गुरुवार, 6 मई 2010

जी हाँ मैं हूँ गेन-फट-राय जो डेली-मे-रेटा है.

गणपत राय जो दिल्ली मे रहता था से एक अंग्रेज, जिसे टूटी फूटी हिंदी आती थी, ने उसका नाम और रहने की जगह के बारे मे पूछा तो गणपत राय ने बता दिया, " साहब मैं हूँ गणपत राय , मैं दिल्ली मे रहता हूँ।

अंग्रेज ने दोहराया," टुम गेन फट राय , टुम डेली-मे-रटा। और गणपतराय अंग्रेज से नाराज हो गया।

ये बहुत पुराना चुटकला है (अगर किसी को ऐसा लगे तो) जो मैंने मंडावली के सरकारी स्कुल मे सीखा था।

आज मैं चुटकले सुनाने के मूड मे नहीं हूँ। और ये चुटकला भी नहीं है। मुझे लगता है की ये मेरी असलियत है।


कल से मैं दुखी हूँ। कल ऑफिस मे सुबह दस बजे से लेकर रात आठ बजे तक गधे की तरह से काम मे लगा रहा। आप सोचेंगे ऑफिस मे ही तो काम कर रहा था इसमे अनोखा क्या है?

मैं एक सरकारी वेतन एवं लेखा कार्यालय मे एक यु डी सी यानि की अपर श्रेणी का कलर्क हूँ। इस ऑफिस मे मेरा काम है पास हुए बिलों की सही अकाउंट मे पोस्टिंग करना। इसके बाद मेरी ऑफिसर का काम शुरू होता है जोकि है पुरे महीने मे पास हुए बिलों का मासिक अकाउंट बना कर हेड ऑफिस भेजना। पर असल मे क्या होता है की मैं ही महिना भर बिलों की पोस्टिंग करता हूँ और फिर महीने के अंत मे खुद ही मंथली अकाउंट बना कर हेड ऑफिस मे जाकर दे कर आता हूँ । मेरी ऑफिसर सुबह ११ बजे ऑफिस आती है और ५ बने अपना बैग उठा कर सबको टाटा करती हुयी घर चली जाती है।

मेरे दोस्त लोग पूछते हैं की मैं क्यों एक गधे की तरह काम करता हूँ । मेर दोस्तों को लगता है की मैं पिस रहा हूँ और वो मौज कर रही है। उन्हें समझ नहीं आता की अकाउंट की इस सुखी सीट पर मैं इतना काम क्यों करता हूँ।

दोस्त लोग पूछते हैं की क्या मैं डरता हूँ। क्या मेरी ऑफिसर के सामने फटती है जो मैं उसका विरोध नहीं कर पाता। हमारे वेतन एवं लेखा कार्यालय मे अकाउन्ट्स विभाग मे महीने के शुरू के पांच दिन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि हमें पिछले महीने का सारा हिसाब किताब अपने हेड ऑफिस मे जाकर देना होता है। इन दिनों अकाउन्ट्स मे किसी को छुट्टी नहीं मिलती। पर हमारी ऑफिसर को मिल गयी क्योंकि उनका सारा काम मैं कर देता हूँ। ये दोस्त लोगों को पसंद नहीं। वो पास आकर मुझे चिढ़ा जाते हैं। पाण्डेय यार तूम बड़े सीधे हो। ये शब्द मुझे गाली की तरह से लगते हैं।

क्या करूँ? मैं हूँ ही ऐसा । जाने क्यों मैं दबता हूँ। जाने क्यों मैं औरों की तरह से साफ़ साफ़ मना नहीं कर पाता? कह नहीं पाता की ये मेरा काम नहीं हैं इसे मैं नहीं करूँगा। मुझे हमेशा से ये लगता रहा की ऑफिस गए हो तो कुछ काम ही कर लो। बस यहीं से मेरी दुर्दशा शुरू हो जाती है। लोग बाग़ अपनी टेबल पर फाइलें सजा कर रखते हैं और मैं अपना काम जल्दी ख़त्म करके दुसरे की सहायता करना शुरू कर देता हूँ। फिर होता क्या हैं की वो काम भी मेरे ही सर मढ़ दिया जाता है। आज तक जिस भी ऑफिस मे मेरा ट्रान्सफर हुआ है सभी जगह मेरे साथ यही परेशानी रही है। हर नयी जगह सोचता हूँ की अपने काम से काम रखूँगा और किसी से ये नहीं कहूँगा की हाँ मैं ये कार्य कर सकता हूँ पर नहीं जब भी ऑफिस मे कोई काम फस देखता हूँ तो खुद ही आगे आ कर अपने गले मे घंटी बंधवा लेता हूँ। फिर जब लोग मुह पर सीधा और पीठ पीछे चूतिया की उपाधि देते हैं तो बुरा लगता है.

अपनी आदतों की वजह से मैं वही गेन-फट- राय बन गया हूँ जो डेली-मे-रेटा है।


11 टिप्‍पणियां:

  1. Ha,ha,ha! Yah 'aqlmandi' maibhi karti hun..farq yah,ki,jinka kaam kar deti hun, unheen se bura bhala sunti hun! Aur to aur' kisne kaha tha tumse karneko'...yah bhi..Aapka aalekh padhke badi shanti mili manko!

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  2. दीप,
    कंटेंट चोरी का इल्ज़ाम तुमपर लगाने जा रहा हूं मैं, तैयार हो जाओ मुकदमे के लिये।
    ये तो मेरी कहानी है यार। कुझे लिखनी थी अपनी आत्मकथा में ये सब, जब मैं बहुत मशहूर हो जाता...)
    दोस्त, समझदारी, ईमानदारी के कीटाणु जिसे डस लेते हैं, उन्हें इन सब के लिये तैयार रहना ही पड़ता है। वैसे अब चाहोगे तो भी बदल नहीं पाओगे खुद को।
    जो गुडविल आपकी बनेगी, उसके सामने दोस्तों के द्वारा दी जाने वाली उपाधियां बहुत बौनी हैं।
    हम तो कहेंगे बने रहो ऐसे ही कामी(काम ज्यादा करते हो न, इसलिये कहा है)।

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  3. यार, हम सब की ही लगभग यही कहानी है, सो लगे रहो भैया !!

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  4. हमारी कंपनी में हर महीने हर विभाग से एक या दो कर्मचारियों को कार्य-प्रशंसा-पत्र मलते हैं. एक बार एक को मिला दूसरी बार दूसरे को, तीसरी बार तीसरे को. इस तरह हर महीने जो भी समर्पित भाव से अधिक समय देकर काम करता उसे सम्मान और पुरस्कार मिलता.

    एक बार हमारे लगभग सभी साथियों ने जी-तोड़ काम किया. लेकिन उस महीने हमारे विभाग से किसी को कोई सम्मान और पुरस्कार नहीं मिला. क्योंकि पुरस्कार लिमिटेड होते है उसके लिए एक-दो व्यक्तियों का ही काम सरहाया जाता है. सभी का नहीं.

    जब हरामखोरी करने वाले नहीं होंगे तो गधे की क्या उपयोगिता रह जायेगी. इसलिए सभी का होना ज़रूरी है मित्र. कभी निराश नहीं होना. बोझा ढोते रहो.

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  5. सुना हुआ था पहले भी पर
    आपका अंदाज बहुत अच्छा था परस्तुती का

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  6. सही कहा बाबूजी आपने, वैसे तो आप जैसे गधे की तरह काम करने वाले कम ही होते है,लेकिन होते सभी जगह है. उस पे भी अकाउन्ट्स का काम तो सबसे बुरा है सारा दिन मगज मारी करते रहो, फिर भी किसी को दया नहीं आती बोलते है "तुम्हारे तो मौज है यार सारा दिन कंप्यूटर से खेलते रहते हो, ठण्ड में "
    एक "गधा-पिदाई मुक्ति संघ" बनाना चहिए :>)

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  7. ye kaamchori bhee ek art hai bhai. isilye me sarkaari naukri se door bhagata hoon

    (meri bhee badi lagan se kaam karne ki aadat hai)

    sarkaari karyalay hi aisi jagah hai jo aksar kaamkaji logon ke liye maha peeda-dayee hoti hai

    sahi kahaa naa maine ??

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  8. बुरा क्या है जी इसमें
    आप खुशी से करते हो, यह आपका स्वभाव है, जबतक कोफ्त ना हो करते रहो।
    जिसदिन आप छुट्टी पर रहोगे, सब आपको ही याद करेंगें।
    और जब तंग पाओगे तो दूसरों के हिस्से का कार्य करना अपने आप छूट जायेगा।
    प्रणाम

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  9. "अपनी आदतों की वजह से मैं वही गेन-फट- राय बन गया हूँ जो डेली-मे-रेटा है।"

    shabdo ke maayne hi badal diye janaab aapne to!
    bahut khoob!
    kunwar ji,

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  10. prisansa partra--by pandit rakesh pandey----------AAP KUTTEY HANY KYONKEE BAFAADAAR HANY,AAP GADHEY HANY KYONKEEY BOGHH DHOTEY HANY.AAP SUAR HANY KYONKY APNEY BOSS KEE GANDGEE KO SAAF KARTEY HANY.AAP BAHOOT AACHEY AADMEE HAY.AAJ KAL KUTTEY GADHEY SUAR KAHNY MILTEY HANY.DUKHEE MAT HO AAP ACHEY AADMEE HO.astrologer.pandey@gmail.com-

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