रविवार, 29 मई 2011

निहारना या घूरना.


कल शाम अपनी बिटिया के साथ सब्जी मंडी में एक दुकान पर प्याज छाट रहा था की देखा मेरी बिटिया सब्जी वाले को घूरे जा रही है. सब्जी वाला खरबूजा खाने में मगन था. मेरी बिटिया सब्जी वाले के एकदम बगल में ही खड़ी थी और निसंकोच उसे एकटक घूरे जा रही थी. पता नहीं उसका मन इस चीज के लिए ललचा रहा था या फिर वो सब्जी वाले के खरबूजा खाने के स्टाइल पर आश्चर्य चकित थी. प्याज लेने के बाद मैं बिटिया को लेकर पास में ही खरबूजे बेच रहे दुकानदार के पास गया और बिटिया को खरबूजे दिखाए तो उसने खरबूजों में जरा भी रूचि नहीं ली बाकि उसे लाल तरबूज ज्यादा पसंद आए. मैंने थोडा हिचकते हुए (क्योंकि आजकल जब  तरबूजों की चीनी  कम होती है तो  कृत्रिम उपाय अपना कर उसे बढ़ा दिया जाता है )  एक छोटा लाल चीनी तरबूजा लिया  और घर के लिए वापस लौट आया.

घर लौटते हुए मेरा मन हमारे घूरने की आदत पर ही अटका रहा. मुझे लगता है की कहीं न कहीं घूरने की आदत मानव स्वाभाव का ही एक हिस्सा है जो बाल्यकाल से ही हमारे साथ होता है. जैसे जैसे हम सामाजिक तौर तरीके सीखते जाते हैं या दुसरे शब्दों में कहूँ की हम सभ्य होते जाते हैं तो  हम अपनी इस आदत पर लगाम कसते जाते हैं.  

घूरना  का  एक भाई  भी है जिसे हम कहते हैं निहारना. घूरने और निहारने में क्या अंतर है? इन दोनों में वही अन्तर है जो राम लखन फिल्म के राम और लखन में था.  किसी को घूरना  एक सभ्य समाज में एक बुरी बात समझा जाता है पर आप किसी को भी प्यार से निहार सकते हैं. स्त्रियाँ निहारे जाने को तो पसंद करती हैं पर घूरे जाने को बिलकुल भी पसंद नहीं करती. मेरे एक मित्र निर्दोष भाव से सुन्दर स्त्रियों को निहारना पसंद करते हैं. मैंने उन्हें बताया की आप अपने घर की स्त्रियों को निहार सकते हैं पर परायी नारी  को देखेंगे तो इसे  बुरा समझा जायेगा. इस पर उन्होंने जो सफाई दी वो मुझे बहुत पसंद आयी . उन्होंने कहा की उनके निहारने या घूरने की आदत पर उनका कोई बस नहीं है. सारा कसूर निगाहों का है जो सीधी सपाट और समतल जगहों पर से तो फिसल जाती है पर वक्रता और गोलाई लिए हुए हर चीज पर टिकी रहती है.

उसकी बनियान मेरी बनियान से सफ़ेद कैसे.


हम भी क़यामत पर नज़र रखते हैं.

लगभग हर पुरुष सुन्दर स्त्री को निहारना पसंद करता है पर ये उसकी बदकिस्मती है की उसका किसी सुन्दर स्त्री को प्रशंसा की निगाह  से निहारना घूरने में परिवर्तित हो जाता है और उस बेचारे को सभ्य समाज के सामने थोड़ी शमिंदगी उठानी पड़ती है. मैं जब भी किसी सार्वजनिक स्थल पर होता हूँ  तो  मेरा समय आसानी से ये देखने में बीत जाता है की कौन आदमी किस को घूर  या निहार रहा है.  ये बहुत मजेदार खेल है. मुझे सबसे ज्यादा तब मजा आता है जब किसी सुन्दर स्त्री को कोई दूसरी स्त्री निहार रही होती है और वो खुद इस बात से बेखबर होती है की कोई और (मेरे जैसा) उसे भी बड़ी तन्मयता से निहारे जा  रहा है.

घूरने और घूरे जाने का ये चक्र बड़ा मजेदार होता है. मैंने कहीं पढ़ा था की स्त्रियाँ बनाव श्रृंगार करती ही निहारे जाने के लिए हैं. अगर आपके बनाव श्रृंगार को देखने वाला कोई न हो तो उसका फायदा ही क्या परन्तु किसी अजनबी द्वारा  घूरा जाने उन्हें पसंद ही नहीं होता. पर यार अगर आप कहीं मीठा रखो और ये सोचो की सिर्फ आपकी पालतू मधुमक्खियाँ ही आयेंगी तो ये आपकी गलती है. हमेशा ये धयान रखो की मीठे पर मधुमक्खियाँ आयें या न आयें गन्दगी पर मंडराने वाली मक्खियाँ जरुर आयेंगी अतः उनसे बचने का कोई न कोई बंदोबस्त हमेशा ही करके चलो.
हमें किसी को घूरने से मिलता क्या है? मैं जब भी खुद को ऐसी स्थितियों में रंगें हाथो पकड़ लेता हूँ तो हमेशा अपनी गिरेहबान में झांक  के  यही सवाल पूछता हूँ की बेटे तुझे मिला क्या.  किसी को चोरी छिपे कनखियों से निहारना  या घुरना मालूम नहीं जाने कौन सा गूंगे का गुड है जो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. हम बरबस ही इस और खिचे जाते है.

चलो जो भी हो उन सभी लोगों को मेरा प्रणाम जो बेफिक्र हो दूसरों को घूरते हैं और साथ ही साथ एक छोटा सा सन्देश की  

" देखि जां पर छेड़ी ना ".


 इस भाव को अंग्रेज कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं.

25 टिप्‍पणियां:

  1. सहज विचारपूर्ण रवानी.
    हम तो बस देखने वालों की नजर देख रहे हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  2. मतलब , आप अपना समय दूसरों को घूरने में लगाते हैं कि वे किसे घूर रहे हैं ! बढ़िया है .....

    उत्तर देंहटाएं
  3. घूरने वाले तेरा मुंह काला -नजरें बड़ी कातिल होती हैं . कत्ल भी नजरों से हो जाते हैं -इसलिए ही घूरने का इतना खौफ है!
    पहला प्यार भी इसी तरह पहली निगाह में हो जाता है -पुरुष के लिए तो नहीं मगर औरत के लिए तो यह भरी पद सकता है -मामला कई महीनों की फजीहत -घूरने वाले की संतान की बोझा ढोने तक जा सकता है ...तो इस मामले में ऐसे ही सड़क चलते जो भी हो घूर ले तो उसे सहज स्वीकृति कैसे मिल सकती है ?
    बच्चों का घूरना बस जिज्ञासा वश ही है ! या लालच वश !

    उत्तर देंहटाएं
  4. सतीश सर शुभकामनायें बिना आपकी टिप्पणी कुछ अधूरी सी लगती है. मुझे शुभकामनाएं देने में आपने कंजूसी क्यों बरती.... चलिए निकालिए मेरी वाली शुभकामनायें अपनी झोली से....

    उत्तर देंहटाएं
  5. I have read somewhere "I like to watch a man who watches a girl." अभी इस घूरे जाने के वर्णन को पढ़ते समय इस पंक्ति की याद आ गयी. उसे देखना अधिक रोचक होता है जो किसी को घूरता है, एक बार तजुर्बा कर देखियेगा.

    उत्तर देंहटाएं
  6. घुराना हो तो बनारस की गलियों में घूमें...घूरना हो तो नैनिताल के मॉल रोड में चले जांय। हर जगह घूरने-घुराने का मजा थोड़े न मिलता है!

    कौतूहल से अजूबा देखना और बात है लेकिन घूरना तो घोर बद्तमीजी है। महिलाओं से अधिक तो महिलाओं के साथ चलने वाले पुरूष मित्र को तकलीफ होती है।

    नारी का देखना निहारना और पुरूषों का देखना घूरना कैसे हुआ! इस पर भी प्रकाश डालने का कष्ट करें।

    उत्तर देंहटाएं
  7. .
    .
    .
    सौन्दर्य को निहारना ( या घूरना भी ) मुझ से स्वयंमेव हो जाता है... औेर निश्चित तौर पर सुन्दर स्त्रियाँ प्रकृति की एक अनमोल देन हैं... मैं तो साथ चल रही महिलाओं से मेरे इस निहारने ( या घूरने ) को लेकर अक्सर डाँट भी खाता रहता हूँ... पर क्या करूँ कन्ट्रोल ही नहीं होता... ;) वैसे मुझे अपनी इस आदत को लेकर कोई अपराधबोध नहीं है...



    ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. विचार शून्य जी ,
    मुद्दे पर टिप्पणी तो ज़रूर करता पर फिलहाल सतीश भाई को लेकर चिंतित हूं , पिछले कुछ दिनों से वे लजाई / सकुचाई / घबराई / अकुलाई /कसमसाई सी टिप्पणियां करते नज़र आ रहे हैं ! :)

    गुज़रे साल में वे काफी तगड़ी फ़ार्म में थे पर अब ? कहीं ऐसा तो नहीं कि भाभी जी ने उनकी ब्लॉग गतिविधियों को घूरना / पर निगाहें तरेरना / रखना शुरू कर दिया हो ? :)

    या फिर कोई और मसला जो ब्लॉग जगत से लंबी अनुपस्थिति के कारण मुझे समझ में नहीं आ रहा हो :)

    उत्तर देंहटाएं
  9. भूल गए यार ....
    बुढ़ापे में सब चलता है ....याद दिलाने के लिए आभार ! कुछ समय से चटपटा लिख रहे हो, अच्छा लगता है :-)
    शुभकामनायें स्वीकारें !

    उत्तर देंहटाएं
  10. @ अली सर ,
    अन्य पारिवारिक जिम्मेवारियों के कारण, ब्लॉग जगत में समय थोडा कम दे पा रहा हूँ ! आप जैसे मित्रो का स्नेह है कि अभी तक मन लगा रहा है !
    आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  11. अच्छा दृष्टि'कोण' है आपका!! इस तरह घूरने वालों को घूरने का दृष्टिपात तो उल्कापात ही हो जाएगा, न। पहली बार देखा कि टिप्पणी से भी किसी को घूरा जा सकता है। घूरते ही सतीश जी के मुंह से बरबस शुभकामनाएँ निकल पडी। बच्चों का घूरना तो कौतुहल वश होता है। वे लोगों की भंगिमाएँ देख उनके मन में गहरे उतर जाते है। बेटी उसकी भंगिमा देख निश्चित कर रही होगी-'खरबूजा इसे कितनी मात्रा में मीठा लग रहा होगा?'राहुल जी नें उडती नजर डाली तो अरविन्द जी दूरदृष्टि डाल रहे है। प्रवीण शाह साहब को चक्षुरिन्द्रिय क्या किसी भी इन्द्रिय-अतिरेक से अपराधाबोध नहीं हुआ करता। अली सा की दृष्टि तो लेख से फिसल कर सतीश जी को आपके द्वारा दी टिप्पणी में ही उलझ गई।………मैने तो घूर कर देखा तो यही दृष्टिगोचर हुआ। गहरी नज़र से तो नहीं बस!! विहंगम दृष्टि डाली है। वैसे मुझे भी घूरने वाले को घूरना अच्छा लगता है। मैं उसके पकडेजाने के अपराधबोध का दर्शन कर लेना चाहता हूँ। इस दृष्टिवेध का क्या दर्शन है, सर्वदर्शी ही जाने।

    उत्तर देंहटाएं
  12. तस्वीर मजेदार है .. आखिरी वाली :)

    उत्तर देंहटाएं
  13. ठंडी आँखें, गरम आँखें ,शरारती आँखें, भींगी आँखें (अब तो पलकें भी ), नम आखें ,कातिल आँखें ,चोर ऑंखें ,सीना जोर ऑंखें ,
    ..यह वर्गीकरण देखने और घूरने से ही तो बने हैं ...
    वैसे घूरना (गेजिंग )लगातार घूरते जाना अशिष्टता है .....
    घूरने के भी अपने कायदे क़ानून होते हैं ..
    प्रवीण शाह सही कहते हैं कि ऐसे सौन्दर्य से प्रायः पाला पड़ जाता है कि आँखें साली बरबस उधर ही जाती रहती हैं बार बार ...
    अपलक सी हो रहती हैं ......
    जब सीता जी ने राम को देखा तो वे अपलक रह गयीं -और पलकों पर निवास करने वाले उनके पूर्वज निमि सकुचा गए .....
    और जब दोनों और से ऐसे ही अपलक देखा देखी शुरू हो जाय तो समझिये कुछ होने वाला है ...
    धरती का घूमना रुकने वाला है या फिर कोई ज्वालामुखी फिर से दहकने वाला है ....या भूकंप आपने वाला है ....

    उत्तर देंहटाएं
  14. मोटा-मोटा एक अन्‍तर तो मेरी समझ में आ रहा है कि निहारना हमेशा प्रेम पूर्वक होता है और घूरने में आक्रोश का भाव अधिक रहता है। जब आपको कोई महिला अच्‍छी लगती है तब आप प्रेम से उसे निहारते हैं लेकिन जब उसी महिला के कारण आपके मन में बेचैनी होने लगे तब आप उसे घूरने लगते हैं। अधिक व्‍याख्‍या नहीं करूंगी नहीं तो स्‍वस्‍थ चर्चा भी घूरने में ही चले जाएगी।

    उत्तर देंहटाएं
  15. विपरीत लिंग का देखना हमेशा घूरना ही कहलाता हैं
    आज तक आप ने कभी किसी लड़की को या लडके को ये कहते सुना हैं हैं "देखो मुझे निहार रहा हैं / निहार रही हैं "

    वैसे घूर शब्द का अर्थ होता हैं कूड़े का ढेर तो घूरना का अर्थ क्या होना चाहिए कोई भाषा विज्ञान में पारंगत बता सकेगा .

    उत्तर देंहटाएं
  16. एकाग्र घूरने से ज्ञान बढ़ता है,
    आँख तरेर घूरने से काम बनता है ।
    बेबाक घूरना अगले की चोरी पकड़ाता है ।
    रसीले अँदाज़ में घूरना बहुधा जूते पड़वाता है ।
    इति सिद्धम,
    घूरने का गुण-दोष परिस्थिति के लक्षण-उपचार पर आश्रित है ।

    @ रचना जी...
    मैं रोज सबेरे कबाड़ियों को कूड़ा घूरते टहलते हुये पाता हूँ,
    अर्थात, कूड़े को घूरना अपने मतलब की चीजें टटोलने वास्ते होता हैं । :)

    उत्तर देंहटाएं
  17. कूड़े को घूरना अपने मतलब की चीजें टटोलने वास्ते होता हैं । :)

    hats of dr amar for this line
    the summary of the whole post came there in

    उत्तर देंहटाएं
  18. घूरने से आगे ??

    (18-11-1994 की वो पाती, जो पाती तो - -)



    हम जानते हैं 'रविकर', जिस चीज की जरूरत

    जो ढूंढ़ते हो आशिक - महबूब खूबसूरत !

    न खूबसूरत हूँ मैं, गबरू-जवान इतना

    पर प्यार पूरा पाए, तू चाहती है जितना

    तुझसे न कुछ भी चाहूँ , चाहूँ तो बात इतनी

    मीठी औ मद्धिम बोली, मधु में मिठास जितनी

    इक आँच सी लगे है, जो पास तेरे होता

    तू साथ मेरे होती, सपने रहूँ पिरोता

    मस्ती तुम्हारी देखी तेरा बदन निहारा

    ऐ जान जाने-जाना, दे दे तनिक सहारा

    तुझ सा न मैंने कोई, है खूबसूरत देखा

    मलमल सी काया सुन्दर, हाथों की भाग्य-रेखा

    गर हो इजाजत तेरी, इक बार छू के देखूं

    इक बार छू के देखूं , दो बार छू के देखूं
    इक बार छू के देखूं , दो बार छू के देखूं
    2 बार छू के देखूं , 100 बार छू के देखूं

    उत्तर देंहटाएं
  19. माननीया अजीत गुप्ता जी की टिप्पणी दोनों क्रियाओं के अंतर को स्पष्ट करती है।
    ’देखी जा, छेड़ी नां’ वाली बात लिखकर मेरी एक पोस्ट का मिसकैरिज कर दिया है श्रीमान जी:)

    उत्तर देंहटाएं
  20. अँग्रेज़ी मे एक कहावत है- "Beauty is to see not for touch" तो भाई देखे जाओ.

    उत्तर देंहटाएं
  21. shriman
    aap ki gurne ki samajha ne ek bat to samzha di ki gurne wale tujhe bhi koi ghur raha he.

    Paritosh

    उत्तर देंहटाएं
  22. Always so interesting to visit your site.What a great info, thank you for sharing. this will help me so much in my learning.
    karachi online shopping

    उत्तर देंहटाएं
  23. With Microsoft office 2010, you can get things done more easily, from more locations and more devices.Track and highlight important trends with data analysis and visualization features in office 2010 Excel

    उत्तर देंहटाएं