मंगलवार, 21 सितंबर 2010

वो एक घंटा जब मैं अजीम प्रेमजी के समान था.

सुख दुःख, हानि लाभ सिर्फ हमारी मानसिक अवस्थाएं हैं. ये बात मुझे सैद्धांतिक  रूप में तो मालुम थी पर इसका वास्तविक अनुभव मुझे अब  हुआ. मैं सप्ताहांत  व्यतीत करने के  लिए अपने  ससुराल गया हुआ था. अचानक रविवार शाम चार बजे  बड़े भाई साहब ने मुझे फोन कर बताया कि मेरे  घर का पिछला दरवाजा खुला पड़ा है और मैं जल्दी से घर वापस लौट आऊं.  शुक्रवार शाम जब हम लोग घर से निकले थे उस वक्त मैंने खुद ही सभी दरवाजे बंद किये थे. मुझे लगा कि हमारे घर में चोरी हो गयी है. जब मैंने ये बात अपनी पत्नी को बताई तो उनके चेहरे कि हवाइयां ही उड़ गयी. वहां का माहौल एक  ही क्षण में बिलकुल बदल गया. मेरे सास ससुर के चेहरे कि भी रंगत बदल गयी. अभी तक जहाँ सब कुछ शांत था वही एक हलचल सी मच गयी.मैंने पत्नी से कहा कि मैं अकेला घर वापस लौट जाता हूँ और वहा पहुच कर हालात कि जानकारी उन्हें दे दूंगा पर पत्नी ने कहा कि वो भी साथ में वापस लौटेंगी. आनन फानन में पत्नी ने घर लौटने  कि तैयारी शुरू की पर साथ साथ उनका मुझे कोसना भी शुरू हो गया कि ये घर कि सुरक्षा का कोई ख्याल नहीं रखते हैं. सारा घर राम भरोसे रहता है. घर के किसी भी  खिड़की या जंगले पर कहीं भी ग्रिल नहीं लगी है.  चोरो को खुला निमंत्रण  दिया हुआ है और अब घर का दरवाजा भी खुला ही छोड़ आए. चोरों ने पूरा घर साफ कर दिया होगा. कहते थे मेरी मेहनत कि कमाई है कहीं नहीं जा सकती. अब सिर पकड़ कर रोना आदी आदी.

असल पत्नी का मुझे कोसना वाजिब भी था क्योंकि मैं वास्तव में लापरवाह किस्म का आदमी हूँ और पैसे यूँ ही खुले में रख देना, घर का दरवाजा बंद किये बिना ही कहीं भी चल देना जैसी लापरवाहियां  अक्सर  करता रहता हूँ और जब पत्नी टोकती है तो कह देता हूँ कि मेरी मेहनत कि कमाई है यूँ ही बर्बाद नहीं जा सकती. इसके अतिरिक्त मेरे घर में चोरों से सुरक्षा के वास्तव में कुछ भी इंतजामात नहीं हैं. असल में मुझे कभी लगा ही नहीं कि मेरे घर में कुछ ऐसा है कि कोई चोर उसे चुराने  कि गलती करेगा. वैसे भी आसपास सभी को पाता है कि सरकारी नौकरी करता है इसके घर पर क्या होगा. ये बात सही भी है सरकारी तन्खाव्ह इतनी कम नहीं होती है कि आपके तन पर कपडे ना हों और इतनी ज्यादा भी नहीं होती कि आपकी अलमारी भी कपड़ों से भरी पड़ी हो.

पत्नी का मुझे कोसना चल रहा था और मैं चुपचाप सुने जा रहा था. मैं भी सोच रहा था  कि मेरे घर में तो कोई था ही नहीं और दरवाजा खुला रह गया तो चोर आराम से घर कि एक एक चीज उठा ले गए होंगे. मेरा नया कंप्यूटर भी चला गया होगा. कंप्यूटर जाने कि बात मन में आते ही  पहली बार मेरे माथे पर चिंता कि लकीरें उभरी कि अब मैं ब्लॉग्गिंग कैसे करूँगा. 
   
मेरे माथे पर चिंता कि लकीरें उभरी ही थी कि दोबारा से भाई साहब का फोन आ गया कि घर पर सब कुछ सुरक्षित है उन्होंने सब अच्छी तरह से जाँच लिया है और कोई चोरी वगेरह नहीं हुई. चिंता कि कोई बात नहीं है, हम आराम से आ सकते हैं. उन्होंने पिछले दरवाजे पर ताला लगा दिया है. 

अब सब ओर शांति ही शांति छा गयी. अंतिम प्रवचन सासु माँ का हुआ कि अपने घर में सुरक्षा व्यवस्था में सुधार  कर लो और निर्णय लिया गया कि अब आराम से चाय पीकर घर वापस लौटेंगे. 

इस एक घंटे में ही मैं  एक छोटे-मोटे निम्न मध्यम वर्गीय भारतीय से बिलकुल लुटा-पिटा भारतीय और फिर वापस वही निम्न मध्यम वर्गीय भारतीय हो गया था.   

कुछ समय पहले अपने   अल्पसंख्यक अरबपति प्रजाति के  भाई अजीम प्रेमजी को भी ऐसा ही एहसास हुआ होगा जब वो भारत के सबसे अमीर आदमी से अचानक विश्व के सबसे अमीर आदमी बने और फिर कुछ ही वक्त में वापस अपनी जगह पर लौट आये. वो उच्च वर्गीय  है इसलिए उन्हें उच्चतम बनने का सपना आया और मैं निम्नवर्गीय हूँ इसलिए मुझे निम्नतम हो जाने  का सपना आया. समानता एक ही है कि हम दोनों को सपने ही आए. 

इस तरह जीवन में पहली बार मुझे इस बात का एहसास हुआ कि सुख दुःख हानि लाभ सिर्फ हमारी मानसिक अवस्थाएं हैं.

16 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लगा पढ़कर....समानता किसी भी तरह की हो सकती है और सुख-दु:ख हमारी मानसिक अवस्थाएं ही हैं..ठीक कही आपने

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  2. दिलचस्प वर्णन...अपना भी हाल आप जैसा ही है...लेकिन अब सावधानी बरतनी ही पड़ेगी...

    नीरज

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  3. आपने तो चोरों को इन्‍टरनेट पर भी बता दिया है कि आओ मेरे घर में सलाखे नहीं है। तुम बेखटके आओ क्‍योंकि मै लापरवाह किस्‍म का इंसान हूँ। अब बताइए आपने तो विज्ञापन ही दे दिया है। कैसे बनेंगे अजीम जी?

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  4. इस तरह की लापरवाही सिर्फ एक बार ही महँगी पड़ती है क्योकि उसके बाद आप दुबारा वो लापरवाही करने की हालत में नहीं होते है |

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  5. @ सुख दुःख हानि लाभ सिर्फ हमारी मानसिक अवस्थाएं हैं.

    सत्य वचन महाराज !

    बाकि अब तो ग्रिल लगवा ही लीजिये क्योंकि आपने उद्घाटित कर दिया है तो कोई तो पराक्रमी अपना प्रक्रम दिखायेगा ही :)

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  6. हा हा हा
    अजित जी की बातों से सहमत
    कहते हैं इंसान स्वप्न में अपनी ही स्रष्टि रच लेता है
    कुल मिला कर ब्रम्हा हो जाता है
    एक असमानता है आपके स्वप्न का इफेक्ट चेहरे पर हवाइयां उड़ा देता है
    घणों असर दार लेख छ या वालो भी [ मजो आयो या कहवो तो चोखो ना लागेगो ]

    @ये बात सही भी है सरकारी तन्खाव्ह इतनी कम नहीं होती है कि आपके तन पर कपडे ........

    ये सेंटेंस कैसा लगेगा ??

    ये बात सही भी है "इमानदारी से कमाई गयी" सरकारी तन्खाव्ह .....

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  7. चलो सब ठीक है ....आगे से ख्याल रखें !

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  8. ये भी पढ़ें
    यहाँ ऐसे ही एक मिनट की महिमा बताई गयी है
    http://redrose-vandana.blogspot.com/2010/09/blog-post_20.html

    सब कह रहे हैं "ग्रिल लगवा लीजिये" .. मैं भी क्यों चुकूँगा कहने से
    "ग्रिल लगवा लीजिये "

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  9. एक ब्लॉगर का लैपटॉप लेजाकर भी क्या करेगा बेचारा , सर धुनेगा । खैर इश्वर को प्रसाद तो आप चढायेंगे नहीं की चलो चोरी नहीं हुई। और ग्रिल आप लगवायेंगे नहीं, क्यूंकि सुपर-आलसी जो हैं। लेकिन इस पुरे प्रकरण में एक बात अच्छी हुई की हमें एक रोचक पोस्ट पढने को मिल गयी। --आभार।
    .

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  10. एक सरकारी नौकर तिसपर ब्लॉग्गिंग का फ़ितूर पालने वाला..उसके घर मिलेगा भी क्याः
    चंद तस्वीरेबुताँ चंद हसीनों के ख़तूत
    और आप्की पोस्ट से से तो इसके भी होने की गुंजायश भी कम है... लेकिन भैया ख़तरा हम जैसों को ही होता है, क्योंकि नहाने और निचोड़ने का प्रश्न है !!

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  11. वाह जी वाह एक साँस में पढ़ गयी आपका वाकया. हर सरकारी नौकर के घर घर की कहानी. जनि पहचानी अपनी सी लगी जैसे सब कुछ अपने ही घर में घट रहा हो

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  12. ओह ससुराल में सप्ताहांत की लक्जरी :)

    घर में इतने खुलेपन से चोर भी घबराते होंगे ! उन्हें ये ख्याल ज़रुर आता होगा कि मकान मालिक नें कहीं कोई चारा तो नहीं डाल रखा :)

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  13. हमारे एक स्टाफ़ सदस्य ने एक नई कालोनी में मकान बनवाया। शायद उस कालोनी में पहला आबाद मकान उन्हीं का था। जब उनसे ये पूछा गया कि डर नहीं लगता क्या? उनका जवाब कमोबेश यही था कि चोर पहले तो ये सोचेंगे कि अकेला इस वीराने में रह रहा है, होगा कोई टूटैत और कोई एडवांस सोच वाला हुआ तो ये सोचेगा कि बंदा वाकई दमदार है जो अकेले रहने से नहीं डरा।
    कोई नुकसान नहीं हुआ, बधाई हो। पार्टी शार्टी तो दे ही देना दोस्तों को, फ़ोलोवर्स को। अगले महीने रख लो, तारीख बता देना। अब प्यार से बुलाओगे तो आना तो पड़ेगा ही।

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  14. घर का पिछ्ला द्वार खुला जानकर,
    बहुत दिनों बाद,
    एक बार फिर आप समाधि अवस्था [शून्यावस्था] में चले गये होंगे.
    तब आपको एक मोडिफाई दोहा याद आया होगा :
    सात वर्ग अपवर्ग सुख,
    धरही तुला ............ जो सुख ......?

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  15. बेहद दिलचस्प वर्णन ,भैया हम तो यही कहेंगे की भाभी जी की बात ठीक है ,थोड़े इंतज़ाम वगैरह कराने में कोई नुकसान भी तो नहीं है

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  16. http://my2010ideas.blogspot.com/2010/09/blog-post_22.html?showComment=1285809420600#c4045327044613189450

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