सोमवार, 28 मार्च 2011

गृहस्थी और ब्रह्मचर्य

मेरी ये पोस्ट मध्य वर्ग के उन अधेड़ दम्पतियों  को समर्पित है जो अपनी अधेड़ अवस्था को मन से स्वीकार चुके हैं.

ऑफिस में मैं अपने तीन  मध्य वय साथियों के  साथ दोपहर का भोजन करता हूँ.इनमे से एक हैं श्री राजकुमार जी जो उम्र के पांचवे पड़ाव में हैं. राज कुमार जी की भोजन उपरांत मीठा खाने की आदत है अतः उनके लंच बॉक्स में भोजन के साथ हमेशा ही कोई न कोई मिठाई जरुर होती है जैसे कभी लड्डू, कभी बर्फी, या कुछ और जिसका मजा हम लोग भी लेते हैं.  मैं यूँ ही मजाक में उनसे कहता हूँ की ये मिठाई उनकी रात के प्रदर्शन के अनुरूप होती है. अगर रात में राजकुमार जी बढ़िया प्रदर्शन करते हैं तो बर्फी आती है और अगर उनका प्रदर्शन ढीला होता है तो लड्डू मिलता है. 

अभी कुछ दिन पहले राजकुमार जी घर से खाना लेकर नहीं आये तो  मैंने फिर से मजाक में कहा की राजकुमार जी का  रात  का प्रदर्शन इतना ख़राब रहा की घर से मिठाई क्या खाना भी नहीं आया. मेरी इस बात का शायद उन्हें बुरा लगा और उन्होंने थोडा चिढ़कर बताया की उन्होंने पिछले डेढ़ दो वर्षों से पत्नी के साथ सेक्स नहीं किया है. पता चला की उनकी पत्नी ने किन्हीं  महाराज जी से गुरु मंत्र लिया हुआ है और वो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रही हैं. मुझे कहीं न कहीं खुद में भविष्य का राजकुमार छिपा दिखा इसलिए मेरे मन में  राजकुमार जी के लिए सहानभूति पैदा हो गयी  और मैंने इस विषय पर "अपने स्तर का" गहन चिंतन मनन आरंभ किया .

मुझे लगता है की ये हमारे मध्य वर्ग की आम समस्या है. ज्यों ही बच्चे थोडा बड़े हुए नहीं,  पति और पत्नी एक दुसरे से दुरी बनाना शुरू कर देते हैं. पति पत्नी की शारीरिक निकटता कम होती  जाती है. ऐसे में अगर दोनों की मानसिकता एक सी हो तब तो कोई बात नहीं पर अगर  पति या पत्नी दोनों में से कोई एक सेक्स में रूचि रखता है और दूसरा न रखे तो गड़बड़ होनी शुरू हो जाती है. ज्यादातर मामलों में पति ही बढती  उम्र में भी सेक्स क्रिया जारी रखने में रूचि रखते हैं और पत्नियाँ असहयोग आन्दोलन शुरू कर देती हैं.

मध्य वर्ग के दम्पतियों   में इस "आचरण" के लिए बहुत से कारण गिनवाये जा सकते हैं पर मुझे इस सब के पीछे  जो सबसे बड़ा या मुख्य कारण नज़र आता है वो है  सेक्स के प्रति हम लोगों का नजरिया. हमारे यहाँ सेक्स को पाप समझा जाता है और ब्रह्मचर्य को पुण्य. हमें समझाया जाता है की  गृहस्थों को भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए. कहा जाता है की सेक्स सिर्फ संतान उत्पत्ति के लिए ही किया जाना चाहिए अन्यथा नहीं. गृहस्थों से भी ब्रहमचर्य के पालन की अपेक्षा की जाती है. 

मुझे ये सब बातें बकवास लगती हैं खासकर की  किसी शादी शुदा व्यक्ति द्वारा ब्रह्मचर्य का पालन तो एक अप्राकृतिक सी बात लगती है.  कोई व्यक्ति  तभी ब्रह्मचर्य का पालन कर सकता है जब वो किसी भी स्त्री को न देखे, न स्पर्श  करे, न ही उसके साथ एकांत में कोई बातचीत करें, और न ही कभी मन में उसका स्मरण करे और न ही कभी उसे प्राप्त करने का मन में कोई संकल्प करे. क्या एक पति और पत्नी के बीच ऐसा हो सकता है और अगर हो तो क्या वो पति पत्नी कहलायेंगे.

मेरा तो शुरू से ये मानता रहा हूँ की समाज में रहते हुए कोई व्यक्ति ब्रहमचर्य का पालन नहीं कर सकता. जरा सोचिये आप कोई घ्रणित वास्तु देखते हैं तो आपके मुह में स्वतः ही थूक भर आता है  या आपको कोई बढ़िया खाने की वास्तु मिलती है और आपके मुह में पानी भर आता है. ये सब स्वतः ही होता है. आप चाहें या न चाहें आपका मस्तिष्क आपकी ग्रंथियों को सक्रिय कर देता हैं. ऐसा ही कुछ विपरीत लिंगी के संपर्क में आने पर होता है. मनोअनुकुल साथी मिलने पर हमारा मस्तिष्क हमारी यौन ग्रंथियों को सक्रिय कर देता है. ये स्वाभाविक क्रिया है और इस पर प्रतिबन्ध लगाना अस्वाभाविक है.

हम लोगों की मान्यता है की स्वस्थ संतान के लिए वीर्य का संचय होना चाहिए पर कुछ लोगों द्वारा की गयी रिसर्च कुछ और ही प्रतिपादित करती है. मध्य वय के स्त्री पुरुष के लिए प्रेम की शारीरिक अभिव्यक्ति कितनी जरुरी है इस बात को कितने सुन्दर तरीके से यहाँ समझाया गया है.
कुछ लोगों का मानना है की उन्मुक्त प्रेम स्त्री व पुरुष दोनों को तनाव मुक्त और खुशहाल जीवन देता है.

तो क्यों न अधेड़ होते जा रहे  भारतीय दम्पति  हफ्ते में कम से कम दो बार अपने घर के सारी  बत्तियां बुझा  कर  earth hour  मनाएं  और उस अँधेरे में खुल कर प्रेम की शारीरिक अभिव्यक्ति करें. जैसे अपनी युवा अवस्था  में अपने माँ बाप की आँखों में धुल झोंककर प्यार के दो पल चुराते थे वैसे ही अब अपने युवा हो रहे बच्चों से बच कर प्यार करें. 

भैय्या मैं तो अपने संपर्क में आ रहे सभी बुढ़ाते लोगों को यही सन्देश देता हूँ. 

(मैं जनता हूँ की मेरे विचारों का समर्थन कर पाना बेहद मुश्किल है पर अगर आपको मेरी बातों में कहीं भी गलती लगे तो खुल कर  विरोध तो कर ही सकते हैं. क्या पता आप मेरा सत्य से साक्षात्कार करवा सकें .) 


106 टिप्‍पणियां:

  1. एक टैबू समझे जाने वाले विषय पर अच्छी और स्वस्थ बात..

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  2. पाण्डेय जी महाराज ... एक बार फिर आपने काफी खुल कर एक ऐसे विषय पर अपनी राय दी है जिस पर शायद ही कोई बोलता हो ... बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

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  3. Ek swasth aur sashakt aalekh. Adhed umr kee mahilayen shayad purushon ke b-nisbat sharirik prem me kam ruchi rakhatee hain.

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  4. शमा जी, भारतीय नागरिक और शिवम् भाई पोस्ट के समर्थन के लिए धन्यवाद पर इस बार मैं अधीरता से विरोधी विचारों की प्रतीक्षा में हूँ. टिप्पणियों की मुझे परवाह नहीं. मेरे समर्थन के लिए तो ब्लॉग जगत का मौन ही काफी है.

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  5. सबसे पहले ये कह दू की एक अच्छा लेख लिखा है इस विषय पर | इसकी समस्या तो विवाह के बाद ही शुरू हो जाती है जब अपने पहली या दूसरी वैवाहिक सालगिरह आने से पहले ही ज्यादातर पति पत्नी माँ पिता बन जाते है उसके बाद वो कभी पति पत्नी बन कर नहीं जीते है सदा माता पिता ही बने रहते है और माता पिता जल्द ही बूढ़े कहलाने लगते है | खासकर महिलाओ को तो और भी पहले न केवल बुढा घोषित कर दिया जाता है बल्कि वो इस बात को मानने भी लगती है और हमारे यहाँ की संस्कृति बुढ़ापे में इसकी इजाजत नहीं देती है | मुझे लगता है सेक्स को छोडिये ज्यादातर भारतीय माध्यम वर्गीय अरेंज विवाह वाले दंपत्ति बिना किसी ज्यादा भावनात्मक प्रेम के यानि रोमांस के बिना एक नीरस जीवन जीते है | जहा सेक्स प्यार का दूसरा रूप न हो कर बस सेक्स होता है और आप ने जैसा कहा सेक्स तो पाप होता है |

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  6. @मैं जनता हूँ की मेरे विचारों का समर्थन कर पाना बेहद मुश्किल है |

    इसका क्या मतलब है आप को क्या लगता है की हिंदी ब्लॉग जगत आज भी पुरातन युग में जी रहा है या इतना शर्मीला है की इस विषय को पढ़ शर्मा जायेगा या हिंदी ब्लॉग जगत ऐसे विषयों को ठेठ अंदाज में ले कर बस हंसी ठठा करेगा कोई गंभीर चर्चा नहीं करेगा | ये सवाल आप की लिखी ये लें पढ़ कर ही उपजी है सो यही तीपनी के रूप में दिए जा रही हूँ |

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. प्रिय विचार शून्य जी ,
    एक बेहतर मुद्दा उठाया है आपने , पर आपके मित्र की पत्नी के गुरुमंत्र वाली बात जम नहीं रही , खासकर जबकि 'बाबा' लोग ही इस प्रेम से मुक्त नहीं हो पाने के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हों ! मेरे विचार से आपके मित्र के 'काम' जीवन पर उनकी पत्नी के कार्याधिक्य और बच्चों के पालन पोषण जैसे अन्य कारकों का असर अधिक होना चाहिए और संभव है कि गुरुमंत्र एक बहाना मात्र हो , वैसे इस दृष्टान्त का सत्य तो आपके मित्र ही विवेचित / उदघाटित कर सकते हैं इसलिए उनकी निर्भीक / निष्पक्ष सलाह 'बहुतों' के काम आ सकती है !

    मेरा ख्याल है कि आपके मित्र की गुरुभक्त पत्नी को इतना अनुमान तो होगा ही कि अगर मित्र अपनी पीड़ा के निवारणार्थ इधर उधर मुंह मारने लगे तो एक नई सामाजिक विसंगति के उत्पन्न होने का खतरा तो है ही !

    कभी कभी स्त्रियां , पति के एक पक्षीय प्रेम / तात्कालिक अवसरवादी त्वरित प्रेम या फिर अतिकामुकता के चलते भी इस आयोजन से उदासीन / विमुख हो सकती हैं वर्ना एक नैसर्गिक आयोजन से किसी स्त्री या पुरुष के विरक्त होने का प्रश्न ही कहां है ?

    स्वस्थ सेक्स के लिए स्वस्थ पारिवारिक / सामाजिक माहौल और अनुकूल मनोदशाओं के महत्त्व को नकारा नहीं जाना चाहिए इसलिए 'घिसते' हुए मित्रों को इन बातों पर भी ध्यान देना चाहिए !



    पुनश्च :
    'रोजी' के चक्कर में फंसा हुआ हूं :) ब्लॉग जगत में आने और मित्रों को पढ़ने का समय ही नहीं मिल पा रहा !...वर्ना यह विषय और भी बड़ी टिप्पणी माँगता है :)...वैसे देखें इंजीनियर गिरिजेश राव और वैज्ञानिक अरविन्द जी इस मसले पे क्या कहते हैं :)

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  10. अर्थ आवर का उपयोग तो आपने नायाब सुझाया है. एक अच्छा लेख. समस्या गौरतलब है.

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  11. शारीरिक सम्‍बंध मन के अधीन होते हैं और मन कब विरक्‍त हो जाए इसका क्‍या पता। वैसे महिलाओं में मेनोपोज के बाद मन में स्‍वाभाविक विरक्ति आ जाती है। भारतीय दर्शन कहता है कि पचास वर्ष के बाद वानप्रस्‍थाश्रम अपना लेना चाहिए जिससे समाज हित में कार्य किया जा सके। नहीं तो यह ऐसी भूख है जो मरते दम तक समाप्‍त नहीं हो सकती।

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  12. यह तो मानी हुई बात है कि सेक्स सभी को शारीरिक व मानसिक उर्जा देता है। ब्रह्मचर्य की बातें बकवास हैं। यह विद्यार्थी जीवन तक ही ठीक है। वहाँ भी उम्र की एक सीमा होती है। प्रकृति के विरूद्ध किया गया कोई भी कार्य उचित नहीं है। भले ही हम अपने पाखंड से इसे उचित ठहरायें। अधेड़ वय की ओर हमारा ध्यान इसलिए जाता है कि ये ही इसकी उपेक्षा करते से प्रतीत होते हैं। दरअसल ऐसा है नहीं। वे उपेक्षा करने के लिए मजबूर होते हैं। मजबूरी के लिए कई कारक जिम्मेदार होते हैं जैसे उनके कार्य की परिस्थिति, शिक्षा का स्तर और सबसे बड़ा आर्थिक पक्ष।

    सेक्स बिना प्रेम के संभव नहीं। प्रेम के बिना किया गया सेक्स बलात्कार की श्रेणी में आता है। प्रेम चाहता सभी है मगर रह नहीं जाता। अधेड़ उम्र के आते-आते सिर्फ कर्तव्य निर्वहन और सामाजिक भय के कारण जीवन जीये जाना ही बहुसंख्य की नियति बन जाति है। यहाँ वे धार्मिक प्रपंच का सहारा ले कर अपनी खीझ मिटाते हैं। अन्यथा यह साफ देखा गया है कि प्रौढ़ वय के पुरूष, युवाओं की तुलना में अपने शारीरिक व मौखिक हाव-भाव से अधिक काम लोलुप दिखते हैं। भले ही उनमे काम की शक्ति शेष न रह गई हो। पढ़े लिखे हम वय वर्ग भी इस विषय में खूब चर्चा करना पसंद करते हैं। आपकी पोस्ट और उस पर मेरा कमेंट भी इसी का प्रभाव हो सकता है। मुझे विश्वास है कि इस पर खूब विचार आने वाले हैं। वैसे भी आपके ब्लॉग में अच्छे विचारक अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। शेष पढ़ने में आनंद है। पोस्ट की सफलता के लिए अग्रिम बधाई।

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  13. अच्छा मुद्दा उठाया है आपने.
    लेकिन बहुत से दम्पति ऐसे भी हैं जो शारीरिक संबधो के बगैर भी बहुत प्रेम से रहते है.
    कुछ समय बाद आम व्यक्ति के लिए शारीरिक सम्बन्ध गौण हो जाते है.
    व्यक्तिगत पसंद पर तो निर्भर है ही.

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  14. समर्थन या विरोध?
    इस विषय को हमेशा इसी तरह प्रस्तुत क्यों किया जाता है।
    देख लिजिये समर्थन पर तो आप पूर्ण आश्वस्त है, और विरोध को एक चेलेंज की तरह प्रस्तुत किया गया है।
    पता है ऐसा क्यों होता है?, हम सदा बडी चतुरता से प्रेम जैसे नैतिक, उदात्त, स्थाई गुण को शारिरिक आवश्यकता और सहज आवेगी सेक्स से मिलाकर ही प्रस्तुत करते है।
    सेक्स से मन-निकटता मात्र इसलिए बढती है कि यह प्राकृतिक आवश्यक्ता समर्पण मांगती है। और समर्पण प्रदर्शनीय प्रेम का मोहताज़ होता है। इस तरह का प्रेम तात्कालिक साथी को खुश करने का प्रयोजन होता है। यह पूर्णरूपेण स्थाई पवित्र प्रेम गुण का ध्योतक नहीं है। कहने का आशय यह नहीं है कि स्थाई पवित्र प्रेम गुण धारक सेक्स से नफरत ही करते है या सेक्स को महत्व देने वालो में आत्मीय प्रेम नहीं होता।
    लेकिन सेक्स को ही एकांत आत्मीय प्रेम का संवाहक मानना भी दोषपूर्ण अभिगम है।
    भोग समर्थक यदि सेक्स प्रेरित प्रेमावेगों को आत्मीय प्रेम गुण से भिन्न स्वीकार करे तो ‘सांसारिक ब्रह्मचर्य’ (अनावश्यक सेक्स भोग त्याग) के महत्व को रेखांकित किया जा सकता है।
    +

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  15. आपके प्रस्तुत राजकुमार जी के उदाहरण में उनकी पत्नी का महाराज जी से ब्रह्मचर्य व्रत का गुरु मंत्र लेना गलत है। ग्रहस्थ कभी भी एक पक्षीय ब्रह्मचर्य व्रत नहीं लेते। दोनो की पूर्ण सहमति के बाद ही ग्रहण किया जाता है। ग्रहस्थों के लिये आदर्श स्थिति यह है कि वे स्वदार संतोष व्रत ही ग्रहण करे।

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  16. अजीत जी नें एक तथ्य उजागर किया…

    "शारीरिक सम्‍बंध मन के अधीन होते हैं और मन कब विरक्‍त हो जाए इसका क्‍या पता। वैसे महिलाओं में मेनोपोज के बाद मन में स्‍वाभाविक विरक्ति आ जाती है।"

    ऐसे में यदि पत्नि में विरक्ति आ जाय और पति अभी इच्छा से मुक्त न हो पाया हो तो उन दोनों के बीच प्रेम को समाप्त प्रायः मान लेना चाहिए?
    अब यदि पाने के लिये समझोते किये जा सकते है तो त्याग के लिये समझोते क्यों नहीं किये जा सकते?

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  17. सुज्ञ जी की टिप्पणी पढने के बाद मैं अपनी पिछ्ली दोनों टिप्पणियाँ स्वेच्छा से वापस ले रहा हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  18. 1. मुद्दा है लाइफ साइकिल में स्टेप्स गडबडाना मन्त्र दीक्षा विद्यार्थी जीवन में ली जानी चाहिए हमने वृद्ध अवस्था को ही क्यों चुना है इश्वर प्राप्ति के लिए ..

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  19. 2. हमारे देश के आम आदमी (स्पेशली कथित आधुनिक युवा ) को भारत की संस्कृति की बस इतनी ही जानकारी है की "बाबा" और "मन्त्र" शब्द आते ही भारतीय संस्कृति से बात को जोड़ कर देखता /देखती है

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  20. ........और हाँ यही आधुनिक[?] युवा कालांतर में बाबा लोगों के प्रवचन सुनते सत्संग पंडालों में मिलते हैं :)) और फिर अगली पीढी ये संस्कृति को कोसने का पारंपरिक काम जारी रखती है :)

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  21. @ असहयोग आन्दोलन शुरू कर देती हैं.

    शायद यही वो स्टेज हो जहां से पुरुष का रोल शुरू होता हो , सलाम -ए -इश्क के अनिल कपूर वाले पात्र पर भी थोडा विचार किया जाये

    साइंटिफिक रीसर्च थोड़ी देर में ......

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  22. Dr. Nicole says: "It is a medical and physiological fact that the best blood in the body goes to form the elements of reproduction in both the sexes. In a pure and orderly life, this matter is reabsorbed. It goes back into circulation ready to form the finest brain, nerve and muscular tissues. This vital fluid of man carried back and diffused through his system makes him manly, strong, brave and heroic. If wasted, it leaves him effeminate, weak and physically debilitated and prone to sexual irritation and disordered function, a wretched nervous system, epilepsy, and various other diseases and death. The suspension of the use of the generative organs is attended with a notable increase of bodily and mental and spiritual vigour."

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  23. Dr. E.P. Miller, says: "All waste of spermatic secretions, whether voluntary or involuntary, is a direct waste of the life force. It is almost universally conceded that the choicest element of the blood enters into the composition of the spermatic secretion. If these conclusions are correct, then it follows that a chaste life is essential to man’s well-being."

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  24. दरअसल मुख्य कमीं है "मन की गुलामी को मन की आजादी कहना" रीसर्च में तो ये भी साबित किया जा चूका है की ऑफिस में फ्लर्टिंग से कईं तरह के फायदे होते हैं , और इससे भी बकवास कईं रीसर्चेस हैं , जो नारी अपराध और मानसिक रोग बढ़ाने में पूरा सहयोग कर रही हैं , सारा इल्जाम तो फिर पुरुषों पर ही आता है , सदियों से आता रहा है :))

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  25. बाकी कमेन्ट शायद बाद में .....

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  26. @"सुज्ञ जी की टिप्पणी पढने के बाद मैं अपनी पिछ्ली दोनों टिप्पणियाँ स्वेच्छा से वापस ले रहा हूँ।"

    अनुराग जी,

    मुझसे कोई विचार अतिक्रमण तो नहीं हो गया? या अनधिकार चेष्टा हो गई। मैं आपके उन टिप्पणी निर्देशित विचारों से सापेक्ष सहमत हूं

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  27. सुज्ञ जी के विचार हमेशा की तरह चर्चा के टर्निंग पॉइंट हैं....

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  28. मैं अभी तक की मेरी टिप्पणियां पर एक स्पष्टीकरण दे दूँ

    मैं लेख का विरोध या समर्थन नहीं कर रहा हूँ , बस कोई एक विकसित संस्कृति को बेवजह दोष और अल्प विकसित आधुनिक रीसर्चेस को बेवजह महत्त्व ना दें, बस यही कहना है

    पक्ष बदलने वाला विज्ञान
    http://www.mcastleman.com/page2/page27/page12/page12.html


    कुछ फायदे
    http://benefitof.net/benefits-of-celibacy/

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  29. भोगवाद से प्रभावित लोग बिना सेक्सी रोमांस के जीवन को नीरस मानते है। स्वनियंत्रित जीवन की सात्विकता से उन्हें आनन्दानुभुति क्यों नहीं होती?

    क्यों लगता है कि कामेच्छा नियंत्रण में संघर्षरत व्यक्ति विक्षिप्त ही हो जायेंगे?

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  30. गौरव जी,

    यही वास्त्विक फंडा है……आपके निराकरण से अभिभुत हूँ
    "मन की गुलामी को ही मन की आजादी कहना"

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  31. celibacy isn't always linked to religious views but issues such as ill health or lack of confidence and opportunity can lead to it. The following interviewees demonstrate it's a more complex subject than you might have thought.

    यहाँ पढ़ें ....
    http://arabia.msn.com/Lifestyle/Relationships/Men/2011/february/Celibacy.aspx

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  32. @क्यों लगता है कि कामेच्छा नियंत्रण में संघर्षरत व्यक्ति विक्षिप्त ही हो जायेंगे?

    @सुज्ञ जी

    अभी तक मनोरोगों का रिकोर्ड तो विदेशों का ही है :))
    ये बात अलग है की ६० सालों की गुलामी में हम पर थोड़ा मानसिक दबाव बना रखा लगता है और हम आज भी उनकी बात का महत्त्व ज्यादा मानते हैं ...... क्या ये किसी बाबा में जरूरत से ज्यादा श्रृद्धा रखने जैसा नहीं है ? :))

    उत्तर देंहटाएं
  33. @सुज्ञ जी,
    नहीं, आपकी बात के बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं बाबाजी के प्रति कुछ अधिक कटु हो गया था, अपने गुस्से पर थोडी शर्म आयी, बस इतना ही।

    उत्तर देंहटाएं
  34. @ मैं बाबाजी के प्रति कुछ अधिक कटु हो गया था,

    अनुराग जी ,
    सच कहूँ तो मुझे भी यही लगा था और मैं सुज्ञ जी के ही विचारों का इन्तजार कर रहा था :)

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  35. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  36. bahut achhe 'dipji'.......taboo charcha ke liye...
    abhar......

    man aur sarir dono me balancing hona bahut aham
    hai............saath hi dono paksh ka vichar aur
    byavhar me ekrupta bhi jaroori hai............

    bakiya shresth jan ke vichar swasth hain........

    pranam.

    उत्तर देंहटाएं
  37. दीप पाण्डेय जी,

    @"आप कोई घ्रणित वास्तु देखते हैं तो आपके मुह में स्वतः ही थूक भर आता है या आपको कोई बढ़िया खाने की वास्तु मिलती है और आपके मुह में पानी भर आता है. ये सब स्वतः ही होता है. आप चाहें या न चाहें आपका मस्तिष्क आपकी ग्रंथियों को सक्रिय कर देता हैं. ऐसा ही कुछ विपरीत लिंगी के संपर्क में आने पर होता है. मनोअनुकुल साथी मिलने पर हमारा मस्तिष्क हमारी यौन ग्रंथियों को सक्रिय कर देता है. ये स्वाभाविक क्रिया है और इस पर प्रतिबन्ध लगाना अस्वाभाविक है."

    दीप पाण्डेय जी,

    मन के विचारो और आवेगों का प्रभाव शरीर पर दृष्टिगोचर होता है। क्रोध व तनावों में एन्ड्रिनल ग्रंथि से पित्त का स्राव, भय होने पर प्रतिरक्षा में समर्थ रसायन का स्राव।

    किन्तु 'मन' ही मुख्य कारक है। शरीर की प्रकृति उसके अनुरूप कार्य करेगी। पर मन के सभी आवेगों की पूर्ति जरूरी नहीं है। अन्यथा कामेच्छा के समर्थन में दिया गया आपका यह तर्क, व्याभिचार की तीव्र आवश्यकता के लिये भी बचाव का कार्य करेगा।

    भुख लगने कर पेट में आग सी लग जाती है, मन कहता है सामने जो भी जिसका भी हो यदि भोज्य पदार्थ पडा है तो उस पर टूट पडो। किन्तु भुख सहकर भी हम बिना मान किसी का भोजन नहीं ग्रहण करते। कुछ देर सह लेने से विक्षिप्त नहीं हो जाते।

    कहने का अर्थ यही है कि मन के प्रकृतिक आवेगों को नियंत्रित कर सकते है और ऐसे नियंत्रण से हमें कोई हानि नहीं होती। लाभ ही होता है। बेलगाम मन पर नियंत्रण ही संस्कृति है वही सभ्यता है।

    उत्तर देंहटाएं
  38. नवीन अध्ययनों के मुताबिक़ अधेड़ व्यक्ति का भी प्रति दिन सेक्स सामान्य है -मगर हम भारतीय हैं -यहाँ सेक्स की चर्चा भी गुनाह है!
    यहाँ तो कई ऐसे परिवार हैं जिन्हें यह याद ही नहीं पिछली बार कब सेक्स किया -कुछ ब्लॉगर भी हैं जिन्होंने मुझे अपनी दारुण कथा बताई है ..अली सा ने मुझे मानव व्यवहार की यौनिक विसंगतियों पर एक लेखमाला करने की सलाह दी है अब आपने दरवाजे खोल दिए हैं तो हिम्मत बनी है -
    कई लोगों के व्यवहार की अपरुप्ताओं के पीछे दरअसल उनके यौन जीवन का असमान्य होना ही है ....कुछ केवल आत्मिक प्रेम को गौरवान्वित करते हैं और दैहिक प्रेम को पाप समझते हैं -अब आप ही बताईये प्रेम किसी से किया जाय और दैहिक सम्बन्ध किसी और कैसे बनाया जाय?

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  39. @arvind bhaijee.........hum apke vichar apke post se padhne ki iksha rakhte hain........

    pranam.

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  40. "...तो क्यों न अधेड़ होते जा रहे भारतीय दम्पति हफ्ते में कम से कम दो बार अपने घर के सारी बत्तियां बुझा कर earth hour मनाएं और उस अँधेरे में खुल कर प्रेम की शारीरिक अभिव्यक्ति करें."
    HA-HA-HA-HA-HA-HA-HA-HA......................... KYA IDEA HAI SIR JI BIJLEE BILL GHATAANE KAA

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  41. @"कई लोगों के व्यवहार की अपरुप्ताओं के पीछे दरअसल उनके यौन जीवन का असमान्य होना ही है ...

    अरविन्द जी,

    माननीय, मैं मानता हूँ व्यवहार की अपरुप्ताओं के लिये यौन जीवन की असमान्यता में 'इच्छा का अतिरेक' भी सम्मलित होगा।

    @कुछ केवल आत्मिक प्रेम को गौरवान्वित करते हैं और दैहिक प्रेम को पाप समझते हैं।
    हमारी संस्कृति में दैहिक प्रेम को पाप की संज्ञा नहीं दी गई है, बल्कि उसे मोह माना गया है और उसके नियंत्रण पर बल दिया गया है।
    @-अब आप ही बताईये प्रेम किसी से किया जाय और दैहिक सम्बन्ध किसी और कैसे बनाया जाय?

    आपने तो देहिक प्रेम के विलोम में आत्मिक प्रेम को 'पति पत्नी और वो' की तरह खडा कर दिया। आत्मिक प्रेम का क्षेत्र तो विशाल है, वह तो हर रिश्ते मित्र और यहाँ तक कि जीव जन्तु से भी किया जा सकता है, आत्मिक प्रेम देहिक प्रेम का प्रतिद्वंधी नहीं है।

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  42. अनुराग जी,

    फिर तो इस विषय पर आपके विचार आने शेष है।
    मुझे इन्तज़ार रहेगा, इस विषय पर आप क्या कहते है।?

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  43. हाँ .... अब हो रही है और होने वाली है ज्ञान की ओरिजिनल बारिश , पाण्डेय जी को पहले ही आभार दे देता हूँ ,
    देखते हैं इस बार विचार मंथन से क्या प्राप्त होता है ब्लॉग जगत को

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  44. अपनी सोच तो यही है कि सेक्स बहुत मोटी बात है,शुरुआत भर!

    उम्र के पाँचवें पड़ाव तक आते आते भी यदि यह प्रेम की सुवास में न बदला तो समझें कि चले तो बहुत पर पड़ाव अभी भी नहीं आया।

    इस उम्र तक तो बात दूसरे को सुख देने की होनी चाहिये न की स्वंम प्यासे रहने की शिकायत!

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  45. ये बात शायद चर्चा में कुछ काम आ जाये
    दुनिया के सबसे महान साइकोलोजिस्ट भगवान् श्री कृष्ण ने कहा था

    कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ ।
    इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥

    भावार्थ : जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है॥6॥

    यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
    कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥

    भावार्थ : किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है॥7॥॥

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  46. और ये भी .......

    मन को विकारपूर्ण रहने देकर शरीर को दबाने की कोशिश करना हानि कारक है । जहाँ मन है वहाँ अन्त को शरीर भी घिसटे बिना नहीं रहता । यहाँ एक भेद समझ लेना जरूरी है । मन को विकार वश होने देना एक बात है और मन का अपने आप अनिच्छा से बलात् विकार को प्राप्त होना या होते रहना दूसरी बात है । इस विकार में यदि हम सहायक न बनें तो आखिर जीत हमारी ही है । हम प्रतिपल यह अनुभव करते हैं कि शरीर तो काबू में रहता है पर मन नहीं रहता । इसलिए शरीर को तुरन्त ही वश में करके मन को वश में करने की रोज कोशिश करने से हम अपने कर्तव्य का पालन करते हैं-कर चुकते हैं

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  47. सम्वेदना स्वर बंधु ने बडी सटीक बात कही……………
    "उम्र के पाँचवें पड़ाव तक आते आते भी यदि यह प्रेम की सुवास में न बदला तो समझें कि चले तो बहुत पर पड़ाव अभी भी नहीं आया। "

    भावार्थ है यदि इतना लम्बा पडाव पार करके भी प्रेम और निकटता के लिए अब भी कामावेग का ही सहारा लेना पडे तो इतने लम्बे भोगकाल का फलितार्थ क्या है?

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  48. मैं तो अपने कमेंट को मिटाने से रहा।
    मेरे विचार से अपने जीवन साथी से सेक्स की कामना करना भोगवादी होना नहीं है।
    "उम्र के पाँचवें पड़ाव तक आते आते भी यदि यह प्रेम की सुवास में न बदला तो समझें कि चले तो बहुत पर पड़ाव अभी भी नहीं आया। "
    ..यह तो दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रेम के सुवास के लिए जीवन के पांचवे पड़ाव तक प्रतीक्षा करनी पड़े। मेरा तो मानना है कि प्रेम ही जीवन का प्रथम पड़ाव है। इसके बाद ही सेक्स की संभावना प्रारंभ होती है। मेरा सेक्स भी उतना ही निर्मल है जितना कि प्रेम।

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  49. अनुराग जी,

    अब समझा आपके द्वारा टिप्पणीयां मिटाने का सद्भाव। वस्तुतः चर्चा विषय से भटक कर बाबा केन्द्रित होने जा रही थी, समय रहते आपनें सही निर्णय ही लिया।

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  50. मुझे एक पुरानी अनिर्णीत बहस याद आ रही है जब मैं इंटर मीडिएट का छात्र था और एक हमसे करीब दस वर्ष बड़े मित्र जो अब इंजीनियर के पद से सेवामुक्त हुए हैं -
    विषय था -
    प्रेम की परिणति वासना है
    वासना की परिणति प्रेम है
    उन्ही दिनों आचार्य रजनीश का भी डंका बज रहा था
    फिर मैंने बायलोजी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पी एचडी की
    फ्रायड ,चार्ल्स डार्विन ,ई ओ विल्सन ,डेजमंड मोरिस को हृदयंगम किया
    कामसूत्र तो पहले ही पढ़ लिया था ,ज्व्याय आफ सेक्स भी जिसकी चर्चा क्वचिद पर पुस्तक समीक्षा में है
    मास्टर एंड जॉन्सन किनसे के सेक्स अध्ययनों के आंकड़े खूब देखे ..
    विषय मेरी पहली पसंद के विषयों में से है -
    आज शायद इस विषय पर मैं कुछ कह सकने की स्थति में हूँ -
    सूत्र यह है कि-बिना घनिष्ठ सम्बन्ध के प्रेम भी स्थाई नहीं रहता ..(अपोसिट सेक्स का प्रेम )
    घनिष्ठ सम्बन्ध बोले तो बिना शरीर संस्पर्श के कोई सम्बन्ध घनिष्ठ नहीं होता ..
    पति पत्नी के बीच नियमित सेक्स 'जोड़े' के लिए फेवीकाल है ..
    इसमें असंतुष्टि कई असमान्य व्यवहारों को जन्म दे सकती है -पर्वर्जन्स ,विवाहेत्तर सम्बन्ध भी
    इन्द्रिय नियमन की बात अपनी जगह सही है पर सेक्स निरोध के लिए ऐसा क्यों किया जाय ?
    आधुनिक नारीवादी पेनीट्रेशन के ही विरुद्ध लामबंद हो रही हैं ...यह एक असमान्य व्यवहार है ...
    हो सकता है एक नए विकासक्रम का बीज मनुष्य में अंकुरित हो रहा हो और भविष्य में सेक्स बिना पेनीट्रेशन के होगा
    मगर फिर मदन लहरियों (आर्गेज्म ) का क्या होगा ,कैसे उनकी अनुभूति होगी ?
    बड़ा विषय है ...लगता है एक यौन परामर्श केंद्र खोलना पड़ेगा -वालन्तियर्स चाहिए -पेनीट्रेशन पक्ष और विपक्ष दोनों का स्वागत है !

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  51. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  52. विषय बहुत व्यापक है और पहलू भी कई हैं -हमें भारत की सामाजिक आर्थिक और समाज में औरत की स्थति को भीदेखना होगा -यहाँ की अधुनिकाएं भी सेक्सके मामले में दकियानूसी हैं और पुरुष प्रधान समाज के मानसिक बंधन से मुक्त नहीं -ज्यादा विभ्रमित और अभिशप्त !

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  53. देवेन्द्र पाण्डेय जी,

    आप भला क्यों मिटाएं कमेंट?

    आपकी टिप्पणी पर भी चर्चा करें…

    @"यह तो मानी हुई बात है कि सेक्स सभी को शारीरिक व मानसिक उर्जा देता है।"

    सेक्स शारिरिक उर्जा नहीं देता, यदि देता होता तो दुगुणित तिगुणित उर्जा पाकर व्यक्ति अनवरत रत रहता। और मानसिक उर्ज़ा भी नहीं, जिसे वह मानसिक आनंद मानता है वस्तुतः वह रक्त के अधोगामी दबाव और दिमाग में कम दबाव होने से मस्तिक्ष को कुछ क्षण के लिये आराम मिलता है। और चैन मिलता है बस। यह मानसिक उर्जा नहीं है।

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  54. देवेन्द्र जी,

    @प्रकृति के विरूद्ध किया गया कोई भी कार्य उचित नहीं है।

    प्रकृति को नहीं मालूम हम मनुष्यों ने सभ्यता के लिए क्या क्या मनदंड निर्धारित कर रखे है।

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  55. देवेन्द्र जी,

    @"अन्यथा यह साफ देखा गया है कि प्रौढ़ वय के पुरूष, युवाओं की तुलना में अपने शारीरिक व मौखिक हाव-भाव से अधिक काम लोलुप दिखते हैं।"

    आपने अधेडों को काम लोलुप कहा? यदि वह मात्र लोलुपता है तो त्यागी जा सकती है। प्रेम के लिये लोलुपता की क्या आवश्यकता।

    और आप तो प्रेम से सेक्स की उत्पत्ति मानते है और प्रस्तुत पोस्ट सेक्स से प्रेम की उत्पत्ति में मानती है। विरोधाभाष है।

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  56. @"मेरे विचार से अपने जीवन साथी से सेक्स की कामना करना भोगवादी होना नहीं है।"

    देवेन्द्र जी,

    काम की अनियंत्रित इच्छा(जिसकी अतृप्त रहने की सम्भावना अधिक है)भोगवाद ही है फिर भले कामना जीवनसाथी से की जाय।

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  57. सुज्ञ जी,
    दृष्टि सकारात्मक हो तो पत्थर में भी देव के दर्शन होते हैं। कुतर्की देव को भी पत्थर सिद्ध कर देते हैं।
    क्षमा करें मेरी प्रथम पंक्ति का अर्थ आपने गलत लगाया। प्रथम पंक्ति पोस्ट के संदर्भ में है जिसमे लिखा है ...
    भारतीय दम्पति हफ्ते में कम से कम दो बार अपने घर के सारी बत्तियां बुझा कर earth hour मनाएं और उस अँधेरे में खुल कर प्रेम की शारीरिक अभिव्यक्ति करें. जैसे अपनी युवा अवस्था में अपने माँ बाप की आँखों में धुल झोंककर प्यार के दो पल चुराते थे वैसे ही अब अपने युवा हो रहे बच्चों से बच कर प्यार करें.
    ....न कि दुगुणित तिगुणित उर्जा पाकर व्यक्ति के अनवरत रत रहने से।

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  58. पिछली पोस्ट पर टोपी उतारी थी, उसके बाद क्या हुआ था ये तो आपने कमेंट में खुद ही लिख दिया है। सबक ये है कि टोपी उतारने में जल्दी नहीं करनी चाहिये। सच बात तो ये है कि ऐसी पोस्ट्स पढ़कर और उस पर आते कमेंट्स पढ़कर खुद के लिये हीनभावना और दूसरों पर गर्व, दोनों भाव आते हैं। अछूता विषय और उस पर अलग अलग प्रतिक्रियायें पढ़ना सुखकर लग रहा है।
    विषय पर राय देना भी जरूरी है सो कहे देते हैं कि इस मामले में कोई भी थम्बरूल नहीं हो सकता। आपसी समझ, सहमति, क्षमता, हालात जिनमें शारीरिक और उससे भी ज्यादा मानसिक स्तर पर जितनी एकरूपता होगी उतना ही बेहतर होगा। मन अगर न मिलते हों तो सप्ताह में दो दिन क्या, रोज भी सुझाये गये तरीके से ’अर्थ-आवर’ मना लिया जाये तो उसका शायद ही कुछ लाभ हो। अपने साथी का मन जीतना पहले और ज्यादा जरूरी है।
    रही बात रिसर्चस की और उपदेश देने वालों की, तो इस जगत में सब कुछ उपलब्ध है और अपने मतलब की चीज हर कोई ढूंढ भी लेता है और मान भी लेता है। न हो तो कभी महिला ओर्गस्म पर कोई पोस्ट डालकर poll करवा लेना, हालाँकि वो भी ऐसी रिसर्चस की तरह आधी अधूरी ही होगी क्योंकि यहाँ सक्रिय महिलायें हमारे समाज के सब तबकों का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं।
    हर चीज में सेक्स को मुख्य मानने वाले और कुछ भी कह देने वाले जिनमें हम सब शामिल हैं, खुशकिस्मत हैं कि यहाँ हमारी बात का अनुमोदन करने के लिये या विरोध करने के लिये दूसरा पार्टनर उपलब्ध नहीं है(प्राय:)। मैं कहूँगा तो हो सकता है बात हँसी-ठ्ट्ठे में चली जाये - कुछ दिन पहले यहाँ स्टेशन पर शाम की सैर करते समय एक मास्टरजी बता रहे थे कि कुछ साल पहले अखबार में एक रिक्शेवाले के मरने की खबर छपी थी जो रात में एक गर्ल्स होस्टल में फ़ँस गया था। ऐसी बात सुन तो मैंने भी रखी थी, लेकिन विश्वसनीयता पर कन्फ़र्म नहीं था। तो मास्टर साहब बता रहे थे कि उन्होंने अपनी पत्नी के सामने वो वाकया बताया और साथ ही ठंडी आह भरी की, "हाय, हम न हुये।" फ़िर खुद ही कहने लगे कि मेरी घरवाली बोली, "रहने दो, ज्यादा न ड्रामा करो कम से कम मेरे सामने, मुझे सब अंदाजा है तुम्हारी क्षमता का सब पता है।" मास्टरजी मस्तमौला आदमी थे, अपने मुँह से सब कह गये।
    ज्यादा मजा तब होता अगर कमेंट का समर्थन या विरोध करने के लिये पति/पत्नी की अप्रूवल जरूरी रख देते।

    माडरेशन लगाना चाहिये था यार ताकि ऐसी ऊलजलूल टिप्पणी न छाप सको:))

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  59. अरे बाप रे!
    मैने लिखा..
    जीवन साथी से सेक्स की कामना करना भोगवादी होना नहीं है।"
    ..इसमें आपने "अनियंत्रित इच्छा" जोड़ दिया! और फिर नया अर्थ गढ़ लिया!

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  60. देवेन्द्र जी,
    आगे की टिप्पणी में भोगवाद की संज्ञा मैने ही दी थी और वहां स्पष्ट स्वनियंत्रण की बात थी।
    आपने उसी बात की प्रतिक्रिया में यह शब्द कहे-"जीवन साथी से सेक्स की कामना करना भोगवादी होना नहीं है।" अतः मेरा "अनियंत्रित इच्छा" कहना सन्दर्भ सहित है। गढा हुआ नहीं।

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  61. सभी टिपण्णी कर्ताओं को प्रणाम. मुझे आशा नहीं थी की इस विषय पर खुल कर विमर्श होगा. मैंने सभी टिप्पणियों को ध्यान से पढ़ा. गौरव के दिए लिंक अभी नहीं पढ़ पाया हूँ .



    अभी मैं एक बार फिर से स्पष्ट कर दूँ की मेरी ये पोस्ट अध्यात्मिक प्रेम और उसकी अभिव्यक्ति पर नहीं है. मैं तो सिर्फ दो विवाहित लोगों के बीच प्रेम की सहज शारीरिक अभिव्यक्ति पर नियंत्रण का विरोध कर रहा हूँ जो की स्पष्ट रूप से धर्म का सहारा लेकर किया जाता है.



    अगर मेरी पोस्ट से ये भाव उत्पन्न नहीं होता तो मुझे बताएं मैं अपनी भाषा में सुधार करूँगा.

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  62. सुज्ञ जी,
    एक अधेड़ वय का पुरूष जीवन साथी से हफ्ते में दो बार जैसा कि पोस्ट में लिखा है सेक्स कर ले वही बहुत है। अनियंत्रित सेक्स की तो कल्पना भी नहीं कर सकता।

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  63. शुभ रात्रि। कल सुबह जल्दी जाना है। अब यह पोस्ट देर शाम ही देख पाउंगा । मुझे चर्चा में भाग नहीं लेना चाहिए था। कष्ट के लिए खेद है।

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  64. आपकी पोस्ट अच्छा मुद्दा उठाती है. मैं सहमत हूँ. साथ ही देवेन्द्र जी, अंशुमाला जी और अली जी की टिप्पणियों से भी. अरविन्द मिश्र जी की टिप्पणी से भी सहमत हूँ, बस इस वाक्य से नहीं, ' आधुनिक नारीवादी पेनीट्रेशन के ही विरुद्ध लामबंद हो रही हैं ...यह एक असमान्य व्यवहार है.' नारीवाद ये नहीं कहता. यह सोच किसी एक नारीवादी विचारक की हो सकती है. नारीवादी सेक्स क्रिया में पुरुष वर्चस्व के विरुद्ध हैं. हमारे समाज में अब भी कई घरों में 'मेरिटल रेप' [ पत्नी की इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक सेक्स करना ] होते हैं. नारीवादी इसके विरुद्ध हैं.
    आपने सही लिखा है कि हमारे समाज में सेक्स को पाप समझा जाता है और ब्रह्मचर्य को पुण्य. वहीं स्त्रियों द्वारा अपनी कामेच्छा व्यक्त करने को उसकी दुश्चरित्रता की निशानी समझ लिया जाता है. मेरे ख्याल से यदि पत्नी यौन सम्बन्धों में अरुचि की बात करे तो उसका कारण जानने की कोशिश करनी चाहिए... जैसा कि कुछ टिप्पणियों में ऊपर कहा गया है कि स्त्रियाँ मेनोपाज़ के बाद ऐसा व्यवहार करती हैं. जबकि मैंने ये पढ़ा है कि सबके साथ ऐसा नहीं होता... ये बहुत कुछ मनोवैज्ञानिक भी हो सकता है. अन्य कारण भी हो सकते हैं. इसलिए आपस में बातचीत करके राह निकालनी चाहिए.
    यहाँ एक हमारे समाज में वर्ज्य माने जाने वाले विषय पर बहस होते देखकर अच्छा लगा.

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  65. मेरी पोस्ट का शीर्षक ही गृहस्थी और ब्रहमचर्य है. हमारे समाज में उम्र के एक पड़ाव के बाद पति पत्नी अपने प्रेम की शारीरिक अभिव्यक्ति करने में शर्माने लगते हैं. मुझे इसके पीछे धार्मिक प्रभाव दिखा.



    ब्रह्मचर्य का पालन कहा होना चाहिए या उसका क्या महत्व है मैं इस विषय पर बात ही नहीं कर रहा. मेरा मुद्दा है की पति पत्नी को किसी भी उम्र में अपने प्रेम की शारीरिक अभिव्यक्ति पर किसी भी प्रकार का अनावश्यक नियंत्रण नहीं लगाना चाहिए. (पढ़ते वक्त अनावश्यक पर जोर दें)



    यहाँ पर मैं पति पत्नी के बीच सेक्स का समर्थन तो करता हूँ पर सेक्स की अति का समर्थन बिलकुल भी नहीं करता क्योंकि अति तो हर चीज की बुरी होती है.



    सुज्ञ जी की ये बात की गृहस्थ कभी एकपक्षीय ब्रह्मचर्य वर्त नहीं लेते बहुत अच्छी लगी. लेकिन अगर एक पक्ष व्रत का पालन करना चाहे और दूसरा न करना चाहे तो किसे वरीयता दी जाय यही मेरी पोस्ट का मूल है. मैं सोचता हूँ की ब्रह्मचर्य व्रत का पालन न करने वाले को वरीयता दी जनि चाहिए.

    उत्तर देंहटाएं
  66. प्रिय विचार शून्य जी ,
    पढकर मुझे भी यही लगा कि आपने दाम्पत्य जीवन को फोकस कर आलेख लिखा है पर अब लगता है कि धन्य हैं वे विषमलिंगी जिन्हें अलौकिक प्रेम के लिए विवाह करना पड़ता है :)

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  67. चलिए अब इधर उधर की बातें चल ही निकली हैं तो मैं मन में आ रहे कुछ और विचार आपके समक्ष प्रस्तु कर ही दूँ. बस मन के विचार हैं जो व्यक्त कर रहा हूँ किसी पर थोप नहीं रहा.



    हमारे समाज में सेक्स पर प्रचलित धारणाओं ने मुझे बहुत भ्रमित किया है. एक तरफ कहा जाता है की काम वासना पर नियंत्रण किया जाय तो दूसरी तरफ पता चलता है की पागलखाने के अधिकांश रोगी यौन कुंठाओं के शिकार होते हैं. कहीं लोग पूजा के वक्त कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं तो कहीं तंत्र में काम ही सिद्धि का आधार बनता है. कभी कहा जाता है की वीर्य लार की भांति ही हमारे शरीर का एक स्राव मात्र है और कही इसे शरीर के शुद्ध खून से निर्मित बताया जाता है (शायद खून की ३२ बूंदों से वीर्य की एक बूंद का निर्माण होता है वाली अवधारणा भी इसी सोच का विकृत रूप है).



    एक सोच कहती है की आपके मन में सेक्स की इच्छा पैदा हुयी और आपने सेक्स कर लिया तो ये मन की गुलामी है वहीँ दूसरी सोच कहती है की बार बार सेक्स की इच्छा पर प्रतिबन्ध लगाना अप्राकृतिक है.




    इनमे से कौन सी बात सही है मैं ये निर्धारित नहीं कर पाता.



    कई बार मेरे मन में विचार आया है की साँस लेना हमारे जीवन के लिए इतना अवशयक है तो हमें साँस लेने में मजा क्यों नहीं आता. क्यों प्रकृति ने हमारी यौन इंद्रियों को इतना सुखदायक बनाया. क्या प्रकृति को कहीं डर था की अगर यौन इंद्रियों में अत्यंत सुख नहीं भरा तो कहीं जीव अपनी संतति को आगे बढाने के कार्यों से विरक्त न हो जाय.







    देखिये मैं वैज्ञानिक नहीं सिर्फ एक प्रकृति प्रेमी हूँ. उसकी व्यवस्था पर पूर्ण विश्वाश रखता हूँ. प्रकृति ने स्त्री के स्तनों में बच्चों के लिए दूध भरा. आप उस दूध के प्रवाह को रोक दीजिये. क्या होगा. मुझे लगता है की प्रकृति ने वीर्य का निर्माण भी बहाए जाने के लिए ही किया है. :))(थोडा हँस भी लो)

    अगर इस रोकना ही होता तो प्रकृति खुद ही कुछ व्यवस्था करती. उसके लिए बाबाओं की नियुक्ति नहीं की जाती.

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  68. अरविन्द मिश्र जी अली साहब की राय को ध्यान में रख अपने कीमती विचार ब्लॉग जगत को दे ही डालिए. कोई इंतजार करे न करे मुझे तो आपकी लेखमाला का बेकरारी से इंतजार रहेगा.
    अब अक्षर डगमगाने लगे हैं शुभ रात्रि

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  69. देवेन्द्र जी,

    खेद न करें, यह तो चर्चा है विमर्श तो होगा ही। आपका दृष्टिकोण है। बात ऐसे ही तो होती है। आपनें चर्चा में हिस्सा लेकर हमारा ज्ञानवर्धन ही किया है।

    आप तो फ़िर भी सहज प्रतिक्रिया करते है,देखो न लोग कितने पूर्वाग्रही होते है। क्षमा करें यदि आपको मेरी किसी भी बात से कष्ट पहुंचा हो।

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  70. @”सुज्ञ जी की ये बात की गृहस्थ कभी एकपक्षीय ब्रह्मचर्य वर्त नहीं लेते बहुत अच्छी लगी. लेकिन अगर एक पक्ष व्रत का पालन करना चाहे और दूसरा न करना चाहे तो किसे वरीयता दी जाय यही मेरी पोस्ट का मूल है. मैं सोचता हूँ की ब्रह्मचर्य व्रत का पालन न करने वाले को वरीयता दी जनि चाहिए.”
    दीप जी,
    भला क्यों? क्यों ब्रह्मचर्य व्रत का पालन न करने वाले को वरीयता दी जानी चाहिए। न्यायपूर्ण तो यह है कि इच्छा से ज्यादा अनिच्छा को वरीयता दी जाय। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन न करने वाले को वरीयता दी गई तो बलात्कार कहलायेगा!! प्रतिज्ञाबद्ध की प्रतिज्ञा तुडवाने से तो अच्छा है समझोता वह करे जो वचनबद्ध नहीं है। अनिच्छा साथी को तैयार करने से तो अच्छा है इच्छा नियंत्रित की जाय। लगे हाथ मुक्ति जी की टिप्पणी का अंश उद्दत करता हूँ। “नारीवादी सेक्स क्रिया में पुरुष वर्चस्व के विरुद्ध हैं. हमारे समाज में अब भी कई घरों में 'मेरिटल रेप' [ पत्नी की इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक सेक्स करना ] होते हैं. नारीवादी इसके विरुद्ध हैं.” 'मेरिटल रेप' में यह भी जोड देना उचित रहेगा कि पति की इच्छा के विरुद्ध पत्नी द्वारा पुरूषोचित उलहाने से इमोशनल कर बाध्य करना।

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  71. दीप जी,

    ग्रहस्थ के लिए पूर्ण ब्रहमचर्य किसी भी धर्म में अनिवार्यता नहीं है। फ़िर भी आपने कहा सेक्स पाप माना जाता है। और ब्रह्मचर्य पुण्य इस प्रकार इसे धर्म से जोडकर धर्म द्वेषियों के हाथो में नया हथियार सौप दिया है जो आप देख ही सकते है।
    जबकि वास्तविकता यह है कि आत्मनियंत्रण या इन्द्रिय निग्रह बस अच्छा माना गया है। और लोग यदा कदा इसका उपयोग कर लेते है। पर चुकि विवाहित लोगों के लिये यह ब्रहमचर्य आपको बकवास, अप्राकृतिक और अस्वभाविक लगता है, अत: बात यहाँ से प्रारम्भ होती है।
    हम ग्रहस्थ जीवन में पूर्ण ब्रहमचर्य के समर्थक न होते हुए भी आत्मनियंत्रण व इन्द्रिय निग्रह के परिपेक्ष में ब्रहमचर्य को बकवास, अप्राकृतिक और अस्वभाविक मानने का विरोध करते है।

    क्योंकि निरंतरता में कमी आना, विरक्ति आना भी उतना ही स्वभाविक है, जितना आवेगों का आना। जिस प्रकार आप नें अनावश्यक नियंत्रण का विरोध किया उसी तरह ‘सेक्स करना ही चाहिए’ का विचार भी अतिरेक है, साथी के मंतव्यो पर अतिक्रमण है। उसका भी विरोध होना चाहिए। मन नियंत्रण यदि अप्राकृतिक है तो मन स्वच्छंदता भी सभ्यता विरोधी है।

    साथी की इच्छा न होने की दशा में हम आवेगो पर नियंत्रण कर लेते है, क्यों? क्या उस नियंत्रण का भी विरोध होना चाहिए? यह कहकर कि हमारा साथी हमारे आवेगों को हमारी इच्छा के विरुद्ध नियंत्रित क्यों करे।

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  72. दीप जी,

    आपके लेख के निहित भाव हम समझ पा रहे है, और चर्चा भी हमारे दृष्टिकोण से विषय केन्द्रित है।

    ब्रह्मचर्य को आपने पाप पुण्य और धर्म से जोडकर जीवन के सहज सहचर्य में बाधक रेखांकित किया है। और इसे धार्मिक कर्मकांड की तरह लेते हुए कामजीवन में धर्म का अनावश्यक हस्तक्षेप माना है। हम ब्रह्मचर्य के लिये धर्म के उल्लेख से सप्रयोजन बचे है। साफ है हमनें धार्मिक कर्मकांडो का बचाव नहीं किया गया है। ब्रह्मचर्य तो मात्र शब्द है। हमारा स्पष्ठ मंतव्य है कि मात्र धार्मिक कर्मकाण्डों से वितृष्णा के कारण एक अच्छे विचार को क्यों त्याज्य माना जाय। हमारी अतृप्त तृष्णाओं के लिये हमेशा धर्म को कटघरे में खडा कर यह आरोप लगाना कि ‘यह देखो इस धर्म नें ही हमारे संसार को लूटा है’ निर्दोष पर आरोप के समान है। यह न्यायोचित दशा नहीं है।

    उक्त ‘ब्रह्मचर्य’ को हम ‘स्वेच्छा स्वीकार किये जाने योग्य आत्मनियंत्रण की इच्छा’ के रूप में ही देखते है। क्योकि बात प्रौढों के विषय में है अतः आत्मनियंत्रण का निर्णय सोच समझ कर ही लिया जाता होगा। थोपा नहीं जाता होगा। क्योंकि हमारी जानकारी में ऐसा कोई धार्मिक आवश्यक कर्मकाण्ड नहीं है जिसमें ग्रहस्थ के लिये ब्रह्मचर्य पालन को महिमामंडित किया जाता हो। अतः भावुक धार्मिक बाध्यता का प्रश्न भी नहीं पैदा होता।

    अतः मेरी सभी टिप्पणीयों को ‘तृष्णा पर स्वेच्छा आत्मनियंत्रण’ के परिपेक्ष में ही देखा जाय।
    (‘तृष्णा’ शब्द का इस्तेमाल कामेच्छा के कभी पूर्ण न होने के स्वभाव के सन्दर्भ से लिया गया है।)

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  73. देश कि आबादी बहुत कुछ बताती हैं । सेक्स की बात ना करना एक संस्कारी सोच के तेहत होता हैं पर अब नयी पीढ़ी मे बदलाव आ रहा हैं । बहुत से लोग आप को मिल जायेगे जो अपने माता पिता कि वैवाहिक सालगिरह पर उनका विवाह पुनह करते हैं और बाकयदा उनको हनीमून का टिकेट भी देते हैं । आज कल बहुत से विज्ञापन भी इस और अग्रसर जहाँ उम्र दराज लोग खुद घुमने केलिये जाते हैं ।
    भारतीये परम्परा मे शादी जल्दी होती हैं इस लिये सो कोल्ड बुढ़ापा भी जल्दी आता हैं जबकि विदेशो मे अगर महिला ४० साल पर विवाह करती हैं तो ५० साल पर माँ भी बनती हैं और कोई उसको ये नहीं समझता ये गलत हैं । ५० साल कि महिला विदेशो मे २५ साल के लडके के साथ भी विवाह कर लेती हैं कहीं किसी को फरक नहीं पड़ता ।
    भारत मे विवाह का उद्देश्य कभी भी सहज प्रेम , आसक्ति नहीं होता हैं यहाँ विवाह का अर्थ परिवार होता हैं ।
    एक लिंक दे रही हूँ विचार शुन्य जी देखिये

    http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2009/10/blog-post_2143.html#comments

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  74. @MO SUM----

    ab tak apne man ki baat apne andaj me na kah pane se ek khij si hoti ja rahi thi........sukra hai humnam ke....... tasallibaksh vichar se apni bat kah dene ki santushti hue..........

    anyway, yahan jo kuch bhi vimarsh hua..ho raha hai...sakaratmak aur sadvhav ke sath.....sikshit
    hone ke sabse mahatwapoorn lakshan hum yahi mante hain......bakiya sab kuch to 'munde-r-munde-r-matir-bhinna.....hi hona hai....so galat
    kya hai sahi kya hai......hum vimarsh kar sakte hain ......... nirnaya nahi thop sakte.........

    kuch jyada kah dene ko.....muafi.....sabhi se..

    pranam.

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  75. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  76. सुज्ञ जी,
    शुभ रात्रि। कल सुबह जल्दी जाना है। अब यह पोस्ट देर शाम ही देख पाउंगा । मुझे चर्चा में भाग नहीं लेना चाहिए था। कष्ट के लिए खेद है।

    .......ऐसा मैने आपकी टिप्पणी से व्यथित होकर नहीं लिखा। लेकिन मेरे लेखन से ऐसा भाव गया कि मैं दुःखी होकर लिख रहा हूँ। दरअसल समय के अभाव के कारण मैने ऐसा लिखा। मुझे यह ज्ञान हुआ कि किसी ऐसे विषय में चर्चा में भाग लेने से पहले जिसमें पर्याप्त बहस होने की संभावना हो, यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि आपके पास कितना समय है। यदि आपके पास समय नहीं है, आप अपनी बात लिखकर चले जाते हैं तो आपके अर्थ का अनर्थ लगाया जा सकता है। वैसे भी बहस छोड़ कर बीच में ही जाते वक्त खेद व्यक्त करना चाहिए। मैं स्वयम् तीखे व्यंग्य लिखता हूँ तो किसी की विषयांतर्गत की गयी टिप्पणी से क्यों दुःखी होने लगा। अपनी एक कमी का और ज्ञान हुआ कि मैं जो बात कहना चाहता हूँ वो बहस, चर्चा के दौरान ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पाता।

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  77. (अन्य बंधु हिस्सा नहीं ले रहे,चलो! मैं चालु रखता हूँ। फ़िर न जाने कब यह विषय उपलब्ध हो) ;))

    @मेरी पोस्ट का शीर्षक ही गृहस्थी और ब्रहमचर्य है. हमारे समाज में उम्र के एक पड़ाव के बाद पति पत्नी अपने प्रेम की शारीरिक अभिव्यक्ति करने में शर्माने लगते हैं. मुझे इसके पीछे धार्मिक प्रभाव दिखा.

    उम्रदराज़, कायिक प्रेम की अभिव्यक्ति के लिये धार्मिक अनुशासन प्रेरित दबाव में शर्माते नहीं है। यह उनका स्वप्रेरित संयम होता है।
    यदि उन्हें सेक्स से ही शर्म होती तो शादी के बाद बेटे-बहु के सहचर्य में अनुकूलताएँ निर्मित करने का कार्य भी न करते।

    कहते भी हैं न "हमने बहुत जमाना देख लिया,अभी उनकी खाने खेलने की उम्र है" इस उक्ति में गहरे संदर्भ छिपे है।

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  78. @हमारे समाज में सेक्स पर प्रचलित धारणाओं ने मुझे बहुत भ्रमित किया है. एक तरफ कहा जाता है की काम वासना पर नियंत्रण किया जाय तो दूसरी तरफ पता चलता है की पागलखाने के अधिकांश रोगी यौन कुंठाओं के शिकार होते हैं.

    दीप जी,

    आज भी कोई शोध यकिन से नहीं कह सकती यौन कुंठाओं का कारण मात्र योन नियंत्रण है। यह सम्भव है इच्छओं के अतिरेक वाले को जब नियंत्रण में रहना पडे तो विद्रोह स्वरूप कुंठा जन्म ले सकती है। पर अधिकांश इच्छा का अतिरेक, और इच्छा वो जो जीवन पर्यन्त सतुष्ट नहीं हो सकती कारण है।
    याद है यौन शिक्षा शास्त्री जी का वह लेख…… http://sarathi.info/archives/507
    ऐसी योन शिक्षा भी योन कुंठा पैदा करने के लिये पर्याप्त है।

    योन को यदि मन के अधीन स्वछंद कर दिया जाय तो यह दुनिया ही योन कुंठितो का पागलखाना बन जाय।

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  79. सुधार…

    याद है यौन शिक्षा शास्त्री जी का वह लेख…… http://sarathi.info/archives/507

    को
    याद है, 'यौन शिक्षा' पर शास्त्री जी का वह लेख…… http://sarathi.info/archives/507

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  80. दीप जी,

    प्रचलित भ्रांत धारणाओं की तो बात ही न करो, तुंडे तुंडे मति भिन्ना हैं।
    लगभग सभी नें अपने वैचारिक स्वार्थों के निमित ऐसी धारणाओं को जन्म दिया है।

    न वीर्य संचय में शक्ति है न बहाव से उर्ज़ा प्राप्त होती है। शायद सेक्स उपरांत आने वाली थकान से लक्ष किया गया हो।

    सेक्स में वीरता का रत्ती भर भी अंश नहीं, फ़िर भी मर्दानगी से जोडा जाता है।

    बहुत सी अन्य मन की प्राकृतिक इच्छाओं पर अनुशासन की तरह ही कामेच्छा पर भी अनुशासन किया जा सकता है लेकिन यह हमारी भ्रांत धारणा है कि कामावेगो पर नियंत्रण अप्राकृतिक है

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  81. सुज्ञ जी प्रणाम और सुप्रभात, सबसे पहले मैं आपको धन्यवाद दूंगा की आपने अपने विचारों से हर बार मेरा मार्गदर्शन किया है. मेरे बचपन से ही मेरे बड़े बूढों (ब्लॉग जगत में कोई बड़े बूढ़े नहीं, यहाँ सब एक ही उम्र के हैं ) को लगता रहा की मेरे विचार या मेरी सोच विद्रोही और धर्म विरुद्ध होती है. अपने विचारों के लिए मैं बहुत बार पिटा. किसी ने मेरी शंकाओं का समाधान नहीं किया. यहाँ ब्लॉग पर आपके गौरव और दुसरे धर्म और संस्कृति पर पकड़ रखने वाले लोगों के सामने मैं अपने मन में उठाने वाले हर उस विचार को रखना चाहता हूँ जिसके उत्तर में मुझे हमेशा तनी हुयी भृकुटी, मौन या प्रताड़ना ही मिली है.

    मुझे लगता है की मेरी ही तरह और भी लोग होते होंगे जो अपने धर्म, अपनी संस्कृति पर विश्वास तो रखते होंगे पर कुछ बातों को समझ नहीं पाते होंगे. इसलिए अगर आप लोग यूँ ही मार्गदर्शन करेंगे तो मैं आजीवन आपका ऋणी रहूँगा.

    मैं जो भी बात कहता हूँ वो मेरे मन में आ रहे विचार होते हैं और मैं कभी भी ये नहीं मानता की मेरा हर विचार सही है. एकाउंट्स का बन्दा हूँ अच्छी तरह पता है की क्रोस चेकिंग का क्या महत्व है इस लिए अपने विचारों की क्रोस चेकिंग करवाने के लिए आप लोगों के समक्ष इन्हें प्रकट करता हूँ.

    देवेन्द्र पाण्डेय जी, की ही तरह वक्त की कमी की वजह से मैं भी किसी चर्चा में सक्रिय सहयोग नहीं कर पता क्योंकि मेरे घर की हर भौतिक वास्तु पर मेरा सिर्फ एक चौथाई अधिकार ही है. बंकि का तीन चौथाई हिस्सा मेरे दो बच्चों और पत्नी का है. मैं कंप्यूटर पर हूँगा तो बाकी के तीनों भी यहीं होंगे और अपना हिस्सा मांग रहे होते हैं (इस वक्त भी मेरी पुत्री कार्टून नेटवर्क पर गेम खेलना चाहती है उसके बाद पुत्र भी लाइन में है) और अगर मैं टी वी देखूंगा तो तब भी वो वहीँ होंगे और अपना चैनल देखना चाहेंगे. बड़ी समस्या रहती है.

    सुज्ञ जी बाकि चर्चा बाद में. ३१ मार्च है. शाम को कब लौटना होगा मालूम नहीं इसलिए संक्षेप में कह देता हूँ की अपने अपनी टिपण्णी में ये जो कहा है की

    "हम ग्रहस्थ जीवन में पूर्ण ब्रहमचर्य के समर्थक न होते हुए भी आत्मनियंत्रण व इन्द्रिय निग्रह के परिपेक्ष में ब्रहमचर्य को बकवास, अप्राकृतिक और अस्वभाविक मानने का विरोध करते है।"



    मैं इस उपरोक्त विचार के पूर्ण समर्थन में हूँ. ब्रहमचर्य का अपना महत्व है लेकिन इस पर हमारे धर्म में खुद को बाल ब्रह्मचारी कहलवाने में गर्व का अनुभव करने वाले बाबाओं ने अनावश्यक रूप से जीवन हर पक्ष में ब्रह्मचर्य को पूजनीय दर्जा दिलवा दिया है जो की गलत है. अगर आप सिर्फ इन्द्रिय निग्रह की बात करते हैं तो संयमी भोजन करने वाले व्यक्ति को भी ब्रह्मचारी का सा दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि वो भी अपनी जीभ पर नियंत्रण करता है. कहने का मतलब है की जो बहुत कठिन चीज है जैसे ब्रह्मचर्य उस पर कुछ लोग कब्ज़ा जमा कर खुद को दूसरों से बेहतर और पूजनीय बनाने का प्रयास करते हैं जिसका मैं विचारों से विरोध करता हूँ.



    अभी तो बस बाकि कल जब समय होगा.



    सुज्ञ जी आपका एक बार फिर से धन्यवाद.



    देवेन्द्र पाण्डेय जी आपका भी बेहद धन्य वाद. अपने अपनी बात स्पष्ट कर दी वर्ना मैं भी यही समझ रहा था की आप चर्चा से निराश या नाराज हैं. आपने खुल कर अपने बात कही इसके लिए बेहद धन्यवाद.



    चलते चलते मैं उन पाण्डेय महोदय को भी दिल से धन्यवाद कहूँगा जिन्होंने भारतीय टीम की जीत पर निर्वस्त्र होकर ख़ुशी मानाने की बात कही है. मैं विचारों में निर्वस्त्र होना चाहता हूँ और वो कपड़ों से होना चाहती हैं पर हैं दोनों ही पाण्डेय :).

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  82. मैं इसलिए कुछ नहीं बोल रहा क्योंकि इंसान को हर बात में नेगेटिविटी ढूँढने की आदत होती है , मैं उत्तर दूंगा तो पाण्डेय जी को लगेगा "ये तो बच्चा है" , दरअसल हमारा मन एक बेईमान दोस्त है , .....लेकिन ये पढ़ कर की
    @ (ब्लॉग जगत में कोई बड़े बूढ़े नहीं, यहाँ सब एक ही उम्र के हैं )
    सोचा एक बड़ी से टिप्पणी में भी कर ही दूँ
    अब किसी ने नहीं बताया तो मैं बता दूँ जो वैज्ञानिक तथ्य मैंने दिए हैं उनका खंडन किया जा चुका है लेकिन वो मैंने सिर्फ दूसरा पक्ष दिखाने के लिए और ये बताने के लिए की साइंस हर बार पक्ष बदलती रही है..... दिए हैं | खंडन जो नए ज्ञानी विज्ञानी लोग करते हैं काश वो ये भी मान लें की "शुक्र धातु शरीर के साथ-साथ मन के लिए भी महत्त्वपूर्ण है" । शायद इसलिए वे लोग मनोरोगों के इलाज और रोकथाम में असफल हो रहे हो :)

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  83. @हमारे समाज में उम्र के एक पड़ाव के बाद पति पत्नी अपने प्रेम की शारीरिक अभिव्यक्ति करने में शर्माने लगते हैं. मुझे इसके पीछे धार्मिक प्रभाव दिखा.
    -----कारण सामाजिक भी होता है ये बात अलग है की हमें जहां भी स्वतंत्रता में कमीं नजर आने लगती है हम धर्म को दोषी ठहराते हैं , हम आधुनिक[?] लोग हैं ना और तार्किक [?] तो हैं ही :))

    @मेरा मुद्दा है की पति पत्नी को किसी भी उम्र में अपने प्रेम की शारीरिक अभिव्यक्ति पर किसी भी प्रकार का अनावश्यक नियंत्रण नहीं लगाना चाहिए. (पढ़ते वक्त अनावश्यक पर जोर दें)

    ----- अनावश्यक की अपनी अपनी डेफिनेशन होती है


    @अति का समर्थन बिलकुल भी नहीं करता क्योंकि अति तो हर चीज की बुरी होती है.

    -----"अति तो हर चीज की बुरी होती है" ये बात बेमतलब है क्योंकि आप उम्र के पांचवे पड़ाव में जिन बातों समर्थन कर रहे हैं अति ही लग रहा है


    @....दूसरी तरफ पता चलता है की पागलखाने के अधिकांश रोगी यौन कुंठाओं के शिकार होते हैं.

    -----गीता के श्लोक दिए हैं मैंने उपर टिप्पणी में


    @कहीं लोग पूजा के वक्त कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं तो कहीं तंत्र में काम ही सिद्धि का आधार बनता है.

    -----पहले हम मनोविज्ञान जैसे साधारण विषयों को समझ लें वही काफी होगा


    @हमारे शरीर का एक स्राव मात्र है और कही इसे शरीर के शुद्ध खून से निर्मित बताया जाता है

    ----- "खून से नहीं मज्जा से" और लोग तो इसे स्त्राव ही मानेंगे , लेकिन काश वो ये भी समझें की जहां मन और साइंस मिल जाये वही हमेशा सही नहीं होता , जहां धर्म और साइंस मिले वो सही सकता है , आयुर्वेद के अनुसार शुक्र सातवे स्तर (स्टेज ) पर आता है

    और शायद ये रीसर्च इस और इशारा भी कर रही हैं

    http://news.bbc.co.uk/2/hi/health/6547675.stm

    http://humrep.oxfordjournals.org/cgi/content/abstract/15/1/83

    @देखिये मैं वैज्ञानिक नहीं सिर्फ एक प्रकृति प्रेमी हूँ. उसकी व्यवस्था पर पूर्ण विश्वाश रखता हूँ.
    ------- जान कर ख़ुशी हुयी लेकिन इसके लिए हमें प्रकृति को समझना होगा

    @अगर इस रोकना ही होता तो प्रकृति खुद ही कुछ व्यवस्था करती.अगर इस रोकना ही होता तो प्रकृति खुद ही कुछ व्यवस्था करती.

    -----चिंतन पर निर्भर है , कुछ लोग ये भी कहते हैं "कामुक चिंतन न करें, क्योंकि ऐसा करने से से पुरुष का शुक्राशय स्राव से भरता रहता है" , प्रकृति ने व्यवस्था की लेकिन किसी ने समझा ही नहीं तो कोई क्या करे

    http://hi.shvoong.com/medicine-and-health/nutrition/


    @.......अगर इस रोकना ही होता तो प्रकृति खुद ही कुछ व्यवस्था करती. उसके लिए बाबाओं की नियुक्ति नहीं की जाती.

    ----- टीचर को सिर्फ पढ़ाने के लिए नियुक्त किया जाता है, कुछ बच्चे फेल भी तो होते हैं क्लास में :) , कुछ तो पढने ही नहीं जाते :))

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  84. @...........एक बूंद का निर्माण होता है वाली अवधारणा भी इसी सोच का विकृत रूप है

    ----- हम कौन होते हैं किसी सोच को विकृत कहने वाले ????

    @एकाउंट्स का बन्दा हूँ अच्छी तरह पता है की क्रोस चेकिंग का क्या महत्व है इस लिए अपने विचारों की क्रोस चेकिंग करवाने के लिए आप लोगों के समक्ष इन्हें प्रकट करता हूँ.

    ------ आप अकाउंट्स से हैं तो "intangible assets" का मतलब भी समझते ही होंगे

    "Intangible assets are defined as identifiable non-monetary assets that cannot be seen, touched or physically measured, which are created through time and/or effort and that are identifiable as a separate asset."

    कुछ ऐसा शायद यहाँ माना गया है ...
    शरीर में ऐसा कोई स्थान विशेष नियत नहीं है जहाँ शुक्र विशेष रूप से विद्यमान रहता हो । शुक्र सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है तथा शरीर को बल प्रदान करता है । इसके लिए कहा गया है, जिस प्रकार दूध में घी और गन्ने में गुड़ व्याप्त रहता है, उसी प्रकार शरीर में शुक्र व्याप्त रहता है । महर्षि चरक के अनुसार शुक्र का आधार मनुष्य का ज्ञानवान शरीर है ।

    शुक्र के कार्य---
    शरीरेषु तथा शुक्र नृणां विद्यद्भिषग्वरः(सु.शा. ४/२१)
    रस इक्षौ यथा दहिन सपस्तैलं तिले यथा ।
    सवर्त्रानुगतं देहे शुक्रं संस्पशर्ने तथा॥(च. चि. ४/४६)

    शुक्र के कार्य- धैर्य- अथार्त् सुख, दुःखादि से विचलित न होना, शूरता, निभर्यता, शरीर में बल उत्साह, पुष्टि, गभोर्त्पत्ति के लिए बीज प्रदान तथा शरीर को धारण करना, इन्द्रिय हर्ष, उत्तेजना, प्रसन्नता आदि कार्य शुक्र के द्वारा होते हैं । इस प्रकार शुक्र धातु शरीर के साथ-साथ मन के लिए भी महत्त्वपूर्ण है । इन सबके अतिरिक्त सबसे मुख्य कार्य सन्तानोत्पत्ति है ।


    @हमारे धर्म में खुद को बाल ब्रह्मचारी कहलवाने में गर्व का अनुभव करने वाले बाबाओं ने अनावश्यक रूप से जीवन हर पक्ष में ब्रह्मचर्य को पूजनीय दर्जा दिलवा दिया है जो की गलत है.
    -----------चिंता ना करें आधुनिकता[?] की स्पीड देख कर लगता है .. जल्दी ही ब्रह्मचारी लोगो को मूर्ख भी माना जाने लग जायेगा , अनावश्यक रूप से

    @अगर आप सिर्फ इन्द्रिय निग्रह की बात करते हैं तो संयमी भोजन करने वाले व्यक्ति को भी ब्रह्मचारी का सा दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि वो भी अपनी जीभ पर नियंत्रण करता है.

    ------पता नहीं, लेकिन एक बात है जिव्हा पर नियंत्रण की ब्रह्मचर्य में अहम् भूमिका बतायी जाती है

    @साँस लेना हमारे जीवन के लिए इतना अवशयक है तो हमें साँस लेने में मजा क्यों नहीं आता.......

    -------- इन्द्रिय का बेसिक कार्य अलग बात है और उससे सुख लेना अलग बात है , क्या हमें चन्दन की सुगंध लेने में सुख नहीं आता ?? आप दूसरी बात कर रहे हैं उत्सर्जन इन्द्रिय की, उसका दैनिक कार्य उत्सर्जन है ...सामान्य परिस्थिति में अपशिष्ट पदार्थों का

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  85. विवाह का फायदे लिखने बैठे तो शाम हो जायेगी ..इससे अच्छा आप ये पढो
    विदेशो के हाल की एक झलक

    A recent study published in the Journal of Sexual Medicine, October 7, 2010 explored the frequency and types of sexual behavior, sexual pleasure and experience, and condom use in men and women age 50+. Traditionally, little has been known about the actual sexual behaviors of older adults. Why is this important? Because, nearly half of the people 65 and older in the United States are single.

    ....

    Sexual health promotion amongst older adults is a difficult undertaking. Older adults in many cases face no risk of pregnancy and a lack of continued sex education in the United States, leading to a spike in sexually transmitted diseases. Also, due to a lack of HIV and STD testing, it is difficult to tell who the carriers are amongst older adults. Men and women over 50 make up about 19 percent of the AIDS cases in the U.S. Targeted information must address the needs of men and women over age 50 as well as the beliefs and attitudes of their healthcare providers. More public education on safe sex and STD risks is critical for men and women over the age of 50

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  86. aap ki post badhiya hai ham iska palan karte hai....


    kuch logo ki aadat hoti hai har aacchi se aacche main kami nikalana ------

    aap ke sujahav sunder hai...pyar pyar hota hai jo karte nahi wo jane kiya .....

    jai baba banaras.....

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  87. @ “ब्रह्मचर्य उस पर कुछ लोग कब्ज़ा जमा कर खुद को दूसरों से बेहतर और पूजनीय बनाने का प्रयास करते हैं जिसका मैं विचारों से विरोध करता हूँ.”

    दीप जी,

    (आपका पूर्ण सौजन्य देखकर आपके व्यक्तित्व पर चर्चा करने का साहस कर रहा हूँ, कुछ अतिश्योक्ति हो जाय तो पूर्व में ही क्षमा मांग लेता हूँ, क्षमा करें)
    विभिन्न ब्लॉग्स पर टिप्पणी के माध्यम से धर्म-संस्कृति पर आपके द्वारा प्रस्तुत विचारों से मैं अवगत था। आप संस्कृति समर्थक होते हुए भी धर्म और पाखण्ड में दुविधा महसुस करते है। मैं आपके लेख रूचि से पढता हूँ। किन्तु मेरे एक लेख पर श्री प्रवीण शाह जी की एक टिप्पणी http://shrut-sugya.blogspot.com/2011/01/blog-post_02.html?showComment=1293993430158#c3610990156116547054 से आपकी विचारधारा निश्चित करने का योग बना। "holier than thou" तब मैं निराश हुआ था। क्योंकि यह थिंकिंग, अभिमान वश हीरे और कंकर में फ़र्क नहीं करती और न तुलनात्मक अध्यन ही करना चाहती है। आज भी आपने अन्तः इस मूल विचार को व्यक्त किया- “खुद को दूसरों से बेहतर और पूजनीय बनाने का प्रयास”।
    लेकिन मुझे घोर आश्चर्य आपके व्यक्तित्व में सरलता निर्मलता और अच्छी बात को सहजता से स्वीकार करने और कृतज्ञता ज्ञापित कर पाने के गुण से हुआ। हर विचार को "holier than thou" की मानसिकता से तोलने वाला व्यक्ति किसी को भी गुणो का श्रेय नहीं देता, समानता के एक चश्मे से देखकर, चरित्रवान की स्तुति नहीं कर सकता। आश्चर्य यह है कि आपमें दोनो विरोधाभाषी सोच, और वह भी निर्मलता से विध्यमान है।

    हम क्यों नहीं हमसे अधिक गुणवान, हमसे अधिक संयमी, हमसे अधिक चरित्रवान की प्रशंसा स्तुति करें कि हाँ "holier than us"
    @”ब्रहमचर्य का अपना महत्व है लेकिन इस पर हमारे धर्म में खुद को बाल ब्रह्मचारी कहलवाने में गर्व का अनुभव करने वाले बाबाओं ने अनावश्यक रूप से जीवन हर पक्ष में ब्रह्मचर्य को पूजनीय दर्जा दिलवा दिया है जो की गलत है.”

    ब्रहमचर्य का महत्व है तो महत्वपूर्ण गुण गौरवान्वित हो उसमें हमें क्यों आपत्ति होनी चाहिए। किसी महात्मा के चरित्र का दूसरे लोग महिमामण्डन करते है तो स्तुति तो गुण की है, व्यक्ति की नहीं। और स्तुति उस गुण को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से की जाती है।
    किन्तु कहीं जब गुण के महिमामण्डन की जगह व्यक्ति महिमामण्डन करने लगते है, अथवा बाबा स्वगुणगान करने लगते है, तो वह पाखण्ड है। अनुकरणीय गुण होते है, व्यक्ति नहीं। किसी बाबा की प्रोत्साहन के उद्देश्य से प्रंशसा की जा सकती है, पर व्यक्ति पूजा नहीं। गुणों के कारण वह स्तुत्य बन सकता है पर उसके कारण ही गुण अस्तित्व में नहीं है। इस तरह स्वयं की ही जय जयकार करवाने वाले महात्मा नहीं, पाखण्डी बाबा ही है। यहाँ आपका विरोध व्यवहारिक है। विवेकवान उनके उपदेशों के चक्कर में नहीं पडते। पर ऐसे बाबाओं का चक्कर देखकर, सच्चे संत से भी किनारा कर लेना, कर्तव्य से पलायन है।

    @इन्द्रिय निग्रह में ब्रह्मचर्य का दर्जा उँचा क्यों?

    सभी प्रकार के इन्द्रिय संयम उत्तम ही है। जैसा कि आपने कहा भी ब्रह्मचर्य पालन सबसे कठिन है, सच ही तो है, कामविजय पाना सबसे दुष्कर है। जिसे जीतना जितना कठिन हो उसे दर्ज़ा भी इतना ही उँचा मिलना चाहिए,यही तो न्याय है।

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  88. सुज्ञ जी की याददाश्त भी गजब की है :))
    सुज्ञ जी , पाण्डेय जी
    कृपया संभव हो तो मेरी टिप्पणियों पर अपने विचार भी बताएं

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  89. @ सभी से

    जहां तक मैं समझ पाया हूँ अपने आपको आधुनिक और विकसित मानने वाले लोग और "स्वतंत्रता" का सपना देखने / दिखाने वाले लोग "गुलामी" की ओर खुद भी बढ़ रहे हैं और दूसरों को भी बढ़ा रहे हैं , मूल समस्या है समाज का वो "प्रदूषण" जिसे हम "परिवर्तन" कहते हैं इसी परिवर्तन की वजह से बच्चों से उनका "बचपन" छीनता जा रहा है और अब लगता है उम्रदराज लोगों से उनकी "सादगी" भी छिन जाएगी , कमीं सिर्फ इतनी सी है की अब हम स्वार्थी होने लगे हैं , अपने सुखों के बारे में बहुत ज्यादा सोचने लगे हैं ,लेकिन इस पोस्ट में जो पाण्डेय जी ने ईमानदारी के साथ मन की बात कही है वो प्रयास सच में सराहनीय है | लोग अक्सर अपने आप को आदर्श साबित करने के पुरजोर प्रयास में ही व्यस्त होते हैं

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  90. गौरव जी,

    मुझे शक है आप इन्सान नहीं है………………………

    यहाँ टिप्पणी करनेवाला कोई कम्प्युटर सोफ्टवेयर है जो ऑटो-रिप्लाय मोड में रहता है। कथन समझकर, तथ्यों का प्रोसेस कर के सन्दर्भो की स्वतः खोज कर उन्हे उपयुक्त जगह सेट करते हुए तीव्र गति से रिप्लाय फॉरवर्ड कर देता है।

    अतः प्रोग्राम पर प्रश्न खडा नहीं किया जा सकता।:)

    बाकी चर्चा आपकी सटीक है।

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  91. @पाण्डेय जी, पोस्ट बहुत ही खुले दिल से लिखी गयी है........... और मैं इस पोस्ट का खुले दिल से (दिमाग तो है नहीं) समर्थन करता हूँ, और मैं ये मानता हूँ की अगर मेरे पास ये आइडिया आया होता तो मैं भी ऐसा ही लिखता (यानी की मेरे लिखे का निष्कर्ष ऐसा ही होता)

    मैंने कई ऐसे माता पिता देखें है, जो बच्चों को स्थापित करने के बाद अलग से रहते हैं.......... और वाकई उनका प्यार (सेक्स) बना रहता है, और वो लोग स्वस्थ भी रहते हैं, बजाए उन प्रोर्दों के जो रहते तो बच्चों के साथ हैं - पर मन ही मन कसमसाते रहते हैं.....

    बाकी इतनी टीप आयी हुए है.......... क्या बताएं....... बहस बदिया चल रही है. और चलनी ही चाहिए....... एक लोकतान्त्रिक देश के लोकतान्त्रिक ब्लॉग जगत में ये जरूरी है ........ कल अगर इस ब्लॉग जगत में जूतम-पैजार हो जाए तो इसके लिए बेफिक्र ब्लोग्गरों को जिम्मेवार मत ठहराना........... संसद से ये सब सीख रहे हैं :)

    जय राम जी की.

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  92. सन्देश आपने बुढ़ाते लोगों को दिया है अतः बोलना नहीं चाहिए फिर भी ... :-))

    बहुत आवश्यक विषय लिया है आपने जिसपर बहुत कम स्वस्थ चर्चा देखने को मिलती है ! अंशुमाला की टिप्पणी स्पष्ट और बज़नदार है ! आज मध्यम वर्ग अशिक्षा और गलत उपदेशों के कारण, विवाह के बाद अपना सेक्स स्वास्थ्य बर्बाद कर चूका है ! और सामाजिक वर्जनाओं के बीच सेक्स चर्चा के बारे में कोई सोंच भी नहीं सकता ! मेरे विचार में इस विषय पर शायद ही कोई ईमानदार हो !

    @ महिलाओं में मेनोपोज के बाद मन में स्‍वाभाविक विरक्ति आ जाती है...

    मुझे नहीं लगता की इसमें कोई सच्चाई है अधिकतर मामलों में विरक्ति का कारण साथी का उत्साह ठंडा पड़ना अक्सर होता है...महिलाओं में पहल करने की अक्षमता और असहयोग अन्य कारण हैं

    डॉ अजित गुप्ता का कहना है है ५० वर्ष के बाद वानप्रस्थ अपना लेना चाहिए ...क्यों ??

    मुझे लगता है खुश होकर जीना अधिक आवश्यक है तभी आप कुछ समाज सेवा अथवा जिम्मेवारियां हँसते हँसते उठा पायेंगे, मस्त जीवन और खुशियों के साथ जीना ही मानव जीवन है !

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  93. कोई भी बाबा, महाराज या उपदेशक अन्तत तो मनुष्य है। वे सभी धर्म से ही ज्ञान पाते है किन्तु उनका ग्रहण ज्ञान जरूरी नहीं कि सम्यक ही हो। उनके पास भी मिथ्या मान्यता भरा ज्ञान हो सकता है। किन्तु अनुसरण करने वालों को चाहिए वे स्वविवेक से हेय ज्ञेय और उपादेय का अन्तर करे और उपादेय को ही स्वीकार करे।

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  94. इस पूरी चर्चा के हमारे तो यही निष्कर्ष है………।

    1-दबावों से या अनिच्छा से नियंत्रण में आना अनुपयोगी है।
    2-स्थायित्व के लिये संघर्षरत की तृष्णा को उकसाना भी गलत प्रयोजन है।
    3-स्वेच्छा आत्मनियंत्रण स्वीकार करना व्यक्ति का स्वाधिकार है। उसके अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए।

    अन्त में,दीप पाण्डेय जी का आभार आपने मेरे विचारों को प्रस्तुत करने के लिये आपके ब्लॉग पर इस लेख द्वारा प्लेटफार्म उपलब्ध करवाया।

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  95. सुज्ञ जी आपका एक बार फिर से धन्यवाद की अपने मेरी बरसों पुरानी "Hornby's Advanced Learner's Dictionary" पर चढ़ी धूल को एक बार फिर हटवा दिया. मुझे खुद अपने ऊपर शक हो आया की कहीं "holier than thou" का जो मैं अर्थ समझता हूँ उससे हटकर कुछ और तो नहीं.



    साहब मेरी डिक्शनरी तो कहती है की "holier than thou" का अर्थ है:



    thinking that one is more virtuous than others मतलब की ऐसी विचारधारा जिसमे कोई व्यक्ति खुद को दूसरों से ज्यादा नेक सदाचारी और धर्मात्मा समझे.



    तो साहब मैं जब भी ऐसी विचारधारा या व्यक्ति के संपर्क में आता हूँ जो खुद को दूसरों से ज्यादा नेक या धर्मात्मा समझे तो मैं स्वतः ही उसके विरोध में आ जाता हूँ क्योंकि मेरे हिसाब से सच्चे धर्मात्मा और सदाचारी लोगों के मन में अपने लिए श्रेष्ठता और दूसरों के लिए तुच्छता का भाव नहीं होता.



    मैं बहुतों से मिला हूँ जो खुद को सिर्फ इसलिए श्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि वो मांसाहार नहीं करते या प्याज लहुसन नहीं खाते जबकि ऐसे लोगों में दूसरी अनेकों बुराइयाँ स्पष्ट दिख रही होती हैं. कोई खुद को श्रेष्ठ समझने का घमंड कर रहा है और हम उसे बिना परखे ही श्रेष्ठ मान लें ये कहाँ की समझदारी है. हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती इसलिए अच्छी तरह से परख लेना क्या गलत बात है.



    हाँ एक बार किसी बात को परख कर जब उसकी श्रेष्ठता वास्तव में सिद्ध हो जाये तो उसे सहज अपना लेना चाहिए. ऐसा मेरा मानना है और मैं करता भी हूँ. अब इन दो बैटन में मुझे तो कोई विषमता नहीं दिखाई पड़ी. जाने आपको किस नजरिये से मेरे विचारों में विरोधाभास मिला. आप कृपया करके मुझे एक बार फिर से परखें :))



    सुज्ञ जी वैसे आपने बहुत अच्छा किया की खुल कर अपने मन की बात कह दी. इससे मुझे भी अपनी मानसिकता, जो की सच में मुझे भी अभी तक मालूम ही नहीं थी, को विस्तार से समझने और समझाने का मौका मिला.

    अब मैं आपको सच्चे अर्थों में अपना मित्र मानता हूँ.



    इसके साथ ही इस पोस्ट पर मैं सभी टिपण्णी कर्ताओं का दिल से आभार प्रकट करता हूँ और कोशिश करूँगा की इस पोस्ट में मिले सभी विचारों से मैं जिस निष्कर्ष पर पंहुचा हूँ उसे अगली किसी पोस्ट में ठेल दूँ.

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  96. दीप जी,

    "holier than thou" के शाब्दिक अर्थ और परिभाषिक मंतव्य पर तो आप और हम दोनो एक मत है। भिन्न्ता इस ब्रह्म वाक्य के लागू करने के आशय में है। हमें इसे सतही निरिक्षण से लेना है अथवा पूर्ण गवेष्णा करके।

    मुझे लगता है कोई पवित्राभासी आपके सम्पर्क में रहा है जिसके असम्यक आभासी विचार आपको व्यथित करते रहे है। वह बार बार पवित्रता का आभास दिलाने वाला किसी भी दृष्टिकोण से श्रेष्ठ नहीं है। उसे गुणों को प्रकट करना ही नहीं आता।
    ऐसे दुर्बोध लोगों के कारण ही यह"holier than thou" की सतही मानसिकता दृढ बन जाती है।

    मैने आपके विचारों के विरोधाभास को भी निर्मल कहा था, आशय यही था कि सम्यक दृष्टि वहां सम्भव है, सभी पहलूओं से देखने पर यह विरोधाभास समाप्त हो जाते है।

    इस पर हम अगली पोस्ट में चर्चा करेंगे।

    आभार आपका, आपने मुझे मित्र रूप में स्वीकार किया, मेरा सौभाग्य है।

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  97. @"तो साहब मैं जब भी ऐसी विचारधारा या व्यक्ति के संपर्क में आता हूँ जो खुद को दूसरों से ज्यादा नेक या धर्मात्मा समझे तो मैं स्वतः ही उसके विरोध में आ जाता हूँ क्योंकि मेरे हिसाब से सच्चे धर्मात्मा और सदाचारी लोगों के मन में अपने लिए श्रेष्ठता और दूसरों के लिए तुच्छता का भाव नहीं होता."

    दीप जी,

    सदाचार के व्यक्ति आधारित अहंकार, और प्रेरक गुण गौरव में बारीक सा अन्तर होता है। व्यक्तिगत श्रेष्ठता प्रदर्शित करना घोर अहंकार है और यह पाप सेवन की कक्षा में आता है। और मात्र गुणों के अनुकरण हेतु गुणानुवाद, सदाचार के अनुमोदनार्थ, गुणो की प्रभावना के उद्देश्य से किया जाने वाला सद्कर्म है।

    विवेकवान को किसान बन जाना चाहिए……

    "खरपतवार को समूल नष्ट करते हुए भी फसल को नुकसान न पहूँचाना चाहिए।"

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  98. @"कोई खुद को श्रेष्ठ समझने का घमंड कर रहा है और हम उसे बिना परखे ही श्रेष्ठ मान लें ये कहाँ की समझदारी है."

    बिलकुल, यह अविवेक ही है। परख जरूरी है। नीर-क्षीर विवेक तो होना ही चाहिए।

    बिना ठोके हम नया खाली मिट्टी का घडा नहीं खरीदते।
    बिना परखे कुत्ता तक नहीं पालते।
    फिर बिना परखे गुरू कैसे बनाएं ( श्रेष्ठ मानना अर्थार्त गुरू स्थान देना)

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  99. यह एक सौ एकवीं मेरी !
    ये चर्चा ब्रह्मचारी गुरु की पूंछ हो गयी -ब्रह्मचारी बोले तो अपने हनुमाना जी हो !
    बढ़ती जा रही है ..उधर आलसी के चिट्ठे पर तीली भी सुलग गयी है !

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  100. नवसंवत्सर 2068 की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  101. अच्‍छा वैचारिक द्वन्‍द्व देखने को मिला। आपकी मेहनत को सलाम।

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    प्रेम रस की तलाश में...।
    ….कौन ज्‍यादा खतरनाक है ?

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  102. मेरे प्यारे भाइयों मैंने सारी तो नहीं लेकिन कुछ टिप्पणियां और आप का ब्लॉग पढ़ा आप ने अपने विचारो को बयां तो कर रखा है लेकिन क्या क्या आप ने कभी शास्त्रों को भी देखा है? हमारे हिन्दू धर्म के शास्त्रों को पढने का एक और कार्य मैं आप को देता हु एक बार ब्रह्मचर्य के बारे में हमारे शास्त्रों में पढ़ कर उसके बाद इस बारे में गहन विचार करना बाकी मेरे पास इतना ज्यादा टाइम नेट पर देने के लिए नहीं होता नहीं तो मैं खुद आप को इस बारे में बताता इस लिए यदि आप मेरे से दोबारा बातचीत करें तो शायद मैं आप से विस्तृत चर्चा कर पाउँगा!

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