शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

डेंगू क्या सच में एक बीमारी है?

पिछले वर्ष हमारी कालोनी में डेंगू एक महामारी के रूप में फैला. बहुत से लोग इसकी चपेट में आए जिनमे से मैं खुद भी एक था. अब मैं मेरे खुद व अपने मित्रों के अनुभव आपसे बाट रहा हूँ.


पिछले वर्ष मैं बहुत समय बाद बीमार पड़ा. करीब पांच या छः  दिन तक लगातार १०२ डिग्री से ऊपर ही बुखार रहा. सिर में तेज दर्द  भी था.  मैंने डाक्टर साहब कि सलाह ली तो उन्होंने मुझे खून में प्लेटलेट कि जाँच करवाने के लिए कहा. मैंने दिल्ली कि मशहूर प्रयोगशाला लाल पैथ से जाँच करवाई तो  तीन दिन में ही मेरे रक्त में प्लेटलेट्स संख्या  दो लाख से  कम होते होते ८ हजार तक आ गयी .  डाक्टर साहब ने फ़ौरन मुझे अस्पताल जाने कि सलाह दी और मैंने सरकारी आदमी होने कि वजह से  राम मनोहर लोहिया अस्पताल का रुख किया जहा पर मेरी सारी रिपोर्ट्स देखने के बाद आपातकालीन विभाग कि डाक्टर साहिबा ने बताया कि अगर मेरी प्लेटलेट्स सख्या ७००० से कम होती है और शरीर में कही से खून का स्राव होता है तभी  मुझे अस्पताल में भर्ती किया जायेगा. मुझे आराम व कुछ जरुरी सलाहों के साथ घर वापस भेज दिया गया. भाग्यवश अगले दिन से ही मेरी प्लेटलेट्स संख्या में इजाफा होने लगा और मैं स्वस्थ हो गया. इस दौरान मुझे कभी भी जरा सी कमजोरी या अन्य कोई और शिकायत नहीं थी. सिर्फ तेज बुखार और सिर दर्द ही हुआ करता था.


ऐसा ही मेरे मित्रों के साथ हुआ पर  उन्होंने कुछ बड़े प्राइवेट अस्पतालों कि ओर दौड़ लगाई जहाँ उन्हें सात आठ  दिन ICU  जिसे शायद सघन चिकित्सा  कक्ष कहते हैं, में रखा गया. उन बेचारों को जब उनकी  प्लेटलेट्स संख्या  ३५००० के अस पास पहुंची तो प्लेटलेट्स भी चढ़ाये गए . सभी लोग निजी अस्पतालों में  ७०-८० हजार से डेढ़ लाख रुपये अर्पित करने के बाद डेंगू रूपी बीमारी से मुक्त हो पाये. 


मेरे   एक मित्र हैं जगदम्बा प्रसाद श्रीवास्तव. उन्होंने भी पिछले वर्ष इन्हीं दिनों  अपनी पत्नी का इलाज नॉएडा के प्रसिद्द कैलाश हॉस्पिटल में करवाया. जब भाभी जी कि  प्लेटलेट्स संख्या ६०००० के आस पास थी तब उन्हें कैलाश हॉस्पिटल के  ICU में भर्ती कर लिया गया था. बाद में उन्हें भी प्लेटलेट्स का कोम्बो पेक चढ़ाने   कि आवश्यकता पड़ी जिसके लिए स्वस्थ रक्तदान करता ढूंढे गए. जगदम्बा जी कि जानकारी में जो पांच छः स्वस्थ युवक थे उन्हें बुलवाया गया और २०० रुपये के शुल्क के साथ उनका रक्त परीक्षण हुआ तो पता चला कि उन स्वस्थ युवकों के रक्त में भी आवश्यक प्लेटलेट्स संख्या पूरी नहीं थी. एक भाई के रक्त में  प्लेटलेट्स संख्या  तो शायद ६०००० थी जबकि वो एकदम स्वस्थ थे यानि कि उन्हें कोई बुखार सर्दी जुखाम या कोई अन्य प्रत्यक्ष बीमारी नहीं थी. बड़ी मुश्किल  से जगदम्बा प्रसाद जी ने दो ऐसे युवकों का इंतजाम किया जनके रक्त में आवश्यक प्लेटलेट्स संख्या विद्यमान थी.


इस वर्ष भी भाभी जी बीमार हैं पर  जगदम्बा प्रसाद जी उन्हें घर पर ही गिलोह के पत्तों का रस पिला रहे हैं ताकि उनके एक डेढ़ लाख रुपये बच सकें.


अपने खुद के और मित्रों के अनुभव से मेरे मन में डेंगू को लेकर कुछ प्रश्न उठे हैं .


१.  क्या डेंगू सच में एक खतनाक बीमारी है या सिर्फ media hype है ?


२.  क्या रक्त में प्लेटलेट्स संख्या बुखार के बिना भी कम हो सकती हैं ? यानि कि एक स्वस्थ व्यक्ति के रक्त में प्लेटलेट्स संख्या सामान्य से कम होने के बावजूद भी वो बिना किसी परेशानी के रह सकता है. अगर ऐसा है तो प्लेटलेट्स संख्या के लिए इतनी हाय तोबा क्या सिर्फ कुछ लोगों को फायदा पहुचाने के लिए है.


३.  कहते हैं कि डेंगू है या नहीं इसका पता जाँच के एक महीने बाद ही चल पाता है तो सिर्फ एक हफ्ते के बुखार के बाद ही डाक्टर लोग डेंगू है, डेंगू है का राग क्यों अलापने लगाते हैं ? सिर्फ लोगों को डराने के लिए.


४. सरकारी हॉस्पिटल वाले प्लेटलेट्स संख्या जब ७००० से नीचे पहुचती है और रक्त स्राव होता है तभी स्थिति को विकट मानते हैं जबकि निजी अस्पताल प्लेटलेट्स संख्या ६०-६५ हज़ार होने पर ही ICU में भर्ती कर लेते हैं और ३०-३५ हजार पर पहुचाने पर प्लेटलेट्स के कॉम्बो पेक चढ़ाने लगाते हैं. क्या सरकारी और निजी मापदंड अलग अलग है.


मैं नहीं जानता कि मैं सही हूँ या गलत पर मन में आम आदमी कि तहर से अक्सर चिकित्सा जगत कि इन विसंगतियों पर सवाल उठते रहते जिनका जवाब ढूंढ़ रहा हूँ.

12 टिप्‍पणियां:

  1. प्लेटलेट्स के बारे में तो कोई डाक्टर ही बता सकता है पर सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों के रवैये के बारे में कुछ कह सकती हु | सरकारी अस्पताल का सोचना ये होता है की जब तक केस बिल्कूल सीरियस ना हो जाये मरीज मरणासन अवस्था में ना पहुच जाये उसे भर्ती करने के लायक नहीं मानना चाहिए | और प्राइवेट अस्पतालों का रवैया ये होता है की यदि मरीज में १% भी भर्ती होने की संभावना है तो उसे तुरंत अपना ग्राहक बनाना चाहिए | चाहे डेंगू हो या मलेरिया कभी भी उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए मुंबई में अभी फैले मलेरिया में मेरे पड़ोस में तीन लोगों की मौत हो गई जिनको मै पहचानती थी बहुत दुख होता है क्योकि सभी ने इसे मामूली बुखार की तरह ले कर लापरवाही की | सो जान है तो जहान है ऐसे मामलों में तो खुद को लुटता हुआ देखने के अलावा हमारे पास और कोई विकल्प नहीं है |

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  2. पैथोलाजिकल चीजों के बारे में कुछ नहीं कह सकता लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि कुछ अस्पतालों में तो मरीज रेफर करने वाले झोलाछापों को बिल का चालीस प्रतिशत दिया जाता है..

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  3. Anshumalaji se bilkul sahmat hun! Dono tareeqe ke ravaiyye galat hain. Dengue me 104/105 kaa bukhar bhee ho sakta hai. Pathological baaten to mai nahee jaantee!Machhar ke katne se dengue hota hai,to gar Malaria beemaree hai to utnee hee dengue bhi ho sakti hai.

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  4. यह भी एक व्यवसाय है..फाईव स्टार हॉस्पिटलिटी (यह शब्द होटेल व्यवसाय के लिए प्रयुक्त होता है)...

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  5. अगर किसी की बीमारी मामूली हो और गलती से अस्पताल में भर्ती करा दिया हो तो वह शर्तिया गंभीर मुसीबत में पड़ जाएगा ! अगर बच गए तो सालों की कमाई वहां देकर ही जान छूटेगी !

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  6. मुझे भी डेंगू हुआ था तब मैं हौज़ खास स्थित फूलवती जैन अस्पताल में गया जहाँ मेरा इलाज मुफ़्त में हुआ सिर्फ़ ६० रुपये खर्च हुए जो प्लेटलेट्स जाँच के लिए लिया गया था. मेरे एक मित्र को डेंगू हुआ वो यहाँ के एक बड़े प्रायवेट हॉस्पिटल में गया जहा उसे करीब ३५००० रुपये खर्च करने पड़े.प्रायवेट हॉस्पिटल एक व्यवसाय है.

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  7. मेरा कमेंट पोस्ट से अलग संदर्भ में दिखे, तब भी झेल लेना।
    एन.डी.ए. सरकार के कार्यकाल के दौरान तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने पाठ्यक्रम में मंत्रोच्चार विधि द्वारा रोगोपचार का कोर्स शुरू करवाने का फ़ैसला लिया था। समाज के प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष और दूसरे धड़ों द्वारा इसका विरोध किया ही जाना था, विरोध हुआ। डी.एम.ए. की एक विज्ञप्ति मैंने अखबार में पढ़ी थी जिसमें यह बताया गया था कि डाक्टर्स के पास आने वाले मरीजों को 85% ऐसी बीमारियां होती हैं, जिनका विधिवत उपचार न भी किया जाये तो वे ठीक हो जाती हैं। उनका कहना ये था कि इस पिच्यासी प्रतिशत वाले वर्ग को यदि मंत्रोपचार के बाद आराम महसूस होगा तो उनमें अंधविश्वास बढ़ेगा, जबकि वे तो वैसे भी ठीक हो जाते भले ही कैसा भी इलाज न करवाया जाता। अब हम तो सबसे सहमत हो ही जाते हैं, इस तर्क से भी हो गये। वैसे भी ये ब्लॉग पर कही गई बात तो थी नहीं कि सुनवाई हो जाती।
    लेकिन सवाल ये है कि ये बात दिल्ली मैडिकल ऐसोसियेशन ने पहले क्यों नहीं प्रचारित प्रसारित की? आज तक कितनी बार ऐसा हुआ है कि किसी प्राईवेट प्रैक्टीशनर के पास आप गये हों, और उन डाक्टर साहब ने यह कहकर दवा देने से, इलाज करने से या फ़ीस लेने से मना कर दिया हो कि ये कोई बीमारी नहीं है, वैसे ही ठीक हो जायेंगे?
    मोटी सी बात ये है कि हाईप क्रियेट होगा, तभी कमाई होगी।

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  8. डेंगू एक बीमारी है , इसमें कोई शंका नहीं . इसका इलाज भी वक़्त और द्रव्य , फलों से १० दिन मैं अक्सर हो जाया करता है. मैंने सुना है प्लेटलेट्स संख्या २०००० से कम होने पे चिंता की बात हुआ करती है हाँ डॉ के नुर्सिंग होम, यह भी एक व्यवसाय है..क्या किया जाए. धन कमाने के नए नए रास्ते. वैसे ९०% डेंगू जान लेवा नहीं हुआ करता.

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  9. हम तो ये सोच कर आये थे कि आपने आलेख मे कोई फाइनल वर्डिक्ट दे ही दिया होगा पर यहाँ तो मामला सवाल पर अटका दिया आपने ! डेंगू एक जानलेवा बीमारी है कि नहीं पता नहीं पर बीमारियों का इलाज करने वालों की मनोव्रत्ति ज़रुर लाइलाज बीमारी लगी ...सरकारी अस्पताल की अलग और प्राइवेट की अलग !

    वैसे जब जान पे बन आये तो पैसे बचाकर क्या करना ?

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  10. बीमारी के नाम पर अस्पतालों की कमाई तो चलती ही रहती है, फिर चाहे वो बीमारी कोई सी भी हो।
    ..............
    यौन शोषण : सिर्फ पुरूष दोषी?
    क्या मल्लिका शेरावत की 'हिस्स' पर रोक लगनी चाहिए?

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  11. .

    डेंगू बुखार , डेंगू- वाइरस से होता है जो एडीज नामक मच्छर के काटने से फैलता है। इसके मुख्य लक्षण हैं - त्वचा में रैशेज़ , तेज़ बुखार, [७ दिन], पेट में दर्द , मितली आना, भूख न लगना , सर में दर्द, जोड़ों में तीव्र दर्द [इसे हड्डी-तोड़ बुखार ]- 'breakbone fever' भी कहते हैं।

    इस रोग में प्लेटलेट्स की संख्या बहुत कम हो जाती है । प्लेटलेट्स में उपस्थित प्रोटीन रक्त में थक्का जमाने का कार्य करते हैं। अतः प्लेटलेट्स की कमी होने के कारण खून जमने की प्रक्रिया न होने से बहुत रक्तस्राव हो जाता है। यह रक्तस्राव आँख, नाक, कान, आँख तथा त्वचा से भी हो सकता है।

    शरीर से फ्लुइड लॉस तथा रक्तस्राव अधिक हो जाने के कारण, रक्त चाप बहुत कम हो जाता है , जिसके कारण डेंगू-शौक -सिंड्रोम होता है तथा मरीज की मृत्यु होने की संभावना होती है।

    इसकी जांच तथा डैगनोसिस बनने में ४८ घंटे लग जाते हैं, तथा तकरीबन दो-हज़ार रूपए लगते हैं ।

    इससे बचने के लिए अभी तक कोई सुरक्षित वैक्सीन नहीं बनी है लेकिन वैज्ञानिक प्रयासरत हैं इस दिशा में ।

    उपचार--

    १- Oral re-hydration
    २- Platelet transfusion. [when platelet count drops below 20,000].
    ३- Avoid Aspirin and NSAID
    4- Paracetamol can be taken to check fever.
    5- Hospitalization for intravenous fluid supplementation.

    Do not take this disease lightly.

    .

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  12. डॉक्टर दिव्या ने अच्छी जानकारी दी है...आज कल कुछ एंटीवायरल भी दिए जाते है | और मरीज की गंभीर हालत में कई प्रकार के सिम्प्तोमेतिक इलाज भी दिया जाता है.. क्यूंकि में संव्यम भुग्तभोगी हूँ | और यूं समझिये कि ये मेरा दुसरा जन्म है - क्योंकि इंटरनल
    ब्लीडिंग से मल्टिपल ओर्गेन फैलीयोर हो गया था .. किसी भी बीमारी का समय रहते इलाज हो जाना चाहिए ..ना कि गंभीर होने पर ..अगर गंभीरावस्था में मरीज की जान को ना बचाया जा सका तो आप क्या कहियेगा - मरीज और अटेंडेंट की गलती या डाक्टर की गलती...

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