बुधवार, 26 मई 2010

ब्लॉग जगत में काला बन्दर.

करीब दस वर्ष पहले की बात है हमारी दिल्ली में एक काले बन्दर ने लोगों का जीना हराम कर दिया था. बाद में पता चला की ये mass hysteria यानि की सामूहिक पागलपन का एक उदहारण था. इसके  ज्यादातर मामले भी उन इलाकों में मिले थे जहाँ पर अपेक्षाकृत  काम पढ़े लिखे लोग रहते थे. सामूहिक पागलपन की स्थिति में लोग सामूहिक रूप से किसी भी काल्पनिक विचार या बात  को सच समझ लेते हैं और सही  बात को समझने के लिए अपनी सामान्य बुद्धि का प्रयोग भी नहीं करते. बात चाहे ख़ुशी की हो या गम की पर होती बड़ी मामूली सी है लेकिन  लोग उसे खींच खींच कर बहुत बड़ा बना देते हैं. कोई आदमी एक  बात कहता है, चाहे वो सच हो या झूट, महत्वपूर्ण हो या मामूली सभी उसी पर पिल पड़ते हैं और बात का बतंगड़ बन जाता है.

मैं जब से ब्लॉग जगत से जुड़ा हूँ मैंने अक्सर ही यहाँ पर ब्लोग्गेर्स में ऐसे ही  सामूहिक पागलपन के दौरे  पड़ते देखे हैं. मेरी यादाश्त बहुत गहरी नहीं है अतः पिछले दो तीन हफ्ते से ही उदहारण लूँगा.

करीब दो हफ्ते पहले ज्ञान दत्त पाण्डेय जी के डंके ब़ज रहे थे. उन्होंने समीर जी और शुक्ल जी पर एक चार लाइन की पोस्ट क्या लिखी ,  ब्लॉग जगत में बबाल ही मच गया. चार पांच दिन तक  घमासान होती रही.  जब भी ब्लोग्वानी पर जाओ इसी विषय की पोस्टें दिखती रहीं. मेरी नजर में ज्ञान दत्त जी ने ऐसे कुछ नहीं लिखा था जिस पर इतना बबाल मचना चाहिए था. पर फिर भी बबाल मचा. भाई एक आदमी ने कुछ कहा. आपको ठीक लगा या नहीं उसके ब्लॉग पर ही टिपण्णी कर दो बात ख़त्म.


बड़ी मुश्किल से यह विवाद थमा था की फिर कुमार जलजला जी वाला विवाद उठ खड़ा हुआ. यहाँ भी मुझे राइ का पहाड़ बनता दिखा. फिर चार पांच दिन कुमार जलजला के जलजले में गुजर गए. ब्लोग्वानी पर जहाँ देखो वहीँ कुमार जलजला का जलजला ही दिख रहा था. जलजला ने जिन लोगों के नाम लिए थे उन लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया  दे दी. बात वहीँ शांत हो जानी चाहिए थी पर एसा हुआ नहीं. बेवजह एक बड़ा विवाद पैदा कर दिया गया.

बमुश्किल ये सब थमा तो फिर दिल्ली ब्लोग्गेर्स मीट का तूफान आ गया. दिल्ली में ब्लॉग्गिंग की दुनिया की कुछ जानी मानी हस्तियाँ एक जगह इकठ्ठा हुयी और अपने विचार रखे. बड़ा अच्छा लगा. ऐसी सभाए होती रहनी चाहिए. इस सभा से जुडी तस्वीरें भी देखि . अच्छी लगी. जिन लोगों के ब्लॉग पढ़ते थे उनको सशरीर देखने का मौका मिला. पर इस के बाद एक के बाद एक लगातार इसी विषय पर कई सारी पोस्ट पढने के बाद मुझे अपने बचपन के वो दिन याद आ गए जब दूरदर्शन पर सिर्फ रविवार को फिल्म आती थी और फिर स्कुल में हम सभी बारी बारी से उसी फिल्म की कहानी आपस में अगले रविवार तक एक दुसरे को सुनते रहते थे.

अब आगे हो सकता है की ऐसा ही कोई नया मुद्दा निकल आए जिस के पीछे सभी लोग नहा धोकर लग लें.


क्या ये ब्लोग्ग जगत में mass hysteria के उदहारण नहीं है?  अगर हैं तो क्या ये सामूहिक पागलपन पढेलिखे लोगों में भी होता है या ब्लॉगजगत के लोग पढेलिखे नहीं है.

क्या चक्कर है कुछ समझ नहीं आया.....

(मेरी इस पोस्ट पर अगर आपको गुस्सा आए तो सारा गुस्सा यहीं नीचे टिपण्णी बॉक्स पर थूक देना. बात का बतंगड़ ना बनाना.  और अगर हो सके तो बतंगड़ किस चीज को कहते हैं ये जरुर बता देना.)

25 टिप्‍पणियां:

  1. sahi kaha sir...blog ko srijanaatmak hona chahiye na ki aapsi matbhed bhara...yah ek shashakt maadhyam ban sakta hai...yahan sirf apni pratibha hi na dikhayi jaaye balki ekjut hoke samasyaaon ka nidaan bhi kiya jaaye...desh ki samaaj ki...

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  2. विचार शून्य जी नमस्कार! मै, यहाँ शून्य विचार प्रस्तुत करता हूँ कि टोपिक तो ढूढ़ने मे जरा मेहनत लगती है और शायद यही कारण है कि रेडी मेड आइटम मिल गया तो लगे रहो यहीं। कोई सुलगाये, कोई हवा दे, फिर बढे आग की लपटें। कहाँ लगाये हैं आप भी, यहां तो मौका कैसे झपटें वाला कारोबार है। लगे हैं भाई स्रृजनात्मक लेख मे भी लोग। आप स्वयं ही इसके उदाहरण हैं। दिलीप भाई हैं निरन्तर भावों को पन्क्तिबद्ध करते जाते हैं,अच्छा लगता है। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर। …………जय जोहार।

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  3. सामूहिक पागलपन पढेलिखे लोगों में भी होता है या ब्लॉगजगत के लोग पढेलिखे नहीं है.

    Both are correct:)

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  4. हो जाओ प्यारे तैयार। अगले महीने हम भी आ रहे हैं दिल्ली, रखो तुम भी मिलन समारोह। नई पार्टी का गठन करेंगे।
    पर नाम में मीट नहीं आना चाहिये, नहीं तो पार्टी बनने से पहले ही खत्म।
    हा हा हा

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  5. विचारणीय पोस्ट लिखी है....

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  6. यहाँ ब्लागजगत में भी ऎसे फालतू लोगों की कोई कमी नही....एक ढूंढिए,हजार मिलेंगें....हमने ऎसे भी लोग देखे हैं यहॉ जो खुद को बहुत बडा रचनाकार मानकर बडी बडी डींगे मारते नहीं अधाते लेकिन दूसरे के लिखे के भाव तक को समझने की उन लोगों में बुद्धि नहीं..

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  7. सभी में अनुशासन का होना ज़रूरी है.
    कोई भी अपनी श्रेष्ठता का कैसे कर सकता है. सभी को सदा ही सम्वेदित होके लिखना चाहिये... न कि तोल तराज़ू लिये वणिक बनना है .....

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  8. पाण्डे जी गलत थे इस पर सब सहमत है कोई भ्रम नहीं पालना है किसी को यहां. सार्थक पोष्ट लगातार आ रहीं है लताशिये मिलेंगी ज़रूर.

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  9. @ गिरीश जी अगर किसी को तराजू लेकर वणिक बनाने की आवश्यकता नहीं है तो कोई हाथ में शब्दों का डंडा लेकर निरीक्षक भी नहीं बन सकता और ना ही किसी को जज बनाने की कोशिश करनी चाहिए जो ये बताये की कौन सही है और कोन गलत.

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  10. कोई आदमी एक बात कहता है, चाहे वो सच हो या झूट, महत्वपूर्ण हो या मामूली सभी उसी पर पिल पड़ते हैं और बात का बतंगड़ बन जाता है.
    isliye---- :):)

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  11. excellent commentary i loved the flow and the basic facts are all correct why do you call your self thought less and if you do how about making a sangathan of thoughtless count me in if you do

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  12. @-मेरी इस पोस्ट पर अगर आपको गुस्सा आए तो सारा गुस्सा यहीं नीचे टिपण्णी बॉक्स पर थूक देना...

    agar pyar aa jaye to ?...Is there any other box for that kind gesture?

    Kindly make separate boxes for comments soaked in love, coated with sugar, full of anguish and so on..

    Divya

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  13. आपके विचार एकदम सही है ... दरअसल एक तो यह होता है क बनी बनाई बातें मिल जाती है ... कुछ लिखने के लिए सोचना नहीं पढता और दूसरी बात यह है कि ऐसे लोग सस्ते वाली लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं ...

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  14. अहो बेन्‍दरा के मारे नई बांचय कोलाबारी रे .....

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  15. हमें इस विधा से जुड़े साढे तीन महीने भी ढंग से नहीं हुए हैं.. बड़ी बड़ी आशाओं और विचारों के साथ पदार्पण किया था हमने...किंतु जो झंझावात देखे, वो हमारीआवधारणा को झुठलाते प्रतीत हुए.. आपने तो व्यक्तिवाचक संज्ञा में उदाहरण भी दे डाले.. हम तो इतना भी साहस नहीं कर पाते कि जातिवाचक संज्ञा में ही कह सकें..बस जिस व्रत के साथ आए थे उसी के पालन में लगे हैं… संतोष इतना है कि कई और ऐसे लोग हैं आस पास...

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  16. आपकी खबरिया शैली और उसमें जायकेदार चुटकियाँ पढ़ कर मज़ा आया. संजय जी और वत्स जी की टिप्पणियाँ पढ़ कर अच्छा लगता है. रचना जी और दिव्या जी मुझे बहुत मेहनत करवाते हैं. अंग्रेजी अल्पज्ञता के कारण डिक्शनरी की मदद बार-बार लेनी पड़ती है. उनके कमेन्ट काफी मनोवैज्ञानिक सोच लिये और मंजे हुए होते हैं.

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