गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

ऊपर की कमाई.

मेरे ऑफिस में मेरे एक सहकर्मी हैं पाण्डेय साहब। मुझे पूरा विश्वास है की वो इस ब्लॉग को कभी नहीं पड़ेगे इसलिए खुल कर लिख रहा हूँ।

pandey साहब ने अपनी सरकारी नौकरी मेरे पैदा होने से भी एक साल पहले शुरू की थी। वो तब २० वर्ष के थे और वो अभी भी दो साल और नौकरी करेंगे। अब इस हिसाब से आप मेरी उम्र बताईये कितनी हुई?

चलिए छोडिये इस बकवास को आगे की बकवास सुने।

मैं पाण्डेय साहब को सन २००८ से जानता हूँ जब मेरा स्थानांतरण Pay & Accounts Office में हुआ। वो अपने क्षेत्र के महारथी हैं। वो विशुद्ध रूप से एक सरकारी बाबु हैं। जब भी वो किसी से कोई बात करते है तो उनके सीधे हाथ की मुठ्ठी आधी बंद होती है और तर्जनी व अंगूठे से वो एक सी का सा अकार बनाकर अपने हाथ को हवा में गोल गोल घुमाते हुए अपनी बात कहते हैं जिसे देख कर ऐसा लगता है की वो हवा में जलेबियाँ तल रहे हैं।

और वो वास्तव में जलेबियाँ ही तलते हैं। कोई भी सीधी बात हो वो घुमा घुमा कर उसकी जलेबी बना देते हैं और सामने वाले को पता ही नहीं चलता की बात का आदि व अंत कहाँ पर है और बेचारा उलझ जाता है। मान लीजिये आपने उनसे पूछा की पाण्डेय साहब सूरज कहाँ से निकलता है तो वो कहेंगे की सूरज पश्चिम से नहीं निकलता, उत्तर से नहीं निकलता, दक्षिण से नहीं निकलता, रात में नहीं निकलता, उनके घर से नहीं निकलता..... अब इतने कठिन सवाल का उत्तर पाना है तो बेटा अपनी जेब से कुछ खर्चा कर तभी बताऊंगा की सूरज कहाँ से निकलता है।


सच्चे सरकारी क्लर्क ऐसे ही होते है। इतनी मेहनत करते हैं वो लोग पैसा कमाने के लिए जिसे आप यों ही ऊपर की कमाई कह देते हो। ऊपर की कमाई को ऊपर की कमाई क्यों कहते हैं इस बात पर मैंने अनेकों बार विचार किया।


इस कमाई से व्यक्ति के रहन सहन का स्तर ऊपर उठता है इस लिए इसे ऊपर की कमाई कहते हैं या यह सामान्य कमाई से ज्यादा होती हैं इसलिए इसे ये नाम दिया गया है। ना .... जी .....ना ....


असल में जब किसी की ऊपर की कमाई शुरू होती है तो उसमे दया धर्म की भावना बढ जाती है। वो मंदिरों के ज्यादा चक्कर लगता है। अक्सर उसके सिर पर जय माता दी वाली लाल चुनरिया बंधी मिलती है और वो आपको अखरोट और मीठी खील का प्रसाद बाटता दिखाई पड़ जाता है। ये कमाई आपको ऊपर वाले के ज्यादा नजदीक ले जाती है इसलिए ऊपर के के कमाई कहलाती है।

मेरी पिछली पोस्टिंग राजस्व विभाग में थी । वहां के अपनी बिरादरी वालों से जब मेरी नहीं बनी तो उन्होंने मुझे विभागीय हिसाब से एक कौने में फैंक दिया जहाँ पर सिर्फ फायलें और धुल भरी थी। उन फायलों के बीच मुझे दो बाजरे और मक्का के दानो से भरे बोरे मिले। छान बिन करें पर पता चला की ये हमारे चपरासी की निजी संपत्ति हैं। मैंने उससे पूछा तो उसने बताया की जब भी उसे १०० रुपये ऊपर के मिलते हैं तो वो १० रुपये का चुग्गा पक्षियों को डाल आता है। मैं उस भाई की धर्म परायणता पर नतमस्तक हो गया। मैंने उससे पूछा की प्यारे यहाँ तो बहुत से रोज हजारों रुपये ऊपर से कमाते हैं वो किसको चुग्गा डालते है। तो वो मुस्काया और बोला की वो तो मछलियों को दाना डालते हैं। बड़ी मछलियों को दाना। सच हैं भाई अगर wetland में रहना हो तो वहां की बड़ी मछलियों और मगरों को तो दाना डालना ही पड़ेगा।

तो दोस्तों उपरी कमाई की कथा अनंत है। ये तो यूँ ही चलती रहेगी.......अनवरत.......हमेशा..........

7 टिप्‍पणियां:

  1. "ये कमाई आपको ऊपर वाले के ज्यादा नजदीक ले जाती है इसलिए ऊपर के के कमाई कहलाती है। "

    aaj marm samajh me aaya!dhanyawaad bataane ke liye!

    kunwar ji,

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  2. आप इसे ऊपर की कमाई कहें या सुविधा शुल्क...अच्छी प्रस्तुति....हाँ शायद आप २९ साल के हैं

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  3. मुझे तो इस कमाई को उपर की कहने का लोजिक समझ में नहीं आता, क्योंकि यह तो टेबल के नीचे से ली जाती है.-)
    सरकारी ऑफिसों के माहोल कि खूब पोल खोल रहे है आप

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  4. mere no. kya khata randhne ke liye, liye the bandhu na online na ph.or upar se fir mail karte ho ki main aap ko chod gya.

    kabhi to online hoiye

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  5. दीप, आपकी उम्र 38 वर्ष है, क्योंकि मैं 76 वर्ष का हूं और पूरा पगलैट हूं। हा हा हा

    मजा आ रहा है, ओफ़िस ओफ़िस पढ़ने में।

    लगे रहो।

    आभार।

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