मंगलवार, 9 मार्च 2010

मेरे मन की व्यथा.

मैं सुबह उठता हूँ रात मैं सो जाता हूँ। दिन में तरह तरह के कार्यों में उलझा रहता हूँ। कुछ समय आफिस में बीतता है और कुछ समय घर पर। कुछ समय परिवार के साथ व्यर्थ करता हूँ कुछ अकेले में। कभी हँसता हूँ कभी रोता हूँ, कभी क्रोध करता हूँ कभी खीजता हूँ। जिंदगी यों ही बीत रही है पर मोक्ष की कामना नहीं करता । आत्मा को परमात्मा से मिलाने के लिए कुछ नहीं करता। हम कहाँ से आये हैं कहाँ जायेंगे? हमारे आने का क्या उद्देश्य है इस प्रकार के प्रश्न मेरे अंतर्मन में नहीं उठते।

मेरा सब कुछ सांसारिक है। मैं खुद, मेरे पिता, मेरी माता, मेरी पत्नी ,मेरे बच्चे, मेरा भाई, मेरे मित्र सब कुछ इस संसार की ही देन है, परालौकिक कुछ भी नहीं। मेरा मन इन्हीं में रमता है। आफिस जाता हूँ काम करना पड़ता है। थक जाता हूँ। घर आता हूँ तो पत्नी अपेक्षा करती है उसके साथ बैठू चाय पियूँ , दो बात अपनी बताऊ और दो बातें उसकी सुनु। पूजा करता हूँ तो मेरी बिटिया मेरी गोद में आ बैठती है। मेरा ध्यान उसकी बाल क्रीडाओं में लग जाता है और मैं भगवन को छोड़ उसकी पूजा शुरू कर देता हूँ। मेरा पुत्र चाहता है सोते समय मैं उसके साथ रहूँ। मेरे बिना उसे नीद नहीं आती। कई बार प्रयास किया इन्हें छोड़ दूँ । अपने लिए अलग से कुछ समय निकालू , कुछ ध्यान करू कुछ आत्मा से परमात्मा के मिलन का उपाय करूँ पर अपने इन सांसारिक बन्धनों से मुक्त नहीं हो पाता। अपनी पत्नी अपने बच्चो को नाराज़ नहीं कर पाता। जाने सिद्धार्थ कैसे अपने सोते हुए पत्नी व् पुत्र को छोड़ कर उस अनादी अनंत सत्य की खोज में निकल पड़े थे? मैं तो अपने बिस्तर से कदम भी नीचे नहीं रख पाता।

मेरे एक मित्र कहते हैं यह पशुवत जीवन है। सभी जानवर ऐसा करते हैं। जीते हैं और मर जाते हैं। आप यहीं तक सीमित न rahen . अपने कल्याण के लिए कुछ करें। आप इस भूलोक में क्यों आये हैं यह जानने का प्रयास करें। कुछ ऐसा करो की उस परम सत्ता में तुम विलीन हो जाओ और जन्म मरण के बन्धनों से तुम्हें मुक्ति मिले।

मुझे यह सब समझ में नहीं आता। मेरा तार्किक मन तर्क करता है। वह अनेकों सवाल पूछता है और मैं भ्रमित हो जाता हूँ।

मेरा मन जानना चाहता है की क्या मैं आत्मा के रूप मैं शुरू से स्वतंत्र था या फिर बाद में उस से अलग हुआ।
अगर मैं पहले उसमे ही समाया था तो फिर उससे अलग क्यों हुआ? और अलग हुआ यह उसकी इच्छा थी या मेरी ?
अब अगर अलग हो ही गया तो क्यों दुबारा से उसमे विलीन होने का प्रयास करूँ?
क्या है यह सब? लोग कहते हैं योग का प्रयास करो मुझे पहले बताओ वियोग हुआ ही क्यों?
क्या अलग होना मेरी गलती थी या फिर उसकी इच्छा? कहींवो खुद ही तो नहीं चाहता की मैं इस संसार में रहूँ। यहाँ के सुख दुःख को भोगु और जब सजा पूरी हो तो वो स्वयं ही मुझे बुला लेगा।

तरह तरह के सवाल मन में उठते हैं। कभी लगता है यह सब पागलपन है और कुछ नहीं। जब अलग होना हमारी इच्छा नहीं थी तो फिर जुड़ने की इच्छा मन में क्यों पालें। इस पर एक कथा ध्यान में आती है। कथा कुछ इस प्रकार से है:

एक बार नारद जी ने यों ही कौतुहल वश भगवान् से पूछा भगवन आपका सबसे बड़ा भक्त कौन है? नारद जी को विश्वास था की उनसे बड़ा भक्त और कोई नहीं हो सकता । भगवान् उनके मन बात समझ गए और उन्होंने कहा की मेरा सबसे बड़ा भक्त पृथ्वी पर वहां रहता है। नारद जी चकित हो गए। वे उस भक्त के घर उसकी भक्ति देखने पहुचे । वह भक्त एक मोची था। वह सुबह उठता नित्य कर्म से निवृत होकर चमडा लाता, जूते बनता, बेचता, अन्य सभी सांसारिक कार्यों को निबटता और सो जाता। ईश्वर का ध्यान, भक्ति, मोक्ष की कामना, मुक्ति के लिए प्रयास, एसा वो कुछ भी नहीं करता था।
नारद जी परेशान।
प्रभु यह कैसा भक्त है आपका जो आपका नाम तक नहीं लेता । पशुवत जीवन जीता है। बतलाइए वो मुझ से श्रेष्ठ कैसे हुआ?
प्रभु बोले " नारद मैं तुम्हें इसका रहस्य बताऊंगा पर तुम पहले मेरा एक काम करो। यह तेल भरा दीपक लो और इस संसार के तीन चक्कर लगा कर आओ। ध्यान रहे तेल की एक बूंद भी छलकने न पाए।"
नारद जी चक्कर लगा कर वापस आए । प्रभु ने पूछा, नारद बताओ तुमने इस दोरान कितनी बार मेरा स्मरण किया। नारद जी बोले प्रभु मेरा सारा ध्यान तो इस बात में लगा रहा की तेल की एक बूंद भी बहार न छलकने पाए । मैं आपका स्मरण कब करता? मेरा सारा ध्यान तो आपकी आज्ञा का पालन करने में ही लगा रहा।
प्रभु मुस्कुराए ! नारद को उनके प्रश्न का उत्तर मिल चूका था।



1 टिप्पणी:

  1. नारद को तो उत्तर मिल गया, आपको नहीं। मुझे भी नहीं। वैसे यह भगवान वाला फंडा ही दोषयुक्त है।
    घुघूती बासूती

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