रविवार, 15 अगस्त 2010

प्रेम प्रदर्शन, पत्नी की शिकायत और मेरा नजरिया

प्रेम क्या है मैं आज तक नहीं समझ पाया. पत्नी कहती है की अगर मैं उन्हें अंग्रेजी में I love you कहता हूँ या फिर महीने में एक बार फिल्म दिखाने ले जाता हूँ या समय समय पर लाल गुलाब भेंट करता हूँ तो मैं उनसे प्यार करता हूँ अन्यथा नहीं.

पता नहीं क्यों प्यार के इस प्रदर्शन को मेरा दिल स्वीकार नहीं पाता. मुझे मेरे बहुत से  मित्रों ने समझया की प्यार होना ही काफी नहीं कुछ लोगों के लिए प्रेम का प्रदर्शन भी बहुत आवश्यक होता है. हमें अपना प्रेम दर्शना भी आना चाहिए. वैसे तो हमारा प्रेम हमारे क्रिया कलापों से प्रदर्शित हो ही जाता है. पर फिर भी हमें कभी कभार इसका प्रदर्शन करना ही चाहिए.

मैं इन बातों को रोमांस की श्रेणी में रखता हूँ और साफ़ स्वीकारता हूँ की मैं रोमांटिक नहीं हूँ.

मैं सच्चे प्यार और रोमांस को एक ही बात नहीं मानता. आप बिना सच्चे प्यार के भी रोमांस कर सकते हैं.  रोमांस करना एक आदत हो सकती है पर प्यार करना एक आदत नहीं होती. सच्चा प्यार किसी किसी से ही हो पाता है और जरुरी ही नहीं की उसे प्रदर्शित भी किया जा सके.

 मेरी माँ ने या मेरे पिता ने कभी भी अपने प्यार को शब्दों में प्रकट नहीं किया. उनके प्रेम की अभिव्यक्ति उनकी रोजमर्रा की बातों से ही हो जाती थी. मुझे इस तरह का प्रेम ही करना आता है जिसमे प्रेम करना ही महत्वपूर्ण है और उसका प्रदर्शन महत्वपूर्ण नहीं है.
 
मेरी इस बात  का मुझे यह उत्तर मिला की माता पिता और बच्चों का प्रेम कुछ और होता है और प्रेमी प्रेमिका या पति पत्नी का प्रेम कुछ और. ये बात भी मेरी समझ से परे है. मैं प्रेम को वर्गों में नहीं बाट पाता  की ये प्रेम माता पिता के लिए, ये प्रेम प्रेमिका के लिए, ये प्रेम भाई बहिनों  के लिए और  ये दोस्तों के लिए आदी आदी.  
 
 मेरे लिए प्रेम की भावना एक शाश्वत भावना है जो एक ही तरीके से हो सकता है . आप जिस से भी प्रेम करें उसे पूरी तरह से समर्पित होकर प्रेम करें. यही सच्चा प्रेम है. मुझे कभी नहीं लगता की अलग अलग लोगों के लिए किये गए प्रेम का अलग अलग महत्व होता है. अगर ऐसा है तो फिर वो भावना प्रेम नहीं कुछ और होगी. 
 
मैं जब समाज में देखता हूँ तो लगता है की आजकल प्रेम करो या ना करो पर उसका प्रदर्शन जरुर करो वाली मानसिकता चारों तरफ व्याप्त है.
 
कुछ लोगों के लिए ये प्रदर्शन का भाव इतना महवपूर्ण होता है की सच्चाई कहीं दूर उनके सीनों में दफ़न होती है. इसका एक ज्वलंत उदहारण अभी मुझे टीवी पर मिला जब मैं एक टीवी अभिनेत्री का उनके पुरुष मित्र (boy friend) वाला mms जो की समाचार चेनलों में प्रसारित हो रहा था देखा. उस mms में वो लड़की इतने विश्वसनीय  तरीके से अपने प्रेम का खुल्ला इजहार कर रही थी की कोई भी व्यक्ति किसी भी तरीके से उसकी बातों पर शक नहीं कर सकता था . पर  बाद में वही अदाकारा कहती है की वो सब बातें उससे जबरदस्ती बुलवाई या करवाई गयी थीं. मैं समझता हूँ की इससे बड़ी अदाकारी और कुछ नहीं हो सकती.

मैंने टीवी पर आ रही ये खबर अपनी पत्नी को दिखाई और पूछा की अगर मैं भी इन अभिनेत्री की तरह से अपने प्रेम का इतना ही विश्वसनीय प्रदर्शन करूँ पर वह वास्तविकता में एक अभिनय मात्र हो तो क्या फिर भी वो इस नकली अभिनय से संतुष्ट होंगी. उनका जवाब तो कुछ नहीं आया पर मैं समझता हूँ कुछ समय के लिए मुझे अनरोमांटिक होने के लिए कोसा नहीं जायेगा.

22 टिप्‍पणियां:

  1. अय हय...आप भी इस हकीर जैसे अन रोमांटिक निकले बीबी कहती है तुम तो ये भी नहीं कह सकते कि सब्जी अच्छी बनी है बस खाने में ना नुकुर नहीं करते तो ही समझ में आता है :)

    झूठ क्यों बोलें कहना तो चाहते हैं पर ससुरा मुंह से निकलता ही नहीं अब दिखावा / एक्टिंग अपने स्वभाव में नहीं हैं ना ! चिंता मत कीजिये ओरिजनल स्टाइल में बैटिंग करते रहिये कुछ ही दिनों में वे प्रेम के मौन को समझ लेंगी :)

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  2. यह दिखावे का युग है। अपना एक परिचित है, जो हर दस मिनट बाद हाईकमान को फ़ोन करके बहुत प्यार से अपनी पोज़ीशन बताता रहता है(हमेशा ही झूठी इन्फ़ार्मेशन) और हम, हमेशा से ही
    ’झूठ वाले कहीं के कहीं बढ़ गये,
    एक मैं था कि सच बोलता रह गया।’ पंक्तियों के चाहने वाले जाने क्या क्या इल्ज़ाम सर पर लेते रहते हैं और हंसते रहते हैं।
    अली साहब की राय जायज है, स्वाभाविक रूप में रहना सर्वोत्तम है।

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  3. नज़र अपनी अपनी ... हमने तो बचपन से अंग्रेज़ी भी हिन्दी में ही बोली है इसलिये जब गोरों की तरह बोलने का प्रयास करते हैं तो खुद को बनावटी लगता है। मगर जब अपने स्वाभाविक तरीके से बोलते हैं तो उन्हें बनावटी लगता है।

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  4. "मैं जब समाज में देखता हूँ तो लगता है की आजकल प्रेम करो या ना करो पर उसका प्रदर्शन जरुर करो वाली मानसिकता चारों तरफ व्याप्त है."

    सत्य वचन महाराज ...........आपसे १००% सहमत हूँ ! बाकी और क्या कहे हम खुद भी भुगत रहे है अपने इस 'अनरोमांटिक'पने को !

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  6. # प्रेम क्या है मैं आज तक नहीं समझ पाया.
    @ प्रेम का जब ह्रदय में आगमन होता है. तब सब 'अ आ इ ई' भूल जाते हैं. मतलब ज्ञान धरा रह जाता है. आप चाहे जितने भी संयमी हों, जड़ता लिये बैठे हों, साधक हों, सब व्यर्थ हो जाता है.

    # पता नहीं क्यों प्यार के इस प्रदर्शन को मेरा दिल स्वीकार नहीं पाता. मुझे मेरे बहुत से मित्रों ने समझया की प्यार होना ही काफी नहीं कुछ लोगों के लिए प्रेम का प्रदर्शन भी बहुत आवश्यक होता है. हमें अपना प्रेम दर्शना भी आना चाहिए. वैसे तो हमारा प्रेम हमारे क्रिया कलापों से प्रदर्शित हो ही जाता है. पर फिर भी हमें कभी कभार इसका प्रदर्शन करना ही चाहिए.
    @ जब उस प्रेम से आपकी पहचान हुवेगी तब केवल वही सूझेगा. इसके लिये अलग से प्रदर्शन का मंच नहीं लगाना पडेगा. यदि लगाया तो आपका प्रेम उदघाटित हो जाएगा और सभी के हँसी का कारण बनेगा.
    इस सन्दर्भ की एक कविता मेरे ब्लॉग पर अभी विद्यमान है जिसे प्रायः लोग न समझ में आने की शब्दावली कहकर पास नहीं आते. लिंक है : "प्रेम-आगमन"
    http://darshanprashan-pratul.blogspot.com/

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  7. प्रेम की नासमझी कभी-कभी तो समझदारी अक्‍सर मुश्किलें पैदा करती है.

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  8. bmtamboli.blogspot.com के पोस्‍ट देखना आपको पसंद आ सकता है.

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  9. — प्रेम एक खिंचाव है. एकदम बेडामूला त्रिकोण की तरह, जहाँ सभी शक्तियाँ अशक्त हो जाती हैं.

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  10. — प्रेम एक ब्लेक होल है. इसका निर्माण स्थूल प्रेम, वासना आदि के मृत होने पर होता है. जहाँ केवल आकर्षण बचता है और उसमें प्रवेश पाने वाले त्वरित गति से संचार करते हैं.

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  11. — प्रेम जब होता है तब किसी और भाव के लिये ह्रदय में स्थान ही नहीं बचता. सभी भाव नदारद हो जाते हैं. यह है ही इतना व्यापक, वृहत स्थान घेरने वाला.

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  12. — प्रकृति का हर एक कोना, सृष्टि का रोम-रोम प्रिय लगने लगता है. परन्तु इसके प्रदर्शन के लिये मंच नहीं लगाना पड़ता. यह हमारे क्रियाकलापों और मुखमंडल के मंच पर स्वतः नर्तन करता है.

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  13. — अधिक टिप्पणियों की कला मैंने आपसे ही सीखी और पहली बार इसका आनंद ले रहा हूँ. अपनी बात निबंध में क्या कहनी, उसे हिस्सों में बाँट कर कहने पर वह पठनीय हो जाती है. बोधगम्य भी.

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  14. प्रेम सबके लिये अलग-अलग नहीं होता, लेकिन इसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग हो सकती है। जो प्रेम शादी के शुरु के वर्षों में अलग तरीके से अभिवयक्त किया जाता है, दो बच्चे होने के बाद उस अभिव्यक्ति का तरीका खुद-ब-खुद बदल जाता है।

    बाहर तो दुनिया/समाज के अनुरुप अभिनय करना जरुरी हो जाता है। होशपूर्वक अभिनय भी करते रहें तो खुद को जानने में मदद मिलती है।

    प्रणाम स्वीकार करें

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  15. दीप जी , अपने जो हरियाणा के परसिद्ध हास्य कवी है उनकी एक पुरानी बात याद आ गई आपका लेख पढ़कर ! उनसे किसी ने पुछा था कि पश्चिमी सभ्यता वाले इतनी जल्दी तलाक क्यों ले लेते है तो उनका सिंपल सा जबाब था कि ये अंग्रेज लोग सुबह से शाम तक जितनी बार बाहर-भीतर आते जाते है पति-पत्नी उतनी ही बार एक दुसरे को "किस" करते है, आई लव यू बोलते है, अत: ऐसा करते-करते उनका "लव स्टॉक" भी जल्दी ख़त्म हो जाता है, इसलिए तलाक हो जाता है !

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  16. लेख पढ़ कर ये तो तय है की आपका प्रेम विवाह नहीं है ये समस्या आप की अकेली नहीं है भारत में होने वाले सभी अरेंज मैरिजो में यही होता है जिसे आप पत्नी के लिए प्रेम कह रहे है असल में वो सिर्फ उनसे लगाव है प्रेम नहीं | जब मन में किसी के लिए प्रेम होता है तो हमें किसी बनावट की किसी प्रयास की जरुरत नहीं पड़ती है वह खुद ब खुद बिना किसी डर के अपने आप उसके सामने प्रदर्शित हो जाता है जिसे आप प्रेम करते है उस प्रदर्शन को आप चाह कर भी रोक नहीं सकते है | जैसे अपने छोटे बच्चे को हम तेज से खिलखिलाता देख कर या उसके मुख से पहली बार माँ या पापा सुनकर उसे बाहों में भर लेते है या चूम लेते है क्या ऐसा करने के लिए हमें किसी प्रयास की जरुरत पड़ती है क्यों हम बच्चे से घंटो बाते करते है जो उसे समझ नहीं आती उसे गोद में लेकर खिलाते है बड़े होने पर बाहर ले जाकर घुमाते है इस प्रेम का प्रदर्शन क्यों | रहने दे बच्चे को युही पालने में पड़ा उसके लिए कपडे खिलौने ला दे या उसकी भी आवश्यकता नहीं है बस पैसे दे दे पत्नी को लाने के लिए बहुत है वो समझ जायेगा की आप उससे प्यार करते है |

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  17. भारतीय पतियों का ये डायलॉग पत्नियों के लिए काफी आम है की मै तुमसे प्यार तो करता हु अब कहने की क्या जरुरत है मेरी रोज की बातो से तुम महसूस कर सकती हो | अब पत्नी किन बातो से समझे पति आफिस से घर आकर या तो टीवी देखने में बीजी हो जाता है या गाली के नुक्कड़ पर चला जाता है दोस्तों के पास या एकांत के लिए छत पर या दुसरे कमरे में चला जाता है या फिर ब्लोगिंग में लग जाता है उसे कभी कोई साड़ी या एक फुल भी ना दे और जब वो खुद अपने लिए ख़रीदे तो कहा जाये की मॉल में पैसे उड़ा रही हो मायके जाने पर पत्नी की याद तब आये जब खाने पहनने की परेशानी हो पत्नी मायके हो तो खुद फिल्म देखा आये और जवाब दे की खाली था क्या करता तुम तो थी नहीं और पत्नी घर पर हो फिल्म देखना फिजूलखर्ची बेकार का प्रेम प्रदर्शन अब बताईये की किस बात में पत्नी के प्रति प्रेम झलक रहा है | आप घर पर हो क्या मजाल की पत्नी किसी सहेली के पास सिर्फ बाते करने चली जाये या एकांत ढूंढे काम ख़त्म होते है सीधे पति के पास आकर बैठ जाती है भले पति किसी और काम में लगा हो बाजार जाने से पहले हमेशा पुचाती है की क्या तुमको भी कुछ चाहिए कई बार टी उन्हें पुचने की भी जरुरत नहीं पड़ती आपके जरुरत का समान ख़त्म होने से पहले ही घर में हाजिर होता है | पहले आपकी बच्चो की जरूरते पूरी होती है फिर वो अपनी जरुरत पूरी करती है ( अपवाद हर जगह होते है )|

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  18. जब आप पत्नी से प्यार करते है तो घर आने के बाद पुरा समय उसे देते है रास्ते चलते अचानक आपकी नजर रास्ते पर टंगी किसी अच्छे से कपडे पर चली जाती है और आप या तो उसे घर ले कर आते है या आते ही पत्नी को उसके बारे में बताते है रास्ते में जब कोई बच्चा आपके पास फूलो का गुच्छा ला कर खड़ा होता है तो आप सोचते है की ले लेता हु उसे दूंगा तो वह खुश हो जाएगी | विश्वास मानिये ये सब कुछ अपने आप होता है इसके लिए आपको बहुत रोमांटिक होने की जरुरत नहीं पड़ती है |

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  19. मुझे तो लगता है की अरेंज मैरिज में ही प्रेम के प्रदर्शन की जरुरत ज्यादा है ( यदि एक दुसरे से प्रेम है तो ) नहीं तो दोनों को पता कैसे लगेगा की सामने वाला आप से प्यार करता है वो तो यही समझेंगे की घर वालो ने शादी कर दी है सो निभाया जा रहा है | और प्यार का प्रदर्शन तो उसी भाषा में करनी चाहिए जो सामने वाले को समझ में आये |

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  21. सागर खायामी साहब का कहना है कि
    इश्क है तो इश्क का इज़हार होना चाहिए
    आपको चहरे से भी बीमार होना चाहिए.

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  22. प्रेम का इज़हार और इसके इज़हार करने के तरीके आज स्व-स्फूर्त नहीं बल्कि मार्केटिंग से प्रभावित हो गए हैं ...प्रेम हो या न हो पर बाजारवाद ने जैसे दूसरी चीजों को विज्ञापन के माध्यम से बेच डालने की मुहीम चला रखी है, उसी प्रकार आपकी प्रेमिका भी आपके प्रेम का विज्ञापन चाहती/चाहता है, यह अलग बात है कि कोई अंदर से प्रेम करे या न करे ।

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