गुरुवार, 2 जून 2011

काश बाबाजी देश को सुपर पावर बनवाने के लिए सत्याग्रह करते.

बाबा रामदेव जी का अनिश्चित कालीन आमरण अनशन शुरू होने में सिर्फ एक दिन बाकि रह गया है. चार जून से बाबाजी अपने करोड़ों भक्तों के साथ आमरण अनशन शुरू करेंगे ताकि उनकी तीन प्रमुख निम्न मांगें मान ली जाएँ.

बाबाजी की राष्ट्रहित में तीन माँगे
  • लगभग चार सौ लाख करोड़ रुपये का काला धन जो की राष्ट्रीय संपत्ति है यह देश को मिलना चाहिए ।
  • सक्षम लोकपाल का कठोर कानून बनाकर भ्रष्टाचार पर पूर्ण अंकुश लगाना ।
  • स्वतंत्र भारत में चल रहा विदेशी तंत्र (ब्रिटिश रूल ) खत्म होना चाहिए जिससे कि सबको आर्थिक व सामाजिक न्याय मिले ।  
(बाबाजी के भक्तों के अनुसार तो बहुत सारे मुद्दे है  पर भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की वेबसाईट इन्हीं तीन प्रमुख मांगों की बात करती है. )


बाबाजी की  मांगों को लेकर मेरे मन में संशय है की क्या बाबाजी के आमरण अनशन के टूटने से पहले उपरोक्त मागों में से कोई भी एक पूरी की जा सकती है?

ऐसा होना मुझे तो बिलकुल भी संभव नहीं दीखता. सरकार अगर अपने  तमाम संसाधनों का उपयोग कर ले तो भी इन मांगों का पूरा होना  संभव नहीं तो क्या स्वामीजी व्यर्थ में अपनी और अपने समर्थकों की  जान जोखिम में डाल रहे हैं और अगर स्वामीजी को सिर्फ सरकार के आश्वासन से ही संतुष्ट होना है तो वो आश्वासन  तो प्रधानमंत्री जी की तरफ से एक हफ्ता पहले ही मिल चूका है तो फिर अनशन पर बैठने की जिद क्यों?

सरकार स्वामी जी के समक्ष हाथ जोड़े खड़ी है की प्रभु आप जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा तो स्वामीजी आगे बढ़कर सरकार का मार्गदर्शन क्यों नहीं करते? काहे को दो चार रोज के लिए भूखे रहकर खुद की उस शक्ति को जोकि देश की सरकार को सही राह दिखने में खर्च की जानी चाहिए थी राम लीला मैदान में जाया कर रहे हैं? ये कैसी कलजुगी लीला है मेरे राम ?

क्या आमरण अनशन जोकि निश्चित रूप से लक्षित मांगों के पूरा होने से पहले ही ख़त्म हो जाना है, भ्रष्टाचार उन्मूलन से ज्यादा महत्वपूर्ण है? 


कुछ बातें और भी ....

अपनी टिप्पणी में राहुल सिंह जी ने कहा.....

आदर्श या बेहतर स्थितियां के लिए कल्‍पना हो, विचार या प्रयास, स्‍वागतेय होना चाहिए.
पर मुझे लगता है की कल्पनाओं और विचारों का तो स्वागत किया जा सकता है पर प्रयास तो सही दिशा में ही होने चाहिए. उदहारण के लिए एक उत्तम विचार/कल्पना  है...

कौन कहता है की आसमां  में छेद नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो.....

अब जरा सोचें की आपका पडोसी इस विचार को सही साबित करने के लिए  प्रयास शुरू कर दे तो क्या होगा.

स्वामी जी का विचार तो उत्तम परन्तु प्रयास भी कुछ ऐसा ही निर्थक है.

@ संजय जी उस ईश्वर या प्रकृति ने भेड़ें बनाई हैं तो उसी ने भेडिये भी बनाये  हैं पर भेड़ की खाल  में छिपे भेडिये नहीं बनाये. मैं  भेडियों तो सहन कर लेता हूँ (प्रकृति की देन हैं)पर भेड़ की खाल में छिपे भेडियों को नहीं.


@ आशीष श्रीवास्तव जी आपने मेरे विचारों को मजबूत सहारा प्रदान किया है. आपका बेहद धन्यवाद.

@ अली सर, धन्यवाद, गलती में सुधार  कर दिया है.

@ संजय जी एवं आशीष जी आप दोनों ने मेरी बात को विस्तार दिया, इसके लिए आपका शुक्रिया.   

@ दीपक जी, रामदेव जी के प्रति आपका झुकाव बनता  है क्योंकि  वो भी बाबा और आप भी बाबा  :))

इसके साथ ही सभी को धन्यवाद और आभार.

18 टिप्‍पणियां:

  1. देखिये बिना सत्ता की कुंजी के देश में कोई भी बदलाव संभव नहीं है. यूपीएससी के सामने वर्षों अनशन रहा अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करने के लिये, कोई हल नहीं निकला. मणिपुर (सम्भवत:) की एक लड़की वर्षों से आफ्सा हटाने के लिये भोजन त्याग चुकी है, कुछ नहीं निकला. ऐसे में मेरी समझ में तो बाबा से अच्छा कोई विकल्प नजर नहीं आता... वह भी तब जब कि सत्ता पर काबिज हो सकें तो..

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  2. आपकी बात तो सही है ये, थोडा करने से सब नहीं होता
    फिर भी इतना तो मैं कहूंगा ही, कुछ न करने से कुछ नहीं होता

    जो जितना दवाब डाल रहा है डालने दो न! कुछ तो बदलेगा!

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  3. आप कोई भी मांग सामने रखे, वह प्रैक्टीकल होना चाहीये! लोकपाल विधेयक जैसी मांग प्रैक्टीकल है, जो मानी जा सकती है।
    काले धन को विदेश से वापिस लाने की मांग व्यवहारिक नही है, सभी जानते है कि ये संभव नही है। किसी विदेशी बैंक से धन मांगने से पहले उसके पुख्ता प्रमाण देने होते है कि यह भारत का धन है और इसे ग़ैरक़ानूनी तरीके से विदेश मे जमा किया गया है। यह प्रमाण कहां से जुटाये जायेंगे ? विदेश मे पैसा जमा करता अपराध नही है यदि कर चुकाया गया हो। किसी भारतीय द्वारा विदेश मे कमाया गया धन विदेश मे रखा जा सकता है, इस पर भारत मे कोई टैक्स देय नही होता है।

    भारत अमरीका नही है जो स्विस सरकार पर दबाव डाल सके, भारत और स्विस सरकार के मध्य इतना व्यापार नही है कि आर्थिक दबाव डाला जाये।

    जो काला धन बाहर है उसपर ध्यान देने की बजाये जरूरत इस बात की है कि काला धन बाहर जाने से रोका जाये।

    छः वर्ष भाजपा सरकार सत्ता मे रही है, वह भी इस तथ्य को जानती है। बोफोर्स मामले की बदौलत सत्ता मे आये वीपी सिंह और उसके पश्चात भाजपा सरकार ने बोफोर्स मामले क्या कर लिया था ?

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  4. जब जनता की सेवा करने के नाम पर लाखों करोड़ खाये उड़ाये जा रहे हैं तो कोई इसी नाम पर अगर खाना छोड़ रहा है, ऐसी स्थिति में हम तो अपनी शुभकामनायें उनके साथ रखना चाहेंगे।

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  5. आदर्श या बेहतर स्थितियां के लिए कल्‍पना हो, विचार या प्रयास, स्‍वागतेय होना चाहिए.

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  6. ऐसे प्रयासों से बहुत ज्यादा आशावादी मैं भी नहीं, लेकिन अच्छे काम के लिये की जा रही पहल को पंक्चर करने की अपेक्षा उसके लिये शुभेच्छा ही करेंगे।
    और सिर्फ़ प्रकृति की देन होने के चलते भेड़िये सहन किये जायें, ख्याल अपना अपना पसंद अपनी अपनी।
    आशीष जी के विचारानुसार मांग प्रैक्टीकल होनी चाहिये। देश की आजादी की मांग भी शायद तत्कालीन सरकार को प्रैक्टिकल लगी होगी और इसीलिये मांग रखते ही हमें आजादी सौंप दी गई होगी। काला धन और कमाये गये पैसे में भी शायद कुछ अंतर होता है। देश का पैसा अवैध तरीके से बाहर जाये, इस पर भी रोक लगनी चाहिये और जो बाहर गया है उसे वापिस भी लाया जाना चाहिये।
    वर्तमान मुहिम का विरोध न करना कहीं से भी भाजपा या किसी और राजनैतिक दल का समर्थन करना नहीं है।

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  7. (१)
    कृपया हेडलाइन देखें ... सुपर पवार ?
    क्या यह अजित / शरद और ललिता पवार की तर्ज़ पर लिखा गया है :)

    (२)
    अब टीपें ...
    इन दिनों बड़ी शाही / आलीशान / खर्चीली / वैभवपूर्ण / ग्लेमरस भूख हड़तालों का चलन हो गया है :)

    अब तो गरीब गुरबा को सत्याग्रह करने से पहले दस बार सोचना होगा कि उसका सत्याग्रह ,सत्याग्रह है भी कि नहीं :)

    गली नुक्कड़ चौक चौराहों में सत्याग्रह करने को तत्पर फ़ौज में से दूध के धुले कितने हैं :)

    कौन जाने इन चमत्कारों के निहित मंतव्य क्या हैं :)

    (३)
    टीप ...
    देश को ठोस राजनैतिक पहल की दरकार है ! सुगठित / लोकतांत्रिक राजनैतिक दलों की स्वस्थ प्रतिस्पर्धात्मक पहल ! करिश्मों के पीछे जुटी भीड़ से देश का भला नहीं होने वाला !

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  8. क्‍या बाबा का यह कदम सुपर पावर के स्‍थान पर और कुछ है? क्रांन्तियां एक दिन में नहीं हो जाती, इसके लिए बरसों लगते हैं। यदि आज कानूनों को बदलने की बात की जा रही है तो क्‍या गलत है? ऐसे तो हम विदेशों की दुहाई देते हैं कि वहाँ कानून ऐसे है और वैसे हैं जब हमारे यहाँ बदलने की बात की जाती है तब हम सत्ता के साथ खड़े हो जाते हैं।

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  9. संजय जी!

    आप काला धन वापिस लाने की बात कर रहे है! मान लेते है कि यह प्रैक्टीकल है ! अब उपाय बताये कि कैसे लाये ?
    १. प्रधानमंत्री लाल किले से घोषणा कर दे कि काला धन वापिस लाया जाएगा।
    २. संसद मे प्रस्ताव लाया जाए और पास किया जाए कि काला धन वापिस लाया जाएगा।(संसद मे कश्मीर के पाक अधिकृत और चीन अधिकृत भाग को वापिस लेने एक प्रस्ताव पास हो चुका है।)
    ३. स्वीटजरलैण्ड पर पैसा वापिस करने के लिए उसके साथ व्यापार बंद कर दो अर्थात आर्थिक दबाव! (कर दो, स्वीटजरलैण्ड भूखों नही मर जायेगा !)
    ४. स्वीटजरलैण्ड पर हमला कर दो!(पहले अपना घर और पड़ोस तो सम्हाल लो!)

    और कोई उपाय है ?

    ५. स्वीटजरलैण्ड को अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय मे ले जाओ। पहले प्रमाण तो जमा करो कि धन आपका है और गैरकानूनी तरीके से जमा किया गया है।

    देश की स्वतंत्रता प्रेक्टीकल(व्यवहारीक मांग) थी, अब अपनी देखभाल करने मे सक्षम थे। यहां धन विदेशी बैंको के पास है।

    देश भावनाओं से नही चलता है। काला धन वापिस लाने से पहले उसे बाहर जाने से तो रोको। पहले भ्रष्टाचार से तो निपटो!

    क्या लोकपाल बील ज्यादा जरूरी नही है?

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  10. काश बाबाजी देश को सुपर पवार बनवाने के लिए सत्याग्रह करते..........बाबा रामदेव जी द्वारा किये जा रहे प्रयास यदि सफल हो जाते हैं तो निश्चित है देश को एक सुपर पावर बनने से कोई नहीं रोक सकता है, और जब भारत एक सुपर बन जायेगा तब उसकी सारी मांगें मान ली जाएगी निसंदेह तब हम स्विस सरकार पर भी दबाव बनाने में सक्षम होंगे, लेकिन अन्ना हजारे या फिर बाबा राम देव जी के इस आन्दोलन में उस आम आदमी ( जो की भ्रष्टाचार, बेईमानी और असमानता का रोना रोता रहता है ) की भागीदारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, आपकी शंका निराधार नहीं है ऐसा में मानता हूँ, ( एलोपैथिक दवाइयां तेजी से अपना असर दिखाती हैं जबकि आयुर्वेदिक दवाइयां धीरे-धीरे अपना असर दिखाती हैं)भृष्टाचार के विरुद्ध अरब देशों की क्रांति और भारत में चल रहे आंदोलनों में शायद यही फर्क है, संक्षेप में कहूँ तो इलाज लम्बा चलेगा और बीमारी का जड़ से उन्मूलन होगा, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए,
    आमीन........................................

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  11. जब बाबू (प्रशासनिक सेवा) अपने मन की कर रहे हैं तो बाबा को भी अपने मन की कर लेने दो.... ये ठीक है की २-४ दिन के अनशन से कुछ भी नहीं होगा... पर सरकार पर एक दबाव तो बनता है... और अगर ये दबाव समूह न हो तो सरकार निरंकुश हो जाती है.... हो क्या जाती है ... और रही है.

    कोई भी तो नहीं रोक पा रहा ...

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  12. आशीष जी,
    आपका दूसरा कमेंट पढ़कर भी अच्छा लगा, वरना तो जरा सा मतभेद होते ही दूसरे की पिछली कई पुश्तों तक पहुंच जाने की स्वर्णिम परंपरा है ब्लॉगजगत में:)
    अब बात मुद्दे पर, मजे की बात ये है कि चित्त, पट और अंटे वाली प्रचलित कहावत के उलट अपन न तो ऐसे कार्यक्रमों के अंधाधुंध समर्थन में हैं और न विरोध में। अपनी समझ में जब ऐसे कार्यक्रमों को सब कुछ या कुछ भी नहीं मान लिया जाता, वह अखरता है। या तो हम ऐसे आशावान हो जाते हैं कि बस ये बिल या वो बिल पास हुआ और लक्ष्य हासिल हुये या ऐसे निराशावादी कि इन आंदोलनों, अनशनों से कुछ भी हासिल नहीं होना इसलिये ये व्यर्थ है। अपने मतानुसार जब तक कोई व्यक्तित्व सही दिशा में अग्रसर होता दिखे, तब तक अपने लिये श्रद्धेय है और जहाँ विचलन हुआ तो व्यक्तिपूजा से हमें भी चिढ़ है, इसीलिये शुभेच्छा\शुभकामना देने में पीछे नहीं हटते।
    रही बात आपके पांचों प्वाईंट्स की, सिर्फ़ लोकपाल बिल पास होने को इनमें से किसी भी पैमाने पर नापकर देख लीजिये, जवाब मिल जायेगा। जो कानून पहले से बने हैं, उनका ही सही पालन हो रहा है क्या? कागजों में कानून बनाकर हम आदर्श राज्य. आदर्श सरकार बनने का ड्रामा करते\देखते हैं और असलियत में ऐसे कानूनों की कैसे धज्जियाँ उड़ती हैं, कोई भी बता सकता है।
    लीजिये लोकपाल बिल के लिये भी शुभकामनायें दे देते हैं, आमीन:) कुछ तो अच्छा हो।

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  13. KHANKHAN POST PE TANATAN TIP........

    VICHARON KI PARTAL KE LIYE VIMARSH KE SAKARATMAK
    ROOP..........

    PRANAM.

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  14. देखिये आगे आगे होता है क्या ?

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  15. बाबा अपने को युगपुरुष साबित करने की चाह हर रास्ते टटोल चुके, अब एक यह भी...
    हो जाने दीजिये ! बाबा इतनी तैयारी से, इतने जोशो खरोश से आये हैं कि उन्हें एक या दो दिनों का अनशन तो करना ही पड़ेगा... उन्हें अपने प्रायोजकों को मुँह भी तो दिखाना है । वह सरकार से किस स्तर की और क्या बातचीत कर आये हैं, यह उनकी जयकारा लगाने वाले भी नहीं जानते । तुलनात्मक रूप से अन्ना हज़ारे अपने शुभ्र गृहस्थ वेष में अधिक त्यागी और सरल लगते हैं, बज़ाय भगवे वेष में करतबबाज बाबा श्री !
    भारतीय भीड़तँत्र का चरित्र लोकतँत्र से अधिक व्यक्तितँत्र को लेकर प्रतिबद्ध रहा है .. किसी को राजा नहीं फ़क़ीर है, देश की तकदीर की याद है... या वह स्मृति भी आरक्षण के कोटे में चली गयी है ?

    आशीष श्रीवास्तव की टिप्पणी को मेरा बिना शर्त समर्थन है :-)

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  16. आप के अन्य लेख मैने पढे, बहुत अच्छे लगे, अब बेटे की आंखे ठीक हो गई होंगी,
    बाकी काला धन, जो इन नेताओ ने जमा किया हे, एक दिन मे आ सकता हे, क्योकि उस धन की लिस्ट तो पहले ही आ चुकी हे, बाकी बाबा का दबाब जरुर इन चोर उच्च्को पर चलेगा,यह बाबा इन चोरो के गले की हड्डी बन चुका हे, हां अगर मै या आप ऎसा करते तो कोई असर नही पडता, लेकिन बाबा दुनिया भर मे प्रसिद्ध हे, ओर दुसरे बाबा( साधू) हे, देख लेना बाबा काम जरुर करवा लेगे,सारे नही तो एक दो तो जरुर, ओर आईंदा चोरो को भी डर रहेगा.
    धन्यवाद

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  17. देश इस समय जिन समस्याओं से जूझ रहा है,उनमें स्वामी रामदेव के उठाए मुद्दे प्रमुख हैं...आज हम स्वयं को स्वायत राज्य घोषित करते हैं,लेकिन हमारी नीतियाँ विदेशी ताकते तय कर रही हैं...सरकार मूक कठपुतली बनी हुई है। अब भ्रष्टाचार बर्दास्त के बाहर हो चुका है...अंग्रेजी तंत्र में गाँव का आम आदमी दब कर रह गया है। जरूरत है उस आखिरी आदमी के मुद्दों को उठाने की ...तभी सही मायने में सर्वोदय होगा। और ऐसी पहल यदि स्वामी रामदेव कर रहे हैं, तो हमें उनका समर्थन करना चाहिए।

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  18. देर से दे पाया मगर आपको हार्दिक शुभकामनायें !

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