मंगलवार, 10 मई 2011

क्या साहित्यकार कागज पर अभिनय करते हैं.

एक अभिनेता विभिन्न लोगों की नक़ल उतरने में माहिर होता है. सबसे पहले वो लोगों के भावों को भली भातीं पढ़ता है  फिर  उनकी हु- बहु नक़ल उतर देता है. जिस चरित्र की वो नक़ल उतर रहा होता है जरुरी नहीं की वो चारित्रिक गुण अभिनेता के व्यक्तित्व में भी समाये हों. मानो की एक अभिनेता किसी साहसी व्यक्ति का अभिनय कर रहा है. अगर वो अच्छा अभिनेता है तो उसके प्रदर्शन को देख कर आपको लगेगा की वो एक साहसी व्यक्ति है चाहे अपने निजी जीवन में वो कितना ही डरपोक क्यों न हो. इसी तरह से यदि कोई माहिर अभिनेता एक ईमानदार व्यक्ति का किरदार निभा रहा है तो आम व्यक्ति को लगेगा की वो सच में एक ईमानदार व्यक्ति है जबकि हो सकता है की वास्तविक जीवन में इस अभिनेता का ईमानदारी से दूर दूर का वास्ता न हो.

मैं जब भी किसी साहित्यकार के लेख पढता हूँ तो यही सोचता हूँ की ये व्यक्ति भी कागज के मंच पर शब्दों के मुखोटे  की सहायता से किसी एक विशेष चरित्र को जी  रहा है. कभी किसी लेख में  साहित्यकार एक ईमानदार व्यक्ति होता है, कहीं माता का भक्त, कहीं मानवता का पुजारी, कहीं धर्मं का रक्षक और कहीं एक बहुत बड़ा देशभक्त. साहित्यकार के भी बहुत से रूप होते हैं. जो कागजी अभिनेता जितनी  बारीकी से अपने किरदार के गुण दोषों को कागज के मंच पर जीवित कर देता  है  वो उतना ही बड़ा साहित्यकार कहलाता है.

एक साहित्यकार कागज पर जो कुछ लिख रहा है जरुरी नहीं की वो अपने वास्तविक जीवन में भी उन गुणों को अपनाता है . वो अपने हर लेख, हर कविता और हर  कहानी  के साथ एक नया किरदार निभा रहा होता है.

इस ब्लॉग जगत में भी ढेरों साहित्यकार भरे पड़े हैं जो बड़ी सजगता से अपनी एक विशेष छवि रचते रहते हैं.

इन सभी साहित्यकारों को मेरा प्रणाम.


16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब पाण्डेय जी ... हमारा भी प्रणाम लीजियेगा !

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  2. निष्कर्षों पर पहुँचने में आप हमेशा बड़ी जल्दबाजी करते हैं.
    प्रणाम.

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  3. ये क्या मिश्र जी मुझे से ज्यादा जल्दबाज तो आप निकले जो बिना कुछ कहे ही निकल लिए. मेरी कही बात में अगर कहीं कोई गलती दिखाई दी है तो कम से कम मेरा मार्ग दर्शन तो कर जाते.

    मेरा बचपन से ये दुर्भाग्य रहा है कि मेरी कही बात का लोग सीधा उत्तर नहीं देते बस इधर उधार कि बात कह खिसक लेते हैं और जब मैं किसी कि बात का सीधा उत्तर देता हूँ तो बुरा मान जाते हैं. खैर आपके दुबारा लौटने का इंतजार करता रहूँगा.....

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  4. यह विषय मेरा भी अपना प्रिय विषय रहा है -अभी कुछ दिन पहले इसी पर लिखने की प्रस्तावना बनी थी -मगर दूसरी बातें आ गयीं -शब्दशः सहमत ...
    मैं तो यह भी सोचता हूँ लेखक ही नहीं हर सृजनकार कलाकार ऐसा ही करता है -गायक कोई जरुरी नहीं गाने की संवेदना रखते हों ! ब्लागजगत भी कोई अपवाद नहीं -यहाँ एक से एक भरे पड़े हैं ! यहाँ आत्म प्रमोचन अधिक है !

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  5. वैसे तो जवाब देने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की बनती है जिन्हें प्रणाम भेजा है फिर भी - जो नकली हैं वे साहित्य में नहीं आते तो भी उतने ही नकली होते। ... और जो असली हैं उन्हें किसकी गवाही की ज़रूरत है?

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  6. पांडे जी, अदाकार और साहित्यकार की तुलना करते समय आपको उनमें मौजूद कुछ अंतर ध्यान में रखने पड़ेंगे.
    पहली बात तो यह कि 'क्या यह ज़रूरी है कि इस बात की पड़ताल की जाए कि कोई अदाकार या साहित्यकार निजी जीवन में वैसा ही है जैसा वह मंच/परदे पर या अपनी कृतियों में दिखता है?'
    यदि ऐसा है तो हमें हर व्यक्ति का शोध करना पड़ेगा क्योंकि किन्ही सीमित अर्थ में हम सभी कभी अदाकार तो कभी साहित्यकार बन जाते हैं, यहाँ मेरा आशय रचनाशीलता से है. कोई निपट गंवार व्यक्ति आपकी इस पोस्ट को पढ़कर आपको घोर साहित्यिक भी मान सकता है और वह उसका बोध होगा. वैसे आप बहुत उत्तम लिखते हैं. :)
    फिर भी, अदाकार एक सीमित अवधि के लिए अपने किरदार में मौजूद रहते हैं जब तक वे मंच पर या कैमरे के सामने हैं. जब वे हर समय अपने अभिनय में डूबने लगते हैं तो उनके न्यूरोसिस की शुरुआत हो जाती है, तब वह रोग बन जाता है.
    दूसरी ओर, साहित्यकार कल्पना के घोड़े दौडाते हैं और मानव जीवन की विसंगतियों को कागज़ पर उजागर करते हैं. और ऐसा करते समय यह ज़रूरी नहीं कि वे अपने किरदार की मानसिकता में भीतर तक उतरकर ही देखें और फिर उसे रचना का रूप दें. यह सब व्यक्ति की रचनाप्रक्रिया पर निर्भर करता है. निजी जीवन में कोई भी कितना ही संत या नराधम हो सकता है. यह उसका लेखन कौशल है जो सशक्त किरदारों का गठन कर सकता है. अगाथा क्रिस्टी जैसे करुणामयी स्त्री जीवन भर अपराधियों और बुरे लोगों के बारे में लिखती है तो यह उसका कौशल है, उसे इसके लिए अपराधियों की सांगत में बैठने या स्वयं अपराध की राह टटोलने जैसे काम करने की ज़रुरत नहीं होती.
    खलील जिब्रान निहायत बदतमीज और क्रोधी थे, पर उनकी रचनाएँ पढ़ने पर आपको लगेगा कि इससे ज्यादा शांतचित्त, निर्मल और बोधवान लेखक और कोई नहीं है. मेरे प्रिय रूसी कथाकार इवान तुर्गनेव बेहद कठोर पृकृति के जमींदार थे पर उनके रचनाओं में उपस्थित करुणा मुझे अचंभित करती है.
    मैं साहित्यकार नहीं हूँ पर कुछ तो लिखता ही हूँ. मैं भी बहुत हद तक वैसा नहीं हूँ जैसा मैं दीखता हूँ, शायद ही कोई वैसा हो जैसा वह भीतर है. मैं ऐसा बनना चाहता हूँ पर यह तो जीवन भर की साधना है.
    यही मानव स्वभाव है. मनुष्य अपने 'किरदार' का असीमित विस्तार कर सकता है. यदि जीवन में बुरा होते हुए भी कोई सद्चरित्र होने का अभिनय कर रहा है तो उसे मैं बुरा नहीं कहूँगा क्योंकि कहीं न कहीं वह व्यक्ति किसी आदर्श को जी रहा है, झूठमूठ ही सही. क्या पता कभी उसका रूपांतरण भी वाल्मीकि की भांति हो जाए.
    बाकी, ब्लौगजगत के साहित्यकारों के बारे में, कुछ नाम देते तो मैं बेहतर कह सकता.

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  7. विचार शून्य
    साहित्यकार की परिभाषा क्या हैं ???
    क्या हर लेखक को साहित्यकार कहना उचित हैं या हर कृति को साहित्य का नाम देना सही हैं .

    किसी की कृतियों मे उसके निज के जीवन और संबंधो को खोजना सही नहीं हैं क्युकी हर कृति बायोग्राफी नहीं होती हैं लेकिन इसके साथ साथ हर कहानी , कविता का आधार कहीं ना कहीं होता ही हैं ये बात भी सही हैं

    लेखक की जीत तब होती हैं जब पाठक अपने को उस किताब/ लेख/ कविता मे पाता हैं और इसका बहुत सशक्त example alchemist हैं . आसान शब्दों मे लिखी किताब जिसमे जो पढता हैं वो अपने को पता हैं . जब बहुत से लोग किसी किताब से इस लिये जुड़ जाते हैं की वो उनकी अपनी कविता या कहानी हैं तो ही वो लेखक "साहित्यकार " कहलाता हैं

    ब्लॉग जगत के साहित्यकार और ब्लॉग जगत मे साहित्यकार इन दोनों मे अंतर हैं . ब्लॉग जगत की अल्प आयु देखते हुए साहित्यकार कोई यहाँ कैसे हो सकता हैं हां लोगो ने इस माध्यम को अपनी लिखी हुई कविता , कहानी और लेख पढवाने का जरिया बनाया हैं .

    फुर्सत हो तो ये देखे http://mypoemsmyemotions.blogspot.com/2009/07/blog-post_21.html

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  8. कहा जाता है कि साहित्‍य समाज का दर्पण होता है। वर्तमान में यह कहा जा रहा है कि जो समाज में घटित हो रहा है, वह साहित्‍यकार लिख रहा है। लेकिन साहित्‍य लेखन में सबसे आवश्‍यक वस्‍तु विचार हैं। एक साहित्‍यकार चाहे पद्य लिखे या गद्य लिखे, उसमें उसके विचार सन्निहित रहते ही हैं। आपके कथन का मैं समर्थन करती हूँ क्‍योंकि साहित्‍यकार अक्‍सर अपने श्रेष्‍ठ विचारों से युक्‍त साहित्‍य का सृजन करता है लेकिन जब इनकी जिन्‍दगी के अन्‍दर झांकने का अवसर आता है तो पृथकता दिखायी देती है। कितने साहित्‍यकार हैं जो व्‍यसनों को अपनाने को श्रेष्‍ठ कहते हैं लेकिन अधिकतर लोग व्‍यसनों को खुलेआम अपनाते हैं। कई नामी-गिरामी साहित्‍यकारों ने तो अपनी जीवनी में न जाने कितनी महिला साथियों के साथ की बात बड़े ही गर्व से स्‍वीकारी है। इसलिए आदर्श लिखना और आदर्श बनना दोनों में अन्‍तर है। मैंने तो अपने जीवन में यही देखा है, और मेरी धारणाएं भी टूटी हैं।

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  9. मिश्र जी काफी पहले दूरदर्शन पर एक कार्यक्रम में एक किरदार किसी भी दुसरे की कही बात को गलत बताता था फिर उसी बात को खुद दोहराता था. जब उससे पूछा जाता की भैय्या आप भी तो वही कह रहे हो जो पहले कहा गया था तो वो कहता पहले वाली बात में वो दम नहीं था जो अब है . आपने भी ऐसा ही किया. मैं खुश था की आप कोई नयी बात कहेंगे पर अपने तो मेरी ही बात दोहरा दी . शायद जब यही बात मैंने कही थी तो उसमे उतना दम नहीं था पर हाँ अब आपने विभिन्न साहित्यकरों के उदहारण दिए हैं जो की अपनी साहित्यिक छवि के विपरीत व्यक्तित्व रखते थे तो अब इसमे दम आ गया है :))


    मिश्र जी जब हम किसी ऐसे व्यक्ति को कसौटी पर कसते हैं जिसकी कही बात का अनुसरण समाज के बहुत से लोग कर रहे हों तो इसमें क्या बुराई है. जाने क्यों हम ऐसी मानसिकता रखते हैं की प्रसिद्द व्यक्ति को सामान्य नियम कानूनों से छुट मिलनी चाहिए. आप एक नौकर को रखने से पहले उसकी पुलिसिया जाच करवाते हैं तो फिर समाज के ऐसे व्यक्ति की जांच पड़ताल क्यों नहीं करना चाहते जो इस समाज को लिखित में एक नया विचार दे रहा है.


    जरा सोचें एक साहित्यकार ने लिख दिया "ढोल गावर शुद्र पशु और नारी, सब ताडन के अधिकारी" और दुनिया इस बात को सच मानने लगी. जगह जगह पर इस उदहारण को दे कर अपनी गलतियों पर पर्दा डालने लगी.अगर आम व्यक्ति इस बात को समझता की भाई ये बात जिस व्यक्ति ने कहीं है वो पत्नी का ठुकराया हुआ है तो शायद उनकी इस बात को मजाक में ही लिया जाता.


    जाँच पड़ताल से ना डरो भाई. समाज को दिशा देने वाले हर व्यक्ति की चाहे वो अन्ना हजारे जैसे लोकमान्य नेता ही क्यों न हो बारीकी से जाच करो.

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  10. रचना जी चरण स्पर्श,


    इस बार चरण स्पर्श सिर्फ इसलिए किया है ताकि आइन्दा आप साहित्याकर क्या है जैसे अति कठिन प्रश्न सार्वजनिक रूप से ना पूछें :))

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  11. अब चरण स्पर्श कहा हैं "सदा सुखी रहे " कहना तो बनता हैं और सार्वजनिक मंच पर कुछ भी "छुपा कर कैसे " पूछा जाता हैं इस कला में , मै पारंगत नहीं हूँ . :)) :))

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  12. एक साहित्यकार कभी कभी खुद से भी अभिनय कर रहा होता है |

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  13. बढ़िया है ...
    शुभकामनायें आपको !

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  14. बहुत खूब पाण्डेय जी .....आपका अभिवादन

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  15. कुछ गहरी गहरी बातें चल रही हैं, सिर्फ़ इतना समझ सका हूँ। कम से कम इस ब्लॉग पर तो छुप-छुप्पव्वल की उम्मीद नहीं थी। खैर कुछ सोचकर ही प्रणाम किया होगा, हमारा भी प्रणाम नत्थी कर देना बंधु:)

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