शुक्रवार, 12 मार्च 2010

प्रगतिशील आधुनिक महिलाओं को मेरा सन्देश.

रोज सुबह जब
छः बजे की बस पकड़कर
काम पर जाती हूँ
तुम्हारा नन्हा सा मुहँ
अपनी छाती से और
बंद मुट्ठी से आँचल छुड़ाती हूँ
तुमसे ज्यादा मैं रोती हूँ
बिटिया ! मैं बिलकुल सच कहती हूँ ।


ये पंक्तियाँ मैंने शेफाली पांडे के ब्लॉग कुमाउनी चेली पर पढ़ी । मैं भावुक हो गया। मेरी भी एक बेटी है। मैं जब आफिस जाता हूँ तो रोती है। वापस जब घर आता हूँ तो मेरे पास दोड़ी चली आती है, मेरे साथ खेलती है, पार्क मैं घुमने जाती है । मुझे लगता है मैं एक बहुत अच्छा पिता हूँ पर जब भी मैं और मेरी पत्नी साथ होते हैं तो वो अपनी माँ की गोदी में ही बैठती है । मेरा सारा प्यार, दुलार व्यर्थ जाता है,कम पड़ जाता है और उसकी माँ की एक नज़र ही उसे अपनी ओर खीच लेती है। तब पता चलता है की एक बच्चे के लिए माँ क्या होती है। पिता चाहे कितना ही प्यार करे माँ की जगह नहीं ले सकता।


प्रकृति ने बच्चे के लिए माँ से बढकर और कोई चीज़ नहीं बनाई है। जो भावनात्मक सुरक्षा माँ दे सकती है वह कोई और नहीं दे सकता । माँ अगर अपने बच्चे को मारती भी है तो अगले ही पल प्यार भी करती है। बच्चे के कोमल ह्रदय पर केवल माँ का प्यार अंकित होता है उसकी प्रताड़ना तो पानी पर लिखे शब्द के समान कोई प्रभाव नहीं छोड़ती। पिता घर पर ही रहे या घर छोड़कर कार्य करने बाहर जाये बच्चे को कोई फर्क नहीं पड़ता। कहीं मैंने पढ़ा था की पिता का प्यार तो एक सुविधा है और माँ का प्यार एक जरुरत। तो फिर स्त्रियाँ आधुनिकता की इस अंधी दौड़ मैं, पुरुषों से बराबरी करने की मुर्खता भरी होड़ में क्यों अपने ही बच्चो को अपने ममता भरे आंचल की छाव से वंचित करती हैं।


ईश्वर या प्रकृति ने स्त्री को कुछ विशेषताएँ दी हैं जो पुरुष के पास नहीं हैं। स्त्री जन्म दे सकती है। यह प्राकृतिक रूप से उसका एकाधिकार है। स्त्री और पुरुष का सृजन अलग अलग कार्यों के लिए हुआ है और वो एक दुसरे से भिन्न हैं। दोनों की शारीरिक संरचना भिन्न है। दोनों अलग अलग कार्यों के लिए बने हैं। पुरुष घर से बाहर निकल कर कार्य करने के लिए ज्यादा अनुकूलित है जबकि स्त्री का घर में रहना ,घर और खुद उसकी अपनी सुरक्षा के लिए अच्छा होता है। जब स्त्री व पुरुष प्राकृतिक रूप से भिन्न हैं तो फिर समानता लाने के लिए औरत को काम पर बाहर भेजना जायज़ कैसे हुआ। स्त्रियाँ क्यों अपना प्राकृतिक स्वभाव छोड़कर पौरुष अपनाना चाहती हैं। सोचो अगर हमारी पृथ्वी माता कहे की मैं सूरज की आग से तपकर परेशान हो चुकी हूँ और मैं भी बराबरी चाहती हूँ, मैं भी उसकी तरह से गर्म होना चाहती हूँ, चमकाना चाहती हूँ तो हम निरीह जीवों का क्या होगा।

कुछ प्रगतिवादी महिलाये कहती हैं की औरत पैदा नहीं होती बनाई जाती हैं। सब बकवास है। औरतें बनाई नहीं जा सकतीं वे पैदा ही होती हैं। यह एक नैसर्गिक गुण है। मेरी दो साल की बेटी है। मैंने उसे गुडिया लाकर नहीं दी तो वो मेरे बेटे के बल्ले को ही गुडिया बनाकर खेलने लगी। यह ममता का भाव उसमे मैंने पैदा नहीं किया, समाज ने पैदा नहीं किया यह उसका नैसर्गिक गुण है। दो साल की उम्र में उसे अपने लड़की होने का अहसास नहीं पर वो अभी से सजती है, सवरती है जो उसकी उम्र में मेरे पुत्र ने कभी नहीं किया। उसमे अभी से प्यार है, करूणा है, ममता है। अभी वह कन्या है और परिपक्व होने पर स्त्री हो जाएगी । यह सब आपने अपने बच्चों के साथ भी महसूस किया होगा। मैं हमेशा चाहूँगा की मेरी बेटी औरत बने, स्त्री बने । जो उसके प्राकृतिक गुण है उनका विकास करे और कभी भी मर्द बनाने का प्रयास न करे।

औरतें हवाई जहाज़ चला रही हैं ट्रक चला रही हैं रेल चला रही हैं। लोग वाहवाही कर रहे हैं की औरत मर्द की बराबरी कर रही है। अरे ये सब काम औरतें करेंगी तो बच्चो को कौन सम्हालेगा। उनकी परवरिश कौन करेगा। क्या वो अपनी माँ को छोड़कर बाई के सहारे पलेंगे। माँ की ममता पैसे से खरीदी जाएगी तो बच्चों का प्यार भी पैसे से ही खरीदना पड़ेगा। मुझे एक घटना याद आती है की किसी चिड़िया घर में एक बंदरिया को जू के लोगों ने पाल पोस कर बड़ा किया बाद में जब उसके खुद के बच्चे हुए तो उसने उन्हें नहीं पाला क्योंकि उसे पता ही नहीं था की बच्चे को माँ पालती है।

इसलिए मेरा सभी कामकाजी महिलाओं से अनुरोध है की वो नौकरी करैं। मर्दों की बराबरी करें । और जी में आये तो शादी भी करें पर बच्चे तभी पैदा करें जब वे खुद उनकी परवरिश कर सकें। बच्चो की परवरिश पार्ट टाइम जॉब बिलकुल भी ना समझें । यह एक फुल टाइम जॉब है। आपने पतियों से कहें की जाओ तुम जो भी कमा कर लाओगे मैं उस में गुजरा कर लुंगी पर बच्चो को छोड़कर सुबह छ बजे की बस नहीं लुंगी ।

मैं फिर से सभी स्त्रियों से विनती करता हूँ की वो पुरुषो के साथ बराबरी की इस अंधी दौड़ में अपनी माँ की पदवी को न त्यागें क्योंकि माँ का स्थान ईश्वर ने केवल औरत के लिए अरक्षित कर रखा है और यह आरक्षण सौ प्रतिशत है।

और अंत में मेरी प्यारी बेटी टुपुर जिसने मुझे यह लेख लिखने के लिए प्रेरित किया।

बुधवार, 10 मार्च 2010

कुछ मुर्खता भरे प्रश्न. उत्तर देना चाहेंगे.

मैं बचपन से सुनता आया हूँ आत्मा अजर अमर हैं, न कभी पैदा होती है और न कभी मरती है। बस अपना चोला बदलती है। हमारे धर्म ग्रंथों में यही बात बार बार दोहराई गयी है।

जब से मेरी तार्किक बुद्धि ने अपना कार्य करना शुरू किया तब से जब भी मैं इस प्रकार की बातें सुनता हूँ तो कुछ प्रश्न मुझे तंग करना शुरू कर देते हैं । मैंने अपने इन प्रश्नों का उत्तर अपने परिचित लोगो से पाने का प्रयास किया पर मुझे संतोषजनक जवाब अभी तक नहीं मिला। मैं अपने प्रश्नों को यहाँ पर दोहराता हूँ अगर किसी के पास कोई जवाब हो तो मेरा दर्द दूर करैं।


जब भारत आजाद हुआ तो भारत की जनसँख्या लगभग ३० करोड़ थी । वही जनसँख्या आज एक अरब के पार है। यह हल सिर्फ भारत का ही नहीं पुरे विश्व का है। पुरे विश्व में जनसँख्या बड़ी है। अब मेरे मन मे सवाल उठता है की ये ७० करोड़ आत्माए कहाँ से भारत मैं आयी ? आत्मा तो न पैदा होती है और न मरती है।

माना कुछ जानवरों की आत्माए मानव बनकर अवतरित हुई तो क्या उन जानवरों की प्रजाति लुप्त हो गई ? ७० करोड़ जानवर इन्सान बन गए।



क्या जो इंसानों में पशुता का भाव बढता जा रहा है इसी वजह से तो नहीं है?



कहते हैं " बड़े जतन मानव तन पायोपर ७० करोड़ जानवरों का इन्सान बनाना तो दिखाता है की इन्सान के रूप में जन्म लेना तो बड़ा आसन हो गया है। कहीं यह कलयुग की महिमा तो नहीं?

प्रश्न तो बहुत हैं पर इनका इलाज हो तो आगे बढें।

मंगलवार, 9 मार्च 2010

मेरे मन की व्यथा.

मैं सुबह उठता हूँ रात मैं सो जाता हूँ। दिन में तरह तरह के कार्यों में उलझा रहता हूँ। कुछ समय आफिस में बीतता है और कुछ समय घर पर। कुछ समय परिवार के साथ व्यर्थ करता हूँ कुछ अकेले में। कभी हँसता हूँ कभी रोता हूँ, कभी क्रोध करता हूँ कभी खीजता हूँ। जिंदगी यों ही बीत रही है पर मोक्ष की कामना नहीं करता । आत्मा को परमात्मा से मिलाने के लिए कुछ नहीं करता। हम कहाँ से आये हैं कहाँ जायेंगे? हमारे आने का क्या उद्देश्य है इस प्रकार के प्रश्न मेरे अंतर्मन में नहीं उठते।

मेरा सब कुछ सांसारिक है। मैं खुद, मेरे पिता, मेरी माता, मेरी पत्नी ,मेरे बच्चे, मेरा भाई, मेरे मित्र सब कुछ इस संसार की ही देन है, परालौकिक कुछ भी नहीं। मेरा मन इन्हीं में रमता है। आफिस जाता हूँ काम करना पड़ता है। थक जाता हूँ। घर आता हूँ तो पत्नी अपेक्षा करती है उसके साथ बैठू चाय पियूँ , दो बात अपनी बताऊ और दो बातें उसकी सुनु। पूजा करता हूँ तो मेरी बिटिया मेरी गोद में आ बैठती है। मेरा ध्यान उसकी बाल क्रीडाओं में लग जाता है और मैं भगवन को छोड़ उसकी पूजा शुरू कर देता हूँ। मेरा पुत्र चाहता है सोते समय मैं उसके साथ रहूँ। मेरे बिना उसे नीद नहीं आती। कई बार प्रयास किया इन्हें छोड़ दूँ । अपने लिए अलग से कुछ समय निकालू , कुछ ध्यान करू कुछ आत्मा से परमात्मा के मिलन का उपाय करूँ पर अपने इन सांसारिक बन्धनों से मुक्त नहीं हो पाता। अपनी पत्नी अपने बच्चो को नाराज़ नहीं कर पाता। जाने सिद्धार्थ कैसे अपने सोते हुए पत्नी व् पुत्र को छोड़ कर उस अनादी अनंत सत्य की खोज में निकल पड़े थे? मैं तो अपने बिस्तर से कदम भी नीचे नहीं रख पाता।

मेरे एक मित्र कहते हैं यह पशुवत जीवन है। सभी जानवर ऐसा करते हैं। जीते हैं और मर जाते हैं। आप यहीं तक सीमित न rahen . अपने कल्याण के लिए कुछ करें। आप इस भूलोक में क्यों आये हैं यह जानने का प्रयास करें। कुछ ऐसा करो की उस परम सत्ता में तुम विलीन हो जाओ और जन्म मरण के बन्धनों से तुम्हें मुक्ति मिले।

मुझे यह सब समझ में नहीं आता। मेरा तार्किक मन तर्क करता है। वह अनेकों सवाल पूछता है और मैं भ्रमित हो जाता हूँ।

मेरा मन जानना चाहता है की क्या मैं आत्मा के रूप मैं शुरू से स्वतंत्र था या फिर बाद में उस से अलग हुआ।
अगर मैं पहले उसमे ही समाया था तो फिर उससे अलग क्यों हुआ? और अलग हुआ यह उसकी इच्छा थी या मेरी ?
अब अगर अलग हो ही गया तो क्यों दुबारा से उसमे विलीन होने का प्रयास करूँ?
क्या है यह सब? लोग कहते हैं योग का प्रयास करो मुझे पहले बताओ वियोग हुआ ही क्यों?
क्या अलग होना मेरी गलती थी या फिर उसकी इच्छा? कहींवो खुद ही तो नहीं चाहता की मैं इस संसार में रहूँ। यहाँ के सुख दुःख को भोगु और जब सजा पूरी हो तो वो स्वयं ही मुझे बुला लेगा।

तरह तरह के सवाल मन में उठते हैं। कभी लगता है यह सब पागलपन है और कुछ नहीं। जब अलग होना हमारी इच्छा नहीं थी तो फिर जुड़ने की इच्छा मन में क्यों पालें। इस पर एक कथा ध्यान में आती है। कथा कुछ इस प्रकार से है:

एक बार नारद जी ने यों ही कौतुहल वश भगवान् से पूछा भगवन आपका सबसे बड़ा भक्त कौन है? नारद जी को विश्वास था की उनसे बड़ा भक्त और कोई नहीं हो सकता । भगवान् उनके मन बात समझ गए और उन्होंने कहा की मेरा सबसे बड़ा भक्त पृथ्वी पर वहां रहता है। नारद जी चकित हो गए। वे उस भक्त के घर उसकी भक्ति देखने पहुचे । वह भक्त एक मोची था। वह सुबह उठता नित्य कर्म से निवृत होकर चमडा लाता, जूते बनता, बेचता, अन्य सभी सांसारिक कार्यों को निबटता और सो जाता। ईश्वर का ध्यान, भक्ति, मोक्ष की कामना, मुक्ति के लिए प्रयास, एसा वो कुछ भी नहीं करता था।
नारद जी परेशान।
प्रभु यह कैसा भक्त है आपका जो आपका नाम तक नहीं लेता । पशुवत जीवन जीता है। बतलाइए वो मुझ से श्रेष्ठ कैसे हुआ?
प्रभु बोले " नारद मैं तुम्हें इसका रहस्य बताऊंगा पर तुम पहले मेरा एक काम करो। यह तेल भरा दीपक लो और इस संसार के तीन चक्कर लगा कर आओ। ध्यान रहे तेल की एक बूंद भी छलकने न पाए।"
नारद जी चक्कर लगा कर वापस आए । प्रभु ने पूछा, नारद बताओ तुमने इस दोरान कितनी बार मेरा स्मरण किया। नारद जी बोले प्रभु मेरा सारा ध्यान तो इस बात में लगा रहा की तेल की एक बूंद भी बहार न छलकने पाए । मैं आपका स्मरण कब करता? मेरा सारा ध्यान तो आपकी आज्ञा का पालन करने में ही लगा रहा।
प्रभु मुस्कुराए ! नारद को उनके प्रश्न का उत्तर मिल चूका था।



सोमवार, 8 मार्च 2010

महिला आरक्षण क्यों ?

यादव कुल के तीन चश्मों चिराग महिलाओं को संसद में आरक्षण देने के विरुध हैं। ऐसा क्यों? भला इन यदुकुल वंशियों को स्त्रियों से क्या दुश्मनी है? क्या इन्हें डर है की स्त्रियों को आरक्षण दे दिया तो सत्ता इनके हाथों से फिसल जाएगी। इनमे से लालू यादव तो अपनी पत्नी को खुद सत्ता की बागडोर दे कर परोक्ष रूप से सत्ता का सुख भोग चुके हैं। फिर कम से कम लालू यादव को तो महिला आरक्षण का विरोध नहीं करना चाहिए था।

असल में ये तीनों भारत के उन हिस्सों का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ औरतों को सिर्फ चूल्हा चौका करने के लायक ही समझा जाता है। इससे ज्यादा महिलाओं का इन लोगो के जीवन में कोई महत्व नहीं। मुलायम सिह यादव तो रामपुर तिराहा कांड के दोषियों को बक्श कर अपनी इस मानसिकता का परिचय पहले ही दे चके हैं। शरद यादव तो महिला आरक्षण बिल के पास होने पर जहर खा लेने की धमकी देकर अपनी हताशा जाहिर का चुके हैं। और लालू जी को पता है की जिस तरीके से उन्होंने खुद अपनी पत्नी को आगे रख कर बिहार पर शासन किया वैसा कोई और न कर पाए अतः इस बिल का विरोध आवश्यक है।

में भी आरक्षण के बिलकुल विरोध में हूँ। मुझे लगता है की जिस प्रकार हमारे सविधान में जॉब्स में अनुसूचित जाती व् जनजातियों को आरक्षण देने का कोई फायदा नहीं हुआ है उसी प्रकार से इस आरक्षण का भी उचित लाभ नहीं मिल पायेगा। आरक्षण तो एक बैसाखी है जो अच्छे भले आदमी को लंगड़ाने पर मजबूर कर देती है। हमें कमजोर को मजबूत बनाने की कोशिश करनी चाहिए न की उसे बैशाखी पकड़ा कर हमेशा के लिए पंगु बनाना चाहिए।

मुझे पूरा विश्वास है की महिलाओं की स्थिति इस तरह से नहीं सुधरने वाली क्योकि उनकी बागडोर तो उनके पतियों के हाथ में ही रहेगी । लालू जी और राजस्थान के एक नेता जिन का नाम मुझे याद नहीं अपनी अंगूठा छाप पत्नियों को सत्ता देकर यह सिद्ध कर चुके हैं।

इस लिए हमें प्रयास यह करना चाहिए की स्त्रियाँ स्वावलंबी बने। उनमे आत्मविश्वास आये। ताकि कोई पुरुष उन्हें कठपुतली की तरह से इस्तेमाल न कर पाए। इसके बिना तो यह आरक्षण देना न देना एक बराबर है.

रविवार, 7 मार्च 2010

स्त्रियों को बराबरी का हक़ दो.


हमारे आराध्य देश अमेरिका में कुछ महिलाएं एक क्रन्तिकारी आन्दोलन चला रहीं है। वे चाहती हैं की स्त्रियों को पुरुषों के भांति समुद्र तट या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर अनावृत वक्ष स्थल के साथ आजादी से घुमाने दिया जाये। उनका तर्क है की जब पुरुष बिना हिचक सिर्फ कच्छा पहन कर आराम से इधर उधर घूमते हैं तो स्त्रियाँ एसा क्यों नहीं कर सकती। उनके हिसाब से यह स्त्री व् पुरुष के बीच भेदभाव का मामला है। वे चाहती हैं की महिलाओं को बराबरी का हक़ दिया जाये। अगर पुरुष नंगी छाती घुमाते हैं तो स्त्रियों को भी एसा ही अधिकार मिले। बात सामान अधिकारों की है।

मैं दिल से उनके साथ हूँ। मैं दिल से चाहता हूँ की एसा हो ताकि लोगों के मन में चोली के पीछे क्या है वाली उत्सुकता न रहे। पर दिल मैं कुछ सवाल बरबस ही आ जाते हैं। शायद मेरी पुरुषवादी मानसिकता का असर हो या भारतीय मानसिकता का , पर ऐसे सवाल तो मन में उठते ही हैं जिनका उत्तर मैं जानना चाहता हूँ।

पहला सवाल यह आता है की यह समानता के अधिकार की बात किस स्तर तक होगी। कल कुछ महिलाएं कहें की पुरुषों की छाती पर बाल हैं और हमारे नहीं। यह असमानता है तो समानता लाने के लिए फिर क्या वो हेयर ट्रांसप्लांट कराएंगी। कुछ प्रगतिशील महिलाओं को लगेगा की सिर्फ पुरुष ही जहाँ तहां खड़े होकर मूत्र त्याग करते हैं। हमें भी यह अधिकार चाहिए। इस तरह यह बराबरी व् समानता की मांग कहाँ तक जाएगी।

एक प्रश्न मेरे मन में और उठता है। प्रकृति ने स्त्री व पुरुष में भेद किया ही क्यों। दोनों को एक जैसा क्यों नहीं बनाया। पहले तो स्त्री को स्तन दिए फिर पुरुष के मन में उनके प्रति आकर्षण पैदा किया जिससे स्त्रियों को इन्हें ढकने की जरुरत पड़ी। अगर पुरुष के मन में यह आकर्षण नहीं होता तो इस आन्दोलन की जरुरत ही नहीं पड़ती। अतः सबसे बड़ी गलती तो प्रकृति या ईश्वर की है। ईश्वर ने ऐसी व्यवस्था क्यों बनाई जिसमे पुरुष स्त्री की तरफ आकर्षित होता है और इससे ही जीवन आगे बढता है। क्यों नहीं कोई और उपाय सोचा गया। अब इस गलती को सुधारने के लिए प्रगतिशील महिलाओं को पुरुषों के गुणसूत्रों में बदलाव करना पड़ेगा और कुछ ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी की बिना पुरुष के बच्चे हो सकें।

ओह्ह भगवान् की छोटी सी गलती का खामयाजा स्त्रियों को अब भुगतना पढ़ रहा है। काश यह जागरूकता पहले ही होती तो मानव जाती का इतिहास कुछ और होता।

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

सेक्स पर प्रतिबन्ध क्यों.

भारतीय संस्कृति में सेक्स एक वर्जित विषय है। हम इसे मानव संतति को आगे बढाने का साधन भर मानते हैं, भोग विलास का नहीं। इसलिए इसे परदे में रखे जाने की जरुरत समझी गई होगी क्योंकि इस विषय पर कोई भी खुलापन या आजादी हमें काम वासना में ही रत रहने को प्रेरित कर सकती है। काम या सेक्स का नशा अन्य सभी इंद्रिय नशों से बढकर है। अगर कोई इसमें बिना किसी प्रतिबन्ध के रत रहे तो वो इससे कभी बहार नहीं आ पायेगा। इन्सान के लिए तो प्रतिबन्ध और भी जरुरी है क्योंकि हम लोगों में सेक्स के लिए कोई नियत समय नहीं है जैसा की आमतौर पर सभी स्तनपायी जानवरों में होता है ( अब चाहे अजीब लगे पर हैं तो हम भी स्तनपायी जानवर ही) ।

शायद ईश्वर ने सोचा होगा की इन्सान को दिमाग दिया गया है अतः वह सेक्स के लिए उचित उम्र, स्थान, और समय आदि का निर्णय खुद ही कर लेगा। और हमने किया भी। हमारे पूर्वजो ने कुछ नियम बनाये। कुछ इंद्रिय सुखों को भोगने की खुली आजादी दी गई और कुछ पर बंधन लगाये गए। आप जितना चाहे खा सकते हैं, कुछ भी देख सकते हैं, कुछ भी सुन सकते हैं और अपने आराम के लिए कुछ भी कर सकते हैं पर सेक्स तो नियंत्रित ढंग से ही करना होगा। इसमें कोई छुट नहीं। इसमें कोई खुलापन नहीं। यह तो ढका छिपा ही ठीक है।

पर हमारे कुछ समझदार लोगों को सेक्स में खुलापन चाहिए। वे चाहते हैं की इस विषय पर हम पश्चिमी सभ्यता व् संस्कृति का अनुकरण करें। जाने क्यों इन्हें लगता है की अगर भारत में लोग नंगे घूमेंगे तो देश ज्यादा तरक्की करेगा। अगर यहाँ की लड़कियाँ भी शादी से पहले ही गर्भवती होंगी तो यहाँ की उत्पादन दर बढ़ जाएगी। पार्कों में अगर खुल्ले आम चुम्मा चा टी होगी तो बच्चे ज्यादा शिक्षित होंगे।

क्या अमेरिका या अन्य पश्चिमी देशों में बलात्कार नहीं होते ? क्या वहां पर यौन अपराधों में कोई कमी है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्यों हम अपनी संस्कृति के विरुद्ध जाएँ । बताइए।
अब हमारे प्रगतिवादी कहेंगे की अगर सेक्स ढका छिपा रहेगा तो मन कुंठित हो जायेगा। अरे भाई इसका भी इलाज हमारे पास है। हमारी संस्कृति बहुत गहरी व् समृद्ध है। यहाँ हर भावना का ख्याल रखा गया है। सेक्स पर इस बात का प्रतिबन्ध नहीं है की सेक्स किया ही न जाये। अगर एसा होता तो फिर खुजराहो के मंदिर नहीं होते। भारत में वसंतौत्सव नहीं मनाया जाता। प्रतिबन्ध है तो सिर्फ उचित स्थान, उम्र व् समय का।

काश हमें भी भगवन ने दुसरे जानवरों की ही तरह से बनाया होता तो अच्छा होता। हममे सही गलत में फर्क करने वाली बुद्धि नहीं होती । हम भी अन्य जानवरों की तरह से होते, कोई बंधन नहीं, कोई रिश्ता नहीं बस अनुकूल अवसर मिला, दाव लगा, जिससे चाहा सेक्स कर लिया। आजादी ही आजादी।

भाइयो समझो ! हमारी संस्कृति बहुत गहरी व समृद्ध है। यहाँ कुछ भी अप्राकृतिक व अवैज्ञानिक नहीं है। जहाँ छुट मिलनी चाहिए वहां छुट है और जहाँ नियंत्रण होना चाहिए वहां नियंत्रण है। इससे ज्यादा क्या कहा जाये आप लोग खुद समझदार हैं स्वयं निर्णय लें।

गुरुवार, 4 मार्च 2010

ताई तुझे सलाम.

आशा भोसले जिन्हें लोग प्यार से आशा ताई भी कहते हैं का मैं भी लाखों में से एक फेन रहा हूँ, पर अब मेरे मन में उनके लिए इज्ज़त कई गुना बढ चुकी है। आशा जी ने वो काम कर दिखाया है जिसे कोई आम आदमी कभी नहीं कर सकता। उन्होंने राज ठाकरे जैसे गुंडागर्दी के बल पर राजनीती करने वाले व्यक्ति को खुले आम जिस तरह से बेइज्जत किया है वो कोई आसन काम कतई नहीं है। हमारे भारतवर्ष में आप किसी आदमी की गलती का इस खुल्ले तरीके से इज़हार नहीं कर सकते वो भी एक राजनेता के गलत कार्यों का। इस तरह से आशा जी ने राज ठाकरे की गलत बातों का उसके ही मंच से उत्तर देकर जो हिम्मत दिखाई है मैं समझता हूँ की हम सभी भारतियों विशेषकर मराठी लोगों को आगे बढकर इसका स्वागत करना चाहिए और आशा जी का पुरजोर समर्थन करना चाहिए।
आशा जी आपको नमन है।
जाने क्यों ऐसी बातो पर मीडिया ज्यादा ध्यान नहीं देता। कोई पत्रकार लेख नहीं लिखता । टी वी चैनलों पर कोई बहस नहीं होती। क्यों??????