शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

वैश्यावृति को भी सामाजिक व क़ानूनी मान्यता दो!

पिछले कुछ दिनों से live in relations पर बहुत बहस हो रही है। सभी लोगों के अलग अलग विचार हैं। मैंने भी इस मुद्दे का विश्लेषण किया। मुझे तो यह मुद्दा ही समझ नहीं आया।

इसकी शुरुवात तब हुई जब एक दक्षिण भारतीय अभिनेत्री ने विवाह पूर्व शारीरिक सम्बन्ध बनाने के पक्ष में अपने विचार दिए। ठीक है, मैं अपने जीवन में जिस चीज को करूँगा उसका ही तो समर्थन करूँगा। दुसरे अभिनेता तो अपने जीवन में जिस चीज का कभी उपयोग नहीं करते उसका खुले रूप में प्रचार करते हैं वो भी पैसे लेकर तब तो कोई कुछ नहीं कहता , तो जब इस अभिनेत्री ने तो मुफ्त में ही उस बात का समर्थन किया जिसे वो अपने जीवन में करती आयी होगी तो बबाल किस बात का? पर कुछ लोगों को लगा की उसकी बातों से समाज में क्रांति हो जाएगी और सारा समाज उसकी बातों का अनुसरण करने लगेगा तो पहुच गए कोर्ट की शरण में जैसे की हमारे देश के न्यायालयों में काम की कमी होगी।

हमारे माननीय न्यायाधीश महोदय ने भी जाने क्यों इस मामले में बेचारे राधा कृष्ण को ही खीच लिया। विवाह पूर्व शारीरिक सम्बन्ध या लिव इन रिलेशन के मामले से राधा कृष्ण के अध्यात्मिक प्रेम का क्या सम्बन्ध है मुझे बिलकुल समझ नहीं आया। मैं पूरी इज्जत में साथ झुक कर माननीय कोर्ट को यह सलाह देना चाहूँगा की हिन्दू देवी देवताओं पर कोई भी गलत सलत टिपण्णी करना तो आसान है, कोई भी चूं तक नहीं करेगा, पर दुसरे धर्मों के देवी देवताओं पर कभी भी ऐसी हवाई टिपण्णी करने की जुर्रत ना करें वर्ना जान पर भी बन सकती है।

लिव इन रिलेशन को समाज में क़ानूनी मान्यता देने की बात हो रही है। मुझे समझ नहीं आया की यह क़ानूनी मान्यता देने की जरुरत ही कहाँ है? मैंने तो अभी तक एक भी ऐसा मामला नहीं सुना जहाँ पुलिस ने किसी लडके या लड़की को सिर्फ इस लिए तंग किया हो की वो बिना शादी किये ही साथ साथ रह रहे है या ऐसे किसी प्रेमी जोड़े की हत्या कर दी गयी हो।

हाँ मैंने अक्सर सुना और पढ़ा है की पुलिस वैध तरीके से विवाहित जोड़े को उठा ले गयी या उनकी हत्या कर दी गयी । ऐसे मामले तो हमारे चारों तरफ बिखरे पड़े हैं। बहस ही करनी है तो उन पर करें। जो मुद्दा समाज में है ही नहीं उस पर बेवजह क्यों बहस की जा रही है?

अब सिर्फ लिव इन रिलेशन पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाय तो मैं इसके एकदम खिलाफ हूँ और अगर आप इसको सामाजिक व क़ानूनी मान्यता दे रहे हैं तो फिर वैश्यावृति को भी क़ानूनी व सामाजिक मान्यता दें।

लिव इन रिलेशनशिप क्या है? यह दो व्यक्तियों द्वारा अपनी शारीरिक काम वासना को तृप्त करने का एक शानदार व सभ्य तरीका है। मुझे तो यह वैश्यावृति का ही सभ्य रूप लगता है। सही कहा जाय तो वैश्यावृति ज्यादा बेहतर है क्योकि बिना मज़बूरी के कम ही लोग इसका सहारा लेंगे पर लिव इन रिलेशनशिप में तो दोनों में से किसी भी पक्ष की कोई मज़बूरी नहीं होती तो क्या वजह है की लोग शादी करके अपने संबंधो को सामाजिक मान्यता नहीं देना चाहते।

वजह साफ है! लिव इन रिलेशन करने वाले दोनों पक्ष मुक्त रहना चाहते है। अगर एक शरीर से जी भर जाये तो दूसरा आसानी से मिल जाय इसके लिए लिव इन रिलेशन सबसे आसान तरीका है। शादी करने के बाद तो अलग होने में अनेक झंझट है। तो बात समझ में आयी आपके। जो लिव इन रिलेशन करते हैं उनके मन में shuru से ही अलग होने की बात रहती है ।

वैशायावृति भी तो ऐसी ही है। आज आप इस कोठे पर चढ़े , अच्छा नहीं लगा तो कल किसी दुसरे कोठे का रुख करेंगे।

इस वजह से ही मैं सोचता हूँ की अगर समाज लिव इन रिलेशन को क़ानूनी व सामाजिक मान्यता देता है तो वैश्यावृति को भी ऐसी ही मान्यता दे जिसकी मांग बहुत से लोग काफी पहले से कर रहे है।

9 टिप्‍पणियां:

  1. अपना अपना नजरिया है. मेरा मानना है कि बेश्या पैसे के लिये सोती है और जिस सम्बन्द की आप बात कर रहे है वह प्रेम से बनता है पैसे से नही. ओसो ने कहा है की जिससे प्रेम कारते हो उसे आज़ाद कर दो.लिव इन रिलेश्न्शीप यही है. अजाद करना. आपने इसकी तुलना बेश्या से कर कर अपने नाम को सार्थक किया.

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  2. दे रहा तर्क आज का युवा — "क्या है अनुचित? / है कौन व्यक्ति जो नहीं का से अब कुंठित? / अब की ही करता बात नहीं देखो अतीत / कितने श्रृंगारिक रच डाले पद, चित्र, गीत। / जिसको कहते भगवान् कृष्ण था महारसिक / सुलह हज़ार रानियाँ धरा करता।" 'धिक्-धिक्' — करता मेरा मन सुनकर अपलापी अलाप / कवियों ने इश्वर पर खुद का थोंप दिया पाप।

    रच रहे तभी से कविगण किस्से मनगणंत / मन के विकार का आरोपण करते तुरंत। / भक्ति के बहाने हुआ बहुत कुछ है अब तक / हो रहा आज भी और ना जाने हो कब तक? / ईश्वर की भक्ति हो अथवा दे...श की भक्ति। / विकृत होती जा रही अर्चना की पद्धति। .... पण्डे भी अपना स्वार्थ सिद्ध करने निमित्त / भक्ति में दिखलाते अपने को दत्तचित्त/ घंटा निनाद ओ' थाली करके इधर-उधर / ईश्वर को भोग लगा पर खुद का बढे उदर

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  3. यह दो व्यक्तियों द्वारा अपनी शारीरिक काम वासना को तृप्त करने का एक शानदार व सभ्य तरीका है। ....to fir shaadi kya hai?

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  4. aapne sahi kaha.. isse kam se kam police wale vaishyaon ke lie dalai ka kaam nahi karenge..

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  6. @हमारे माननीय न्यायाधीश महोदय ने भी जाने क्यों इस मामले में बेचारे राधा कृष्ण को ही खीच लिया।................. ..................................पर दुसरे धर्मों के देवी देवताओं पर कभी भी ऐसी हवाई टिपण्णी करने की जुर्रत ना करें वर्ना जान पर भी बन सकती है।

    हिन्दू समाज समाज नहीं हुआ गरीब की जोरू हो गयी, जिसे मौका लगता है वही छेड़ देता है.
    क्यों नहीं इन माननीय न्यायाधीश पे मानहानि का केस दायर किया जाये, बाकी तो एक ही उपाय बचता है "आओ सभी हिन्दू मिलकर आत्महत्या कर लें " क्योंकि हम कायर हैं

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  7. कुछ लोग स्त्री-पुरुष संबंध में केवल देह देखते हैं। आशा है आप ऐसा नहीं सोचते होंगे। वैसे सुप्रीमकोर्ट कुछ समय पहले ही सरकार को कह चुका है कि यदि आप वैश्यावृत्ति को रोक नहीं सकते तो इसे कानूनी क्यों नहीं बना देते?

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  8. आ रहा है भैया समय तुम्हारी इच्छा पूरी होने का। और कुछ सालों में सरकार से यह भी कहा जा सकता है कि चोरी, लूट, अपहरण, ठगी और आतंकवाद को भी कानूनी क्यों नहीं बना देते क्योंकि इन चीजों को सरकार रोक नहीं सकती है।
    बाकी दीप, तुम्हारा भविष्य उज्जवल है यहां। जल्दी ही मशहूर होने वाले हो, हमें मत भूल जाना। हा हा हा।

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  9. aapke lekh par tiipni hi likh raha tha magar wo itni badi ho gayi ki khud lekh ban gayi...."लिव इन / वेश्यालय : दीवार में खिड़की तो हो .."http://naturica.blogspot.com/2010/04/blog-post_03.html

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