रविवार, 11 अप्रैल 2010

स्त्री व पुरुष की मित्रता और मेरा अनुभव.

उससे मेरी मुलाकात पल्स पोलिओ अभियान के दौरान हुई थी। वो एक नर्स थी और मैं एक क्लर्क । हम दोनों एक ही टीम में थे। हमारा सेंटर एक पोश कालोनी में था जहाँ बच्चों की भीड़ ना के बराबर थी। वैसे तो हमारी टीम में एक डाक्टर और एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी थे पर वे लोग दवा पिलाने की जिम्मेदारी हमारे कन्धों पर डाल कर अपनी दूसरी जिम्मेदारियों को निभाने चले गए थे। हमारे पास करने को ज्यादा कुछ नहीं था इसलिए हमने समय बिताने के लिए सबसे आसान काम करना शुरू किया । आसान काम यानि इधर उधर की बातें।

वो GTB Hospital में नियुक्त थी जहाँ पर मैं भी प्रशासन विभाग में कार्यरत था। जब मुझे यह बात पता चली तो मैं थोडा सहज होगया। अब बातचीत में मेरी भी रूचि बढ़ गयी। वो एक साधारण सी केरल के ईसाई परिवार की लड़की थी। गहरा रंग, ऊँचा कद , घुंघराले बाल सारे लक्षण एकदम ठेठ दक्षिण भारतीय। यहाँ वो दूसरी केरलाई लड़कियों की तरह अपने परिवार से दूर नर्स होस्टल में रहती थी।


उसके व्यक्तित्व में सब कुछ साधारण था पर मैंने उसमे दो विशेष बातें देखीं। पहली चीज थीं उसकी आखें । उन आँखों में आत्मविश्वाश की एक अनोखी चमक थी। इस चमक से पवित्रता झलकती थी, कोई चंचलता या गरूर नहीं झलकता था।


दूसरी बात जो मैंने उसमे दूसरी लड़कियों से अलग पाई वो थी की जब भी मैं उससे कोई बात कहता तो वो पुरे मनोयोग से मेरी बात सुनती थी और जब मैं अपनी बात ख़त्म कर लेता था तब अपनी आँखों में वही पवित्रता भरी चमक लिए मेरी हर बात का जबाब देती थी । उसका हर जवाब मुझे निरुत्तर कर देता था।

हमने सारे दिन भर अलग अलग विषयों पर बात की और मैने पाया की हर विषय पर उसकी पकड़ मुझसे बेहतर थी। वो विषयों को बहुत गहरे से समझ लेती थी। मैं उस से बहुत प्रभावित हुआ।


इसके बाद हम अक्सर मिलाने लगे। वो जब भी किसी कार्य के लिए प्रसाशनिक ब्लाक में आती थी तो मुझ से अवश्य मिलती थी। जल्दी ही उसका मुझसे मिलना मेरे सहकर्मियों के लिए चर्चा का विषय बन गया। उसके जाने के बाद मेरे दोस्त मुझे खूब खीचते थे। वे मजाक में हमेशा मुझसे पूछते की उसके साथ मेरा क्या रिश्ता है ? मैंने इस बात पर विचार किया । अपने दिल में झाँका और पता लगाने का प्रयास किया की वो मुझे कैसी लगाती है और उस के साथ क्या रिश्ता रखु जो की समाज में मान्य हो। उसके प्रति मेरे मन में बहिन वाले भाव नहीं थे और ना ही मैं उसे प्रेमिका के रूप में देखता था। अब उसके साथ क्या रिश्ता रखा जाय मुझे समझ नहीं आया। मैंने निर्णय लिया की अब मैं इस मिलाने जुलने के क्रम को ही ख़त्म कर दूंगा ताकि बेवजह की बदनामी से तो बचा जाय।


इसके बाद जब हम मिले तो मैंने उसके सामने अपने मन की बात रखी। उसने मेरी बात हमेश की तरह से बड़े ध्यान से सुनी । उसने मुझ से पूछा की क्या हम लोग सिर्फ दोस्ती का रिश्ता नहीं रख सकते। मैं इस बात के विरोध में था और वो इस विचार के पक्ष में थी। हमरी बहस हुई और वो जीत गयी। मुझे उसका साथ अच्छा लगता था अतः मैं भी उसके साथ दोस्ती का रिश्ता रखने को आसानी से तैयार हो गया। मेरे मन में एक भावना यह भी थी की वो एक ईसाई परिवार की लड़की है जहा इस तरह के संबंधों को आधुनिकता के नजरिये से देखा जाता है अतः हमारी दोस्ती कायम रह सकती है।


इसके बाद मैंने कभी अपने दोस्तों की बातों की परवाह नहीं की। वो जब भी पूछते की हमारा रिश्ता क्या है तो मैं उन्हें बताता की हम दोनों अच्छे मित्र हैं बस और कुछ नहीं। मेरी इस बात का वो लोग खूब मजाक उड़ाते और कहते की इस तरह की मित्रता तो उन्होंने भी कई बार निबाही है , ऐसी दोस्ती का मजा ही कुछ और होता है। मैं उनकी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देता था।

उन्ही दिनों मेरे पिताजी को दिल का दौरा पड़ा। उन्हें मेरे अस्पताल में ही CCU वार्ड में भर्ती करवाया गया जहाँ पर मेरी वो मित्र नियुक्त थी। उसने इस दोरान मेरी बहुत सहायता की । वो अपनी ड्यूटी के बाद भी मेरे साथ रहती। उसके साथ रहने से मुझे कहीं भी कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। इस अनुभव के बाद तो मैं उसे अपना सच्चा मित्र मानने लगा।

हमारी मित्रता यों ही करीब एक डेढ़ साल निर्विघ्न चलती रही फिर एक दिन उसने मुझे बताया की उसके माता पिता ने उसके लिए एक लड़का पसंद किया है। लड़का दिल्ली में ही एक दावा की कंपनी में MR था। उसने मुझे लडके का फोटो दिखाया और मेरी राय जाननी चाही। मैं चूँकि ज्योतिष में भी रूचि रखता था अतः मैने उनके sun signs मिलाये। उनके जन्मांक मिलाये। मुझे सब कुछ अच्छा लगा और मैंने अपनी सहमती व्यक्त कर दी। कुछ दिनों बाद वो केरल गयी और वहां उसकी सगाई हो गयी। केरल से वापस आने के बाद जब हम मिले तो मैंने उसके मंगेतर से मिलाने की इच्छा जाहिर की । वो मेरी बात टाल गयी। शुरू में मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा पर जब मेरे बार बार कहने पर भी उसने हमें नहीं मिलवाया तो मैंने उससे इसका कारण पूछा। उसने जो कारण बताया वह अगर किसी और लड़की के मुख से सुना होता तो मुझे अजीब नहीं लगता पर अपनी इस समझदार दोस्त से सुनकर मुझे स्त्री चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम वाला श्लोक याद आ गया।

मेरी मित्र ने मुझसे कहा की हम अपनी मित्रता को आगे कायम नहीं रख सकते क्योंकि उसकी शादी होने वाली है और वो शादी के बाद अपना सहारा समय अपने पति को देना चाहती है और वो ये भी नहीं चाहती की उसके होने वाले पति के मन में हमारी मित्रता को लेकर कहीं कोई शक रहे।

प्रश्न तो मेरे मन में उस वक्त भी बहुत सारे उठे जो आज भी कायम है पर मैंने दुबारा भी अपनी हार स्वीकारना ही ठीक समझा और उससे अपनी मित्रता को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया। हम दुबारा कभी नहीं मिले और ना ही मैं अब कभी उससे मिलना चाहूँगा ।

अब आप पूछेंगे की मुझे ये सब बातें आज क्यों याद आई ?

असल में कल सुबह मेरी अपने बच्चों (भतीजा और भतीजी) से बहस हो गयी थी । मुद्दा था एक लडके और लड़की की दोस्ती का। मैं इस बात के विरोध में था और वो इस बात के पक्ष में थे।

मेरा मानना है की एक लड़का और एक लड़की (आप स्त्री व पुरुष भी कह सकते हैं )आपस में सिर्फ मित्र नहीं हो सकते। मेरी समझ से सच्चे मित्रों का जुडाव बहुत गहरा होता है और हर स्तरपर होता है जो की एक स्त्री और एक पुरुष के बीच संभव नहीं है। अतः स्त्री व पुरुष जब एक दुसरे को सिर्फ मित्र मानते हैं तो वो मित्रता छिछली होती है और ज्यादा समय तक टिक नहीं सकती।

अपनी इस बहस में कल भी , मैं फिर से हार गया और दकियानूसी , घटिया, बाबा आदमके ज़माने का , पुराने फेशन का , आदि अनेक विश्लेषणों से अलंकृत होकर (ये सारे विश्लेषण अंग्रेजी जबान में दिए गए थे इसलिए मैं शांत रहा वर्ना फसाद हो जाता) इस नसीहत के साथ भगा दिया गया की जाओ ब्लॉग्गिंग करो।

तो मित्रो मैं आ गया आप लोगों की शरण में । अब यहाँ पर अपने पुराने, दकियानूसी विचारों को लिख दिया है। मन शांत हो गया है अब जाकर दूसरा काम करूँगा।

धन्यवाद और सुप्रभात।

5 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी-अपनी सोच है। स्त्री-पुरुष अच्छे दोस्त भी हो सकते हैं और दुश्मन भी। ये उनपर निर्भर करता है कि वे अपने रिश्तों को किस हद तक ले जाना चाहते हैं।

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  2. aap se sahmat bhi hun par ashamat bhi meri pahli best friend bhi ek ladki thi aur kuch aap jaisi hi kahani huni par ab bhi meri best friend ek ladki hi hai wo mahanagar me rahti hai aur main gaon me colladge time se dost hai. in riston me main jhamela bakhera to sirf logon ki soch ke karan paida hota.

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति
    bahut khub

    http://kavyawani.blogspot.com/

    shekhar kumawat

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  4. bhai, aapke vicchar se maii puri tarah sahmat hun. koi bhi male ane female sirf dost kbhi nhi ho sakte haii. es samay maii bhi kuch esi tarah ke santras se gujar raha hun. maii apni dost se ke bar yah kah chuka hun ki hum dono apni dosti ko toad de lekin wo tayyar nhi hoti hii.bate bhi ek mail dost se jayda hoti haii mere w uske beach. kya karun kuch samagh nhi aa raha haii............

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