शनिवार, 7 अगस्त 2010

नक्कटों का गाँव.

दसवीं कक्षा में हमारे इतिहास के एक गुरूजी थे सोहन लाल जी. उनके लिए इतिहास का मतलब कथा कहानियों से होता था. पाठ्यक्रम के इतिहास कि जगह  वो आपने खुद के इतिहास का वर्णन करने में ज्यादा रूचि  लेते थे.

उन्होंने एक बार एक कथा सुनाई थी  "नक्कटों का गाँव".

कथा के अनुसार एक गाँव में एक शरारती लड़का रहता था. एक बार किसी शरारत के समय उसकी नाक कट गयी. अब सारे गाँव के लोग उसे नक्कटा कह कर बार बार चिढाते.
बच्चा शरारती था. थोड़े दिनों के बाद उसने आपने आस पास के लोगों को बरगलाना शुरू किया कि  नाक कटाने के बाद उसे तरह तरह कि शक्तियां प्राप्त हो गयी हैं. उसने लोगों को अपनी बातों के जाल में फंसा  कर धीरे धीरे गाँव के सभी लोगों को आपने जैसा नक्कटा बनवा दिया.

जब गाँव में सभी कि नाक कट गयी तो उसे चिढाने वाला कोई ना रहा. 

कहने का मतलब ये कि नाक वाले लोगों के बीच एक नक्कटे का जीना हराम था तो उसने सभी को नक्कटा बनवा दिया

पर  अगर बात इसकी उलटी हो तो?

यानि कि गाँव ही  नक्कटों का हो और उनमे एक नाक वाला आ जाए तो क्या वो सबकी नाक ठीक करवा पायेगा.

इस स्थिति में क्या होगा?  या तो उस नाक वाले को नक्काटों के बीच से भागना पड़ेगा या फिर खुद कि नाक कटवानी  पड़ेगी .

मेरी इस कहानी का कोई दूसरा  अर्थ ना लें.

मेरे मन में ये सारी बातें हमारे ही मध्य के एक ब्लॉग हथकढ़ को पढ़ते पढ़ते आयी. असल में हथकढ़ ऐसा पहला ब्लॉग था जिसमे मैंने टिप्पणी वाला ऑप्शन हमेशा बंद देखा.

जहाँ सारा ब्लॉग जगत टिप्पणी के लिए मरा जाता हैं इस भाई को टिप्पणी कि कोई तलब लगती ही नहीं.

कमाल है.

हथकढ़ भैया इस गाँव में तुम अकेले हो. क्या करोगे? अरविन्द मिश्रा जी  कि तरह से बच कर भागोगे या टिप्पणी का आप्शन चालू करोगे.

वैसे ये नक्कटा अपना प्रयास नहीं छोड़ेगा.  ध्यान रखना. 

12 टिप्‍पणियां:

  1. @विचारशून्य जी

    ज़रा इस " हथकढ़ " नामक ब्लॉग का लिंक भी उपलब्ध करा देते तो मैं भी इस ब्लॉग से रु-ब-रू हो जाता

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  2. दीप,
    टिप्पणी ऑप्शन खुला रखना या बंद रखना, मॉडरेशन करना या न करना एक व्यक्तिगत फ़ैसला है, और इस बारे में फ़ुरसतिया जी ने भी ’हथकढ़’ ब्लॉग मालिक से बात की थी और अपनी एक पोस्ट में इसका जिक्र भी किया था। वैसे ’हथकढ़’ भाई का शायद चौथा या पांचवां फ़ॉलोअर मैं बना था, लिखने का अंदाज बहुत पसंद आया था मुझे।
    अपने को तो राजस्थानी भाई अकेला नाक वाला लगा है।
    मन से तो अपन भी चाहते हैं कि उनके यहां टिप्पणी ऑप्शन हो ताकि वाह-वाह या आह-ओह जाहिर भी कर सकें, लेकिन फ़िर वही बात, कि मर्जी मालकां दी।
    तुम भी भाई करते रहो सर्वेलेंस।

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  3. मेरी पिछली पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए गिरिजेश जी से इस विषय में चर्चा हुई थी सोच रहा था कि इस विषय पर लिखूंगा कभी ,आज आप लिख बैठे !

    यह अपेक्षा कि पाठक आपको पढ़े तो , पर चुप रहे ! ये बड़ा ही असहज विचार है जो प्रतिक्रिया नहीं लेने के लेखक के निज अधिकार की पुष्टि के साथ ही पाठक की अभिव्यक्ति का गला भी घोंट देता है !

    स्वान्तः सुखाय लिखने वालों की नहीं कहता पर जिन लेखकों को पाठकों की दरकार है उन्हें पाठकों की अभिव्यक्ति का सम्मान करना ही चाहिए !

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  4. Ali sahab se sahmat hun.Jab ham apne wichar baatte hain to phir wo ektarfa kyon ho?Len den honi chahiye,hai na?Koyi tippanee na kare wo uski marzi par option hee na ho ye baat samajhme nahi aayi!

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  5. कथा के बहाने बात को समझाने का बढिया प्रयास किया है !!

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  6. महक भाई आप जो ब्लॉग मैं फोलो करता हूँ उस लिस्ट में देख लें वहां आपको हथकढ़ का लिंक मिल जायेगा.

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  7. चलिए पहले वहाँ से घूम घाम कर लौटता हूँ..

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  8. आपकी ये नकटा कथा..हिन्दी ब्लागिंग के कईं पक्षों पर एकसमान रूप से लागू हो रही है...

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  9. हमारी नजर में आया ही नहीं वो ब्लॉग...जहाँ टिप्पणी का ऑप्शन न हो वो भला हमारे किस काम का..हा हा!! :)

    वैसे यह कथा तो जाने कहाँ कहाँ लागू होती है...किस किस संदर्भ में. बढ़िया.

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  10. Mujhe to lagta hai Pandey ji ki ab ye nakkaton kee samasyaa desh mein vikraal roop dhaaran karne lagee hai. Bhagvaan bachaaye in katwo se :)

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  11. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

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