सोमवार, 23 मई 2011

ये स्त्रियों का कौन सा गुण है?

दो सच्ची घटनाएँ बयान कर रहा हूँ जिनके विषय में मेरे पास प्रथम पुरुष जानकारी (फर्स्ट हैण्ड इन्फोर्मशन)  उपलब्ध है. मेरी पूरी कोशिश है की कम से कम शब्दों में अपनी बात कही जाए  ताकि आपका कीमती वक्त बर्बाद न हो. कृपया ध्यान से पढ़ें और बताएं की ये स्त्रियों का कौन सा गुण है.

पहली घटना.

मेरी पहली पोस्टिंग के वक्त मेरी  जानपहचान  एक बहुत ही सुन्दर और सुशील  नर्स से हुई जो अपने कार्य  के प्रति पूरी तरह से समर्पित थीं(अपने कार्य  के प्रति समर्पण सरकारी कर्मचारियों का एक दुर्लभ गुण है)  .  इन्होने एक निखट्टू  से प्रेम विवाह किया था. पति निखट्टू होने के साथ साथ पियक्कड़ भी  था.  धीरे धीरे  उनके प्रेम और विवाह के सारे घटनाक्रम की जानकारी मुझे उन्हीं के मुख से प्राप्त हुई. उन्हें अपने इस प्रेमी से पहली नज़र में प्यार नहीं हुआ था बल्कि शुरू में तो वो आवारा लड़का उन्हें बिलकुल भी पसंद नहीं था और उन्होंने अपने भाइयों से उसकी एक दो बार जबर्दस्त पिटाई भी करवाई पर फिर आहिस्ता अहिस्ता  उस निखट्टू के प्रेम का रंग उन  पर चढ़ ही गया और अंततः इन नर्स महोदया ने अपने परिवार के जबरदस्त विरोध के बावजूद अपने इसी प्रेमी के साथ, जिसकी कभी शुरुवात में इन्होने पिटाई  करवाई थी, विवाह कर घर बसा लिया और अब दो बच्चों के साथ उसका लालन पालन कर रही थी .

दूसरी घटना.

मेरे बचपन के एक सखा हैं जो  अपने माता पिता की ग्यारह  जीवित संतानों  में से सबसे आखिरी पायदान पर हैं. इनके दसवें पायदान वाले भाई साहब ने अपनी मुफ्तखोरी की आदत  की वजह से अपनी माता के नाम का २२५ गज का प्लाट जिसका बाजार मूल्य उस वक्त करीब २५ लाख रुपये  था सिर्फ दस या पंद्रह हज़ार रुपयों में हमारी कालोनी के ही एक नामी  गिरामी गुंडे के पास, जिसका काम ही लोगों की प्रोपर्टी हड़पना था,  गिरवी रखवा दिया. कोई बात नहीं घर के सदस्यों  ने अपने भाई के इस अपराध को क्षमा कर दिया. बड़ी जद्दोजहद के बात मेरे मित्र ने अपने लिए एक ५० गज के प्लाट का जुगाड़  किया और उसमे मकान बनवाया. मित्र के वही बड़े भाई जिनकी कृपा से वो लोग सड़क पर ही आ गए थे उनके साथ बने रहे हालाँकि  उनके रवैये में जरा भी गंभीरता नहीं आई. मेरे मित्र की शादी कर दी गयी और उनके उस बड़े भाई का विवाह नहीं हो पाया क्योंकि वो  मुफ्तखोरी और मटरगस्ती  अपनी आदत को छोड़ नहीं पाए  थे. खैर मेरे मित्र ने विवाह के बाद भी अपने बड़े भाई को अपने घर अपने साथ ही रखा और अपनी पत्नी से बड़े भाई को वही सम्मान दिलवाया जो एक जेठ को मिलना चाहिए . माता जी भी अपने सभी ज्यादा संपन्न और स्थापित पुत्रों को छोड़ अपने सबसे छोटे बेटे के पास ही रही. कहते हैं की माता को अपना सबसे छोटा पुत्र सबसे ज्यादा  प्यारा होता है. एक दिन मुफ्तखोर जेठ ने अपनी बहु यानि मेरे मित्र की पत्नी के साथ कोई शारीरिक छेड़खानी कर दी जो मेरे मित्र को  सहन नहीं हुआ और उन्होंने  अपने बड़े भाई को घर से निकल दिया. इस घटना को लेकर मेरे मित्र की माताजी सारी बातें अच्छी तरह से जानते हुए भी अपने अंतिम वक्त तक मेरे मित्र यानि अपने सबसे छोटे पुत्र और उनकी पत्नी  से नाराज ही रहीं.  


मुझे तो लगता है की ये स्त्रियों का भावुकता  वाला गुण है.(पता नहीं गुण है या कुछ और)

आप  बताएं ये दोनों उपरोक्त घटनाएँ स्त्रियों के किस गुण की और इशारा करती दिखाई पड़ती हैं.

16 टिप्‍पणियां:

  1. जब तक भावुकता है, एक गुण है और जब अति भावुकता हो गई तो अवगुण। अति भावुक होने के कारण ही स्त्रियां इस्तेमाल होती हैं।

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  2. और भी कारक जरूर होंगे, बात सिर्फ इतनी नहीं होगी.
    कोई अति करता रहे और आप सक्षम हो कर भी सब कुछ सहते रहें तो यह प्रेम-भावुकता के अलावे और कुछ भी है, उसकी कोई खासियत और आपकी कोई जबरदस्‍त कमजोरी, जिसे शायद भलेपन का आवरण पहना कर ढंका गया हो.

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  3. अब आप खुल रहे हैं :)
    पहला वाला तो मेरा भी हूबहू वही अनुभव है -मेरा मित्र अनिल भी एकदम तडीपार था ...एक नर्स जब उस पर फ़िदा हुई तो हमें भी ऐसा ही घोर आश्चर्य हुआ था....अनिल अपराधिक वृत्ति का था -सुपर मेल -छः फुट ,बहुत आकर्षक व्यक्तित्व -नर्स को यही भाया होगा ...और लगातार पर्शुएशन भी कोई चीज है ..
    दूसरा तो एक परिवार में ही जींस का संवहन भला जींस के स्रोत को क्यों बुरा लगेगा -बाहरी जीनिक संगठन से बड़े भाई छोटे भाई का जीनी आमेलन माँ को इतना बुरा नहीं लगेगा .....
    अगर बात बहुत तकनीकी हो गयी हो तो अलग से मेल कर समझ सकते हैं !

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  4. हमारे यहाँ प्रेम को इतना महिमा मण्डित किया गया है कि स्‍त्री-पुरुष का प्रेम अनिवार्य सा हो गया है। और जब प्रेम के अंकुर फुटने लगते हैं तो आसान नहीं होता कि इसे समेट लिया जाए। अक्‍सर ऐसी विपरीत परिस्थिति में केवल महिलाएं ही नहीं पुरुष भी फंसते हैं। मेरी राय में पुरुष ज्‍यादा फंसते हैं। दूसरा उदाहरण एक माँ का है। अक्‍सर माँ को अपनी संतान का अवगुण दिखायी ही नहीं देता। एक बात और देखी है कि ऐसे निखट्टू लोग माता-पिता के ज्‍यादा नजदीक हो जाते हैं। क्‍योंकि कुछ काम-धंधा तो करना नहीं है बस मीठी बाते करके बेवकूफ ही तो बनाना है।

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  5. हमारे समाज मे अविवाहित स्त्री को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता . विवाह आज भी हमारे समाज में स्त्री के लिये सबसे जरुरी माना जाता हैं . बहुत सी महिला जो काम काजी हैं अच्छा कमा रही हैं सामाजिक सुरक्षा के लिये अपने से कमतर { आप जिसे निखट्टू कह रहे हैं हम कहते तो आप हमे "नारीवादी " कह देते } पुरुष से विवाह कर लेती हैं . ये उनकी कंडिशनिंग हैं की विवाह कर के किसी एक की बाते सुननी पड़ती हैं और बिना विवाह के सबकी . प्रेम नहीं था ये सब समझोते हैं जिनको क्युकी ये स्त्री पुरुष मे हैं { अब आप तो खुद स्त्री पुरुष मे और कोई रिश्ता हो सकता हैं मानते ही नहीं हैं } इस लिये इसको विपरीत लिंग का आकर्षण मान लिया जाता हैं . वो नर्स कतई भावुक नहीं थी , उसने अपने लिये एक सामाजिक सुरक्षा कवच खोज लिया था . अब कम से कम उसको अपनी आय अपने मायके वालो पर नहीं खर्च करनी होगी .

    दूसरा किस्सा बड़ा आम हैं घरो मे स्त्रियों का यौन शोषण वो भी घर के ही लोगो द्वारा एक आम बात हैं . बलात्कार तक होता हैं पर "घर की घर मे" ही रहनी चाहिये . माँ अपने बेटे को प्यार नहीं करती अपने घर और अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को प्यार करती हैं और इस लिये नाराज होती हैं की अगर जेठ ने कुछ कर भी दिया तो क्या हुआ .
    हां ये जो स्त्री - पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं की थीयोरी हैं वो भी इसका कारन हैं क्युकी पुरुष के लिये { लीजिये होगे हम नारीवादी } हर स्त्री मात्र शरीर हैं जिसका काम पुरुष के शरीर के काम को सम्पूर्णता देना हैं .

    ये दोनों गुण नहीं हैं अवगुण हैं स्त्रियों के और धीरे धीरे इनमे सुधार आ रहा हैं . प्रतिशत कम हैं पर

    अब independent working woman बिना पति के रह कर भी खुश हैं { जानती हूँ अभी और कमेन्ट में बताया जाएगा की कैसे वो सब बिना शादी के या सो समलैगिक हैं या हर रात किसी के साथ हमबिस्तर होती हैं तो उनको शादी की क्या जरुरत या जब लिव इन हैं तो शादी क्यूँ करे }

    और
    घरो मे सासे अपनी बहु को एक सुरक्षित माहोल देने की कोशिश करती हैं और यौन शोषण करने वाले अपने बेटे या रिश्तेदार को सजा दिलवाती हैं .

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  6. @पहली घटना-करत करत अभ्यास के...., वाली बात सिद्ध होती दिख रही है!उस लड़के के प्रयास आखिरकार सफल हुए,लड़की के भावुक होने के कारण!गुण तो था पर अवगुन वाला काम कर गया....मेरे हिसाब से!

    @दूसरी घटना-एक औरत भी दूसरी औरत की पीड़ा नहीं समझ पा रही है....अब केवल धृतराष्ट्र ही हो सकते है क्या.....?एक बार फिर गुणों के अवगुणों की और पलायन की कहानी.....




    @रचना जी-कमाल है,आपने तो पोस्ट का पोस्टमार्टम ही कर दिया!और किसो को कुछ भी कहने के लायक ही नहीं छोड़ा!आप नारियों के पक्ष में बोली या विपक्ष में बस ये समझना बाकी है अभी.....

    कुँवर जी,

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  7. मेरी इसबात को सहजता से स्वीकार नहीं किया जायेगा कि इन दो घटनाओं में एक ही दुर्गुण है 'मोह'। सामान्य लोग मोह को ममता प्रेम में लेकर अवगुण नहीं मानते। जैसा कि अजित गुप्ता जी नें कहा ही है प्रेम को हमने अनावश्यक महिमामण्डित कर दिया है।
    यह घटनाएं स्त्री के लिये आरक्षित नहीं है। पुरूष के साथ भी हो सकता है।
    पहली घटना में उस निख्खटु मे जान बुझ कर पागल-प्रेमी का रोल अदा किया होगा। मार खाने के बाद भी लगे रहना। इसी बात ने उस नर्स के मोह को जगाया कि कोई कितनी हद तक उस पर मर मिटता है। किसी के प्रति भी अतिशय लगाव(?) बार बार दर्शाना उसमें मोह पैदा करने के लिये पर्याप्त है।

    दूसरी घटना भी मोह का ही परिणाम है, पुत्र मोह, बिचारा कुछ कमा नहीं पा रहा का बिचारापन मोह। जिसका जिक्र अजित जी नें किया ही है। उसके बाद परिवार की इज्जत का मोह, जिसका जिक्र रचना जी नें उपयुक्त ही किया है।

    यह विशेष गुण नहीं, बल्कि मोह मनुष्य मात्र का वह अवगुण है जो अक्सर उससे अनैतिकताएँ करवाता है।

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  8. सुधार----
    पहली घटना में उस निख्खटु मे जान बुझ कर…
    को
    पहली घटना में उस निख्खटु नें जान बुझ कर…
    पढें

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  9. कभी कभी लगता है रचना जी का स्टैंड सही है -विश्लेषण बढ़िया करती हैं !और जब हिन्दी में लिखती हैं तो गजब लिखती हैं ! सच्ची !

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  10. सबसे बेहतरीन विश्लेषण अजित जी का लगा ..... प्रेक्टिकल बात कही है

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  11. समाज में स्थिति शायद ये है ......
    हमारे समाज में बहन शब्द को नीची निगाह से देखा जाने लगा है ,उदाहरण के तौर पर " ये क्या "बहन जी" टाइप के कपडे पहने हैं ?और दोस्ती जैसे बेनामी टाइप के रिश्ते का महिमा मंडन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती
    वेलेंटाइन से ज्यादा करवा चौथ पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है
    और अब तो ......
    हमारे समाज में विवाह की जगह लिव इन को सही ठहराने के दबे छिपे प्रयास जारी है ..जय हो आधुनिकता की ,एक तरफ तो स्त्री पुरुष को सिर्फ शरीर मानती व्यवस्था (लिव इन) का समर्थन और दूसरी और उसी बात के नाम पर विरोध

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  12. पहले केस में मन से लिए फैसले "स्वतंत्रता" ढूंढी गयी है "सुरक्षा" नहीं , ऐसा मुझे पहले केस को ध्यान से पढने पर मालूम होता है ...बिना पूर्वाग्रह के पढने पर :)

    दूसरे केस में छोटे पुत्र से नाराज रहना ........ मोह की अधिकता ही लगती है समाज की प्रतिष्ठा का भय नहीं (कम संभावनाएं हैं )

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  13. संजय जी अजित जी दोनों की बाते मुझे अपनी अपनी जगह सही लगी और रचना जी ने पूरी घटना का अच्छा विश्लेषण कर दिया तो संभव है आप के सवालो का जवाब आप को मिल गया हो |

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  14. हाँ .... अब देखें ..... पाण्डेय जी क्या कहते हैं ? :)

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  15. http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2008/04/blog-post_7399.html

    vichaar shunya
    when you get time read this as well few portions are related to ur question in this post

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  16. पहले उदाहरण में सँरक्षण पाने की भावना में अपने को उत्सर्ग कर देने का भाव है, पर इसका एक अँधेरा-पक्ष भी है कि उसे अपने इतर सँबन्धों के लिये एक अँडर-कवर चाहिये होगा ।

    दूसरे उदाहरण में स्वार्थयुक्त शोषण का भाव है.. जिस पुत्र ने देख कर भी मक्खी निगली, उसकी पत्नी के प्रति ऎसे निर्मम नज़रिये को आप और क्या कहेंगे ।

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