शनिवार, 3 अप्रैल 2010

एक ब्लॉगर की अभिलाषा

चाह नहीं बनूँ इस दुनिया का
हीरो और भूल खुद को इतराऊ ।

चाह नहीं खीचुं टांग किसी की
और मन ही मन मुसकाऊ।

चाह नहीं लेख उत्तेजक लिखूं
और गलियां सबकी ही खाऊ।

मझे झेल लेना ओ ब्लॉगर तुम
और गुस्से में माउस ना देना फैक
जब भी बात कहू दिल की तुमसे
तुम भेजना हरबार टिपण्णी अनेक ।


(मेरा यह अवैध निर्माण 'मो सम कौन " के संजय अनेजा जी को समर्पित है। आपकी कल की टिपण्णी पढ़ कर मैं अपने paradise में पहुच गया था और वहां से यह निकल कर लाया हूँ।)

18 टिप्‍पणियां:

  1. मझे झेल लेना ओ ब्लॉगर तुम
    और गुस्से में माउस ना देना फैक
    जब भी बात कहू दिल की तुमसे
    तुम भेजना हरबार टिपण्णी अनेक ।
    क्‍या बात है !!

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  2. अनेक टिप्पणी में से एक का महा दान तो ये रहा इस पुण्य कर्म में.

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  3. विचार शून्यता के इस महायज्ञ में मेरी भी एक भावनात्मक आहुति
    सदैव टिप्पणियाँ मिलती रहेंगी।

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  4. tum likhte rahna
    tippaniyo ki bochhar rana karta rahega
    चाह नहीं लेख उत्तेजक लिखूं
    और गलियां सबकी ही खाऊ।
    gaaliya bandhuwar

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  5. thoda likhe ko sahi kar lo
    bahut badhiya
    tum taang mat kheencho
    par likhte rahna

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  6. बहुत खूब...बहुत ही खूब.....कुछ ज्यादा ही खूब

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  7. अच्छी लगी....ब्लौगर की अभीलाषा.

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  8. मैं तो पूरे का पूरा पोस्ट ही दे रहा हूँ टिप्पणी में..
    .....................
    सानिया मिर्ज़ा---तुम जहाँ भी रहो खुश रहो..(पुरुषों ने तुम्हारे लिए किया क्या है.?
    http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/04/blog-post_03.html
    .

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  9. प्रिय दीप,
    डुबो कर ही मानोगे मुझे।
    भैया, अभी तो खेलने खाने के दिन थे मेरे।
    ज्यादा ही कर दिया यार तुमने कुछ।
    कोई बात नहीं, झेलेंगे दोस्तों की मेहरबानियां।
    आभार।

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  10. बहुत सुंदर दीप जी
    आपकी सुंदर कविता से कौन गुस्सा कर सकता है
    आप ऐसे ही ओज पूर्ण विचार पोस्ट करते रहिये
    आपको बहुत - बहुत धन्यवाद

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  11. वाह्! ब्लागर की अभिलाषा...बहुत खूब्!!

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