बुधवार, 12 मई 2010

पढ़े लिखे, गुणी-लोग विचार शून्यता का अर्थ नहीं समझते.

बहुत पहले की बात है नई दिल्ली में गोल मार्केट के पास योग आसन व अन्य योग क्रियाये सिखाने के लिए एक योग केंद्र खुला था जिसका नाम मुझे ध्यान नहीं पर उसके मुखिया वो स्वामी जी थे जिनकी शायद जम्मू में बंदूकों की फैक्ट्री पकड़ी गयी थी। खेर वो जैसे थे हमें इससे क्या पर उन्होंने हमें स्वामी रामदेव जी के आने से लगभग दो दशक पहले ही योग से परिचित करा दिया था।

मेरे बड़े भाई साहब जो की हिंदुस्तान टाइम्स में कार्यरत हैं, अपनी रात की पाली की नोकरी करने के बाद वहां आसन सिखाने जाया करते थे। उनके साथ मैंने भी वहां जाना शुरू किया। वहां पर हम लोगों ने कुंजल, जल नेति , सूत्र नेति, विभिन्न आसन व अन्य योग क्रियाये सीखी थी। ये सब १९८३-८४ की बातें हैं।

योग जिसे हमारे अंग्रेजी पढ़े लिखे, गुणी-लोग, योगा कहते हैं, का मतलब सामान्य लोगों के लिए सिर्फ आसनो से हैं। पर असल में योग आत्मा को परमात्मा से मिलाने के लिए किये गए सभी उपायों का संकलन हैं। पतंजलि अष्टांग योग में आत्मा को परमात्मा से मिलाने के लिए आठ पायदान बताये गए हैं।

इन आठ पायदानों (स्टेप्स) में सबसे अंतिम पायदान है समाधी यानि की वो स्थिति जब हम उस ईश्वर से एकाकार होने की अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं। उस अवस्था में हम परम आनंद को प्राप्त होते हैं । परम आनंद का अर्थ है ऐसा आनंद जिसका कभी अंत ना हो।

अब थोडा सा प्रकाश मैं समाधी की अवस्था पर डालना चाहता हूँ। समाधी वो स्थिति है जब हमारे मन में विचार आने ख़त्म हो जाते हैं। मतलब की हमारा मन विचार शून्य हो जाता है।

विचार शून्य होने का मतलब है की आपके मन मस्तिष्क में कोई भी अच्छा या बुरा विचार नहीं है। जब आप विचार शुन्य होते हैं तभी आप समाधी की अवस्था को प्राप्त होते हैं।

विचार शुन्य होने का अर्थ भावना शुन्य या संज्ञा शुन्य या बुद्धि शुन्य होना नहीं है।

आम लोग विचार शुन्यता का अर्थ भाव या संज्ञा शुन्यता से लेते हैं । वो ऐसा समझे तो चलता है पर कोई अपने ज्ञान दत्त जी जैसा ज्ञानवान ऐसी बात करे तो मुझे अजीब सा लगता है। पहले भी मुझे कई लोगों की बातों से ऐसा लगा की विचार शुन्य होना कोई गलत बात है पर मैंने उनकी बातों को पढ़े लिखे गुणियों की बात समझ कर टाल दिया पर जब माननीय ज्ञान दत्त पाण्डेय जी ने भी दुसरे गुणी भाइयों की तरह से लिखा की विचार शुन्य शीर्षक अटपटा लगता हैं तो मुझे ये पोस्ट लिखनी पढ़ी।

उनके ब्लॉग पर जाकर अपनी टिपण्णी देने की हिम्मत अब मुझ में नहीं। कल एक छोटी सी टिपण्णी की थी उसके लिए ही बड़े पापड़ बेलने पड़े थे। इसलिए ये पोस्ट प्रकाशित कर रहा हूँ।

सोचता हूँ की पंडित ज्ञान दत्त जी की तरह से ही अन्य पढ़े लिखे गुणी जन मेरे विचार शुन्य होने को मेरा भावना शुन्य या संज्ञा शुन्य या बुद्धि शुन्य होना नहीं समझेंगे।

और अगर समझते हैं भी तो वो जाये तेल लेने ।

कल ज्ञान दत्त जी की शुक्ल और समीर में कोन श्रेष्ठ वाली पोस्ट पर अपनी राय दी तो पाण्डेय जी को मेरा विचार शुन्य होना अटपटा सा लगा। मुझे पहले भी कई लोगों ने यही कहा है इसलिए मैंने अपने शुन्य विचार, पढ़े लिखे और गुणी जनों के अवलोकनार्थ रखे हैं।
( आप सोच रहे होगे मैं बार बार ये गुणी लोग क्यों लिख रहा हूँ असल में गुणी कुमाउनी भाषा में लंगूर को भी कहते हैं और जो व्यक्ति पढ़ा लिखा होने के बावजूद नासमझदारी की बात करता हैं तो मैं उसे प्यार से पढ़ा लिखा गुणी बच्चा कह कर बुलाता हूँ.)

14 टिप्‍पणियां:

  1. चलिए अब भूल जाइए विचार शून्य जी इस पूरे प्रकरण को ! :) मुझे भी अब ब्लॉग पर लगभग २ साल हो गए और इस दो साल में मैं भी उनके ब्लॉग पर बस सिर्फ एक बार ही टिपण्णी कर पाया ! वो भी चिट्ठाचर्चा से सम्बंधित कुछ विवाद था !

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  3. "और अगर समझते हैं भी तो वो जाये तेल लेने"

    कौन सा तेल? खाने वाला या लगाने वाला?
    आज कल तो सब "गुणी" जन एक द्सरे की लगा ही रहे हैं
    इसलिये लगाने वाला तेल लेने जान ही मुफीद रहेगा

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  4. वैसे ये बात मे पहले से जानता था अब आपके इस महान लेख से लोग भी समझ जाएँगे, मैं विचार शून्यता पर लेख तैयार करने ही वाला था जिसका सार ये था की विचारशून्य मानव के विचारों को आम आदमी के थके हुए विचारों के स्तर से बहुत उपर उठा देती है क्योंकि ये विचार मन या मस्तिष्क से परे जाने से प्राप्त मस्तिष्क की प्राक्रतिक शक्ति के सहयोग उठने वाले विचार होते है इस विचारशून्यता के आनंद की अनुभूति लेने वाले इसका महत्व जानते होंगे

    और आपके इस उर्जा से भरे लेख ने ये साबित कर दिया है की विचार शून्यता सचमुच मानव को विचार अभिव्यक्ति की अदभुद क्षमता देती है

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  5. विचार शुन्य होने का अर्थ भावना शुन्य या संज्ञा शुन्य या बुद्धि शुन्य होना नहीं है।
    थारी बात समझ आ गई, इब गुस्सा थूक दे भाई!

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  6. I am loving your 'vichaar' and 'shoonyata' as well.

    Regards,
    Ek Langoor
    [Divya]

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  7. आपकी पोस्ट एक तो लाजवाब होती है और उनपर टिप्पणियाँ भी एक से बढ़कर एक.
    आप नए-नए शब्दों को देकर हमारे शब्दकोष में इजाफा करे रहे हैं.
    दो शब्द समुच्चय हैं — "विचार-शून्य" और " शून्य विचार".
    विचारों के बाद शून्य लगा है इससे ही आपके विचार मूल्यवान हो जाते हैं.
    पहले शून्य लगता है तो कीमत नगण्य हो जाती है. आपने बहुत अच्छे से व्याख्यायित किया 'विचार-शून्यता को.
    हाँ, गोल-मार्केट के पास 'महेश योगी का "विश्वायतन" नामक योग संस्थान था शायद. मेरे बड़े भाई भी जाया करते थे.

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  8. एक सटीक और उम्दा लेख !! बाकी क्या कहू यहाँ तो सब ही 'गुणी' जन है !!

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  9. दीप,
    ये शायद इसलिये है क्योंकि बड़े लोग जरूरी कामों में व्यस्त होते हैं, और हमारे तुम्हारे कमेंट्स पर प्रतिक्रिया दे देते हैं भईया तो तुम्हें तो इसमें भी अहसानमंद होना चाहिये(हालांकि सभी बड़े ब्लॉगर ऐसे नहीं हैं)। यदि एक बार ब्लॉग पर आकर देखें तो आपने इसका अर्थ स्पष्ट कर रखा है।
    मैंने सूरदास के पद ’मो सम कौन कुटिल, खल, कामी?’ से प्रभावित होकर अपने ब्लॉग का नाम ’मो सम कौम?’ रखा था। हम जैसों का तो एक चर्चा में इस बात पर अच्छा खासा मज़ाक भी बनाया गया था। लेकिन मुझे तो ऐसे कमेंट मिले हैं कि सच में ’आप सम कौन’ है :)
    बाकी दोस्त, ये तेल लेने वाली बात जमी क्या?

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  10. शून्य शिखर पर अनहद बाजे जी
    राग छतीस सुनाऊँगा, गाऊँगा
    निरभय निरगुन गुन रे गाऊँगा, गाऊँगा।
    .. यह कबीर नाम के एक गुणी की बानी है :)
    फंडा किलियर करने के लिए धन्नवाद जी !

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  11. भाई ये ज्ञानी दत्त पाण्डेय जी कौन है कुछ दिनो से काफी चर्चा सुन रहा हूँ पर अभी तक मुझे उनके ब्लॉग का पता नहीं मिला खैर आपकी लेखन कला वाकई बेहतरीन है आपके विचारों से सहमत हूँ

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