रविवार, 4 अप्रैल 2010

मेरा धर्म , उसका धर्म, हम सबका धर्म!

आज जिस चीज को हम लोग धर्म कहते हैं और उस पर लड़ने मरने को तैयार हो जाते हैं वह चीज वास्तव में है क्या? जब भी कोई झगडा किसी भी धार्मिक रीती रिवाज को लेकर होता है तो अपनी अल्प बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए मैं भी विचार करता हूँ की आखिर इस झगड़े का कोई ओचित्य है भी की नहीं।

सभी धर्मों के लोग कहते हैं की उनका धर्म सीधे ईश्वर ने बनाया है। मुझे एसा बिलकुल भी नहीं लगता की ईश्वर ने विभिन्न धर्मों की रचना की है।

ईश्वर कोई भी ऐसी चीज नहीं बना सकते जिस से लोगों में आपस में कोई झगडा हो। आप अपने इर्द गिर्द की किसी भी वस्तु को देखें। जिस किसी भी चीज को उस परम पिता परमेश्वर ने बनाया है वह क्या बिना वजह किसी का नुकसान करती है? नहीं ! बिलकुल नहीं ! ईश्वर की बनाई एक भी ऐसी चीज नहीं है जिससे किसी को कोई नुकसान होता हो।


क्या ऐसा हो सकता है की इन धर्मों को खुद ईश्वर ने बनाया है। मैं सोचता हूँ की ऐसा नहीं है। आप अपना निर्णय खुद लें। मैं अपनी बात को आगे बढाता हूँ।

तो ये आज जो हम तेरा धर्म मेरा धर्म का राग आलापते रहते हैं वो आखिर हैं क्या?

वर्तमान समय में हम जिसे धर्म कहते है वो असल में जीवन को सही रूप में किस तरह से जिया जाये इसके लिए अलग अलग जगहों पर, अलग अलग समयों पर, अलग अलग व्यक्तियों द्वारा दिए गए दिशा निर्देश मात्र हैं। इन निर्देशों को सैकड़ो हजारों साल पहले दिया गया था। और वर्तमान समय में इनकी उपयोगिता बेहद कम हो गयी है.

जैसे की वेदों को ही लें । इनकी रचना हजारों साल पहले हुयी थी। इनमे उल्लेखित अनेक बातों का आज के आधुनिक जीवन में कोई भी स्थान नहीं है। लेकिन आज भी हम उन बातों कर अनुसरण करते हैं।

असल में धर्मं में दो बातें निहित हैं। एक है हमारा मानसिक आचरण और दूसरा है शारीरिक आचरण । मानसिक आचरण से मेरा अर्थ उन बातों से है जिनका ध्यान हमें प्राणी मात्र के साथ व्यव्हार करते वक्त रखना चाहिए। शारीरिक आचरण से मेरा अर्थ उस विशेष आचरण से है जो हम किसी विशेष भोगोलिक परिस्थिति में अनुकूलित होने के लिए करते है।

हमारा व्यव्हार सभी जीवों के साथ कैसा होना चाहिए इस विषय पर सभी धर्म एक सी ही बात कहते हैं। जहाँ तक सामाजिक आचरण की बात है सभी धर्म भिन्न मत रखते हैं क्योंकि इन धर्मों का विकास अलग अलग जगहों के लिए हुआ है। एक उदहारण देता हूँ । हिन्दू लोग धोती पहनते हैं और प्रायः अपना बदन खुला रखते है वहीँ मुस्लिम और ईसाई लोग अपने धार्मिक अनुष्ठानों में एक बड़ा सा लबादा पहने रहते है। इसके पीछे उन जगहों की परिस्थितिया है जहाँ इन धर्मों का विकास हुआ। अब अगर एक हिन्दू किसी यूरोपीय देश में भरी सर्दी में नंगे बदन कोई पूजा पाठ करेगा तो उसका क्या हाल होगा।

मैं सोचता हूँ की हमें सभी धर्मों को उसी तरह से अपडेट करते रहना चाहिए जैसे की हमारे कम्प्यूटर के anti virus programmes अपडेट होते रहते है। और जब इनको अपडेट नहीं किया जाता तो ये बेकार हो जाते हैं। वर्तमान में सभी धर्मों की यही दुविधा है की इन्हें अपडेट नहीं किया गया है।

मेरा यह मानना है की हम धर्म को दो भागों में स्पष्ट रूप से विभाजित करें। एक हो आध्यात्मिक धर्म और दूसरा हो सामाजिक धर्म। अध्यातिमिक धर्म अलग अलग लोगों का अलग अलग हो जाये पर सामाजिक धर्म सभी का एक सा हो।

अध्यात्मिक उत्थान के लिए आप चाहे तो हिन्दू धर्म अपनाये, आप चाहें तो इस्लाम अपनाएं या फिर ईसाई धर्म का अनुसरण करें पर सामाजिक धर्म के लिए देश के संविधान का पालन करना सभी का कर्तव्य होना चाहिए। और जहाँ भी अध्यात्मिक धर्म सामाजिक धर्म का विरोध करे वहां पर सामाजिक धर्म को ही महत्व दिया जाना चाहिए।

ये विचार बहुत दिनों से दिमाग में थे आज इन्हे बहार निकल पाया हूँ। अब शायद नींद अच्छी आयेगी।

शुभ रात्रि।

10 टिप्‍पणियां:

  1. काश सभी जान पाते सिर्फ एक ही धर्म मानवता का धर्म तो इस जहान का नजारा कुछ और होता 1अच्छा लिखा है आपने

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  2. धर्म को भी आज की परिस्थिति के अनुरूप अपडेट किए जाने की आवश्‍यकता है !!

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  3. हमें सोचना होगा... धर्म 'इंसान' के लिए है या इंसान 'धर्म' के लिए...
    इंसान के रूप में जन्म लेकर भी, लोग मज़हब के नाम पर इंसानियत का ही खून करने पर क्यों तुले रहते हैं...???

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  4. कह तो सही रहे हैं..विचारणीय बातें.

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  5. Lekin dikkat to yeahi hai ki log samjhane ko taiyar nahi hai. Sirf dusare ki kamiyon ko nikalane ke chhakkar main pade hain.

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  6. @ "तो ये आज जो हम तेरा धर्म मेरा धर्म का राग आलापते रहते हैं वो आखिर हैं क्या?"
    सचिव जो रहा धर्मरूचि जासू. भयौ बिमात्र बंधु लघु तासु (१-१७६-४)

    धर्म्रुची का मतलब है जिसकी जो रूचि हो उसके मुताबिक उस परम सत्ता की उपासना करे , तो वह उसका धर्म है. कोई ईश्वर बोले,कोई अल्लहा बोले, कोई कैसे कोई कैसे .
    लेकिन यह उपासना प्रलोभन से ना हो,किसी को पीड़ित करके ना हो,किसी को परवश करके ना हो .
    किसी को पीड़ित करके ,लोभ से ,परवश करके किसी पद्दति में रूचि लेने के लिए कहा जाए तो ये अधर्म है
    लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं की जिसकी जो मर्जी हो वही धर्म है.धर्म की परिभाषा के लिए तो शास्त्र ही प्रमाण है
    धरमु न दूसर सत्य समाना , आगम निगम पुराण बखाना (२-९५-५)
    सत्य के सामान कोई धर्म नहीं, सत्य धर्म है .

    धर्म की दया सरिस हरिजाना (७-११२-१०)
    दया के सामान कोई धर्म नहीं है .

    कोई समझे तो धर्म का मूल क्या है-
    मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधे: (३-१-१)
    धर्म का मूल है शंकर और शंकर का कोई संकीर्ण मतलब ना निकाले,शंकर का मतलब है कल्याण .
    बाकि तो जैसा जो समझे ,
    समय काफी कम मिल पा रहा है विषय काफी जटिल है फुर्सत से बात करेंगे

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  7. धर्म की सरल व्याख्या है —

    "जो धारण किया जा सके।" वही धर्म है।
    बाह्य धर्म हैं जलवायु अनुकूल पहनावा, ऐसा शिष्ट पहनावा जो बिना वजह स्वयं और अन्यों के भावों का उद्रेक ना करता हो। अपने उत्तेजक भावों का प्रदर्शन और अन्यों के भावों की परीक्षा लेने की कोशिश भी सामाजिक अधर्म है।

    आंतरिक धर्म हैं — १] 'धृति' धैर्य — इससे मन का संतुलन बना रहता है। जटिल कार्यों को कर पाने की हिम्मत मिलती है।

    २] 'क्षमा' की भावना — इससे दोहरा लाभ होता है। जिसके भीतर होती है वह इसे करके आनंदित होता है और जिसपर की जाती है उसे भूल सुधार का अवसर मिल जाता है। लेकिन इसे कसौटी पर कस कर ही तय करना चाहिए।

    ३] 'दम'न — अपने अहंकार का त्याग। इसकी कमी के कारण रावण, हिटलर, सद्दाम, मुशर्रफ सोच वाले पैदा होते हैं।

    ४] अस्तेय — मतलब किसी भी तरह की चोरी ना करना।

    ५] शौच — मतलब पवित्रता, हर तरह की स्वच्छता। जिससे रोग शरीर में प्रवेश न कर पाए।

    ६] इन्द्रिय-निग्रह — अपनी ऐन्द्रिक लोलुप इच्छाओं को शांत करते रहना चाहिए। यह परिवार-व्यवस्था और समाज व्यवस्था बरकरार रखने का सत्संगीय आचरण है।

    ७] धी — बुद्धि प्रयोग, — बिना विचारे किसी के विषय में धारणा बना लेना और आस्था के नाम पर लेट जाना धर्म नहीं। धर्म बुद्धि के प्रयोग पर बल देता है। हर तरह से रोगमुक्त रहने को कहता है।

    ८] विद्या — ज्ञान प्राप्ति, जीवन को सौ वर्षों तक सुविधा और सुगमता से योजनाबद्ध ढंग से चलाया जा सके इसके लिए ज्ञान लेने को कहता है। अपनी उन्नति, समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए ज्ञान की हर ऊँचाई छूने को प्रेरित करता है।

    9] सत्यम — 'मनसा वाचा कर्मणा' सच का आचरण करना।

    १०] अक्रोध — क्रोध वयक्तिक तौर पर भी हानिकर है और जिसपर किया जाता है उसको तो परिणाम भोगना ही पड़ता है। भविष्य में पछताना ना पड़े इसके लिए सोचकर ही इसे इस्तेमाल किया जाना चाहिए। क्रोध एक ऐसी ऊर्जा है, yaa kahen poonjii hai, जिसका प्रयोग बड़ी किफायत के साथ किया जाए तो सुखद परिणाम होते हैं।

    मित्र , शास्त्रोक्त उपर्युक्त बातें राजनीति, फिल्म, उद्योग, साहित्य, पत्रकारिता आदि सभी क्षेत्रों में घटित की जा सकती है। यही तो धर्म है। जिसको आज कोई नाम दे दिया जाए तो फसाद हो जाए। क्योंकि हर व्यक्ति अपने-अपने झंडे को उठाये कडा है।

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  8. सुझाव बहुत अच्छा है आपका, बस्स.....थोड़े कार्यान्वयन में संदेह है। हम सब यही चाहेंगे कि ये विचार दूसरे जन मानें(नहीं तो थोप देंगे कि मान, नहीं तो................), हमारे लिये इसमें छूट होनी चाहिये।
    सुझाव अच्छे हैं। याद करें "दाग अच्छे हैं"?
    ::))

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