शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

इन्टरनेट के बिना गुजरे ये दिन.

जब से मैंने अपने घर पर ही इन्टरनेट की सुविधा का जुगाड़ किया है तब से मेरा घर से निकलना ही ख़त्म हो गया है। लगभग सारे रिश्तेदार और दोस्त किसी ना किसी रूप में नेट से जुड़े है। चाहे घर हो या ऑफिस सभी इन्टरनेट का इस्तेमाल करते हैं अतः जब से मैंने अपने घर में नेट लगवाया तो मुझे किसी से उसके घर जाकर मिलाने की जरुरत ही नहीं रही।

वैसे मैं तो पहले भी घर घूस ही कहलाता था क्योंकि मैं हमेशा घर में ही घुसा रहता था। मेरे पत्नी को भी मुझ से यही शिकायत थी की मैं उनके साथ कहीं घुमने या फिल्म देखने नहीं जाता। घर से ऑफिस और ऑफिस से घर। छुट्टी के दिन भी घर पर रहकर नए पुराने अख़बार चाटना, इधर उधर से इकठ्ठा की हुई किताबें पढना और थक कर सो जाना , यही मेरी दिनचर्या होती थी । मेरी इस मानसिकता से इन्टरनेट एकदम मेल खता है। आपको कहीं जाने की जरुरत नहीं। आप अपनी मेज पर बैठे ही सारी दुनिया से जुड़े रहते हैं। इस नेट पर सारी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। लगता है की सारी कायनात एक चटके (क्लिक ) पर उपलब्ध है।

इतने कम समय में ही मैं इस सुविधा का इतना आदि हो गया हूँ की पिछले चार दिन जब मेरा नेट कनेक्सन नहीं जुड़ा तो मुझे ऐसा लगा की मैं किसी जेल के एकाकी कक्ष (isolation chamber) में पड़ा हूँ जहाँ मैं किसी से बात नहीं कर सकता और सबसे जरुरी बात , अपने विचार किसी दुसरे तक पंहुचा कर खुद को हल्का नहीं कर सकता।

मेरी नजर हमेशा मोडम की टिमटिमाती बत्तियों पर ही टिकी रही की कब लिंक वाली बत्ती स्थिर होगी और मैं उस आभासी दुनिया से जुड़ पाउँगा जो की इस दुनिया के सामान ही वास्तविक है। कभी कभी तो मुझे ऐसा लगा की मैं इस नेट के जाल में फसा जीव हूँ जो खुद को मुक्त समझता है पर वास्तविकता में वह मोह के बंधन में जकड़ा होता है। ( फिर से बेकार की बकवास)

जब मैं नेट कनेक्सन ले रहा था तो मेरे एक मित्र जो प्रकाशन तथा विज्ञापन से जुडी एक फर्म चलते हैं , ने मुझे राय दी की मैं MTNL का कनेक्सन ना लूँ पर मेरी मति मरी गयी थी। मैंने सोचा चलो इस बहाने देशभक्ति ही हो जाएगी। मुझे क्या पता था की मैं किसी सरकारी फर्म का समर्थन नहीं कर रहा मैं तो कामचोर लोगों को उनकी दुकान चलने का एक और मौका दे रहा हूँ। मेरा नेट चार दिन में पचासों जगह फोन करने और कईयों की खुशामद करने के बाद ठीक हुआ है।

अब तो बस दिल यही कहता है:

दीप अल्टरनेट कछु रखिये, इन्टरनेट बिन सब सून ।

( आज मुझ पर भगवन की कृपा हुई और मैं इस दुनिया में फिर से अपना अस्तित्व पा गया)

5 टिप्‍पणियां:

  1. विचार शून्य, आज आपको जैसा लग रहा है वैसी मेरी हालत थी लगभग दस साल पहले जब इन्टरनेट बहुत बड़ी नौवेल्टी था और डायल अप पर सिसक-सिसक कर चलता था. उसपर, बला का महंगा!
    लेकिन वक़्त गुज़रते आपको शायद इसका अहसास हो जायेगा कि इन्टरनेट बहुत कुछ ज़रूर है लेकिन सब कुछ नहीं.
    तब तक हम यह कामना करेंगे कि आपका कनेक्शन कभी धोखा न दे. आखिर, आपकी बेहतरीन पोस्टें जो पढनी हैं.

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  2. मित्र, अल्टरनेट के लिए पड़ोस हुआ करता है. बिना झिझक पहुँच जाओ. [ "आओ" नहीं लिखूंगा, क्योंकि आप जानते हैं कि लोग जान जायेंगे.]

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  3. बुद्ध हो गये आप जो अपना अस्तित्व पा गये!

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  4. विचारीजी आपके नेट चालू होने की आपसे ज्यादा ख़ुशी मुझे हुई है. आपसे chating करें बिना कुछ खाली सा लगता है.
    जहाँ तक मोतियों की बात है तो कहा जाता है की "जिन खोजा तिन पइयां गहरे पानी पैठ ", और मुझे तो गहरे पानी में गोता लगाने का मौका भी नहीं मिला, ये मोती तो विरासत में दादाजी ही दे गए थे.

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  5. अंत भला तो सब भला।
    जुट जाओ अब सबको विचार शून्यता की स्थिति में पहुंचाने में।
    हम इंतज़ार करेंगे।

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