रविवार, 28 मार्च 2010

और एक सेक्युलर मुस्लमान न बन पाया ...........

गुनगुना रहे हैं मसक , जग रही है गली गली,

वाह !वाह ! कितना कर्ण पीडक गीत है। यह सुन कर थोडा मूड बना गुनगुनाने का ।

सर्वप्रथम सभी ब्लॉग लिखने और पढने वाले निठल्ले भाईयों को मेरा नमस्कार । उन भाइयों को, जिनका ध्यान शीर्षक में मुस्लमान शब्द पढ़कर इस लेख की तरफ गया है, मैं यह वैधानिक चेतावनी देना चाहता हूँ की यहाँ आपको कुछ भी भड़काऊ नहीं मिलेगा अतः यहीं से वापस लौट जाये। आगे न बढ़ें।

मैं एक मच्छर हूँ।

मैं आपके घर में ही पैदा हुआ और शायद यहीं मर जाऊंगा और आपको पता भी न चलेगा।

क्या कभी अपने एक मच्छर के विषय में सोचा है? जानते हैं एक मच्छर कितना ताकतवर होता है । नहीं पता तो नानाजी से पूछो। ताकतवर होते हुए भी वो कितनी लाचारी की जिंदगी जीता है। कितने खतरे भरे होते हैं एक मच्छर के जीवन में। जरा सोचो आपका शिकार आपके सामने गहरी नींद में है। आप उसका खून चुसना चाहते हो, वो भी ऐसे की उसको पता न चले और aapka पेट भी भर जाये। वो सोता ही रहे। कितना कठिन कार्य है। विल्कुल एक नेता की तरह से काम करना पड़ता है।

कहीं आप इसलिए तो मुझ से घृणा नहीं करते की मैं खून चूसता हूँ? खून चुसना तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। पर जरा अपने भीतर तो झाकों । आपमे से बहुत से ऐसे हैं जिनके पास पेट भरने के लिए दुसरे रास्ते हैं या फिर जिनके पेट पहले से ही भरे पड़े हैं पर फिर भी वो दूसरों का खून चूसते हैं। घृणा करनी ही है तो उनसे करो।

हमारी कौम पर बहुत अत्याचार हुए हैं। आप लोगों ने हमें मिटने के लिए हर संभव उपाय किये हैं पर हमारा जीवट तो देखो हम अभी भी जिन्दा हैं और हमेशा रहेंगे।

कौम पर अत्याचार से मुझे धर्म की याद आ गयी। जब मैं पैदा हुआ तो मुझे नहीं पता था की खून चूसने के अलावा मेरा दूसरा धर्म क्या है? आपको पता है ही की जब हमें अपने धर्म का ज्ञान नहीं होता तो हम सेकुलर कहलाते हैं। वैसे हमारे सेकुलर कहलाने के और भी दुसरे कारण हैं।

मेरे पिता की रगों में एक मुस्लिम का खून था । मेरी माता की रगों में एक इसाई का खून और मेरी रगों में एक हिन्दू का खून बह रहा है। हम मच्छरों में यह संभव है। इसलिए भय्या हुए न हम सेक्युलर। एक दम सो फीसदी सेक्युलर।

इस देश के सभी तथाकथित सेक्युलर मेरे जैसे ही हैं।

ऐसा नहीं है की हम हमेशा ही सेक्युलर बने रहते हैं । कभी कभी हमारे भीतर भी धार्मिक भावनाए उमड़ पड़ती हैं। हम भी राजनैतिक इच्छाएं रखते हैं।

जब बजरंग दल का गठन हुआ तो मेरी रगों के बह रहा हिन्दू रक्त उबल खाने लगा। मुझे लगा की अब मुझे भी इस देश में पूजा जायेगा । मेरे भी मंदिर बनेगें।

मेरे भीतर का मच्छर बहुत खुश हुआ। मैने निर्णय लिया की मैं खुद को हिन्दू घोषित कर दूंगा।

मैं ख़ुशी ख़ुशी कटियार जी के पास गया और उन्हें कहा की वे मेरा चित्र अपनी ध्वजा पर लगायें और मेरा logo इस्तेमाल करें । विनय जी ने मेरी विनती पर कोई ध्यान नहीं दिया और मुझे भगा दिया।

आप ही बताएं क्या मेरा आग्रह वाजिब नहीं था? बजरंग बलि ने एक मच्छर का रूप धरकर ही तो लंका का भ्रमण किया था। तो क्या मैं बजरंग दल वालों के लिए पूजनीय नहीं हुआ? उन्होंने मेरी भावनाओ को ठेस क्यों पहुचाई?

आहत भावना से मैंने निर्णय लिया की अब मैं सेक्युलर से मुस्लमान बन जाऊंगा। सब कुछ तय हो गया। सारी तैयारी पूरी हो गयी थी पर एक technical problem हो गयी जिसकी वजह से मैं इस्लाम न अपना पाया।

कोई मेरा खतना करने को तैयार ही नहीं हुआ। और मैं सेक्युलर का सेक्युलर रह गया।

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब..यह लिखकर की यहा कुछ भी भड़काव नही मिलेगा...आपने इस लेख के प्रति मेरी रूचि और बढ़ा दी...

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  2. अरे, गज़ब कर दिया महाराज।
    शीर्षक से ही छा गये।
    शायद कट-पेस्ट पार्टी भी आती होगी, आपका स्तुति-गान करने।
    भाई जी, आनंद आ गया।
    और ये वर्ड वेरिफ़िकेशन हटा दीजिये,आसानी हो जायेगी हमें, क्योंकि लगता है अब बार बार यहां आना होगा। आखिर हम भी सेक्युलर हैं।

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  3. एक सामयिक जोरदार व्यंग्य.

    आप जारी रहें.

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  4. काफी करारा करारा सा परोसा है जी .....!!
    अच्छा लगा .....!!

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