सोमवार, 3 मई 2010

पुरुष शरीर में तड़पती औरत.

कल के टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुख्या पृष्ट पर " Rose finally blooms into a woman" शीर्षक के अंतर्गत एक खबर छपी थी। रोज वेंकटेशन नामक युवक ने अपना लिंग परिवर्तन करवाया और वो अब पुर्णतः एक पुरुष से स्त्री हो चूका है।

आजकल के ज़माने के हिसाब से देखा जाय तो इसमे कुछ भी अजीब नहीं है पर मेरे दिमाग में यह खबर सारे दिन भर छाई रही।

असल में रोज वेंकटेसन जैसा एक युवक मेरी कालोनी में रहता है। मैंने अपने बचपन से उसे देखा है।

यह युवक सात बहनों का एकलोता भाई है। कालोनी के लोग उसके स्त्रियोचित व्यव्हार को देखकर उसे हिजड़ा समझते थे पर मैं यह सोचता था की यह इतनी बहनों के बीच पला बड़ा है अतः उनकी नक़ल करता होगा। अच्छा, काम भी वो "लेडिज टेलर" का करता था इसलिए मुझे लगता था की वो लड़कियों की तरह से व्यव्हार करता है। पर फिर भी मुझे उसका व्यव्हार बड़ा अजीब लगता था।

बाद में उसके परिवार वालों ने उसकी शादी कर दी। उसकी पत्नी के दो पुत्र और एक पुत्री भी हो गयी। लोगों के हिसाब से ये बच्चे उसके नहीं बल्कि किसी और के थे। जो भी हो शुरू शुरू में तो उसका औरतों जैसा व्यव्हार सिर्फ उसके बोलने , चलने या कभी कभार शाल ओढ़ने के तरीके तक ही सीमित था मतलब की वो कपडे तो लड़कों जैसे ही पहनता था बस शारीरिक हाव भाव से ही स्त्रियों के लक्षण प्रकट करता था । वो जो भी था और जैसा भी था अपने घर तक सिमित था पर एक बार उसके घर की कलह सार्वजनिक हो गयी और सारी कालोनी को पता चल गया की उसके अपने जीजा से ही सम्बन्ध है जो उसके घर पर ही रहता था। कुछ दिनों बड़ा हंगामा रहा , फिर जैसा की आमतोर पर होता है सब शांत हो गया ।

पर इसके बाद से उस युवक में एक परिवर्तन आया . धीरे धीरे उसने अपने बाल बड़ा लिए और अब वो अक्सर सूट सलवार में, हाथो में नेल पोलिश लगाये इधर उधर आता जाता दिख जाता है। इतना भी ठीक था पर अब अक्सर उसके पास कुछ निम्न तबके के लफंगे टाइप लोग आते है जिनका किसी शरीफ आदमी के घर में मौजूद रहना किसी को गवारा नहीं होगा । कहने का मतलब है की उसके मन से समाज क्या कहेगा वाला भय निकल चूका है और वो क्या है ये समाज को बता देना चाहता है।

जब उसके घर में उसके अपने जीजा के साथ संबंधो को लेकर कलह चल रही थी तब उन्ही दिनों मैंने उससे एक बार खुल कर पूछ लिया था की क्या वो एक हिजड़ा है । तब उसने मुझे बताया था की उसका शरीर पुर्णतः एक मर्द का शरीर है और वो बच्चे उसके खुद के हैं जो की शरीर को एक यन्त्र की तरह से इस्तेमाल करने से पैदा हो गए हैं पर वो अन्दर से एक औरत है। उसे औरतों के तरह से रहना , सजाना सवारना पसंद है। उसे मर्दों का साथ भी पसंद है। उसने बताया की असल में दिल से वो एक औरत है।

इन सब बातों से मैं थोडा उलझन में पड़ जाता हूँ। क्या एसा हो सकता है की किसी का शरीर एक आदमी का हो और मन एक औरत का।

क्या ईश्वर या दुसरे शब्दों में कहें की प्रकृति ऐसी भूल कर सकती है की शरीर एक आदमी का बनाये और दिमाग औरत का।

टी वी सीरियल या कहानियों में तो मजेदार लगता है की एक पुरुष की आत्मा औरत के अन्दर और औरत की आत्मा पुरुष के शरीर में घुस गयी पर जब असल जिंदगी में ऐसा होता है तो ये बड़ा दर्दनाक होता है।

जरा सोचे की उस युवक की पत्नी पर क्या बीतती होगी जिसे ब्याहा तो एक पुरुष से गया था पर जो अन्दर से एक औरत निकला। मैंने देखा है उसकी पत्नी को करवा चौथ पर व्रत रखते हुए और उसकी असहज स्थिति पर विचार करके बड़ा दुःख होता है। जब उस युवक के किशोर होते हुए बच्चो को देखता हूँ तो बड़ा बुरा लगता है की उन्हें अपने खुद के पिता की वजह से कितना अपमान सहना पड़ता होगा।

हमारा समाज तो आपको पता ही है की इन विषयों पर क्या सोच रखता है।

दूसरों का तो पता नहीं पर मैं खुद इस प्रकार के लोगों से बड़ी सहानभूति रखता हूँ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. यह पूरा ब्रह्माण्ड पुरुष-प्रकृति के मेल से उत्पन्न है, और यत ब्रह्मांडे तत पिंडे के अनुसार ये इन दोनों ही प्रकृतियों का समावेश मानव शरीर में भी है .
    हर शरीर में नारी और पुरुष के गुण मौजूद होते है . यह प्राकृतिक असंतुलन ही है जो एक पुरुष शरीर में स्त्री तत्व और स्त्री शरीर में पुरुष तत्व की प्रधानता हो जाती है.
    मेरे विचार से तो जिस तरह अन्य जन्मजात शारीरिक विकलांगताओं पे किकी का बस नहीं है उसी तरह इसे मान सकते है.
    लेकिन जिस तरह दूसरी विकलांगताओं पे साइंस की मदद से पार पाया जा सकता है, उसी तरह इनकी भी उचित व्यवस्था हो सकती है.
    आगे राम जी मालिक !!!!

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  2. ऐसे 'पुरुष' को एक महिला से विवाह करके उसका जीवन बर्बाद करना नहीं चाहिए था... उस महिला के प्रति सिर्फ़ सहानुभूति ही जताई जा सकती है...

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  3. आपका विषय चयन हमेशा ही अलग लेकिन समसामयिक रहा है!

    अमित भाई ने सही कहा है....
    "आगे राम जी मालिक !!!!"

    कुंवर जी,

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  4. आपका उससे सहानुभूति रखना, आपको निरंतर यह अहसास भी देता होगा कि चलो मैं ऐसा ना हुआ.

    प्रायः अमीर आदमी गरीब के प्रति, पढ़ा-लिखा व्यक्ति अनपढ़ के प्रति, धार्मिक मनुष्य नास्तिकों के प्रति, स्वस्थ सुडौल शरीर वाला विकलांगों के प्रति, सामर्थ्यवान असहायों के प्रति सहानुभूति करते पाए गए हैं.

    जो जहाँ है उसे वहाँ की आदत पढ़ चुकी है. वह उसी परिवेश में प्रसन्न है. मैंने एक बार अपने नज़रिए से सोचा और एक कीड़े को तकलीफ में जान गोबर से निकाला और उसे पानी में डाल दिया, कुछ समय बाद देखा कि वह वापस गोबर में घुसने की कोशिश कर रहा था.

    समझिये, जिसको जैसी आदत डालेंगे वो वैसा ही बन जाएगा. आपने जंगल में भेड़ियों के बीच पले बच्चे के बारे में सुना होगा. उसे इंसानों ने अपनी इंसानियत के कारण सहानुभूतिवश अपने समाज में रखना चाहा था. ... पर सब बेकार. ....

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  5. दीप,
    देखने-सुनने में ऐसी बातें अस्वाभाविक लगती हैं, लेकिन इस दुनिया में सब कुछ संभव है। अगर व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात करें तो जो जैसे रहना चाहे, रह सकता\सकती है, लेकिन दूसरे पक्ष मसलन जीवनसाथी या बच्चों या दूसरे परिवार वालों की बात करें तो उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का क्या होगा?
    आप बहुत संवेदनशील विषय उठाते हैं,और रोचक तरीके से। बधाई

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