शुक्रवार, 6 मई 2011

स्त्री पुरुष मैत्री - वास्तविकता या छलावा.

मैंने बहुत बार लोगों को कहते सुना है " हम लोग तो सिर्फ सच्चे मित्र हैं और हमारे बीच में मित्रता के अलावा कोई दूसरा रिश्ता नहीं है."

मैंने इस तरह की बात लड़कियों  के मुख से भी सुनी  है और लड़कों के मुख से भी सुनी है और ऐसी   बातें सुनकर हमेशा मेरा विश्वास मजबूत हो जाता है की जरुर इन लोगों की काली  दाल हंडिया  पे चढ़ी हुई है.

जाने क्यों मुझे विश्वास नहीं होता की एक स्त्री और पुरुष के मध्य शुद्ध रूप से सिर्फ मित्रता का रिश्ता कायम रह सकता है. अगर एक स्त्री व पुरुष के मध्य मित्रता होती भी है तो वो स्वतंत्र मित्रता नहीं हो सकती. उसे तरह तरह के सामाजिक प्रतिबंधों को मानना ही होगा और अगर आप समलिंगी मित्रों के सामान ही विपरीत लिंग के मित्रों से स्वतंत्र मैत्रिक सम्बन्ध  रखते हैं तो मेरा मानना है की १०० में से ९८ मामलों में यह मित्रता निश्चय  ही शारीरिक संबंधों में परिवर्तित  हो जाएगी.   स्त्रियों के विषय में तो मैं कुछ नहीं कह सकता पर मैंने देखा है की स्त्रियों से मित्रता करते वक्त अधिकांश पुरुषों के मन में यही भाव होता है की कभी तो मौका मिलेगा.

मैं अपनी बात को थोडा विस्तर से समझाने के लिए आपको कल्पना लोक में लिए चलता हूँ.

कल्पना कीजिये की एक जॉन  अब्राहिम टाइप स्वस्थ पुरुष और प्रियंका चोपड़ा जैसी स्त्री के मध्य मित्रता वाला भाव है. एक गर्मियों की शाम  वे दोनों घूमने के लिए नेहरू पार्क जाते हैं. लड़का लो जींस और शोर्ट शर्ट में है और लड़की ने देसी गर्ल वाली साड़ी पहनी है. दोनों विशुद्ध मित्र भाव से पार्क में विचरण करते हैं. दोनों में बहुत सी बातें होती हैं फिर अचानक कहीं से काले काले मेघा उमड़ आते हैं. लोगों को गरमी से राहत मिलती हैं. शाम खुशनुमा हो जाती है. दोनों मित्र उस बारिश में भीगते हैं की अचानक लड़की का पांव फिसलता है और उसके पैर में चोट आ जाती है. भइय्या ऐसी मुसीबत  में तो मित्र ही काम आते हैं अतः पुरुष मित्र अपनी महिला मित्र को सहारा देकर उठता है. पुरुष अपनी मित्र का एक हाथ अपने कंधे पर रखता है और दुसरे हाथ से उसकी कमर को सहारा देता है. दिल्ली के तिपहिया चालक इस बार भी धोखा देते हैं तो बड़ी मुश्किलात का सामना कर पुरुष स्त्री को अपने घर ले आता है जो की महिला के घर से ज्यादा नजदीक है .  घर पर आकार दोनों कपडे बदलते हैं. बारिश से पुरुष को थोडा सर्दी जुखाम हो गया है तो वो दो पैग ब्रांडी के लगा लेता है. पुरुष के घर में एक ही पलंग है अतः दोनों मित्र साथ साथ सो जाते हैं. 

अब कल्पना लोग से बाहर आकर जरा  विचार कीजिये की ऐसी स्थिति में क्या एक पुरुष व स्त्री की मित्रता कायम रह पायेगी परन्तु यदि दोनों मित्र सामान लिंग के होते तो इनकी मित्रता इन सभी परिस्थितियों से गुजर कर भी कायम रहती.
 ये तो एक उदहारण मात्र है. ऐसी अनेक स्थितिया गिनवाई जा सकती हैं जो यह दर्शाती हैं की एक स्त्री व पुरुष अपनी मित्रता को निर्बाध रूप से लम्बे समय तक कायम नहीं रख सकते और अगर कहीं किसी ने रखी भी है तो उन्होंने अपनी मित्रता  पर ऐसे अनेकानेक प्रतिबन्ध  लगाये होंगे जो उस सम्बन्ध को सच्ची दोस्ती के रूप से बहुत दूर कर एक समान्य सामाजिक सम्बन्ध में तब्दील कर देते होंगे.    


मेरी समझ तो यही कहती है  की स्त्री पुरुष नैसर्गिक मित्र नहीं होते. ये मित्र भाव रख सकते हैं परन्तु इसके लिए इन्हें  किसी न किसी रिश्ते का सहारा जरुर ढूँढना  पड़ता है.


इस पोस्ट पर मिली प्रतिक्रियाओं के बाद मुझे लगा की पहले कही अपनी बात को और ज्यादा स्पष्ट करने की आवश्यकता है. इस विषय पर कुछ कहने से पहले  मुझे मित्रता क्या है इस पर  भी कुछ  न कुछ  अवश्य  कहना चाहिए था  अतः अब कुछ पंक्तियाँ और जोड़ रहा हूँ और आशा करता हूँ की इनसे मेरे विचार और स्पष्ट होंगे .


मेरा मूल विचार यही था की विपरीत लिंगी लोग अपने सेम सेक्स के मित्रों सी निर्बाध मित्रता नहीं कर सकते और इसे सामान लिंगी मित्रता के समकक्ष नहीं रखा जा सकता. इस विचार को स्पष्ट करने के लिए बहुत कुछ तैय्यारी के साथ अपनी बात कही जानी चाहिए थी ताकि लोग इसे स्त्री पुरुष के बीच के सामान्य सामाजिक संबंधों से जोड़ कर ना देखें परन्तु मैं ऐसा कर न पाया .


ऑफिस में या समाज के अन्य क्षेत्रों में हम बहुत से स्त्री पुरुषों से मिलते हैं और व्यावसायिक या सामाजिक सम्बन्ध रखते हैं परन्तु मित्र का दर्जा हर किसी को नहीं देते. मित्रता का सम्बन्ध सामान्य संबंधों से हटकर होता है. अपने मित्र के साथ हम अपनी जिंदगी का हर अनुभव बाटते हैं.दो मित्रों के बीच एक विशवास का संबध होता है, एक निर्बाध सहजता और स्वतंत्रता होती है जो दैहिक प्रतिबंधों की मोहताज नहीं होती. दो दोस्तों के बीच मानसिक निकटता ही नहीं बल्कि शारीरिक निकटता भी होती है. शारीरिक निकटता से मेरा मतलब शारीरिक सम्बन्ध नहीं बल्कि मैं कहूँगा की सेक्स लेस शारीरिक निकटता जो की स्त्री पुरुष की दोस्ती में कभी भी नहीं हो सकती. बस इसी वजह से मैंने कहा था की स्त्री पुरुष नैसर्गिक मित्र नहीं होते. अब कहीं कोई स्त्री पुरुष अपने शरीरों को भूल कर अपनी मित्रता को कायम रख पाते हैं तो उनको मेरा दंडवत प्रणाम.











49 टिप्‍पणियां:

  1. स्त्री पुरुष मैत्री छलावा है,

    मुझे आश्चर्य तो तब होता है जब इस एक शब्द " मित्रता" की व्याख्या के लिए लोग लम्बे लम्बे लेख लिखने की क्षमता से भरे मिलते हैं अक्सर यही लोग शब्दों की व्यापकता को सिरे से नकारने या उन पर प्रश्नचिन्ह लगाने में भी आगे रहते हैं :)

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  2. और हाँ मेरे हिसाब से......

    "मित्रता" सभी रिश्तों के लिए जरूरी एलिमेंट है लेकिन "मित्रता" अपने आप में कोई रिश्ता नहीं होती

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  3. घनिष्ठ मित्रता -परिभाषा ?
    एक इथोलाजिस्ट के अनुसार -
    बिना शरीर/अंग संस्पर्श के कोई सम्बन्ध घनिष्ठ नहीं है ...
    विपरीत लिंग के ऐसे संस्पर्श प्रगाढ़ से और प्रगाढ़ होते जायं तो कैसा आश्चर्य ?
    वही तो है इंटिमेट रिलेशन!

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  4. आपके उदाहरण में बहुत सारे पेंच हैं,
    कुछ उदाहरण्:
    1. पुरुष स्वस्थ है और लडकी का पाँव फिसलता है - नर-नारी भेदभाव?
    2. दोनों के घर में टीवी/इंटरनैट नहीं है कि निकलने पहले मौसम का मुहूर्त देखते चलें - अल्प-विकसित समाज
    3. दोनों ठलुआ हैं कि कामधाम के बजाये बहुत सी बातें करते हैं।
    4. ऐसे पिछडे माओग्रस्त क्षेत्र में जाते हैं जहाँ चिकित्सा व्यवस्था का सर्वार्थ अभाव है और डॉ. साहब लोग दवा-दारू के बजाय नक्सलियों के पार्सल पहुँचाकर ज़्यादा कमाई कल्लेते हैं शायद।
    4. स्ट्रेचर/बैसाखी/ऐम्बुलेंस आदि का काम कन्धे और कमर से लेना पडता है
    5. आटो वाले सडक पर जाकर पैसेंजर को हैरास करने के बजाय ट्रैफिक पुलिस के साथ पेंच लडा रहे होते हैं - वो भी बरसात में
    6. स्त्री का घर दूर होता है या इस घटना में मान लीजिये होता ही नहीं है।
    7. पुरुष के घर की टोटी में पानी की जगह जुकाम ठीक करने वाली "पेटेंटिड" ब्रैंडी प्रवाहित होती है।
    8. बिस्तर एक ही है, सोते दोनों हैं, मगर गिरता कोई नहीं है।

    अब जिस प्लॉट में शुरू से आखिर तक गड्ढे ही गड्ढे हों उस पर इमारत बनेगी तो ऐसी ही बनेगी।

    अब सीरियसली: जो समाज जितना अधिक विकसित होता जाता है उसके प्राणियों को सोचने और करने के लिये उतनी ही विविधता होती है जोकि प्राणायाम से लेकर अंतरिक्ष अभियान या उससे आगे तक कुछ भी हो सकती है। हाँ जहाँ कुछ भी नहीं है वहाँ जीवन पाशविक प्रवृत्तियाँ (बेसिक इंस्टिंक्ट) तक ही सीमित रह जाता है। उपरोक्त उदाहरण स्वस्थ दोस्ती का उदाहरण नहीं (एक बारिश में एक की टांग टूटी दूसरे को ज़ुकाम - दोनों ही परले दर्ज़े के अस्वस्थ हैं - इन्हें हैल्थ क्लब या योग केन्द्र में भेजो)

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  5. फिल्‍मों में ऐसा कुछ-कुछ होता ही रहता है.

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  6. आपकी परिकल्पना के अनुसार आगे जो भी होने वाला है उसके लिए बादल / बिजली / बारिश / फिसलन / ऑटो / दो पैग्स / एक बिस्तर को कष्ट देने की क्या आवश्यकता थी ! वो तो वैसे भी हो सकता है :)

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  7. आपका विचार फिल्‍म 'हम तुम' के नायक की थ्‍योरी पर आधारित है कि 'एक लड़के और एक लड़की में दोस्‍ती नहीं हो सकती, कमबख्‍त प्‍यार बीच में आ जाता है।'

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  8. friendship between man and woman is possible only if they treat each other as "equals and human beings "
    love is a integral part of any relationship but "love " has a very vast definition

    its a norm to start addressing some one as brother and sister to prove that "we are honorable "

    to enjoy a healthy relationship one needs to stop thinking in terms of gender

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  9. दोनों की नियत पहले ही गड़बड़ लग रही है दोनों को तो डाक्टर के पास या अस्पताल जाना चाहिए था पर घर चले गए वहा भी यदि दोनों पैरो में चोट के बाद भी कुछ कर बैठे तो समझिये पैरो में चोट था ही नहीं थी सब बहाना था और दोनों के बीच कभी मित्रता थी ही नहीं | दूसरी बात की ये जान कही दोस्ताना वाला तो नहीं है क्योकि यदि ये वो है तो उसकी जगह प्रियंका क्या अभिषेक जैसा भी कोई होगा तो इस परिस्थिति में तो उन दोनों की भी मित्रता नहीं बचेगी :))) कहानी पूरी फ़िल्मी है |

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  10. मुझे याद आ रहा है की किसी ने कृष्ण तो एक ही है बाकि तो सब राधा ही है( कुछ ऐसा ही ) के तर्ज पर कहा था की मेरे लिए तो पत्नी ही बस स्त्री है बाकि तो पुरुष ही है तो जब बाकि सभी पुरुष ही रहेंगे तो मुझे नहीं लगता है की इस स्थिति में किसी से भी मित्रता में कोई परेशानी होगी | वैसे दुनिया में ऐसे लोग की भी कोई कमी नहीं है जिनके लिए नारी सिर्फ नारी ही है बहन बेटी भाभी कुछ नहीं होती वो सब पर ख़राब नियत रखते है उन लोगो को लिए अपने ही घर की महिलाओ के साथ कुछ बुरा करने के लिए किसी फ़िल्मी परिस्थितियों की जरुरत नहीं होती है |

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  11. कुछ सवाल मन में उठते हैं

    01 कुछ कपड़ों को "बहन जी टाइप" क्यों कहा जाता है ??

    02 "मित्रता" शब्द को स्थापित करने के लिए / सही साबित करने के लिए हमें अप्राकृतिक से लगने वाले रिश्तों या व्याभिचार की चरम सीमा तक पहुंचे लोगों की बात का सहारा क्यों लेना पड़ता है ??

    03 पुरुष मित्र एक दूसरे को भाई कहने में परेशान नहीं होते तो स्त्री पुरुष मित्रता में इससे परेशानी क्यों होती है ??

    04 वो संत मानव (स्त्री /पुरुष ) कौन है जो इस मानसिक प्रदुषण वाले माहौल में ऐसा "संत मानसिकता" ले कर पैदा हुआ है / हुयी है, जो 24 X 7 जेंडर से ऊपर उठा कर सोचेगा / सोचेगा , मतलब ये की ये एक प्रेक्टिकल सोच है या किताबी बात ??



    मुझे लगता है पाण्डेय जी के दिए उदाहरण में टेक्नीकल फाल्ट निकालने से उसके मूल भावना जो शायद ये कहती है "अक्सर दोस्ती रिश्ते का अंत कुछ ऐसा ही घटना हो सकती है" को इग्नोर नहीं किया जा सकता है, अक्सर एकांत इसमें अहम भूमिका निभाता होगा

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  12. ऑफिस में साथ काम करते हैं, सभी से मित्रता हो जाती है। इसमें स्‍त्री मित्र भी हैं और पुरूष मित्र भी। सारे ही सुख-दुख की बातें भी होती हैं, इसे क्‍या कहेंगे?

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  13. @ऑफिस में साथ काम करते हैं,.....

    ajit जी ,

    इसका मतलब यही ना की एकांत नहीं है , शायद ये बात हर कोई मानेगा की ये प्रवृतियां अक्सर एकान्त पा कर बलवती होती हैं

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  15. पुरुष वही जिसे स्त्री पुरुष माने और स्त्री वही जिसे पुरुष स्त्री माने ।
    विपरीत लिंग का आकर्षण इस लिये होता हैं लेकिन तब जब कोई अपने मित्र को विपरीत लिंग का माने । पारंपरिक सोच हैं की स्त्री पुरुष एक दुसरे के पूरक हैं यानी जहां एक स्त्री पुरुष बैठे और एकांत हुआ वहाँ वो दोनों एक दूसरे को "पूरा " करने लग गए । इस सोच से ऊपर उठ कर सोचने वाले मानते हैं की केवल पति पत्नी ही एक दूसरे के पूरक होते हैं इस लिये उनका आकर्षण सही हैं ।

    जरुरत हैं अपनी अपनी सोच को सही रखने की । विपरीत लिंग का आकर्षण तो सगे भाई बहिन मे भी होता हैं और कई बार उनमे दैहिक सम्बन्ध भी बनते देखे ही गए इस लिये जरुरी हैं की हम जेंडर से ऊपर उठ कर सोचे , और जो हर विपरीत लिंग के व्यक्ति से आकर्षित होकर पूर्णता खोजते हैं वो मित्र बनाने के लायक नहीं हैं ।

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  16. अगर कोई किसी पर आसक्ति रखता हैं और इस लिये मित्रता करता हैं तो वो मित्रता के आवरण में किसी मंतव्य को पूरा करना चाहता हैं । चाहती हैं ।
    विचार शून्य
    किसी भी रिश्ते इस लिये बंधना की हम विपरीत लिंग के हैं केवल और केवल अपने आसक्त मन को भरमाने का तरीका हैं । एक पर्दा दारी हैं । रिश्ता हो ना हो फिर भी नैतिकता रहे ये जरुरी हैं और नैतिकता सबके लिये एक ही होनी चाहिये नहीं होती हैं ।
    कोई साइंस का आधार मान कर डिफाइन करता हैं कोई धर्म ग्रंथो का , पर आधार होना चाहिये अपने मन और दिमाग का । जो पढ़ लिया उसको अपने जीवन मे बरतना आना चाहिये ।

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  17. गौरव जी, मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि ऐसे कितने ही रिश्‍ते हैं, जैसे ऑफिस के आदि आदि, उनमें मित्रता होती है लेकिन पुरुष और स्‍त्री का भाव नहीं होता। इसलिए यह फार्मूला सभी पर लागू नहीं हो सकता।

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  18. @पाण्डेय जी
    फिर लगभग वही प्रश्न है ........

    अगर "मित्रता" को असामाजिक / अमानवीय घटनाओं, अधूरी बातों और वाक्यों, कुत्सित सोच को पारंपरिक बता कर या उससे जोड़ कर उनका का सहारा लेकर ही बचाना पड़ता है तो इस मित्रता रुपी महानतम रिश्ते से किसी सामान्य व्यक्ति डरना / संदेह करना स्वभाविक है ना ??? :)

    किसी रिश्ते से केवल इसलिए बचना की हम विपरीत लिंग के हैं (लगता है यही छिपा हुआ रीजन होता है ) मन को भरमाना ही है :)

    नैतिकता कोई केप्सूल नहीं है जो खा लिया और नैतिक हो गए..नैतिकता आयेगी कहाँ से ??? .... बच्चे जो पढ़ते हैं , जो देखते हैं (सबको पता है ) उसको इम्प्लीमेंट कर रहे हैं शायद यही समस्या है , जिसें बाद में "पुरुष ने स्त्री पर अन्याय किया" से भी डिफाइन किया जा सकता है :)

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  19. मैंने देखा है की स्त्रियों से मित्रता करते वक्त अधिकांश पुरुषों के मन में यही भाव होता है की कभी तो मौका मिलेगा.

    वाह! आप दूसरों के मन के भाव भी पढ लेते हैं।

    प्रणाम

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  20. @ajit जी

    मैं आप की बात समझ रहा हूँ , शायद मैं ये कहना चाहता हूँ की मित्रता में रिस्क फेक्टर ज्यादा होता है, उम्मीद है आप भी मेरी बात समझ रही हैं

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  21. हमारी संस्कृति में स्त्री व पुरुष के निर्बाध मिलन पर बहुत से प्रतिबन्ध लगाये गए हैं जिन्हें कुछ प्रगतिशील लोग नहीं मानते और उनका विरोध करते हैं. मैं अक्सर यह विचारता रहता हूँ की ये प्रतिबन्ध क्यों लगाये गए हैं. इन बातों के उत्तर मुझे अलग अलग जगहों पर मिले हैं. टी वी पर मैंने एक फिल्म देखि थी "अमेरिकन पाई". बड़ी मजेदार फिल्म थी. उससे एक नया शब्द पता चला MILF (mother i like to fuck). इस शब्द को जानने के बाद मेरे मन में एक विश्वाश पैदा हुआ की हमारी संस्कृति में स्त्री व पुरुष के मिलन पर लगाये गए प्रतिबन्ध बहुत सही हैं.



    उपरोक्त पोस्ट में दिया मेरा उदहारण सिर्फ यह दर्शाने के लिए हैं की इन परिस्थितियों में अगर दो लडके होते तो उनकी मित्रता कायम रहती पर स्त्री पुरुष की मित्रता के मामले में यह संभव नहीं है.



    मैंने अपनी पूरी बात सिर्फ स्त्री पुरुष के बीच की मित्रता पर ही केन्द्रित रखी है. मेरा मानना है की स्त्री पुरुष की मित्रता कभी भी वैसी नहीं हो सकती जैसी समलिंगी मित्रता होती है या जैसी की आमिर खान की फिल्म "रंगीला" में हीरो और हिरोइन के मध्य दर्शाई गयी है. आधुनिक समाज में समलिंगी और विपरीत लिंगी मित्रता में कोई फर्क नहीं माना जाता और लैंगिक आकर्षण को दोस्ती या मित्रता का नाम दे दिया जाता है जो की गलत है. अगर हम चीजों को सही अर्थो में पहचान लें तो यौन शोषण की बहुत सी घटनाएँ न हों. अगर लडके और लड़की के बीच मित्रता हो सकती तो अंग्रेजों को बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड जैसे शब्दों को गढ़ने की जरुरत ही नहीं होती. सिर्फ फ्रेंड शब्द ही काफी रहता. पुराने डायलोग का प्रयोग करूँ तो कहा जायेगा की स्त्री व पुरुष का सम्बन्ध आग और फूस वाला होता है. परिस्थितिया जरा सी अनुकूल हुई नहीं की सब कुछ भस्म हो जाता है.



    @अंशुमाला जी मैंने अपवादों के लिए दो प्रतिशत की जगह छोड़ी है.



    @ गौरव आपकी नज़र में मित्रता की संक्षिप्त परिभाषा क्या है?



    मेरी डिक्शनरी कहती है.

    "person one khows and likes, but who is not a relation." इसका मतलब जहा भी रिलेशन पैदा हुआ वहा मित्रता ख़त्म और यही मैं ऊपर बताना चाहता हूँ की स्त्री व पुरुष में बड़ी आसानी से मित्रता खत्म हो सकती है यानि की वो नैसर्गिक मित्रता नहीं.



    उनकी मित्रता नियम कानून से नियंत्रित होनी चाहिए जबकि सामान सेक्स की मित्रता में सब कुछ चलता है. मैंने बहुत बात लड़कियों को एक दुसरे के नितम्बों पर मजाक मजाक में चुटी काटते देखा है. उनके बीच चल जाता है पर अगर एक लड़का अपनी महिला मित्र के साथ एसा करे तो क्या होगा. रुपन देयोल बजाज वाला केस हो जायेगा :))

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  22. @पाण्डेय जी

    मेरे अनुसार संक्षिप्त परिभाषा :
    "मित्रता सुगंध है"

    उदाहरण सहित :
    मेरा मानना है कोई भी रिश्ता मित्रता के बिना नहीं निभाया जा सकता , जैसे कहते हैं ना की फूल और उसकी सुगंध , इसमें सुगंध मित्रता है और फूल है रिश्ता , अर्थात पति पत्नी मित्र की तरह रहें, इससे विश्वास-घात जैसी पारिस्थिति से दो गुनी सुरक्षा मिलती है, क्योंकि कोई भी अपने पति / पत्नी को धोखा देने की सिचुएशन आने पर एक नहीं दो रिश्तों (शादी और दोस्ती ) को बीच में पायेगा / पायेगी , और स्त्री पुरुष समानता भी मेन्टेन रहेगी ..... इसकी संभावना बढ़ती लगती है

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  23. " केवल मित्रता" के बंधन से बंधना मुझे समझ नहीं आता , मतलब मित्रता से जुड़े बड़े बड़े विचार और उसकी सीमा रेखा आप एक टीनएजर को कैसे समझायेंगे ?

    उस माहौल में जहां लिव इन , यौन शिक्षा , खुली मानसिकता वाले टी वी प्रोग्राम लगभग मजबूरी में स्वीकार किये जा रहे हैं

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  24. भाई मेरे, मित्रता तो प्रेम से भी अधिक चित्त की निर्मलता मांगती है और इसीलिए भगवान् बुद्ध ने मैत्रीभाव को ही महत्व दिया है, प्रेमभाव को नहीं.
    बाकी आपका दिया गया उदाहरण वाकई लचर है. इसमें कोई दो राय नहीं.
    जैसा कि मोहनीश बहल की भांति आप मान ही चुके है कि स्त्री और पुरुष कभी मित्र नहीं रख सकते भले ही वे कितना ही "मित्र भाव" रख लें तो क्या किया जा सकता है.
    बाई द वे, 'मैंने प्यार किया' का वो डायलोग क्या था? किसी भाई को याद हो तो पोस्ट कर दे.

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  29. मैंने मेरे पिछले चार कमेन्ट हटाये हैं , क्योंकि वो मुझे चर्चा की मौजूदा दिशा से कुछ अलग दिशा में जाते लगे

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  30. ब्लॉग जगत में पहली बार एक ऐसा सामुदायिक ब्लॉग जो भारत के स्वाभिमान और हिन्दू स्वाभिमान को संकल्पित है, जो देशभक्त मुसलमानों का सम्मान करता है, पर बाबर और लादेन द्वारा रचित इस्लाम की हिंसा का खुलकर विरोध करता है. साथ ही धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कायरता दिखाने वाले हिन्दुओ का भी विरोध करता है.
    आप भी बन सकते इस ब्लॉग के लेखक बस आपके अन्दर सच लिखने का हौसला होना चाहिए.
    समय मिले तो इस ब्लॉग को देखकर अपने विचार अवश्य दे
    जानिए क्या है धर्मनिरपेक्षता
    हल्ला बोल के नियम व् शर्तें

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  31. जस्ट टू ऐड: पाश्चात्य पोर्नो का एक और जुमला है -FMB!

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  32. सबसे कहले तो कहूँगी की अमेरिकल पाई जैसी फिल्मे केवल मनोरंजन की दृष्टि से देखिये उससे कुछ सीखने का प्रयास मत कीजिये वैसे कई फिल्मो के नाम बता सकती हूँ जिसमे पुरुष महिला की मित्रता को अच्छे से दिखाया गया है फिल्मो में कभी भी समाज की सच्चाई नहीं दिखाई जाती है |

    मै फिर वही बात दोहराती हूँ जिन परिस्थितियों की बात आप कर रहे है उस में तो मित्र क्या भाभी, चचेरी ममेरी फुफेरी बहन या सगी बहन तक , साली सहज किसी से भी रिश्ता ख़त्म हो सकता है यदि आप की सोच वैसी है | बड़ी बात सोच की है की वो पुरुष दुनिया में बाकि महिलाओ को किस रूप में देखता है या वो महिला अन्य पुरुषो को किस रूप में देखती है | यदि आप के लिए नारी सिर्फ एक शारीर का नाम है तो एकांत क्या भीड़ में भी उसके निकट जा फायदा उठाने से नहीं चुकेंगे फिर इन प्रिश्तितियो की बात ही क्या |

    आप आधुनिक गर्लफ्रेंड ब्वाय फ्रेंड को गलत अर्थ में ले रहे है इनका शाब्दिक अर्थ महिला या पुरुष मित्र होता है किन्तु ये शब्द हर जगह प्रेमी या प्रेमिका के लिए प्रयोग किये जाते है अमेरिका में भी | मित्र के लिए आज भी फ्रेंड शब्द ही कहा जाता है चाहे वो महिला हो या पुरुष | शब्दों को रिस्तो से घालमेल न करे |

    इस बारे में आप की राय पढ़ कर आभास होता है की आप कभी भी को एजुकेशन में नहीं पढ़े है | कई बार आप ने देखा होगा की लड़की लड़को का एक मित्रो का ग्रुप होता है संभव है की उसमे से एक दो प्रेमी जोड़े भी हो किन्तु बाकि तो आपस में सामान्य मित्र ही होते है | रही बात कुछ पर्दे की तो ये बात तो सामान लिंगी पर भी लागु होती है हर मित्र से हम हर तरह की बाते नहीं करते है बिलकुल वैसा ही रिश्ता नहीं रखते है | किसी का घर में बहुत आना जाना है तो उससे घर के सरे सुखा दुःख कह लेते है किन्तु दूसरो से नहीं कहते कभी आफिस एक ही केबन में बैठने वालो के बिच जैसी मित्रता होती है वैसी अन्य आफिस वालो से नहीं कसी मिटे से सिर्फ दिमाग वाली ही बात होती है तो कसी से दिल दिमाग सभी खोल कर रखा देते है | बस इसी तरह का पर्दा कुछ लोग महिला मित्रो से रखते है तो कुछ नहीं | रही बात धोखे की तो वो तो आप किसी भी रिश्ते में खा सकते है |

    किसी ने कहा था की जिसको बेटी नहीं होती वो उसके सुख को उसके रिश्तो को नहीं जान सकता उसी तरह जिसके मित्रो में विपरीत लिंग वाले नहीं होते है वो उन चीजो को शायद वैसे नहीं समझ सकता है | अपना मान बस सुनी सुनाई बातो से ही बनता है |

    आप ने बताया नहीं की आप ने अपना ब्लॉग सामूहिक बना लिया है और कितने सदस्य है :)))

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  33. .
    .
    .
    मेरी समझ तो यही कहती है की स्त्री पुरुष नैसर्गिक मित्र नहीं होते. ये मित्र भाव रख सकते हैं परन्तु इसके लिए इन्हें किसी न किसी रिश्ते का सहारा जरुर ढूँढना पड़ता है

    यह आप के लिये सही हो सकता है परंतु सभी के लिये नहीं... इस तरह के मसलों पर हमारे निकाले निष्कर्ष हमारे परिवेश से प्रभावित होते हैं... अपनी कहूँ तो जिस स्त्री की चाह मैं एक पुरूष के नाते रखता हूँ उसे मित्र तो कभी नहीं कहता...


    ...

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  34. @पाण्डेय साहब
    ऐसी छिछोरी फ़िल्में मनोरंजन की दृष्टि से देखनी है , क्या मनोरंजन है , वाह... वाह..... वाह .....:))))) ऐसे "मन" से किस तरह के विचारों की उम्मीद की जाये जिसे इस तरह की फ़िल्में "रंजन" लगे

    सीखने प्रयास अगर आप ना भी करें तो थोड़ी जानकारी बढ़ा दूँ ..सीख दो प्रकार की होती है .प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ..मतलब subconscious mind भी कोई चीज होती है , लगता है इस देश के आधुनिक लोगों ने सिर्फ को-एज्युकेशन देखी है साइकोलोजी नहीं पढी , इस मनोरंजन के साइड इफेक्ट जो युवा को होंगे तो उन्हें मेडिकल साइंस[?] "ये तो नोर्मल बात है" कह ही देगा ..और बाकी रीसर्चेस तो कमाल की हैं ही ..अच्छा जुल्म हुआ है हर सदी में मासूम युवाओं पर (रूढ़िवादियों द्वारा)

    अब सीखने और सिखाने वाली बात ये है की नारी को शरीर नहीं मानना है , और जेंडर से ऊपर उठ कर सोचना है . ठीक है .. ये बात आपको एक टीन एजर को समझानी है .. उम्मीद है वो संतों के लेवल की बातें समझेगा ..

    """को - एज्युकेशन और गैर जरूरी तनाव""""

    अक्सर देखा है पढ़ाई से ज्यादा तनाव गर्ल फ्रेंड के लिए होता है और आजकल तो प्रेस्टीज का मामला है , ये दिव्य प्रभाव, इससे जन्में अपराध , कुंठाएं इग्नोर कर दें और इधर उधर से बेकार उदाहरण उठा कर लायें तो बाल विवाह जैसी कुरीति को भी सही ठहरा सकते हैं

    मुझे किसी ने बताया की कट्टर आधुनिकता वादी और कट्टर धार्मिक बातें करने वालों में कोई फर्क नहीं होता , बस इनके एक्सप्लेनेशन पढो और हँसो .....और अगर चापलूस हो तो हँसी आने के बाद भी धारदार लेखनी और पता नहीं क्या क्या अच्छा कह दो
    कुछ केसेज में चापलूसी मित्र बने रहने की मिनिमम क्वालिफिकेशन भी है, कईं लोगों को मित्रतावश बेवजह बचाव करते और बाद में आपस में लड़ते देखा है :)) और उसके बाद मित्रता पर ज्ञान बांटते हुए भी देखा है :))


    अरे पाण्डेय जी बनाओ बनाओ ग्रुप ब्लॉग बनाओ, भारत भारती वैभवं और निरामिष के बाद एक और ढंग के ग्रुप ब्लॉग की जरूरत है जो बात के सभी पक्षों पर विचार करे , आप कोई तगड़ी पालिसी तो नहीं बनायेंगे ना "कमेन्ट कर्ताओं" के लिए :))


    सुज्ञ जी और प्रतुल जी कहाँ हैं , मुझे बीच बीच में बोलना पड़ रहा है :))

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  35. वसीम बरेलवी साहब ने सही कहा है .......

    गुलामी जिस्म की रहती है जंजीर कटने तक गुलामी जेहन की बड़ी मुश्किल से जाती है |

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  36. विचार शून्य में आना मतलब विचारों की नदी में गोते लगाना।
    ..मेरे विचार से मित्रता को रिश्तों की नहीं, रिश्तों को मित्रता की दरकार होती है।

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  37. हाँ तो अब आगे ..

    ~~~~~फ़िल्में, भोजन और मन~~~~~~~

    भोजन कईं तरह से होता है एक तो सिम्पल वाला भोजन जो हम मुख द्वार से ग्रहण करते हैं इसी तरह आँखों , कानों से भी हम भोजन ग्रहण करते हैं , सोचने वाली बात है अगर किसी के सामने सात्विक और चटपटा भोजन रख दिया जाए तो कोई चटपटा भोजन ही खायेगा .......मानव स्वभाव है, यहाँ चटपटे भोजन से आशय कथित चटपटी और हानिकारक फिल्मों आदि से है (जिनमें सच्चाई नहीं दिखाई जाती .... सिर्फ मसाला होता है, चटपटे भोजन की तरह ) धीरे धीरे हमारा मन ये मानने लगता है की हाँ ऐसा भी होता है या हो सकता है ... वहीं से नयी परेशानियों की शुरूआत होती है और दोस्ती अक्सर इस तरह के एक्सपेरिमेंट्स के लिए एक साधन भी बनती देखी जाती है, एक बात हमेशा याद रखिये आप का subconscious mind अपने आप में एक शक्ति है तो एक बड़ी परेशानी भी , ये एक दम सच बात है की आज के युग में मनोरोग दबे पाँव आगे बढ़ रहे हैं (जीवन शैली के अलावा कारण बहुत से हैं ) , हमें उन क़दमों की आहट को सुनना होगा , इसलिए बेहतर है की हम हर विषय के सूक्ष्म और दूरगामी प्रभावों पर भी ध्यान दें और आने वाली पीढीयों को उससे बचाएं क्योंकि ये हमारी जिम्मेदारी है

    {मेरे सभी कमेंट्स को सबसे पहले टीन एजर्स को ध्यान में रखते हुए सोचिये }

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  38. @ गौरव जी मुझे लगता है की आपने स्त्री पुरुष मित्रता के सम्बन्ध में कही मेरी बात की मूल भावना को समझ लिया है. आपके सारे कमेन्ट मुझे लेख के मेरे भावों का समर्थन ही करते लगे. ( जिन टिप्पणियों को अपने हटाया है वो भी सही थीं).



    मेरा मूल विचार यही था की विपरीत लिंगी लोग अपने सेम सेक्स के मित्रों सी निर्बाध मित्रता नहीं कर सकते और इसे सामान लिंगी मित्रता के समकक्ष नहीं रखा जा सकता. इस विचार को स्पष्ट करने के लिए बहुत कुछ तैय्यारी के साथ अपनी बात कही जानी चाहिए थी ताकि लोग इसे स्त्री पुरुष के बीच के सामान्य सामाजिक संबंधों से जोड़ कर ना देखें परन्तु मैं ऐसा कर न पाया .



    ऑफिस में या समाज के अन्य क्षेत्रों में हम बहुत से स्त्री पुरुषों से मिलते हैं और व्यावसायिक या सामाजिक सम्बन्ध रखते हैं परन्तु मित्र का दर्जा हर किसी को नहीं देते. मित्रता का सम्बन्ध सामान्य संबंधों से हटकर होता है. अपने मित्र के साथ हम अपनी जिंदगी का हर अनुभव बाटते हैं.दो मित्रों के बीच एक विशवास का संबध होता है, एक निर्बाध सहजता और स्वतंत्रता होती है जो दैहिक प्रतिबंधों की मोहताज नहीं होती. दो दोस्तों के बीच मानसिक निकटता ही नहीं बल्कि शारीरिक निकटता भी होती है. शारीरिक निकटता से मेरा मतलब शारीरिक सम्बन्ध नहीं बल्कि मैं कहूँगा की सेक्स लेस शारीरिक निकटता जो की स्त्री पुरुष की दोस्ती में कभी भी नहीं हो सकती. बस इसी वजह से मैंने कहा था की स्त्री पुरुष नैसर्गिक मित्र नहीं होते. अब कहीं कोई स्त्री पुरुष अपने शरीरों को भूल कर अपनी मित्रता को कायम रखते हैं तो उनको मेरा दंडवत प्रणाम.

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  39. लिंग विभिन्नता एक प्राकृतिक सच्चाई है। जेन्डर को इग्नोर कर देना सम्भव ही नहीं। जेंड़र से उपर उठकर मित्रता निभाना बड़े बडे संतो के लिए भी कठिन है। वे भी यह तब कर पाते जब वे राग और लगाव (कथित प्रेम-मित्रता) को ही त्याग देते है। और उसमें भी प्राकृतिक आवेगों का उत्पन्न होना इतना ही प्राकृतिक है। किन्तु यह जरूरी नहीं है कि प्राकृतिक आवेगों को ज्यों का त्यों प्राकृतिक मान उनके वश हो जाना चाहिए। उन आवेगों को सुसंस्कृत बनाना सम्भव है।

    महापुरूषों द्वारा रिश्तो का महिमामंडन उसी प्राकृतिक लगावों का सुसंस्कृतिकरण है। माता का लगाव ममता, बहन का लगाव अपनत्व और सुरक्षा, पिता का लगाव पालन, भाई का बंधुत्व,पत्नी/पति का सहयोग। और भी कईं। यह लगावों को सही, सुसंस्कृत दिशा और स्थायित्व प्रदान करना है।

    ऐसे आवेगों में एक विपरित लिंग आकृषण भी है। जिस पर नियंत्रण पाना कठिन ही नहीं दुष्कर भी है। इसीलिये विद्वान ज्ञानी ‘काम’ को ‘दुर्जेय’ कहते है। और संयत रहने की सलाह देते है। वहीं भौतिकता वादी भी इस को दुर्जेय मानते हुए उस पर विजय पाने के प्रयत्न को व्यर्थ श्रम कहकर प्राकृतिकता वश रहने को उपयुक्त मानते है।

    दीप जी,
    आपकी यह बात सही है कि कितने ही अदेह भाव से मित्रता की जाय, आग-भूसे के उदाहरण के समान ही अनुकूलता आने पर वह अक्सर दैहिक प्रेम में बदल जाती है।

    सारी गड़बड़ ‘प्रेम’ और ‘मैत्री’ जैसे आत्मिक विशेषणों को भौतिक आवेगपूर्ण लगावों के लिये प्रयुक्त करने से हुई है। वह सम्यग् प्रेम और सम्यग् मैत्री यहां है भी नहीं। वह तो राग का भी त्याग करने पर उत्पन्न होती है।

    और इस कथित‘मैत्री’ शब्द में हमनें सभी रिश्तों के गुण गुण ही भर दिए, और मान लिया यह रिश्तों के हर सम्भावित दूषणों से मुक्त है। किन्तु, इन सारे गुणो का भार यह ‘भौतिक मैत्री’ उठाने में समर्थ नहीं है। कदापि नहीं। इसिलिये दूषणों का आ जाना अवश्यंभावी है।

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  40. अब कहीं कोई स्त्री पुरुष अपने शरीरों को भूल कर अपनी मित्रता को कायम रखते हैं तो उनको मेरा दंडवत प्रणाम

    yae panktiyan jodane kae liyae thanks warna lag raha thaa jaese shareer kae allawa kuchh haen hee nahin .

    gender sae upar uth kar bhi bahut kuchh haen

    aur agar koi nahin kar paataa toh yae nahin kehna chahiyae ki koi nahin kar saktaa


    kuchh kar saktey haen

    ek post likhungi is vishay par jaldi hii

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  41. मैं समझ नहीं पाया , अगर चर्चा का कोई पहलू बच गया है और तार्किक भी है तो यहीं पर क्यों नहीं रखा जा रहा है ??
    ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि आपके ब्लॉग की पालिसी की समझ मुझे और मेरे जैसे अन्य मासूम विचारकों को कुछ कम ही है इसीलिए आपके ब्लॉग पर आने या/और वहां विचार रखने से कतराते भी हैं शायद , दूसरी बात ये की सच का सम्मान तो हमेशा होता है ......होता रहेगा ..

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  42. ...... तो यहाँ पर अपनी बात रखने में क्या बुराई है ?

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  43. रचना जी आपकी पोस्ट का इंतजार रहेगा और पूरा विश्वास है की गौरव जी की टिपण्णी मोडरेशन संबन्धिन सभी आशंकाएं निर्मूल साबित होंगी :))

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  44. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  45. @पाण्डेय जी

    आपका ये नया प्रोफाइल अवतार अदभुद है :)

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  46. deep

    I said soon i will also write on this topic.
    I have not said any where in any of my comments that i will contradict your post or support it
    we all have our individual views and experience and i always feel if a post provokes a thought that we need to elaborate we can / should do it on our blog with a back link

    As regards policy at least "naari blog " has a policy and it adheres to its policy

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  47. @पाण्डेय जी

    जब ऐसी बड़ी बड़ी बातें होती हैं , तो मुझे कुछ पोस्ट्स , कुछ चर्चाएँ और कुछ कमेन्ट्स और उनमें मौजूद एक ख़ास पेटर्न याद आने लगते हैं जिसमें पॉलिसी को घुमा फिरा कर इस्तेमाल किया गया हो . लेकिन .. हम जैसे लोगों ने हमारे मन की पॉलिसी में कुछ ज्यादा ही बंधन लगाएं हैं जिन्हें हम घूमा फिर कर इस्तेमाल नहीं करते ......इसलिए हम टेक्नीकल फाल्ट मौजूद होने पर भी नहीं बताते :)

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  48. आग ओर घी साथ रहे ओर पिगले भी नही....? आफ़िस, कालेज वगेरा कि बात अलग हे, वहां अलग नही होते.... बाकी तो... राम जाने

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