शनिवार, 4 मई 2013

समलैंगिकता की चीड़फाड़


लगभग डेढ़ वर्ष से मैं भारत भ्रमण पर हूँ। पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण लगभग पूरा भारत नाप चूका हूँ। अपने इस भ्रमण के दौरान पुरे भारत में मुझे जो दो चीजें लगभग सभी जगहे दिखाई पड़ी वो हैं खाने में दक्षिण भारतीय सांभर डोसा और इंसानों में समलैंगिक जोड़े। डोसे का स्वाद मैंने सभी जगहों पर लिया और समलैंगिक जोड़ो को अभी तक सिर्फ निहारा। 

अभी पिछले हफ्ते चंडीगड़ में था। इस बार एक समलैंगिक से मुलाकात/बातचीत हो ही गयी जो अपने पार्टनर के साथ संयोग से गेस्ट हॉउस में मेरे बगल के कमरे में ठहरा हुआ था। समलैंगिकता को लेकर कुछ प्रश्न मेरे मन में हमेशा रहे हैं जो मैंने उस जीव के सामने रखे पर अफ़सोस वो "कच्चा खिलाडी" था। वो इस खेल के क्रियात्मक पक्ष से ही जुड़ा था। सिद्धांत रूप में उसने कभी भी इस "कला" की चीड़फाड़ नहीं की थी।

जब भी मैं स्त्री पुरुष के शारीरिक संबंधों पर विचार करता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है की इन संबंधो में भी एक पक्ष घनात्मक होता है और दूसरा ऋणात्मक। एक यिन होता है तो दूसरा येंग, एक ठंडा होता है तो दूसरा गरम, एक तलवार होता है तो दूसरा उसकी म्यान। ऐसा शारीरिक रूप से हो या मानसिक रूप से पर ऐसा होता जरुर है तभी आनंद की बत्ती जलती है वर्ना नहीं।  ऐसा इसलिए क्योंकि अगर दोनों ही घनात्मक होंगे तो प्यार की बत्ती नहीं जलेगी बल्कि शार्ट सर्किट हो जायेगा । आप ही सोचिये ना अगर दोनों ही तलवार वाले होंगे तो आनंद नहीं होगा सिर्फ युद्ध ही होगा। 

अपनी इसी सोच के साथ जब मैं किसी समलैंगिक जोड़े पर विचार करता हूँ तो मुझे जोड़े के उस व्यक्ति की मानसिकता समझ नहीं आती जो अपने सामान लिंग वाले पार्टनर में विपरीत लिंगी गुण खोज रहा होता है।  

मैं इस बात में पूरी तरह विश्वास रखता हूँ की कभी कभी कुछ मामलों में प्रकृति से भी गलती हो जाती है और वो एक पुरुष के शरीर में स्त्री को और स्त्री के शरीर में पुरुष को भूल से बांध देती है। ऐसे  पुरुष शरीर में फंसी स्त्री तो तो पुरुष की तरफ ही आकर्षित होगी और स्त्री शरीर में फंसा पुरुष स्त्री की ओर ही आकर्षित होगा। 

इसमें मुझे कोई लोच नज़र नहीं आता। मुझे समलैंगिकों के दुसरे वाले साथी की मानसिकता समझने में कठिनाई होती है।जो स्त्री पुरुष शरीर में फंसी है उसे पुरुष साथी पसंद आएंगे पर उसका साथी क्यों एक अधूरी अपूर्ण स्त्री को पसंद कर रहा है ये बात मुझे समझ नहीं आती। ऐसे  ही लेस्बियन जोड़े भी स्त्री शरीर में फंसा पुरुष तो स्त्री की और आकर्षित होगा पर जो मानसिक और शारीरिक रूप से स्त्री ही है वो एक अधूरे अपूर्ण पुरुष की और क्यों आकर्षित हो जाती है ये समझ नहीं आता।

अब अपने मन के इस प्रश्न को हिन्दीब्लोग जगत में इस आशा के साथ उछाल रहा हूँ की शायद कोई "पक्का खिलाडी" इधर भी हो जो इसे सुलझा दे ........... 


   

63 टिप्‍पणियां:


  1. कुछ कुदरत की माया है , कुछ इंसानी
    देख पतन मानव का, काहे की हैरानी।

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    1. मुझे हैरानी इस पतन को सामाजिक स्वीकृत दिलवाने के प्रयास पर है

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    2. डाक्टर साहब,
      मैं व्यक्तिगत रूप से इसका समर्थन नहीं करता पर ...

      पतन काहे कहते हैं आप इसे, भाई दीपचन्द्र पाण्डेय जी भले ही आज घूम घूम कर इसका पर्यवेक्षण कर रहे हैं पर इतिहास का कौन सा पन्ना इस तर्ज के सेक्स से खाली है / या रहा होगा ?

      सोचता हूं कि हस्तमैथुन कौन से लिंगीय वर्ग (खाने)में डाला जाएगा ? ...और जब डाक्टर्स, विपरीत लिंग के अभाव वाले इस यौन व्यवहार को अनुचित नहीं कहते तो फिर आप किस वास्ते समलैंगिकता को मानव का पतन मान रहे हैं ?

      क्या विषम लिंगीय युगल के रूप में पति एवं पत्नि इस मिथुनाचरण से सदैव असम्पृक्त रहते बने होंगे ? ...और तब इसे किस तरह का पतन कहा जायेगा ?

      सहज यौन व्यवहार में अपनी रूचि / अपना चयन और अपनी नैसर्गिकता के अनुरूप तुष्टि के विकल्पों में ऊंच नीच का दावा कैसा ?

      आचार्य अरविन्द जी और आपको इस विषय (सेक्स) का विशेषज्ञ मानकर ही ये सवाल उठाये हैं , यदि नादानी /मासूमियत वश मुझसे कोई भूल हुई हो तो अग्रिम खेदप्रकाश !

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    3. अली साहब शिखंडी सरीखे लोग तो हर युग में रहे हैं उनका समलिंगियों के प्रति आकर्षण तो समझ आता है पर मुझे उनके सहयोगियों का खुद को समलैंगिक घोषित करना मुझे समझ नहीं आता।

      हस्तमैथुन यदि विपरीत लिंगी को याद करके किया जाया तो समझ आता है पर मुझे नहीं लगता की कोई अपने सामान लिंगी को ध्यान में रखकर इस प्रकार आनंद लेता होगा। पति पत्नी का इस प्रकार का मिथुनाचरण उनके प्रयोगधर्मी होने और ये दिल मांगे मोर की भावना रखने का परिचायक है। लेकिन जब कोई पुरुष ये कहता है की उसे सिर्फ एक पुरुष के साथ ही यौन सम्बन्ध रखने में आनंद आता है तो मुझे समझ नहीं आता। इसलिए मुझे लगता है की समलैंगिकता प्राकृतिक नहीं बल्कि एक मानसिक बीमारी है जो आधे समलैंगिकों को तो है ही ।

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    4. हां वही, प्रयोगधर्मिता की भावना से आगे बढ़कर 'ये दिल मांगे मोर' तक ही खुद को सीमित रखने वाले जियालों की तरफ इशारा था अपना :) यानि एक सीमा रेखा /निश्चित डगर से आगे बढ़कर :)

      कौन किसका आभास करके यौन व्यवहार/हस्तमैथुन करता है यह बताना कठिन है! विपरीत लिंगियों की ओर अधिक आभासी झुकाव तो हो सकता है पर समलिंगियों को शून्य कैसे मान लें :)

      प्राकृतिकता का निर्धारण एक गूढ़ विषय है सो इस पर फिलहाल टिप्पणी नहीं :)

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  2. समलैंगिकता एक सामाजिकजैवीय हकीकत है -शायद ही कोई होगा जो ऐसे अनुभव से न गुजरा हो -पारस्परिक रोल कोई भी हो !
    फेसबुक आजकल इनका फेवरिट ऐशगाह है -मुझे भी फोन आते रहते हैं -मैं कभी झिड़क देता था ऐसे लोगों को मगर उत्तरोत्तर अध्ययन ने यह समझ विकसित की है कि वे प्राकृतिक परिहास के परिणाम हैं बिचारे जिनमें लैंगिक अभिव्यक्ति उलट पलट गयी है! मुझे ऐसे लोगों से सहानुभूति है. और ये सामजिक सहानुभूति और मनोवैज्ञानिक/ सर्जिकल /सेक्स चेंज उपचार के पात्र हैं!
    सम लैंगिकता का प्रतिशत भारत में भी अच्छा ख़ासा है !

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    1. असली कम हैं। आजकल बाज़ार में फेक वस्तुओं का ज्यादा बोलबाला है।

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    2. मिश्र जी मुझे लगता नहीं की लगभग सभी इस को भोग चुके हैं। जो लोग खुद को समलैंगिक घोषित कर चुके है उनको छोड़कर अगर कुछ को जबरिया इस सब में शामिल होना पड़ा हो तो उनका प्रतिशत मेरे हिसाब से बहुत कम होगा।

      वैसे मुझे पता है की ये समलैंगिक डार्क और हृष्ट पुष्ट मर्दाना लोगों को फोन करना ज्यादा पसंद करते हैं।

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  3. आज की ब्लॉग बुलेटिन एक की ख़ुशी से दूसरा परेशान - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. aap ka vishy thoda alaga hai fir bhi ye do post padhe pahali shikha ji ki hai us par kafi vimarsh hai dusari ghughuti ji ne usake uttar me likhi thi
    http://shikhakriti.blogspot.in/2012/07/blog-post_11.html
    http://ghughutibasuti.blogspot.in/2012/07/blog-post_8683.html

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    1. अंशुमाला जी आपके दिए लिंक मेरी जिज्ञासा को शांत नहीं करते। इन दोनों पोस्टों में समलैंगिकता से उत्पन्न विषमताओं पर विमर्श हुआ है पर मैं तो अभी इस मानसिकता को ही ढंग से समझना चाहता हूँ। मुझे लगता है समलैंगिकता वास्तव में एक मानसिक बीमारी ही है जो कम से कम आधे समलैगिकों को है जो अपने समलिंगियों में विपरीत लिंगी गुणों को खोजते फिरते हैं

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  5. शिखा जी की पोस्ट पर दी गई टिप्पणी का अंश यहाँ भी दे रही हूँ ।
    संभव है की सामान लिंगी एक दूसरे के प्यार , भावनाओ , इच्छाओ और जरूरतों को ज्यादा अच्छे से समझते है इसलिए ही ये रिश्ता बन जाता है |

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    1. मुझे लगता है समलैंगिक शारीरक रिश्ते कायम करने के लिए प्यार करते हैं प्यार के लिए रिश्ते नहीं बनाते

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    2. प्रेम इस दुनिया में नहीं है ये आप ने पहले ही कह दिया है यदि कुछ है तो स्वार्थ , आन्नद और मजा , सो इस नजरिये से आप ने बस और बस शारीरक रिश्तो की ही बात कही है | आप इन रिश्तो में भी बात बस उनकी कर रहे है जो सामान्य हो कर भी इन रिश्तो में जाते है , कही एक ब्लॉग पर एक गाली पढ़ी थी बड़ी अजीब सी "रगड़ की पैदाइश" तो बस समझ लीजिये की कुछ लोगो को मात्र एक शरीर चाहिए चाहे वो किसी बच्ची का हो वृद्ध का हो या खुद का ...या किसी पुरुष का उन्हें इससे क्या फर्क पडेगा जो आसानी से उपलब्ध हो उनके लिए यही सही है , आप को ये विकृत लगेगा , तो फिर बहुत कुछ है जो विकृत है किन्तु वो आप के लिए ज्यादा मजे की खोज होगी , वात्सायन का काम सूत्र होगा, आदि आदि पर बहुतो के लिए वो भी एक विकृति ही होगी | सो नजरिया अपना अपना सोच अपने अपनी और जरुरत के आगे नतमस्तक होते अलग अलग लोग |

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    3. अंशुमाला जी आपकी ये टिपण्णी कुछ हटकर है। लगता है समझने के लिए अगला जन्म स्त्री रूप में ही लेना होगा :-))

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    4. लीजिये जी आप को इसमे स्त्री का कौन सा पक्ष नजर आ गया पूरी की पूरी टिप्पणी पुरुषो की सोच के बारे में है , चाहे वो गाली वाली बात हो या विकृति वाली सभी यही पुरुष ब्लागरो के ब्लॉग से पाया गया ज्ञान है , इन विषयों में बोलने का एकाधिकार हमारे देश में बस और बस पुरुष ही रखते है , महिलाए या तो इस बारे में सोचती नहीं और सोच भी लिया तो बोलती नहीं , यदि बोला तो पुरुष समाज की उंगली सीधे उनके चरित्र पर उठ जाती है , वो अश्लील हो जाती है ब्लोग अश्लील हो जाता है और बहुत बवाल हो जाता है समजा का पतन हो जाता है आप को वंदना जी की कविता और उस पर हुआ बवाल याद होगा , सो इस विषय में तो आप पुरुष रह कर ही अच्छे से समझ जान सोच बोल सकते है स्त्री बने तो आप और आप का ब्लॉग ही अश्लील घोषित हो जाएगा :)

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. इसे एक मानसिक विकृति ही कहा जा सकता है जो कामाग्नि को शांत करने के लिए कोई भी उपाय ढूढ़ निकालते हैं.

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  8. रश्मि रविजा ने भी इस विषय पर एक पोस्ट लिखी थी दिसंबर 2010 में और वहाँ भी काफी विमर्श हुआ था
    ये रहा लिंक
    http://rashmiravija.blogspot.in/2010/12/blog-post_12.html

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  9. इसपर इटली वाले डॉ. सुनील दीपक जी ने अपने ब्लौग "जो न कह सके" में कई लेख लिखे हैं जो इसकी कई सन्दर्भों में व्याख्या करते हैं. उन्हें पढ़ लें.

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    1. निशांत जी मैं सुनील दीपक जी के लेखों को बहुत दिनों से पढ़ रहा हूँ पर मेरी उपरोक्त जिज्ञासा का समाधान उनके किसी लेख से नहीं हुआ। शायद कुछ छुट गया हो। यदि आपके पास उनकी किसी पोस्ट का सीधा लिंक है तो कृपया बताएं।

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    2. प्रिय भाई दीप जी ,
      जब आप इस विषय में संतोषजनक ज्ञान प्राप्त कर लें तो कृपया जनहिताय साझा करने के बारे में भी विचार कीजियेगा !

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  10. एक पक्ष की यौनाचार विचित्रताओं को संतोष देने के लिए दूसरा पक्ष निश्चित ही शोषण का शिकार है. आपका अनुमान सही है. उस दूसरे पक्ष के पास कोई तर्कसंगत कारण नहीं है.

    फिजाओं में यौन विकारों के समर्थन की हवा घुली हुई है ऐसे में शोषितों की विवशता को कौन बाहर लाए......

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    प्रिय विचारदीप,

    अच्छी चर्चा छेड़ी है, मैंने भी तीन पोस्ट दीं थी इस विषय पर... ब्लॉगवुड के एक अति सम्मानित व मेरे परिचित ब्लॉगर तो इतना चिढ़ गये कि बेनामी बन इल्जाम लगा दिया कि मैं खुद समलैंगिक होने के कारण यह पोस्ट लगाता हूँ... क्या करें भाई, स्नेही बीबी है, दो दो बच्चे हैं, परिजन ब्लॉग पढ़ते हैं... इसलिये एक हिचक सी हो गयी इस मुद्दे पर चर्चा करने से... फिर भी कोई देखना चाहे तो क्रमवार वह पोस्टें इस प्रकार हैं...

    http://praveenshah.blogspot.com/2010/02/blog-post_22.html

    http://praveenshah.blogspot.com/2011/05/blog-post_04.html

    http://praveenshah.blogspot.com/2011/07/blog-post.html


    अभी आगे जारी है...



    ...

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    फिर भी काफी कुछ पढ़ा इस मुद्दे पर... सबसे पहले तो यह जानकारी कि Is Homosexuality A Mental Disorder?
    No. All major professional mental health organizations have gone on record to affirm that homosexuality is not a mental disorder. In 1973 the American Psychiatric Association’s Board of Trustees removed homosexuality from its official diagnostic manual, The Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders, Second Edition (DSM II). The action was taken following a review of the scientific literature and consultation with experts in the field. The experts found that homosexuality does not meet the criteria to be considered a mental illness.
    यानी आज का चिकित्सा विज्ञान इसे मानसिक बीमारी नहीं मानता...

    मामला कुछ जटिल न्यूरोहारमोनल गड़बड़ी से पनपा बताया जाता है आजकल... दो लिंक दे रहा हूँ समय हो तो अध्ययन कर सकते हैं... क्षमा चाहूँगा कि यह अंग्रेजी में हैं... हिंदी में इस तरह की जानकारियाँ अभी नहीं मिलतीं... लिंक इस प्रकार हैं...

    http://williamapercy.com/wiki/images/Neurohormonal_functioning_2.pdf

    http://www.viewzone.com/homosexual.html


    जारी...


    ...

    उत्तर देंहटाएं
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    अपने मन की कहूँ तो मुझे मामला अभी भी ठीक ठाक समझ नहीं आता...

    तीन किस्से बताता हूँ अपनी जिंदगी से...

    १- एक छोटे शहर में रहता था मैं तब... एक किताब की दुकान में आनाजाना होता था... मालिक यही कोई सत्ताइस बरस का मुसलमान लड़का था... उसके बारे में तमाम बातें कही जाती थीं... मुझे उत्सुकता हुई और उसे घर चाय पर बुलाया, सीधे उसी से पूछा, पहले तो काफी देर तक वह रोता रहा... फिर बोला जो आपने सुना वह सही है... बचपन में सात साल से चौदह साल की उमर तक उसके सगे चाचा ने उसके गुदा मार्ग से यौनाचार किया... बड़ा होने पर उसको लिंगोत्थान व इजेकुलेशन केवल तभी होता है जब कोई पुरूष उसके गुदामार्ग से यौनाचार करे... शादी हुई, एक साल बाद पत्नी ने पंचायत बैठा तलाक ले लिया क्योंकि वह उसके साथ संबंध बनाने में असमर्थ था... अपनी रोज की कमाई में से चार-पाँच सौ रूपये वह खर्च करता है कोई ऐसा पुरूष ढूंढने में जो उसका गुदामैथुन कर दे... आवारा, निकम्मे, नशेड़ी और स्मैकिये ही अक्सर मिलते हैं, बीमारियाँ भी पकड़ लेता है पर यही अब उसकी जिंदगी है...

    २- राजनीति में सक्रिय अपने एक परिचित हैं... एक बीबी है, दो रखैलें भी... फिर भी प्रदेश की राजधानी को जाते हैं तो हाईवे पर जगह जगह सड़क किनारे खड़े मिलने वाले चिकने आईब्रो बनाये लिपस्टिक-नेलपेन्ट लगाये 'लौंडे' उठा लेते हैं जो चंद रूपयों के बदले मुखमैथुन और 'गोलवाली' देने को तत्पर हैं... इन लड़कों का और कामों की तरह ही यह एक धंधा ही है ऐसा मैं मानता हूँ...
    पूरब के गाँवों में भी देखा है मैंने की कुछ जमींदारों के बीबियाँ भी हैं और लौंडे भी...

    ३- एक और अपना परिचित लड़का है बड़े सम्मानित परिवार का, चार बड़ी बहनों के बाद पैदा हुआ... बचपन से ही बहनों को देख देख सजना संवरता काजल लिपस्टिक और नेलपेन्ट लगाता है... पढ़ने के दौरान ही साथ के किसी भी माचो लड़के के नाम की माँग भरने लगता है... आजकल बैंगलौर में है सॉफ्टवेयर लाईन में... बहुत मिलजाते हैं उसे जिन्हें नर से गुरेज नहीं है उसके फ्लैट में उसी के पैसों से ऐश करते हैं और मन भर जाने पर लात मार चल देते हैं...

    इसीलिये मुझे समझ नहीं आता अब तक कि क्या राय बनाई जाये इस मामले में...



    ...

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    1. प्रवीण जी कृपया इस विषय पर अपनी पुरानी पोस्टों में से ४ मई २०११ की पोस्ट पर दी मेरी टिपण्णी को पढ़े। समलैंगिकता पर जो प्रश्नचिन्ह मेरे मन में तब था उसी को मैंने ४ मई २०१३ को दोहराया है। आपके दिए दुसरे लिंक मैं अवश्य पढूंगा पर अभी सिर्फ ऊपर दिए उदाहरणों के विषय में सिर्फ इतना ही कहूँगा की ये सब मानसिक विकार ही हैं कोई प्राकृतिक चीज नहीं।

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  14. - लालच(रोटी से लेकर रुपये पैसे तक और लग्ज़री आईटम्स तक का)
    http://twocircles.net/node/66616

    - मजबूरी(रोटी, नौकरी, लग्ज़री आईटम्स पर अतितिक्त निर्भरता)
    http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-04-25/delhi/31398362_1_wasim-murders-gay-relationship

    - लत\शुरुआती अनुभव का अवचेतन में ऐसा बैठ जाना कि यही नेचुरल लगने लगे
    जैसा कि प्रवीण जी ने किताबों की दुकान के मालिक का वाकया बताया, ऐसे मामलों में ’जो कुछ मुझे दिया था, वही लौटा रहा हूँ मैं’(

    - इसके अलावा लगभग दस साल पहले दिल्ली में एक रिटायर्ड आई.ए.एस. अधिकारी के पुत्र पुश्किन की हत्या वाला केस भी आपको याद होगा, ढूंढेंगे तो और डिटेल्स मिल भी जायेंगे। विस्तार में जाने पर लगभग इन्हीं में से कोई वजह दिखेगी।

    - इसके अलावा एक वजह उपलब्धता-अनुपलब्धता की भी हो सकती है। मान लीजिये कि भूख जोरों से लगी हुयी है और मनपसंद खाद्य पदार्थ उपलब्ध नहीं है या अपनी रेंज में नहीं है, तो जो मिल जाये उसी से भूख मिटा लेना। बल्कि इस बात को मैं सबसे बड़ी वजह मानता हूँ। और यह वजह ही है जो मासूम और अबोध बच्चों\बच्चियों और कमजोर शिकार पर अत्याचार होने की वजह होती है।

    ये टिप्पणी पक्का स्पैम में नहीं जायेगी, इससे बवाल की थोड़ी बहुत संभावना जो है :)

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  16. जहां तक समझता हूँ एक वजह विपरीत लिंग से नफरत हो सकती है (नफ़रत का कारण कुछ भी हो सकता है)

    बहुत समय पहले मैंने "कट्टर नारीवाद और लेसबियनिस्म में सम्बन्ध" पर पढ़ा था ...कल्पना कीजिये अगर किसी छोटी बालिका के मन में बचपन से पुरुषों के प्रति नफरत भर दी जाए तो क्या ऐसे विकृत नतीजे नहीं आ सकते?

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  18. सोचिये की किसी छोटे लडके के मन में नारी को लेकर एक ही घिसी पिटी भूमिका संस्कृति परम्परा आदि आदि के नाम पर भर दी जाए तो बड़े हों पर वो क्या करता है , दुनिया में ब्लॉग में , लोगो का दिमाग ख़राब :)
    और कुछ बच्चे रह कर भी दिमाग ख़राब करने की क्षमता रखते है , और ये बच्चे कभी बड़े नहीं होते , जबकि उन्हें हो जाना चाहिए :)

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    1. @घिसी पिटी भूमिका संस्कृति परम्परा आदि आदि के नाम पर भर दी जाए तो बड़े हों पर वो क्या करता है , दुनिया में ब्लॉग में , लोगो का दिमाग ख़राब :)

      अब देखिये ना ... यही बात ...इसी अंदाज में ...अगर किसी पुरुष ब्लोगर ने किसी महिला ब्लोगर के कमेन्ट के बाद कही होती तो हंगामा खडा हो सकता था। किसी कथित 'बड़े' के द्वारा तेंजेंशियल कमेन्ट और चर्चा की मर्यादा पर बड़े-बड़े पाठ पढाये जा सकते थे ।
      सब कथित बड़ों के पास अपनी अपनी किताबें हैं जिसमें चेप्टर अपनी सुविधा के हिसाब से खोले जाते हैं .. जैसे विद्वान पंडित कुछ चुनिन्दा श्लोक अपनी सुविधा से बदल बदल कर खुद को जस्टिफाई और दूसरों को नीचा दिखाने के लिए प्रयोग करते हैं

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    2. टिप्पणिया को फालो न करने के यही नुकशान है की कोई आप की टिपण्णी का जवाब दे और आप को पता ही न चले , पूरी उम्मीद है की ग्लोबल जी उर्फ़ गौरव जी उर्फ़ पाठक जी जरुर टिप्पणियों को फालो करते होंगे और मेरा जवाब उन्हें मिल जाएगा :)
      @ अब देखिये ना ... यही बात ...इसी अंदाज में ...अगर किसी पुरुष ब्लोगर ने किसी महिला ब्लोगर के कमेन्ट के बाद कही होती तो हंगामा खडा हो सकता था।
      मेरी टिपण्णी बड़ी बुरी लग रही है क्यों, मैंने तो आप को प्रतिउत्तर नहीं दिया है फिर बुरा क्यों लग रहा है , उसे आप अपने आप पर क्यों ले रहे है ,कही मैंने आप का नाम लिखा है आप का जिक्र तक किया है फिर भी आप मेरी टिपण्णी को अपने ऊपर ले रहे है क्यों , इसलिए क्योकि आप ने भी कुछ खास लोगो को निशाना बना कर ये टिपण्णी की थी ।
      @ बहुत समय पहले मैंने "कट्टर नारीवाद और लेसबियनिस्म में सम्बन्ध" पर पढ़ा था ...कल्पना कीजिये अगर किसी छोटी बालिका के मन में बचपन से पुरुषों के प्रति नफरत भर दी जाए तो क्या ऐसे विकृत नतीजे नहीं आ सकते ?
      आप को हर जगह ये नारीवादी क्यों नजर आती है , आप को हर मसले में नारी ही नजर क्यों आती है , एक संतुलित टिपण्णी ये होती की यदि बच्चो के मन में विपरीत लिंग के प्रति गलत भावना भर दी जाये तो इस तरह की विकृति ( आप की नजर में ) आ सकती है , लेकिन नहीं आप को तो हर जगह नारीवादियो को ही घुसाना है सो यहाँ भी वही राग अलाप दिया , मैंने भी टिपण्णी की है किसी भी लिंग को इंगित किये बिना , चाहती तो खूब पुरुषो को गलिया दे देती , आप की इस सोच को देख कर तो यही लगता है कि
      सोचिये की किसी छोटे लडके के मन में नारी को लेकर एक ही घिसी पिटी भूमिका संस्कृति परम्परा आदि आदि के नाम पर भर दी जाए तो बड़े हों पर वो क्या करता है , दुनिया में ब्लॉग में , लोगो का दिमाग ख़राब :)
      बस आप की दी टिप्पणी में दिए नारी को नर ही तो किया है फिर क्यों बुरा लग रहा है , छोटे कुछ ज्यादा ही उत्पात करे तो उन्हें उनके ही भाषा में जवाब देना चाहिए , बात उन्हें तभी समझ में आती है । हद है हर जगह नारीवाद हाय हाय का नारा !

      हटाएं

    3. पहले दी टिपण्णी तो स्पैम में गई शायद निकले भी नहीं दीप जी तो है ही नहीं दुबारा दे रही हूँ शायद ये न जाये ।
      टिप्पणिया को फालो न करने के यही नुकशान है की कोई आप की टिपण्णी का जवाब दे और आप को पता ही न चले , पूरी उम्मीद है की ग्लोबल जी उर्फ़ गौरव जी उर्फ़ पाठक जी जरुर टिप्पणियों को फालो करते होंगे और मेरा जवाब उन्हें मिल जाएगा :)
      @ अब देखिये ना ... यही बात ...इसी अंदाज में ...अगर किसी पुरुष ब्लोगर ने किसी महिला ब्लोगर के कमेन्ट के बाद कही होती तो हंगामा खडा हो सकता था।
      मेरी टिपण्णी बड़ी बुरी लग रही है क्यों, मैंने तो आप को प्रतिउत्तर नहीं दिया है फिर बुरा क्यों लग रहा है , उसे आप अपने आप पर क्यों ले रहे है ,कही मैंने आप का नाम लिखा है आप का जिक्र तक किया है फिर भी आप मेरी टिपण्णी को अपने ऊपर ले रहे है क्यों , इसलिए क्योकि आप ने भी कुछ खास लोगो को निशाना बना कर ये टिपण्णी की थी ।
      @ बहुत समय पहले मैंने "कट्टर नारीवाद और लेसबियनिस्म में सम्बन्ध" पर पढ़ा था ...कल्पना कीजिये अगर किसी छोटी बालिका के मन में बचपन से पुरुषों के प्रति नफरत भर दी जाए तो क्या ऐसे विकृत नतीजे नहीं आ सकते ?
      आप को हर जगह ये नारीवादी क्यों नजर आती है , आप को हर मसले में नारी ही नजर क्यों आती है , एक संतुलित टिपण्णी ये होती की यदि बच्चो के मन में विपरीत लिंग के प्रति गलत भावना भर दी जाये तो इस तरह की विकृति ( आप की नजर में ) आ सकती है , लेकिन नहीं आप को तो हर जगह नारीवादियो को ही घुसाना है सो यहाँ भी वही राग अलाप दिया , मैंने भी टिपण्णी की है किसी भी लिंग को इंगित किये बिना , चाहती तो खूब पुरुषो को गलिया दे देती , आप की इस सोच को देख कर तो यही लगता है कि
      सोचिये की किसी छोटे लडके के मन में नारी को लेकर एक ही घिसी पिटी भूमिका संस्कृति परम्परा आदि आदि के नाम पर भर दी जाए तो बड़े हों पर वो क्या करता है , दुनिया में ब्लॉग में , लोगो का दिमाग ख़राब :)
      बस आप की दी टिप्पणी में दिए नारी को नर ही तो किया है फिर क्यों बुरा लग रहा है , छोटे कुछ ज्यादा ही उत्पात करे तो उन्हें उनके ही भाषा में जवाब देना चाहिए , बात उन्हें तभी समझ में आती है । हद है हर जगह नारीवाद हाय हाय का नारा !

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    4. @ आप ने भी कुछ खास लोगो को निशाना बना कर ये टिपण्णी की थी ।

      आज कल मुझे इतना दिमाग लगाने का समय नहीं मिलता

      हटाएं
    5. @आज कल मुझे इतना दिमाग लगाने का समय नहीं मिलता

      isame 3 shabd jyada or ek kam hai sahi comment ye hai

      मुझे दिमाग लगाने का kabhi समय नहीं मिलता :)))

      हटाएं
    6. लगता है आपके पास तो दिमाग और समय दोनों ही कुछ ज्यादा मात्रा में है .. हो सके तो इसे कभी दुसरे की बात समझने भी लगाइये

      धन्यवाद

      हटाएं

    7. चलो मान तो लिया मेरे पास आप से ज्यादा दिमाग है ;)
      मै कब से बस आप की ही बात को दोहरा भर रही हूँ , खामखाह अपनी ही लिखी बात का बुरा माने जा रहे है , फिर से आप की ही बात दोहरा देती हूँ ।
      यदि समय और दिमाग कम हो तो उसका उपयोग "हो सके तो इसे कभी दुसरे की बात समझने में भी लगाइये " लीजिये फिर से आप की ही बार को दोहराया है :)))

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    8. वाह! क्या बात है! इतनी ही जल्दी मान और दोहरा रहीं हैं तो एक बार आईने के सामने भी कोशिश कीजिये :) वैसे मैं अभी मित्र प्रवीण के लेख पर कुछ कहने वाला था लेकिन आप वहां टिपण्णी कर चुकीं हैं ये देख कर बिना टिप्पणी किये वापस लौट आया :) इसे कहते हैं दहशत :)))


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  19. सुंदर पंक्तिया
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  20. ये एक प्रकार की मानसिक विकृति है.

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  21. इस प्रकार की मानसिक विकृतियों को प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए बल्कि हमें इसके निदान हेतु उपाय ढूंढना चाहिए.

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  22. अत्यंत घृणित और निंदनीय परन्तु यह प्रकृति की ही देन है.

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  23. विपरीत लिंग से नफरत की भावना जब अंतर्मन में घर कर लेती है तो इस तरह की विकृत्यों का जन्म होता है

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  24. जब समलैंगिकता की बात होती है तो ये मामला बार विवादस्पद बन जाता है पर है विचारणीय क्यूँ होते हैं इस तरह के लोग हमारे समाज में?

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  25. क्या हमारी सामाजिक परिष्ठितियाँ जिम्मेदार हैं इस विकृति के लिए या हमारी शिक्षा जिसमे नैतिकता का पतन होता जा रहा है.

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  26. समलैंगिकता सामाजिक रूप से स्वीकार्य तो नहीं है फिर भी ये कहाँ से पैदा हो रही है ये पश्चिमी सभ्यता से हमारे देश में भी घर कर गयी है ,इसका प्रतिशत बढ़ रहा है.

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  30. Homosexuality is as natural as heterosexuality. I agree, that there are thousands and thousands of people who get involved just to try it, just to enjoy the monetary benefits, have fun, do something different, are rebellious, drug addicts or just want to have an otherwise unattainable lifestyle and be a parasite on someone who has a genuine, natural state. In fact I should call this too a symbiotic relationship where one person gets material benefits and the other one gets to have a life which nature has chosen for him/her.
    Yes, it is complex but just weighing everyone on the same parameter, considering all of them fake is unjust. If a heterosexual has the right to find a partner and go out in the open then why do we see these people with a grunt and mock them.
    As per the question raised by you " मुझे समलैंगिकों के दुसरे वाले साथी की मानसिकता समझने में कठिनाई होती है।जो स्त्री पुरुष शरीर में फंसी है उसे पुरुष साथी पसंद आएंगे पर उसका साथी क्यों एक अधूरी अपूर्ण स्त्री को पसंद कर रहा है ये बात मुझे समझ नहीं आती। ऐसे ही लेस्बियन जोड़े भी स्त्री शरीर में फंसा पुरुष तो स्त्री की और आकर्षित होगा पर जो मानसिक और शारीरिक रूप से स्त्री ही है वो एक अधूरे अपूर्ण पुरुष की और क्यों आकर्षित हो जाती है ये समझ नहीं आता।" I think I have answered the question already but would reiterate by saying that if the other partner is not a homosexual then he/she has material benefits to get in this partially parasitic and partially symbiotic relationship. But there are certainly more number of cases where both the partners are genuinely homosexuals, in such a case both of them are trapped in bodies of opposite sex, they understand each other better, are compassionate, have been through same emotional issues and satiate each others physical requirements as the woman trapped in a man's body gets the man (physically) she is looking for and it doesn't matter to her whether the partner is also a woman trapped in a man's body because then the question is only about physical aspect of it while the emotional part is already taken care of . Ideally, its better to get involved with someone not completely a man/woman but resonates partial characters of the sought after gender rather than to get involved with someone who doesn't understand you and has not been through the same emotions as yours. I believe this is what that makes the bond becomes stronger. Though they might be incomplete to the worldly eye but together they become more than complete. But again the dark side is that not everyone is lucky to find such a partner in a closed society as India, where people out rightly label homosexuality as a taboo.
    While I was studying in India I knew a girl who had strong feelings for another girl. Both of them were pretty normal girls, had the ability to cheer up an otherwise tense environment, had honor rolls to their academic credits and were good looking as per Indian standards. One of them got married to an IAS officer as she did not have the guts to tell her family and the other one committed suicide on a railway line. The one who got married got divorced later and suffers from serious depression and psychological issues. Such a waste of two beautiful and talented lives in the name of social definitions.

    I have been in the US for seven -eight years now and have seen homos pretty closely in the neighborhood and at work. Believe me their sexual orientation does not make an inch of difference in there abilities at making intelligent decisions at work, doing their work diligently or being there for friends.
    For all those who have written in their comments above that it is a social taboo, I would say that I despise their narrow-mindedness, ignorance and compassionless attitude. It shows how biased they are and are unnecessarily proud of something that God gave to them. My question to them is what if God would have chosen them or their progeny to be someone like those targeted here ?

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  31. Vaicharik post ! Samaj me jo kuchh bhi hai, achchha ya bura, us par vichar aur anubhavon ka aadan-pradan to hona hi chahiye.Tabhi cheezen saaf hongi.

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  32. मैंने भी ढूंढा टिप्‍पणियों की बाढ़ में पर खिलाड़ी तो कोई नजर ही नहीं आया।

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  33. very nice ! ...check the link for new quotes and poems : http://gazabcollection.blogspot.in/

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