रविवार, 5 जून 2011

समान विचारों का अन्तःप्रजनन खतरनाक है

मैं जब भी कुछ लिखता हूँ या कहता हूँ और सभी लोग आसानी से सहमत हो जाते हैं तो जाने क्यों मैं भीतर ही भीतर डर सा जाता हूँ. अपनी कही बात पर दुबारा विचार करता हूँ और अपने निर्णय पर अडिग नहीं रह पाता क्योंकि जब प्रत्येक व्यक्ति मेरी बात से सहमत दिखता है तो मुझे लगता है की या तो मेरी बात पर पर्याप्त  विचार नहीं हुआ है या फिर मेरी हाँ में हाँ मिलाने वाला आदमी जाने अनजाने में मुझ से अत्यंत प्रभावित होकर मेरा समर्थन कर रहा है.

जाने क्यों लोग अपनी आलोचना को नकारात्मक रूप से ग्रहण करते हैं. मुझे लगता है की हमें अपने आलोचक को अपने समर्थक से ज्यादा सम्मान देना चाहिए क्योंकि वो हमें हमारे विचारों को सटीक बनाने में सहायता करता है. सही मायनों में हमारा  आलोचक ही हमारा  सबसे बड़ा समर्थक है क्योंकि कहीं न कहीं वो हमें उस मुकाम पर पहुचने में सहायता कर रहा है जहाँ से कोई हमें गिरा न सके या  जहाँ जहाँ  विचारों में कमी का प्रतिशत कम से कम रहे. वर्ना आजकल किसके पास इतना समय और उर्जा है की वो आलोचना जैसे श्रमसाध्य  कार्य में लग कर लोगों की  बेवजह की नाराजगी मोल ले.

अपने खुद के बारे में एक बात मैं यहाँ बिलकुल सत्य कह दूँ जिन्हें मैं मन ही मन नापसंद करता हूँ या जिनके भरभरा कर गिराने का मुझे बेसब्री से इंतजार होता है मैं कभी भी उनकी आलोचना नहीं करता. मैं शांत होकर उन्हें गलतियाँ करते देखता जात हूँ और इंतजार करता रहता हूँ की कब गलतियों के फंदे में फंस कर उनकी द्रुत गति पर लगाम लगे.

सबसे स्वस्थ मंच वो है जहाँ विभिन्न प्रकार के विचारों  का स्वस्थ मिलन हो और उनके समागम से श्रेष्ठ गुणों से युक्त विचारधारा का जन्म हो जिसमे कमियों की कम से कम गुन्जायिश हो. परन्तु दुर्भाग्य ये है की हम अपने से विचार रखने वाले लोगों के मध्य ही सहज होते हैं और किसी का जरा सा भी विरोध मिलने पर आक्रामक हो जाते हैं. एक से विचार रखने वाले लोगों के साथ रहने से विचारों का अन्तःप्रजनन शुरू हो जाता है जो भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है.

तो ध्यान दें स्वस्थ व बेहतर भविष्य के लिए विरोधी विचारों से समागम के लिए हमेशा प्रसन्नता पूर्वक प्रस्तुत रहें.

भूल सुधार :

@ अनुराग जी, जब से आपकी टिप्पणी देखी है तब से यही सोचा रहा था की इस शीर्षक में क्या कमी है. बड़ी देर बाद लगा की शायद एक शब्द छुट गया है. "विचारों का अन्तःप्रजनन" को अब "समान  विचारों का अन्तःप्रजनन" कर दिया है. अभी भी कुछ ठीक न लग रहा हो तो बताएं, सुधार  हो जायेगा. अपना ही ब्लॉग है गलतियों में कभी भी सुधार किया जा सकता है :-))

@अंशुमाला जी मैंने कभी इस नज़रिए से सोचा नहीं था. भविष्य में ध्यान रखूँगा की सीधे मुझ से किये गए प्रश्नों के उत्तर मैं जरुर दूँ. साथ ही साथ मैं यह भी स्पष्ट कर दूँ की मेरी पोस्ट से सम्बंधित दिए गए आपके या किसी और के विचारों से अगर कोई दूसरा व्यक्ति अपनी सहमती या असमति व्यक्त करता है तो मैं उसे रोक दूँ ये बात मुझे ठीक नहीं लगती.
बेशक गूगल बाबा के आशीर्वाद से ये ब्लॉग मेरा हुआ है पर फिर भी सभ्य भाषा में पोस्ट के विषय से सम्बंधित अपनी बात रख रहे व्यक्ति को मैं सिर्फ इसलिए रोक दूँ की इस ब्लॉग पर पोस्ट लिखने की सुविधा मुझे मिली हुयी है मुझे ठीक नहीं लगता. यहाँ पर प्रकट मेरे विचारों से मेरा कोई लगाव नहीं है.यहाँ मैं अपने विचार रखता ही इसलिए हूँ ताकि अगर मेरी कोई बात गलत है तो उसकी ढंग से मरम्मत हो जाये. आप ऐसा करती हैं इसलिए ही मैं आपकी इज्जत करता हूँ. जब कभी भी मुझे मेरे विचारों की कमियां आप जैसे अनुगृही मित्रों की कृपा से नज़र आती हैं तो मैं उन्हें सुधारने की कोशिश अवश्य करता हूँ. बेशक मैं हर उस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार न करूँ.
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43 टिप्‍पणियां:

  1. विचारों के आदान-प्रदान से ही नवीन विचारों का उदय होता है। आलोचना सही है लेकिन कुछ विषय ऐसे हैं जिनपर लोग आलोचना पसन्‍द नहीं करते। जैसे देश, स्‍वधर्म आदि। यदि मैं अपने देश की आलोचना करने लगूं तो कुछ लोग बात ठीक होने पर भी विरोध करेंगे। जैसे आज देश की सरकार ने लोकतंत्र की हत्‍या कर दी और लोग इस पर भी अपने विचार प्रतिकूल रखेंगे तो लगेगा कि यह देश भ्रष्‍टाचारियों का अड्डा बन गया है।

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  2. "मैं मन ही मन नापसंद करता हूँ या जिनके भरभरा कर गिराने का मुझे बेसब्री से इंतजार होता है मैं कभी भी उनकी आलोचना नहीं करता. मैं शांत होकर उन्हें गलतियाँ करते देखता जात हूँ और इंतजार करता रहता हूँ की कब गलतियों के फंदे में फंस कर उनकी द्रुत गति पर लगाम लगे"
    उत्तम, पढ़कर अच्छा लगा..

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  3. हर जगह, हर मुद्दे पर, इर्द गिर्द फैले कचरों पर सहमत होते रहना.. ब्लॉगजगत की तहज़ीब में है ।
    ऎसी तहज़ीब विचार प्रदूषण के ख़तरे देती है
    आपका विचार शून्य होना ही ठीक है !

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  4. हर जगह, हर मुद्दे पर, इर्द गिर्द फैले कचरों पर सहमत होते रहना..
    ब्लॉगजगत की तहज़ीब में शुमार है ।
    ऎसी तहज़ीब विचार प्रदूषण के ख़तरे देती है
    आपका विचार शून्य होना ही ठीक है !

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  5. "एक से विचार रखने वाले लोगों के साथ रहने से विचारों का अन्तःप्रजनन शुरू हो जाता है जो भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है."

    विचार-शून्यता परम उपलब्धि है...इसका मार्ग बड़ा पेचीदा है...एक विचार से दो विचार उपजते हैं,दो से चार,चार से आठ ...इस प्रकार यह शृंखला परमाणु विखंडन की तरह है...वस्तुत: विचार शून्यता के लिए सर्वोत्तम मार्ग है विचार का साक्षी होना ...विचार आएं तो उनके प्रति न विरोध का और न पक्ष का रुख अपनाएँ...बस मात्र उनके द्रष्टा बने रहने से वे क्षीण होने लगते है। बाहर से देखने पर लगता है कि यह क्रिया तो हमें आलसी और निष्क्रमण्य बना देगी। लेकिन ऐसा नहीं है...विचार शून्यता पर व्यक्ति की प्रतिभा चमकने लगती है...जैसे आकाश से बादल छँट गए हों और सूर्य यकायक चमकने लगा हो।

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  6. हर जगह, हर मुद्दे पर, इर्द गिर्द फैले कचरों पर सहमत होते रहना..
    ब्लॉगजगत की तहज़ीब में शुमार है .

    इस बात से मै इतीफाक रखती हूँ

    जो मुझे गलत लगता हैं उस पर अपनी असहमति दर्ज करवाती हूँ

    ब्लॉग जगत में लोग बहस से परहेज करते हैं , तर्क जब नहीं दे पाते हैं तो व्यक्तिगत रूप से बदनाम करते हैं . हिंदी ब्लॉग जगत का या दंश झेल रही हूँ और क्युकी महात्मा गाँधी नहीं हूँ इस लिये जवाब देने में विश्वास रखती हूँ . अपनी तरफ से कभी भी कहीं भी किसी को अपशब्द नहीं कहती हूँ पर अपशब्द कोई कहे तो उसी भाषा में जवाब देती हूँ

    ब्लॉग जगत आभासी दुनिया हैं किसी ब्लॉग पर कुछ मनपंसद हुआ तो कमेन्ट का कोई औचित्य नहीं बनता हैं जब तक उसमे कुछ और ना जोड़ा जा सके . हां अगर किसी पोस्ट में राय मांगी जाती हैं तो अवश्य निस्पक्ष राय देना मंशा होती हैं
    असहमत होने पर टिपण्णी देती हूँ लेकिन अगर उस ब्लॉग मालिक को नहीं पसंद आये तो फिर चर्चा अपने ब्लॉग पर करने की कोशिश करती हूँ
    विचारों का आदान प्रदान तभी हो सकता हैं जब ये दो तरफ़ा हो , हिंदी ब्लॉग जगत की ये रीति हैं की यहाँ कुछ लोगो को एक पायदान पर खडा कर दिया जाता हैं उनसे असहमत होने का अर्थ होता हैं की आप को " तमीज " नहीं हैं .
    ब्लॉग मालिक को पूर्ण अधिकार हैं की वो अपने ब्लॉग पर क्या करे क्या ना करे , अगर समाज का नुक्सान होता हैं उनके ब्लॉग पर आयी सामग्री से तो उस से असहमत होना जरुरी हैं और हर संभव कोशिश कर के उसको हटवाना चाहिये .
    कोई मुझ से सहमत हैं या असहमत हैं इससे फरक नहीं पड़ता हैं . क्युकी हर सहमति और असहमति का असर मेरी सोच पर नहीं पड़ता हैं . लेकिन जो मै सोचती हूँ अगर वो कुछ समय बाद ही सही लोगो को सही लगने लगता हैं ख़ास कर उनको जो असहमत थे तो बड़ा अच्छा लगता हैं .
    एक example देती हूँ
    शुरू में जब इंग्लिश में कमेन्ट देती थी तो लोग नाराज रहते थे , जब रोमन में देती थी तो भी लोग नाराज रहते थे , ब्लॉग को बाई लिंगुअल किया तब भी लोगो ने मखोल किया और आज वही लोग हमारी वाणी के पथ प्रदर्शको में हैं और हमारी वाणी पर इंग्लिश के ब्लॉग आराम से दिखाए जाते हैं .
    कमेन्ट मोदेरेशन के खिलाफ डॉ अमर हमेशा रहते हैं लेकिन ये ब्लॉग मालिक का अधिकार हैं और जो इसके खिलाफ होते हैं वो कहीं ना कहीं किसी के अधिकार का हनन करते हैं . उनका असहमत होना ना होना कोई माने ही नहीं रखता हैं पर किसी के ब्लॉग पर बार बार ये कहना दूसरे को irritate करता हैं क्युकी अपने अधिकारों का हनन कौन पसंद करता हैं
    ब्लॉग पर आप विचार रख सकते हैं , पर विचार में शून्यता मुझे भाति हैं क्युकी शून्य किसी भी संख्या में लगा दो उस संख्या में चार चाँद लग जाते हैं

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  7. अफ़सोस है कि स्पष्टवादिता बहुत कम लोग पसंद करते हैं और झेलना तो और भी कम लोगों के बस का है। इस का एक कारण तो यह है कि ब्लोगिंग में हर कोई खुद को विद्वान समझता है और किसी दूसरे से कुछ सीखने को तौहीन ।
    इस माहौल के चलते --ये गाड़ी बस यूँ ही चलेगी ।

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  8. "जिन्हें मैं मन ही मन नापसंद करता हूँ या जिनके भरभरा कर गिराने का मुझे बेसब्री से इंतजार होता है मैं कभी भी उनकी आलोचना नहीं करता. मैं शांत होकर उन्हें गलतियाँ करते देखता जात हूँ और इंतजार करता रहता हूँ की कब गलतियों के फंदे में फंस कर उनकी द्रुत गति पर लगाम लगे."

    :)

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  9. "हर जगह, हर मुद्दे पर, इर्द गिर्द फैले कचरों पर सहमत होते रहना..
    ब्लॉगजगत की तहज़ीब में शुमार है।"
    -डॉ अमर कुमार
    माई लार्ड इसे नोट किया जाय और मेरा भी मत यही माना जाय
    एक ब्लॉग पर ऐसा ही अन्तःप्रजनन चल रहा है ....जो तरह तरह की विकृतियों का आधार तैयार कर रहा है ..
    और उस अन्तः प्रजनन में सम्मिलित वे लोग हैं जो सीधे प्राक्रतिक/सामाजिक चयन में असफल हो गए हैं
    और अपनी प्रजाति रक्षा के हताश प्रयासों में लगे हैं!
    अब स्मार्ट इन्डियन को समझाईये कि आपका शीर्षक बिलकुल सही है ...
    मगर आज का सबसे बड़ा मुद्दा तो दिली में लोकतंत्र पर हुआ सबसे बड़ा हमला है !

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  10. .
    .
    .
    तो ध्यान दें स्वस्थ व बेहतर भविष्य के लिए विरोधी विचारों से समागम के लिए हमेशा प्रसन्नता पूर्वक प्रस्तुत रहें.

    दो सौ फीसदी सहमत हूँ मित्र, आखिरकार यही समागम तो इंसान की कौम के भविष्य को सुखद बनायेगा !



    ...

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  11. हम तो हमेशा स्वस्थ बहस इसमें जिज्ञासाएं हों(कुतर्क नहीं) के लिए हमेशा तैयार रहते हैं , और हमेशा स्नेह बांटने की कोशिश की है बदले में लोग उनके पास जो होता है दे देते हैं (स्नेह , नफरत , नाराजगी) , हम जैसों को अगर गुस्सा आया हो तो भाई लोगो सिचुएशन कुछ डिफरेन्ट रही होगी :)

    पाण्डेय जी की एक बात जो अच्छी लगती है वो ये की जब वे सवाल पूछते हैं तो सच में जवाब का इन्तजार करते हैं , इस बात का नहीं की जवाब आते ही विरोध कैसे करना है ?? :))

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  12. "विरोध को दबाने की एक ब्लोगिंग स्किल" बताता हूँ , इसे ब्लोगिंग में "आम आदमी की आवाज के नाम पर नेता गिरी कैसे शुरू की जाए"?? भी समझ सकते हैं

    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

    एक्जाम्पल है . गौर कीजियेगा .......
    जैसे किसी ब्लॉग का मूल उदेश्य केवल संस्कृति को गालियाँ देना है तो उन कमेंट्स के लिए पालिसी में हर तरह की ढील दीजिये जो की आपको पता है की बेमतलब कुतर्क है लेकिन आपके उदेश्य (संस्कृति को गाली देने ) की पूर्ती करते हों और हाँ उन कमेंट्स पर पालिसी हमेशा सख्त रखिये जो आपका विरोध (संस्कृति का समर्थन ) कर रहे हों

    नोट: तीज त्यौहार के दिन कुछ भजन वजन वाली पोस्ट जरूर लगाएं

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  13. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  14. एक ट्रिक ...... ग्रुप ब्लॉग के लिए है .....

    यहाँ आप पालिसी[?] का दोहरा फायदा ले सकते हैं क्योंकि पालिसी के नाम पर आप कमेन्ट ही नहीं वे लेख भी दबा या हटा सकते हैं जो आपके मूल उदेश्य से मेल ना खाते हों

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  15. धन्यवाद!
    दोबारा पढने पर बात समझ आ गयी थी। ग़लती शायद मेरी थी। ऐसा लगता है कि मैं शीर्षक को (:) द्वारा बांटे हुए दो भागों में पढ रहा था। नये परिवर्तन के बाद एक और कंफ़्यूज़न हो गया है - यह "सामान" का यहाँ क्या अभिप्राय है - समान या सामान्य (या फिर लगेज)

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  16. असहमति विचारो से हो हो, कोई परेशंनी नहीं, जब व्यक्तिगत हो, छिछले स्तर पर हो.. फिर क्या कहें ?
    वैसे सहमिति वाली पोष्टो, विचारो के लिए तर्क नहीं, भावनाओ, भक्ति की जरूरत होती है|

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  17. @ "जाने क्यों लोग अपनी आलोचना को नकारात्मक रूप से ग्रहण करते हैं."

    यह आवश्यक तो नहीं कि आलोचना / नकारात्मक भाव देते समय, आपका नजरिया इमानदार ही हो ! संभव है कि आपके विचार आपकी नकारात्मक सोंच से प्रभावित हों फिर आप अपना मूल्यांकन खुद क्यों कर रहे हैं ! समय और पाठकों को अपना मूल्यांकन क्यों न करने दें !
    लेखन सबके भेद खोलने में समर्थ होगा !

    @ "एक से विचार रखने वाले लोगों के साथ रहने से विचारों का अन्तःप्रजनन शुरू हो जाता है जो भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है."

    सहमत हूँ , मगर विरोध स्वस्थ और दुर्भावना रहित होना चाहिए अन्यथा अपने घर का विनाश इसी विरोधमात्र से हो जायेगा जिसे हम आवश्यक मानते हैं !

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  20. आदरणीय सतीश जी ने बात तो सही कही है , एक दिल की बात बोलूं ......... व्यक्तिगत ब्लोग्स पर तो मुझे फिर भी आश्चर्य नहीं होता लेकिन दुःख तो तब होता है जब एक ग्रुप ब्लॉग होता है और वहां से तकनीकी और तार्किक रूप से मजबूत लगने वाले आलोचना / जिज्ञासा को दबा दिया जाता है ...... अब अपन ने भी कुछ कहना छोड़ दिया

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  21. अन्तर्प्रजनन से आशय शायद पूर्वाग्रह युक्त स्थिरता से है। विचार तो सहज सरिता समान प्रवाहमान और उनका परिमार्जन होते रहना चाहिए। अन्यथा तालाब के पड़े जल के समान सड़ने लगते है।
    विचारों का कभी कभी अपनी 'जाति गौत्र'(आग्रहों) के बाहर प्रजनन होना आवश्यक है।

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  22. "एक से विचार रखने वाले लोगों के साथ रहने से विचारों का अन्तःप्रजनन शुरू हो जाता है जो भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है."

    बहुत गम्‍भीर बात कह गये आप, यकीनन।

    ---------
    बाबूजी, न लो इतने मज़े...
    भ्रष्‍टाचार के इस सवाल की उपेक्षा क्‍यों?

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  23. कई बार लोग जाने अनजाने में लोगो से सहमत हो जाते है तो कई बार किसी विवाद से बचने के लिए सहमती जता देते है तो कई बार इस उम्मीद में भी की ये हमारे ब्लॉग पर भी सकारात्मक टिपण्णी दे जायेंगे तो कुछ ये जानते है की यदि आलोचना की तो ब्लोगर पचा नहीं पायेगा | जहा तक आप की और अपनी बात करू तो एक दो मुद्दों पर हमारे विचार अलग है और मैंने बिना किसी संकोच के उसे आप के ब्लॉग पर कहा है ( बेटी की बिदाई और पत्नी से प्रेम के मुद्दे पर तो दो बार आप से असहमति जता चुकी हूँ ) आप ने उसे सकरात्मक रूप में लिया और कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं दी तो अन्य मुद्दों पर भी आप से असहमत होने पर मैंने उसे कहा है |

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  24. किन्तु कई बार ऐसी बातो के लिए ब्लॉग मालिक भी जिम्मेदार होते है | जैसे की आप, जब हम किसी के ब्लॉग पर जाते है तो हमारा प्रयास उस ब्लॉग मालिक से विचारो के आदान प्रदान का होता है किसी अन्य से नहीं किन्तु आप बल्ला घुमाने के बाद लगभग गायब हो जाते है और अपने रनर को रन लेने के लिए छोड़ देते है ये गलत बात है | यदि हमें किसी और से विचार करना है तो हम उसके ब्लॉग पर जायेंगे न की आप के ब्लॉग पर आयेंगे आप के ब्लॉग पर हम आप के विचार और आप की प्रति टिप्पणी जानना चाहेंगे अपनी टिप्पणी पर किसी और के नहीं | जब आप की जगह किसी और से जवाब मिलेगा और वो भी कभी कभी बेतुकी तो कभी अपमान जनक, तो कोई भी आप के ब्लॉग पर नकरात्मक क्या सकरात्मक बात भी लिखने से पहले सौ बार सोचेगा क्योकि हर किसी के पास इतना समय नहीं होता की वो बिना मतलब की कोई लम्बी बहस करे या अपना अपमान करवाए जब आप ये सब नहीं रोकते है तो ये माना जाता है की इन सब में आप की मौन सहमती है | आप बिना कोई प्रति टिप्पणी किये गलत बात के भागीदार बन जाते है | मैंने अपने ब्लॉग पर भी कुछ लोगो को मना किया था की मेरे ब्लॉग पर आने वाली टिप्पणियों का जवाब मै दूंगी कोई और नहीं हा किसी के बात पर एक टिप्पणी या कुछ शब्द कहना तो ठीक है पर किसी दुसरे के ब्लॉग पर खुदी जवाब देते जाना बहस करना मुझे निजी रूप से सही नहीं लगता है क्योकि इस स्थिति में कोई अपमान जनक टिप्पणी पर ब्लॉग स्वामी साफ ये कह का निकल जाता है की ये मैंने तो नहीं कहा है | ब्लॉग , ब्लॉग मालिक और टिप्पणी कर्ता के विचारो के आदान प्रदान के लिए होते है ना की ऐसा आखाडा जहा दो चार लोगो को भिड़ा दिया और खुद चुपचाप बैठ देखते रहे | इस टिप्पणी का जवाब भी केवल आप से ही जानना चाहूंगी किसी और से नहीं यदि जवाब नहीं दे सकते तो मेरी टिप्पणी को हटा दे | मै अब भी पहले की तरह ही आप को पढ़ती रहूंगी और टिप्पणी भी देती रहूंगी |

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  25. "एक से विचार रखने वाले लोगों के साथ रहने से विचारों का अन्तःप्रजनन शुरू हो जाता है जो भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है."

    एकदम सत्य
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  26. मैंने ये नहीं कहा है की कोई आप से बहस न करे या अपनी बात आप के ब्लॉग पर न रखे जीतनी चाहे टिप्पणिया आप को दे अपनी बात खुल कर रखे | मैंने ये कहा है की जब मै आप के ब्लॉग पर आप को टिप्पणी देती हूँ तो उसका कोई भी जवाब आप देंगे न की कोई और
    @ हा किसी के बात पर एक टिप्पणी या कुछ शब्द कहना तो ठीक है पर किसी दुसरे के ब्लॉग पर खुदी जवाब देते जाना बहस करना मुझे निजी रूप से सही नहीं लगता है |
    मैंने साफ कहा है की यदि कोई किसी की टिप्पणी से असहमत है तो जरुर वो कह सकता है किन्तु बेमतल की अपनी व्यक्तिगत खीज न निकाले | विचार विमर्श दो चार टिप्पणियों तक ही सिमित होता है उसके बाद तो ज्यादातर वो बेमतलब बहस बन जाती है | फिर विद्वान् जनों को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए की क्या सामने वाला आप से किसी भी बात पर विचार विमर्श करना भी चाह रहा है की नहीं |
    वैसे मुझे तो ये बात भी थोड़ी अजीब लग रही है की आप ने मेरी टिप्पणी का जवाब एक टिप्पणी के रूप में न दे कर उसे पोस्ट में ही शामिल कर दिया | इसलिए पूछ रही हूँ की क्योकि मुझे भी लोगो के मन में छुपी बाते समझ नहीं आती है |

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  27. @ पाण्डेय जी
    एक विकल्प और है .....
    उस बन्दे के कमेन्ट स्पाम कर के बात ख़त्म कर सकते हैं, खुली सोच का भारतीय होगा तो बुरा नहीं मानेगा....... वैचारिक विरोध का (कहने वाले इसे व्यक्तिगत विरोध का नाम देते हैं) भी नहीं मानता होगा .....लेकिन हाँ ऐसे कमेंट्स मत हटाइएगा जो किसी की एक तरफ़ा जानकारी को पूर्ण बना रहें हों , मेरे पास मेरे कमेन्ट फौलाद का बनाने के लिए एक्स्ट्रा लाइन्स भी नहीं है जो बीच में डाल दूँ ..
    सिर्फ एक विकल्प सुझाया है ..... मुझे किसी के व्यक्तिगत ब्लॉग पर अपनी पालिसी थोपना बड़ा अजीब लगता है .. अपने ब्लॉग की पालिसी मेन्टेन रहे वही बड़ी बात है .. उससे बड़ी बात है ब्लोगर से पहले इन इंसानी नजरिये से सोचना .. खैर लेक्चर ज्यादा ना हो जाये......... और हाँ मैं १ तो १ चेटिंग के लिए जी -मेल की दी सुविधाएं इस्तेमाल करता हूँ ब्लॉग की नहीं

    मैंने हमेशा यही चाहा है की एक हद एक बाद विवाद ना बढे .. कौन गलत कौन सही .. इस बात से फर्क क्या पड़ता है .. कभी कभी सच को भी टेम्परेरी हार का सामना करना पड़ता है

    आपको आप ही के ब्लॉग की एक पोस्ट याद होगी..... जिस पर कमेंट्स बंद थे ....उसमें ध्यान देने की बात ये हैं की एक बार वैचारिक मतभेद (विवाद नहीं) होने के बाद भी मैंने यही कोशिश की थी ..की कुछ ही तो ठीक ठाक ब्लोग्स और ब्लोगर्स हैं ....वो तो ऐसे विवादों से दूर ही रहें.. और ना ही मैं सभी "व्यक्ति विशेष विरोधी" पोस्ट्स पर मैं कभी जा कर समर्थन देता रहा ....

    अकसर होता ये हैं की हम जैसे होते हैं वैसा ही दूसरों को समझते हैं .. जैसे हम जानते हैं की हम नहीं सुधर सकते तो हम ये जरूर मानने लगते हैं "कोई भी नहीं सुधर सकता" वगैरह ..वगैरह.. वगैरह

    मल्टीपल कमेन्ट करना किसी किसी की आदत में शामिल होता है ......ये बात अलग है की कोई एक ब्लॉग पर कर देता है , कोई जगह जगह करता है (अब अपने पास इतने लेख पढने का समय नहीं है ).. उम्मीद है समाधान हुआ होगा ...

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  28. कोई यकीन करे ना करे
    कुछ लोग .......
    -------ब्लॉग जीवन की शुरुआत से ही चर्चा और इससे निकले निष्कर्ष को पाने के लिए ब्लोगिंग करते हैं/ रहेंगे ..... केवल कमेंट्स लेने देने के लिए नहीं (इनके ब्लॉग पर भी जाकर देखें तो यही पायेंगे )
    ------- अपने लिए कम संस्कृति व अन्य पक्षों के लिए ज्यादा तर्क करते हैं , और ये कोई बुरी बात नहीं
    -------- विरोध वैचारिक ही करते हैं व्यक्ति का नहीं , वर्ना पंगा तो कितनों से ही हुआ होगा
    ------- व्यक्तिगत ब्लोग्स से ज्यादा ग्रुप ब्लोग्स उम्मीद रखते हैं की वो सामान विचारों का अन्तः प्रजनन का ना होने दें
    -------अपने परम ब्लॉग मित्रों से एक-दो बार पंगे (हा हा हा ) ले चुके हैं और भविष्य में भी पंगे(हा हा हा ) लेते रहेंगे , लेकिन मित्रता हर दिन मजबूत हो रही है, पता नहीं क्यों ? :)

    और एक बात ... अगर देखा जाए तो कुछ लोग दिखने में किसी को बहुत बुरे लगते हों पर ध्यान से देखें तो ऐसा कुछ भी नहीं है ...... एक बार समझने की कोशिश तो करें ..बस यही अनुरोध है .. स्नेह ना पहले कभी कम हुआ था ना आगे कभी होगा .........बात फिर से यकीन पर आ टिकती है .

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  29. [सुधार]

    व्यक्तिगत ब्लोग्स से ज्यादा ग्रुप ब्लोग्स से उम्मीद रखते हैं की वो समान विचारों का अन्तः प्रजनन का ना होने दें

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  30. @अंशुमाला जी मैंने अपनी पिछली पोस्ट से ही किसी भी टिपण्णी का जवाब पोस्ट में ही शामिल करना शुरू किया है. बहुत सी वजहों से मुझे ऐसा करना बेहतर लग रहा है. वजहें छोटी छोटी हैं. कभी मौका लगा तो विस्तार से लिख दूंगा.


    अंशुमाला जी मैंने ऊपर भी यही बात कही है की मैं भविष्य में इस बात का पूरा ध्यान रखूँगा की अगर किसी टिप्पणी में मुझसे कोई प्रश्न किया जाता है तो मैं उसका उत्तर जरुर दूँ. परन्तु अगर कोई दूसरा व्यक्ति भी अपनी ओर से उस टिपण्णी पर कुछ कहना चाहता है(चाहे कम शब्दों में कहे या फिर ज्यादा शब्दों में) तो मैं उसे रोकना ठीक नहीं समझता. मैंने खुद भी बहुत बार दुसरे लोगों के ब्लॉग पर जाकर किसी तीसरे की टिप्पणी का जवाब दिया है. ऐसे में अगर वो ब्लॉग मालिक मेरी टिप्पणी को रोक दे तो शायद मुझे भी अच्छा नहीं लगेगा.


    ऐसा मुझे तो बड़ा स्वाभाविक सा लगता है की अगर हमें कहीं कोई बात अच्छी लगाती है तो हम उस बात का पक्ष लेते ही हैं. आपको एक उदहारण दे दूँ. वरिष्ठ ब्लॉगर गिरिजेश राव जी की बाबा रामदेव पर लिखी पोस्ट में मैंने उनके विचारों का विरोध किया.तो मेरी बातों का उत्तर राव साहब से पहले ही मो सम कौन के संजय जी ने दे दिया.मुझे इस बात से कोई परेशानी नहीं हुयी. हाँ अगर राव साहब ने कुछ नहीं कहा होता और मुझे उनके विचार ही जानने होते तो इस बात का आग्रह मैं वहीँ उस पोस्ट पर ही कर देता.

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  31. विचार शून्य जी
    ये संवाद केवल आप तक सिमित हैं उत्तर भी आप से ही अपेक्षित हैं
    मेरा मानना हैं की हर ब्लॉग मालिक को अधिकार हैं की वो अपने ब्लॉग पर अपनी नीति रखे . सब के अपने अपने "नियमित " पाठक और टिप्पणीकार हैं . समस्या तब उत्पन्न होती हैं जब किसी ब्लॉग के नियमित , अपने को मित्र कहने वाले टिप्पणीकार दूसरे टिपण्णी कारो पर tangential टिपण्णी करते हैं . टिपण्णी अगर विषय से जुड़ी हो तो भी ठीक हैं लेकिन आप के ब्लॉग की पिछली कई पोस्ट पर नारी ब्लॉग और मुझे लेकर काफी बाते कही गयी हैं बिना नाम लिये जिसको आप ने मौन सहमति दी हैं . जबकि एक बार आप खुद अजय झा के ब्लॉग पर कह चुके हैं की "नाम ले कर बात कहना चाहिये " . हर एक को बहस में अधिकार हैं बोलने का विचार रखने का लेकिन किसी पर तन्जेंशियल टिप्पणी करने से आप बहस की पूरी अस्मिता को ही नष्ट कर देते हैं
    आप के ब्लॉग पर विविधता हैं इस लिये आती हूँ आगे से पढना जारी रहेगा टिपण्णी देने की बात पर सोचुगी जरुर क्युकी इस पोस्ट पर आये कमेन्ट मे भी वही दिख रहा हैं जो मैने ऊपर कहा

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  32. पाण्डेय जी, अपना भी जिक्र हो ही गया यारों की महफ़िल में:)
    मैं आभारी हूँ कि गिरिजेश जी के ब्लॉग पर मेरे कमेंट से आपको कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन इतना तय है कि अगर आपको या किसी को मेरे कमेंट से कोई परेशानी होती और इसका जिक्र कर दिया जाता तो मैं इस बात को भविष्य के लिये नोट करता। इसलिये, कभी दिक्कत महसूस हो तो बता देना क्योंकि मैं भी लोगों के मन में छिपी बातों को नहीं पढ़ पाता।

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  33. वैसे तो कहने के लिए बहुत कुछ है .....पर अँधेरे में लाईट जलाने का कोई फायदा नहीं है

    फिर भी एक नया ओब्जेर्वेशन :
    वो करे तो चुहल ...............मैं करूँ तो व्यक्तिगत कमेन्ट की पहल
    वो लिखे तो धारदार लेखनी , पैना ओबजर्वेशन , बिना लाग लपेट के कही बात ..........मैं बोलूं तो उबल पड़े जज्बात
    वो बोले तो महंगी आपत्ति , ...................मैं करूँ तो "केवल आलोचना " वो भी सस्ती

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  34. नए ब्लोगर्स के लिए एक लास्ट फंडा है ...............ये भी आब्जर्वेशन है................ पोलिसियाँ तोड़ो तो इतनी जम के और आत्मविश्वास के साथ की ना तो कोई काउन्ट कर पाए ना कुछ कह पाए , तभी आपकी आपत्ति में कुछ वजन आएगा :))
    ...... अब रह गया "नियमितता" फेक्टर मैं तो उस मामले में भी बहुत पीछे ही हूँ ........ मुझे बड़ा अजीब लग रहा है ...........खैर ....... मैं ये तो कहूँगा की एडमिनिस्ट्रेटर से कुछ भी कहना तब ही सही होता जब कमेन्ट कोई बेनामी कमेन्ट होता या गलत भाषा में होता , कमेन्ट कर्ता (जिसके कमेन्ट पर आपत्ति की गयी है ) के खुद के समझने की ही बात है की "ये इंडिया है यहाँ ऐसा ही चलता है और चलता रहेगा" , और वो कमेन्ट कर्ता अब ब्लोग्स पढ़ना ही बंद करेगा , क्योंकि पढ़ेगा तो बोलेगा जरूर ..................अब अनुरोध है इस बात को यहीं समाप्त करें

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  35. पाण्डेय जी को अपने ही ब्लॉग पर हुयी असुविधा के लिए हमेशा खेद रहेगा .....उम्मीद है अब बात को आगे नहीं बढ़ाया जायेगा

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  36. एक बात दिल से बोलूं ...........आप लोगों को नाराजगी से भी मेरा ही सुकून छिना जाता है ..नुकसान दोनों और से मेरा ही है ...इस बात समझ पाना मुश्किल है.....

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  37. जिस किसी का भी ह्रदय दुखी हुआ हो ..(उदेश्य कभी ये नहीं था).... क्षमा कर दें ...(क्षमा की वजह सिर्फ इतनी ही है की किसी को दुःख या परेशानी हुई)

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  38. ये पोस्ट मेरे लिए संग्रहणीय है

    http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/06/blog-post_17.html

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  39. कल 08/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  40. With Microsoft office 2010, you can get things done more easily, from more locations and more devices.Track and highlight important trends with data analysis and visualization features in office 2010 Excel

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