शनिवार, 6 अप्रैल 2013

बकवास जारी है .....

जब भी नारी अधिकारों की बात चलती है या फेमेन जैसे संगठन सनसनी खेज तरीके से इस समस्या को सामने लाते  हैं तो मेरे मन में इस विषय पर अनेक प्रश्न कुलबुलाने लगते हैं। 

नारीवादी संगठन नारी शक्ति, मुक्ति, आजादी , स्वतंत्रता आदि बातें बड़े पुरजोर तरीके से उठाते हैं। मैंने अपने चालीस वर्षीया जीवन में अपने आस पास के माध्यम वर्गीय  हिन्दू समाज में  जो कुछ देखा है और समझा है उस अनुभव के आधार पर नारी स्वतंत्रता मुक्ति आजादी अदि विचारों को मैं समझ नहीं पाता।  हो सकता है कोई पर्दा पड़ा  हो।

मैं ये मनाता हूँ की स्त्रियों को समाज में पुरुषों के समान  अधिकार प्राप्त नहीं हैं और उन्हें कमतर समझा जाता है। मुझे लगता हैं की  इन दोनों में जो शारीरिक भिन्नताए हैं उनका ख्याल रखते हुए दोनों को समान समझा जाना चाहिए पर मैं नारी स्वतंत्रता के विचार को पूरी तरह से समझ नहीं पाता।

कौन, किस से किस बात के लिए कितनी आजादी चाहता है इस बात को जीवन मरण के चक्र से  मुक्ति, आजादी और स्वतंत्रता की चाह रखने वाला मेरा हिन्दू मन आसानी से समझ नहीं पाता।   
 
मुझे दूसरों का नहीं पता पर अपने जीवन में कदम कदम पर मैंने खुद को अनेक बंधनों में बंधा पाया है। अगर इनमे से कुछ एक बंधनों में स्त्री स्वतंत्रता के समर्थक खुद को बंधा पाते  हों तो मेरी  मुक्ति आजादी और स्वतंत्रता के समर्थन में भी फेमेन टाइप चोली उतार जिहाद करें।

मैं छुटपन में नंगा घूमता था। अम्मा पिताजी ने समझाया की बेटा नंगा मत घुमा करो वर्ना कौवा तुम्हारी बहु नौच ले जाएगा। मैं आज भी घर पर कच्छे बनियान में रहना पसंद करता हूँ पर पत्नी को पसंद नहीं। बिना नेकर पायजामा और टी शर्ट  के मुझे अपने ही घर में जीने नहीं दिया जाता। वैसे मैं किसी न्यूड केम्प में कम से कम एक हफ्ता गुजरना चाहता हूँ। विदेश नहीं जा सकता, दिगंबर या नागा साधू नहीं बन सकता अतः इस इन्तजार में हूँ की कब अपने देश में लोग इतने आधुनिक,प्रगतिशील और समझदार हों की यहाँ भी न्यूडिस्ट केम्प स्थापित हों। कुल मिला कर आज की तिथि में मुझे कम से कम अपने घर में पायजामा या नेकर पहनने की घुटन से मुक्ति आजादी और स्वतंत्रता चाहिए।

मैं युवा हुआ तो अपने पिता की ही तरह बीडी और हुक्का पीना चाहता था।बड़े भाई की तरह शराब और बियर पीना चाहता था। इजाजत नहीं मिली। बहुत सी लड़कियों के साथ बिना रोकटोक खुले आम रोमांस करना चाहता था। चहुँ ओर से विरोध हुआ।  मेरे पिता बीडी हुक्का पी सकते थे, दोस्त लोग दो दो तीन तीन लड़कियों से प्रेम कर सकते थे पर मुझे आजादी नहीं मिली। कहा गया चोरी छिपे ये काम कर लो। समाज के इस दोगलेपन पर बहुत गुस्सा आया। बड़ी घुटन सी महसूस हुयी। दिल के अरमान कुचले गए।  आज मैं किसी सुन्दर महिला से बात करता हूँ तो पत्नी को बुरा लगता है। उस सुन्दर महिला के परिजनों को बुरा लगता है।  मुझे आजादी चाहिए, मुक्ति चाहिए।

मैं छोटा था तो देर तक बाहर रहने पर माता पिता की डांट  सुनानी पड़ती थी। जमाना ख़राब है देर रात तक गलियों में दोस्तों के साथ आवारागर्दी मत किया करो के जुमले मैंने कई बार सुने। पहली बार बेंक से पैसे निकलवाने गया तो सुरक्षित रहने के बहुत से तरीकों के साथ मुझे लेस कर भेज गया। दिल्ली के ही कुछ इलाकों में जाने से पहले सावधान रहने की हिदायतें भी बहुत बार मुझे मिली हैं। बहुत बार मेरे मन में आया की मैं अपनी जेब में सौ के नोटों की गड्डी रखकर किसी भीड़ भरे बाज़ार में  कुछ इस तरह से घुमु के गड्डी  का कुछ हिस्सा जेब से बाहर दीखता रहे। ये न पूछे की ऐसा क्यों? भई मेरा सामान है मैं जैसे चाहे रखूं, जब चाहे जहाँ चाहे दिखाऊ। दुसरे के धन को मिटटी समझना चाहिए। पर दोस्तों मैं  रात की बात छोडो मैं कभी दिन में ऐसा नहीं कर पाया। ये सब देखकर मुझे लगा की इस देश, इस समाज  में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज कभी रही ही नहीं है। आप रात तो क्या दिन दहाड़े भी अपने कीमती सामान के साथ खुले घूम नहीं सकते। लोगों की बुरी नज़रों से अपने मूल्यवान सामान को बचा नहीं रख सकते।  इस सब से मुझे बड़ी घुटन महसूस होती है। मुझे अपनी मूल्यवान चीजों को सुरक्षित रखने के डर  से आजादी चाहिए।

तो कदम कदम पर आजादी मुक्ति स्वतंत्रता खोज रहे इस पुरुष को भी समर्थन की चाह है। है कोइ सगठन इधर या उधर जो मुझे बेहद असरदार और प्रभावशाली चोली उतार समर्थन दे सके।   

42 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन दुःख है भैया, चलो किसी दिन बैठकर गम गलत करते हैं.
    अपनी पत्नी से पूछे बिना मैं और कुछ लिख नहीं सकता.

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  2. हम भी ’कच्छा गैंग’ वाले ही हैं भाई :)

    जोरदार तर्क दिये हैं नोटों की गड्डी वाले केस में - आदर्श स्थिति में होना तो यही चाहिये कि आपके नोट बेशक दिखें लेकिन उन्हें हासिल करने, बिगाड़ने का, हथियाने का किसी को अधिकार नहीं लेकिन ऐसा होता नहीं।


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  3. संगठन?

    किसी को जमीं तो किसी को आसमां नहीं मिलता……

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  4. अभी तक राजनेता न बने एक चतुर अभिनेता का एक पुराना (प्रतीकात्मक) कथन याद आ गया:
    मैं कानून का पालन करता हूँ। गाड़ी हमेशा सड़क के बाईं ओर चलाता हूँ। जब दाईं ओर चलाने का मन करे तो अमेरिका चला जाता हूँ।

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  5. आज की ब्लॉग बुलेटिन बिना संघर्ष कोई महान नहीं होता - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. आपके साथ हैं हमारी संवेदनाएँ. आपकी आकांक्षा शीघ्र पूरी हों.

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  7. अगर वो सब बाते जो आप चाहते हैं और उसको स्वतंत्रता कहते हैं तो वो सब बाते सबके लिये "स्वतंत्रता " का पैमाना मान ले समस्या ख़तम
    हिन्दू धर्म में जगत जननी माँ दुर्गा के बाद ही कोई देवी देवता स्थान पाते हैं . जब भी किसी देवी देवता पर कोई समस्या हुई ख़ास कर देवता पर जैसे इंद्र तो माँ दुर्गा की गोदी में / शरण में जा कर ही उसका निवारण हुआ हैं { डिस्क्लेमर ऐसा कलर चॅनल के सेरियल में कहा गया हैं }

    सोचिये सोचिये सोचिये
    जब इंद्र को माँ दुर्गा की जरुरत थी अपनी स्वतंत्रता के लिये तो बाकी सब किस खेत की मूली हैं
    :)

    स्त्री स्वतंत्रता लोगो को इस लिये भ्रमित करती हैं क्युकी वो स्त्री को परतंत्र मानते हैं
    इस दुनिया में हर जन्म लेने वाला स्वतंत्र हैं जिनमे स्त्री भी एक स्वतंत्र प्राणी हैं .
    शरीर महज शरीर हैं उसके लिये बनाये गए नियम पुरुष और स्त्री के लिये बराबर हैं इस लिये
    सबके अलग अलग गैंग हैं

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  8. स्थापित तौर तरीकों से हटकर कुछ भी हो तो वह अजीब लगता ही है ।

    यह ध्यानाकर्षण इसलिए लगता है कियह आम तौर पर होता नहीं । पुरानी फिल्मों में हिरोइन साडी ही पहनती थीं - फिर माल सिन्हा आदि ने suits पहन - तो मॉडर्न लगीं -। फिर आदत हो गयी - फिर आया ज़माना स्लीवलेस का । but today no heroine (almost none) wears salwar suits .

    इसका कोई अंत नहीं - क्योंकि मानदंड बदलते रहते हैं लगातार ।

    यदि कोई अपने पैसे / संपत्ति / शरीर आदि का प्रदर्शन करे तब भी उसे नुक्सान न हो - यह "IDEAL " परिस्थिति होगी । आम तौर पर नुक्सान होने की संभावना अधिक होगी ।

    फर्क यह है दीप जी -बहुत बड़ा फर्क यह है - कि आप पैसे जेब से झांकते हुए घूमें तो जो उसे चुराएं - वे "/चोर उचक्के / बदमाश" कहलाते हैं कानूनन । लेकिन लड़की अपने शरीर को उघाड़े तो उसे न सिर्फ उचक्के ही बुरी नजर से देखेंगे वरन पूरा समाज, पूरी व्यावस्था, समूचा तंत्र उसे पागल / सेक्स मनिअक आदि आदि कहेगा । फर्क यहाँ है ।

    ये लड़कियां इसी के विरुद्ध प्रदर्शन कर रही थीं ।

    यह बात और है कि उनके तरीके से मैं खुद असहमत - हूँ लेकिन उस समस्या और आपकी समस्या में बुनियादी फर्क तो है ही ।

    आपकी हर प्रॉब्लम / bandhan एक "एग्रीमेंट" के तहत है - यह सभी कायदे जो भी आप्पने कहे - ये सब ही - स्त्री पुरुष (pati patni) दोनों पर बराबरी से लागू हैं । जबकि "फेमेन" स्त्रियों के इस विरोध के विषय में ऐसा नहीं है ।

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. पाण्डेय जी -

    नारी स्वतंत्रता मुक्ति आजादी अदि विचारों को समझने के लिए इस साधारण से उदाहरण पर ध्यान दें

    किसी अश्लील विज्ञापन का विरोध ना होने पर - इस पुरुष प्रधान समाज में नारी शरीर को उत्पाद कि तरह दिखाया /माना जाता है.. इसी देश में नारी पूज्य माना जाता है वगैरह ..वगैरह .( अगर कोई लेख है तो साथ में आठ दस व्यंग बाण भी )

    उसी कथित अश्लील विज्ञापन का विरोध होने पर - इस पुरुष प्रधान समाज में नारी शरीर को लेकर बहुत ही चिंता रहती है (इसके साथ भी आठ दस व्यंग वाले बाण विरोध का एंगल ध्यान रखते हुए)

    दरअसल मामला सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने का है नारी स्वतंत्रता या समानता का नहीं

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    1. यह साधारण पाठक असाधारण बात कह गया :))

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  11. जब इतनी मेहनत से लम्बी टिपण्णी दी जाये और जिसके लिए लिखी जाये वो उसे ठीक से पढ़े समझे नहीं ऊपर से डिलीट भी कर दे , तो कष्ट कैसा होगा आप समझते होंगे :)

    आप का ये लेख कुछ कुछ वैसा ही है जैसा की अजित पवार ने सुख पीड़ितो पर कहा की जब बांध में पानी नहीं है तो क्या पेशाब करके पानी दे , या राव साहब ने जैसा कहा की गरीब बढ़िया( प्रोटीन )खाना खा रहे है इसलिए महंगाई आ रही है ।बिना जमीनी हकीकत को जाने पीडितो का मजाक , मैंने पिछले लेख में ही कहा था की ऐसा कुछ भारत में नहीं हो रहा है इसलिए आप इसे भारतीय सन्दर्भ से न जोड़े , अब चुकी आप ने पहले ही लिख दिया था की आप जारी रहेंगे सो ये लिख मारा, ठीक है , हम भी घाघ पाठक है फिर से टिप्पणी देंगे ।

    आप छुटपन में नंगे घुमा करते थे किसी लड़की को कभी छुटपन में भी नंगा घुमते देखा है , नहीं देखा होगा उन्हें सदा कपड़ो में रखा जाता है क्योकि वो कितनी भी छोटी हो उन पर पुरुषो की बुरी नजर हो सकती है , बेटियों को पैदा होते ही बड़ा बना दिया जाता है उनका बचपन छीन लिया जाता है , क्या लड़को के साथ ऐसा होता है यदि हा तो हम आप के आन्दोलन के साथ है ।

    आप कच्छे में भी बहार आ जाये तो ज्यादा से ज्यादा लोग आप पर हंस देंगे कोई आप को वेश्या कहा कर संबोधित नहीं करेगा , जिन दिन आप को लोग आप के कपडे के कारण वेश्या कहने लगे उस दिन हम भी आप के आन्दोलन में आप के साथ है ।

    जिस दिन पुरुषो को सर से पांव तक ढँक कर रहने का फतवा सुना दिया जाये ऐसा न करने पर जान से मारने और मुंह पर तेजाब फेकने की धमकी दी जाये उन दिन हम आप के आन्दोलन के साथ है ।

    जिस दिन स्त्रियों को जींस शर्त पेंट आदि जैसे आधुनिक कपडे पहनने की छुट दी जाये उन्हें आधुनिक न माना जाये और वही कपडे पहनने पर पुरुषो को ताने मारे जाये उन्हें धोती कुरता पैजामा जैसे भारतीय संस्कृति के पकडे पहनने पर मजबूर किया जाये उस दिन हम आप के आन्दोलन के साथ है ।

    वैसे तो मै शराब बीडी आदि के खिलाफ हूँ किन्तु जिस दिन किसी पुरुष को बस शराब पिने भर से लोग झुण्ड में उसे पिटे उसके कपडे फाड़े , नशा करने भर से उसे चरित्र हिन् कहे उन दिन मै आप के आन्दोलन के साथ हूँ । जिस दिन स्त्रिया पुरुषो को बस उपभोग करने का सामान और मात्र एक शारीर मानने लगे उनदिन आप के आन्दोलन के साथ हूँ ।

    जिस दिन आप को कोई ठग ले , कोई चोर उच्चका ( जो दुसरे की चीजो को देख कर अपनी नियत ख़राब करता है उसको चुराने का प्रयास करता है उसे चोर उच्चका कहते है शरीफ लोग दूसरो के धन पर बुरी नियत नहीं रखते है और न ही उसे ठगने चुराने का प्रयास करते है , वरन रोज आम लोग बैंको गहनों कपड़ो की दुकानो को लुटते फिरते, सोचती हूँ की जब लड़किया इतना ही दिखाती फिरती है तो सारे ही पुरुष बलात्कारी, लफंगे क्यों नहीं बन जाते है , कुछ ही क्यों बनते है शायद लड़किया अभी भी ठीक से अपना शारीर दिखा नहीं रही है ) आप का सामना ले कर भगा जाये और लोग उसे पकड़ने उसे दोष देने अपराधी मानने की जगह आप की ही मरम्मत करे आप को भला बुरा कहे आप की ही घर से बाहर निकलना बंद कर दे उस दिन हम आप के साथ है । वैसे यहाँ मुंबई में तो मंगलसूत्र पहनना परम्परा है और रोज लाखो के मंगलसूत्र गले से छीन लिए जाते है मुझे नहीं पता की वो महिलाए ऐसा दिखावा क्यों करती है उन्हें अपने गहने पहनने नहीं चाहिए उन्हें घर में रखने चाहिए वहा भी वो सुरक्षित है कह नहीं सकते है क्योकि आज कल तो घर के लोग ही बुरी नजर वाले हो गए है । जब लड़को को बस लडके होने के कारण पैदा करने से ही इंकार कर कर दिया जाये और लड़का होने पर उन्हें सजा दी जाये उस दिन आप के आन्दोलन के साथ हूँ ।

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    1. मुझे पता था कि इस लेख पर जवाब में कोई टिप्पणी दी जाए तो वह इतनी ही लंबी हो जाएगी ।मैं खुद आलस कर गया था जो कि अक्सर होता है।दूसरा ये कारण भी था कि मुझे इसका कोई फायदा नहीं लगा क्योंकि यदि विचार जी ने पिछली पोस्ट पर टिप्पणियों को ध्यान से पढ़ा होता तो ये पोस्ट लिखने की जरूरत ही नहीं पड़ती पर कोई समझना ही न चाहे तो क्या किया जाए।पर ईमानदारी से कहूँ तो मैं इस पोस्ट पर आपकी ही टिप्पणी का इंतजार कर रहा था क्योंकि आपको लंबी टिप्पणी लिखने में महारत हासिल है।पर कितना फायदा होगा कह नहीं सकते।लेकिन हाँ वो टिप्पणियाँ गलती से उड़ गई होंगी।विचार शून्य जी ऐसा थोड़े ही करेंगें।

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    2. अंशुमाला जी मैंने हमेशा देखा है की आप अपने ब्लॉग पर बहुत मेहनत से लिखती हैं और उतनी ही मेहनत से आप दुसरे ब्लोग्स पर टिपण्णी भी करती हैं। आपके तर्क बहुत दमदार और सटीक होते हैं।
      ऐसे बेहतरीन टिप्पणीकार की अथक मेहनत पर पानी फेरने का अपराध मैं जानबूझकर तो कभी नहीं कर सकता। टिप्पणियाँ मेरी मुर्खता की वजह से डीलीट हो गईं। असल में कुछ भी लिखने के बाद मैं ब्लॉगर पर बार बार 'लॉग इन' नहीं करता परन्तु संजय जी और अदा जी की टिपण्णी स्पैम में जाने के बाद मुझे लगा की किसी तरह से इस स्पैम के झमेले को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया जाय। स्पैम तो ख़त्म नहीं हुआ पर पोस्ट की सारी टिप्पणियां ख़त्म हो गयी। ये विशुद्ध रूप से एक गलती है और इसके पीछे कोई दूसरी बात नहीं।

      मेरे लिए ब्लॉग्गिंग कोई साहित्य सृजन नहीं बल्कि किसी विषय पर अपने विचारों को बहुत से लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने का एक सुविधाजनक मंच है। मुझे ऐसा कोई भ्रम भी नहीं है की जो कुछ भी मैं सोचता हूँ वही सही है। विरोधी विचारों से मुझे सही और गलत की पहचान करने में आसानी होती है। इस रूप में पिछली पोस्ट पर की गयी आपकी और राजन जी की टिप्पणिया मेरे लिए अमूल्य थी जिन्हें खोने का मुझे बेहद खेद है।

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    3. अब मैं पिछली और वर्तमान पोस्ट के अपने विचारों को विस्तार देता हूँ। मुझे Slut walk aur Femen जैसे नारीवादी संगठन स्त्री अधिकारों के प्रति गंभीर नहीं लगते बल्कि मुझे तो इनके शुरुवात कर्ता ऐसे लोग लगते हैं जिन्हें आम नियम कानूनों को तोड़ने में मजा आता है और इसके लिए ये इस्लामिक पाबंदियों या किस पुलिस ऑफिसर के वक्तव्य का सार्थक बहाना खोज लेते हैं। मुझे ये लोग बाईकर्स गिरोह के सदस्यों के सामान लगते हैं जो ट्रेफिक पाबंदियों का मजाक उड़ने के लिए खुले आम बिना हेलमेट तेज बाइक चलाते हैं। ऐसे तत्व हर समाज में होते हैं। नारी अधिकारों की बात तो सिर्फ आड़ है इन लोगों का असल मकसद तो खुद को किसी तरह से खबरों के केंद्र में लाना होता है और इसके लिए कोई समाज विरोधी कार्य करना पड़े तो वो इनके लिए मन माफिक हो जाता है । फेमेन संगठन के शुरुवाती प्रदशन अंतःवस्त्रों में हुआ करते थे फिर खबरों की सुर्ख़ियों के बढ़ने के साथ साथ कपडे कम होते गये।
      पिछली पोस्ट पर अपनी टिपण्णी में अंशुमाला जी अपने लिखा था की विरोध स्वरुप बुरका उतर फैकाना आसान नहीं है, अगर ऐसा है तो चोली उतरना आसान कैसे हो गया। असल में इन लोगों को सिर्फ बुरका नहीं उतरना इन्हें अपने शारीर के सरे कपडे उतरने हैं।

      पिछली टिप्पणियों में शायद अदा जी ने इस विरोध प्रदर्शन को नमक सत्याग्रह के समकक्ष माना था। हमारे देश में नमक बनाने पर पाबन्दी थी तो विरोध स्वरुप नमक बनाया गया किसी ने इसके विरोध में बम बनाने की बात नहीं की। यहाँ तो बुर्के के विरोध में चोली उतरने की बात हो रही है जो मुझे अच्छा नहीं लगा और मैंने अपनी बात रखी।
      नारी स्वतंत्रता के मुद्दे पर जो भी बातें मैंने कही हैं वो सब जमीनी हकीकत को देख कर ही कही हैं। भारतीय नारीवादी संगठन भी उन्हीं मुद्दों को उठाते हैं जो उनके पश्चिमी माई बाप कहते हैं। ये संगठन इस दुनिया को ऐसे स्थान के रूप में चित्रित करते हैं जहाँ प्रत्येक स्त्री अत्याचार की शिकार और पीड़ित है। जमीनी तौर पर मुझे कहीं ऐसा नहीं लगता।
      स्त्री सुरक्षा के मुद्दे पर मैं रक्षात्मक रवैया रखता हूँ। स्त्री मादा देह के प्रति नर पुरुष के आकर्षण को कभी भी नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। मक्खी मच्चारों से बचने के लिए हम मच्छरदानी से खुद को दहकते हैं ना तो फिर बुरी नज़रों से बचने के लिए खुद को ढकने में क्या बुराई है । जिन चीजों को हम मूल्यवान मानते हैं उनकी सुरक्षा के लिए हम खुद ही प्रयत्नशील होते हैं। हम कभी भी चोरों की मानसिकता में परिवर्तन लेन के लिए आन्दोलन नहीं करते। चोर उचक्कों की बात पर आपका ज्ञानवर्धन कर दूँ की दिल्ली में बहुत बार जेबकतरे अपने शिकार को ही दोषी बना कर उसकी सरे आम पिटाई करवा देते हैं।

      जहाँ तक स्वतंत्रता की बात है तो इस दुनिया में कोई भी निर्बाध रूप से स्वतंत्र नहीं है। समाज समय और स्थान के हिसाब से हमें अलग अलग पाबंदियों का पालन करना ही चाहिए।

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    4. आपकी मच्छर वाली बात में दम है. मच्छर से बचना है तो मच्छरदानी ओढ लो, या फिर शरीर को किसी लेपन से सुरक्षित करो कि मच्छर विकर्षित हो. यह तो कोई बात नहीँ हुई कि मच्छर से विरोध दर्शाने के लिए या उसे सबक सिखाने के लिए चमडी ही छील कर एक तरफ रख दी
      जाय.

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    5. तो मतलब महिलाओं को यदि कपडों को लेकर चुनाव की आजादी हो और उसमें समाज का कोई हस्तक्षेप न हो तो सारी महिलाएँ सड़कों पर नग्न घूमने लगेंगी,ऐसा कुछ है क्या विचार जी और सुज्ञ जी ?यदि पुरुषों के मामले में ऐसा नहीं है तो महिलाएँ क्यों करेंगी? मच्छर मक्खी को उचित अनुचित का भेद पता नहीं होता पर फिर भी वो हमें नुकसान पहुंचाते हैं तो हम उन्हें मार डालते हैं।इंसान के मामले में तो छेड़छाड़ का दोष महिलाओं को दिया जाता है और पुरुषों के लिए इसे स्वाभाविक माना जाता है।यहाँ सोच बदलने की जरूरत है।पर यदि फेमेन वाले ये कहते हैं कि लड़कियों को नग्न या अर्द्धनग्न ही घूमना चाहिए और जो महिलाएँ अपनी इच्छा से इसके विपरीत करती हैं यानी पूरे कपडों में रहती हैं तो वह गलत है तो मैं भी उनका विरोध करता हूँ ।

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    6. राजन जी मुझे तो अपने आस पास नग्नता फैलती दिख रही है. मैं दिल्ली में रहता हूँ और जब भी सड़क पर निकलता हूँ तो बाइक्स पर बैठी लड़कियों के नग्न पिछवाड़े खुले आम दिखाई पड़ते हैं। लो जींस का ऐसा फेशन चला है की आप किसी भी बैठी और बैठती लड़की के पीछे से उसका भविष्य देख सकते हैं। ये सब इन नारीवादी संगठनों की हाय तोबा का ही परिणाम है। खुलापन तो हमारे देशी पहनावे में हमेशा से रहा है। राजस्थान गुजरात की चोली देखिये । केरल में चुन्नी का कोई रिवाज नहीं रहा है। मेरे उत्तराखंड में खेतों में काम करते महिलाओं को देखो जरुरत से ज्यादा बदन को कभी नहीं ढका जाता है। और तो और बदनाम हरियाणा के घाघरा कुर्ती को देखो क्या वहां खुलापन नहीं है। पर साहब हरेक पहनावे की अपनी मर्यादा और तरीका है। मुझे नहीं लगता की कोई भी हमारी इन माँ बहिनों को अपना शरीर ढ़कने के लिए कहता होगा। सवाल सिर्फ एक विशेष तरीके की वेशभूषा पर उठाये जाते हैं जो मुझे तो सही लगते हैं। सवाल उस संस्कृति पर उठाये जाते हैं जहाँ बेरोकटोक संबंधों की आजादी मांगी जाय, बेरोकटोक अधि रात तक पब्स में घुमाने की आजादी मांगी जाय। ये आजादी लड़का हो या लड़की किसी को भी नहीं दी जा सकती

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    7. :)

      राजन जी, मच्छर के मामले में काट्ने का अपराधी अवश्य मच्छर है साथ ही दोष मानव को भी दिया जाता है कि उसने मच्छर उपद्रव के सुरक्षा इंतजाम नहीं किए, मलेरिया पीडित ने भी सावधानी के नियमो को फोलो नहीं किया. उसी तरह कुंठित व कुटिल भावना वाले पुरूष तो दोषी है ही लेकिन उछ्रँखल व्यवहार करती लडकी को भी क्यों कुछ न कहा जाय?

      जिस ओर आपने इंगित किया, अवश्य ही वह सोच बदलने की जरूरत है। किंतु सोच बदलते हुए भी विवेक को स्थिर रखने की भी आवश्यकता है. दूरगामी परिणामों पर सोचना जरूरी है, यही विवेक है. देखना होगा कि किस व्यवहार का भविष्य पर क्या प्रभाव होगा. तीव्र प्रभाव के लिए पूर्णतः नग्न हो रहे है,आगे चल कर नग्नता के प्रति सम्वेदनाएँ समाप्त हो गई, प्रभाव कुँद हो गया, बे-असर हो गया तो फिर उससे आगे क्या करेँगे? फिर ध्यान खींचने के लिए क्या उपाय शेष रह जाएँगे? इस प्रकार के विवेक को अविचलित रखना आवश्यक है.

      वो तो फिर सीधा सीधा फतवा होगा, जिसके विरोध करने की बात आप कर रहे है. लेकिन क्या बिना किसी फतवे के आए, दूरगामी दुष्प्रभावो पर चिंतन ही छोड देना चाहिए?

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  12. अपनी टिप्पणी दुबारा पढ़ने पर एक डायलाग याद आ गया " जाओ पहले उसके साइन ले कर आओ जिसने मेरे हाथ पर ................." ही ही ही

    क्या करे आज कल सभी स्त्रियों के मुद्दे पर बड़े मजाक के मुड में है :)

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  13. आदर्श स्थिति में होना तो यही चाहिये कि आपके नोट बेशक दिखें लेकिन उन्हें हासिल करने, बिगाड़ने का, हथियाने का. हर किसी के मामले में यही होना चाहिये.

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  14. स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह
    http://sandoftheeye.blogspot.in/2012/08/blog-post_22.html

    http://rashmiravija.blogspot.in/2012/08/blog-post_23.html
    jara ye do post bhi padhe aap ko pata chalega ki choli pahanane ki aajadi ke lie bhi mahilao ko ladana pada tha or aap choli ko bhartiya sanskriti or na jane kis kis se jod rahe hai . ye dono post padhane ke bad aap ki pratikriya jarur janana chaungi samay mile to jarur kuchh kahiyega :)

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    1. Anshulama jee till Saturday I am not in familiar territory so right now i will not be able to say anything.Hope my absence will be pardoned :-)

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  15. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  16. हम्म ... मुझे एक बात याद आ गयी .. एक बार महिलाओं के हक़ के लिए सजग और उनके लिए हर मुमकिन तर्क देने वाली एक महिला घर अपने रोजमर्रा के काम में व्यस्त थी तभी नौकरानी के फेशनेबल कपड़ों में बाहर दिख रही स्किन पर उसका ध्यान गया .. एकांत में मालकिन में नौकरानी से कहा "अगर काम पर आना है तो ढंग के कपडे पहन कर आया कर। ये [आपत्ति जनक संबोधन] जैसे कपडे नहीं चलेंगे यहाँ" .. अक्सर ऐसा ही होता है .. हम कहने को कुछ भी कह देते हैं लेकिन जब बात अपने पर आती है तो मामला कुछ और होता है|

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  17. दीप जी आपकी पोस्ट्स इनदिनों महज फेमेन पर ही आधारित है। फेमेन सिर्फ एक संस्था है, जिसमें तीन सौ से ज्यादा सदस्य भी नहीं हैं, और प्रदर्शन में भी इन-गिने प्रदर्शनकारी ही भाग लेंगे, जो नारी गत समस्याओं की तरफ, पुरुषप्रधान समाज का ध्यान आकृष्ट करने के लिए, लीक से हट कर कुछ कर रही है। शायद यह रैली दो दिन चले या चार दिन चले। लोग देखेंगे, कुछ कहेंगे बात ख़तम हो जायेगी। शायद इसका कुछ असर हो, शायद न भी हो। और फिर स्तन दिखाना कोई बड़ी बात नहीं हैं। मैं रांची की रहने वाली हूँ, आदिवासियों के बीच ही रही हूँ, बचपन में यही देखा है, आदिवासी महिलाएं ब्लाउस पहनती ही नहीं थीं। आज भी बहुत सी ऐसी जनजातियाँ हैं जो बहुत कम कपडे पहनती हैं। माताओं को स्तन-पान कराते हम सबने देखा है। इसमें इतनी विचित्र बात क्या हो गयी ?? अगर आप इस विरोध की मंशा को समझेंगे तो कुछ भी बुरा नहीं लगेगा। यहाँ विदेश में बिकनी पहनना बहुत आम है, इसलिए ये मुद्दा इतना भी बड़ा नहीं है जितना आप इसको बना रहे हैं। फिर यह प्रदर्शन तो विदेश में हो रहा है आप क्यों परेशान हैं। दिल्ली की सडकों पर होता तब मैं समझ सकती थी की दिल्ली वालों की नींद हलकान होने वाली है, यहाँ तो ऐसा लग रहा है जैसे 'क़ाज़ी जी दुबले क्यों हुए, तो शहर की चिंता में' यह एक बहुत ही छोटा और नगण्य प्रयास है, विरोध का।

    अक्सर मैंने देखा है, स्त्री विमर्श के मामले में बात हमेशा मुद्दे से भटक जाती है। हम स्त्री-विमर्श की जगह पुरुष-विमर्श करने लगते हैं। नारी की समस्या फेमेन से कहीं बड़ी है। इस समस्या को आप फेमेन के झंडे तले लाकर इसे छोटा बनाने की कोशिश न करें। नारीगत समस्या कपड़ों की नहीं है, न ही देह की है। आपने अपनी खुद के जितने भी बंधनों की बात कही है, उन सभी बंधनों को स्त्री भी उतना ही स्वीकारती है, जितना आप। लेकिन साथ ही स्त्री को उतना ही अधिकार चाहिए जितना आप पुरुषों को मिला हुआ है। मतलब साफ़ है, उतने ही बंधन जितने आपको मिले हैं और उतना ही अधिकार जितने आप को मिले हैं। न कम न बेसी।

    मैंने कई बार लिखा है, बेटी का पिता की संपत्ति पर अधिकार मिलना ही चाहिए, लेकिन इस मामले में ब्लॉग का पुरुष समुदाय, ठीक वैसे ही मौन साधे हुए हैं जैसे हमारा समाज। सब आ तो जाते हैं, स्त्री विमर्श के मुद्दे पर तंज़, हमदर्दी, विश्लेषण और न जाने क्या-क्या भाषण बाज़ी करने लेकिन अभी तक कोई माई का लाल नहीं आया यह कहने की, नारी के उत्थान की पहली सीढ़ी माता-पिता के घर से ही शुरू होनी चाहिए। हाँ हर बेटी को अपना भविष्य बनाने का सुअवसर वैसा ही मिलना चाहिए, जैसे बेटे को मिलता है, उसे भी पिता की संपत्ति में पुत्र के बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए। ये बात कोई क्यों नहीं कह रहा है ? सब मौन क्यों साधे हुए हैं ? कहाँ गयी आप लोगों की ईमानदारी और नेकनीयती ? क्या यह मांग गलत है ? स्त्री देह पर न जाने कितने पोस्ट्स, कितने विमर्श, कितनी जाने हलकान हुई पड़ी हैं यहाँ। सबको संस्कृति की नैया डूबती नज़र आ रही है। इसलिए न क्योंकि स्त्री देह विमर्श में उनका कुछ नहीं जा रहा है, किसी और की बीवी और किसी और की बेटी, जितनी मर्ज़ी कलम चला लें, पल्ले से तो कुछ नहीं जा रहा है। लेकिन संपत्ति में हिस्सा देने में तो खुद का अंटी ढीला हो रहा है ना। इसलिए सबका मुंह खपा हुआ है। हिम्मत है तो कोई इस बात का जवाब दे। और ये बेकार की बात कोई न करे कि स्त्री को तो ससुराल में भी मिलता है, जो यह ओछी दलील देगा वो मुझे इस बात का भी जवाब देगा, जब स्त्री के अपने पिता-भाई ही कुछ नहीं देते , उसे ससुराल वाले काहे कुछ देने लगे, और ये भी बता देवे कोई की किस किस ने अपनी पत्नी या बहू के नाम जायदाद लिखवा दिया है अब तक। और हाँ एक बात और, क्या आप दहेज़ देने के बदले जायदाद में हिस्सा देने के लिए तैयार हैं अपनी बहन-बेटी को ?? ई भी बताइयेगा ज़रा।

    हाँ नहीं तो !

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  18. सभी पाठकों ने अपने-अपने विचार दिए अंशुमाला जी ने नारी होने का परिचय दिया तो बाकि लोगों ने भी अपने पौरुष को जताया । सबकी बातें अपनी जगह सही थीं । प्रकृति परमात्मा का दिया हुआ एक अनमोल उपहार है और अब मानव ने अपने बौद्धिक पराक्रम को दिखाते हुए प्रकृति को भी चुनौती देने का महान कार्य कर लिया है. खेतों की ठंडी हवा अब एसी की हवा से बदली जा चुकी है, तजा पानी हीटर के पानी से और भी न जाने बहुत से तरीकों से प्रकृति को अंगूठा दिखाया जाता है. पर प्रकृति उन्ही जीवों का चुनाव करती है जो उसके अनुकूल हैं ।

    पाश्चात्य के लोगों के नग्न घूमने को अच्छी मानसिकता का सूचक मन जाता है. यहाँ लोग दुहाई देते हैं की देखो वहां के लोग कितने आगे निकल चुके हैं मानसिकता में। ऐसी मानसिकता की दुहाई देकर भारतीय संस्कृति का जो खुले आम बलात्कार किया जाता है क्या वह सराहनीय है ? नारी के साथ शक्ति शब्द का प्रयोग कर लेने से नारी को शक्ति नहीं मिल जाएगी । प्रकृति का नियम है पुरुष का स्त्री के प्रति आकर्षण स्वाभाविक है। पहले लोग प्रकृति की हद में रहते थे तो पुरुषों की मानसिकता इतनी ओछी नहीं थी पर प्रकृति से साथ खिलवाड़ करके मनुष्य ने सब कुछ असंतुलित कर दिया है। योग, साधना जैसी संजीवनियों का रसास्वादन कौन करता है ? हर बात के होने का एक पर्याय है. हर किसी का एक कार्य है जिसके लिए उसकी उत्पत्ति हुई है पर केवल मानसिकता का ठेका लेकर लोग मर्यादा को खुले आम तोड़ेंगे तो आप कितने ही संगठन बना लें कोई फायदा नहीं है। सोच बदलना अच्छी बात है पर क्या ताली एक हाथ से बजेगी ? ये तो वही बात हुई कि अप भरे हुए क़ुए में बाल्टी भी डाल रहे हो और बाल्टी में पानी न भरने की दुआ भी कर रहे हो ।

    मैं नारी जाति का सम्मान करता हूँ पर केवल मानसिकता के अधर पर पाश्चात्य संस्कृति अपनाना कुछ अटपटा लगता है । एक उदाहरण देना चाहूँगा : जो चीज जहाँ प्रारंभ से होती आ रही है वह वहां सामान्य है पर क्या जरुरी है वही चीज़ दूसरी जगह हो तो अच्छे ही परिणाम आएंगे। पाश्चात्य देशों में लोगों ने तकनीक के क्षेत्र में भी बहुत कुछ हासिल किया है क्या हम उस बात की होड़ न करें ? या फिर जब तब पूरा भारत नग्न नहीं हो जाता इसी मानसिकता की दुहाई दी जाएगी की विदेशों में तो लोग जैसे चाहे घूमते हैं । वे लोग आपस में ही सम्बन्ध बना लेते हैं रिश्तों में भी। क्या इन्ही संबंधों को हम भारत के भविष्य के रूप में देखना चाहते हैं ? नारी को सम्मान का पूर्ण अधिकार है उसके द्वारा किए गए त्यागों एवं ममता का ऋण कभी नहीं चुकाया जा सकता है । पर सम्मान किसी से माँगा नहीं जाता है खुद ही बनाया जाता है।

    इन्सान प्रकृति से खिलवाड़ न करे और योग साधना का प्रयोग करे तो आत्म-संयम नाम की संजीवनी को पाया जा सकता है। नारी को भी सम्मान मिले और पुरुषों को भी, वही एक अच्छे समाज की पहचान है। नारी को स्वतंत्रता का अधिकार है पूर्ण अधिकार है परन्तु उन्हें भी समझदारी से काम लेना चाहिए। एक लड़की सूट में और एक महिला साड़ी में जितनी खूबसूरत लगती है वो कितनी भी जीन्स पेहेन ले कितना भी फैशन करले बराबरी नहीं कर सकती। सादगी में ही सुन्दरता है और उस सुन्दरता को हवस नहीं सम्मान की नजरो से देखा जाना चहिये।

    मेरी उम्र का तजुर्बा अप सभी लोगों से अभी बहुत कम है परन्तु मेरे मन के विचार रखने का प्रयास किया है । किसी के दिल को ठेस पहुचने की कोई मंशा नहीं है । आशा है मैं सही जगह पंहुचा हूँ ।

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  19. दीप जी,

    पूरा नारी विमर्श देह प्रदर्शन से हट्कर, सम्पत्ति ध्येय केन्दित हो गया है। अगर नारी सशक्तिकरण पिता की सम्पत्ति के हिस्से पर ही आधारित है तो पिता की सम्पत्ति में हिस्सेदारी का कानून मौजूद है। यदि पुत्री क्लेम करे तो ब्लॉग का पुरुष समुदाय क्या कोई भी पुरूष इन्कार नहीं कर सकता। हमारे यहाँ तो परम्परा है कि बेटी को उसके हिस्से से भी अधिक सहायता पहूँचाने का चलन रहा है। यदि किसी पिता के पास बचत हो जिसे वह विवाह पर खर्च करे और सम्पत्ति हो ही नहीं तो क्या देगा? ऐसे में हमारी परम्परा में अभावी पिता की जिम्मेदारी पुत्र और पौत्र तक निभाता है। आगे चलकर जब कभी भी पुत्र आर्थिक सबल बनता है, बहन के अधिकार को अपने पर कर्ज समझ कर मायरा नूतर व आणा के स्वरूप में बहन तक अपना अवदान, अंशदान पहूँचाता है। बाकि रह जाय तो पोत्र तक यह फर्ज निभाता है। कहीं किसी स्वार्थी मनोवृति से न देने के अपवाद मिल सकते है वहीं फर्ज पूरा करने वालों को समाज में अच्छी नजर से देखा जाता है। किसी बाप के पास बांटने लायक सम्पत्ति ही न हो तो कैसे दिखाएगा ईमानदारी और नेकनीयती ? किसी के एक ही बेटी हो तो पूरी सम्पत्ति ही उसकी होगी। कोई बाप अगर अपना पुस्तैनी मकान पुत्र को दे और उसी मूल्य का धन पुत्री को दे तो क्या विभाजन ही लादना जरूरी है? कहीं तीन पुत्र और एक पुत्री हो और पुत्र संयुक्त परिवार में रहना चाहे तब भी पा्र्टीशन अनिवार्य बना दिया जाय? अगर लोगों को लगता है कि विभाजन से ही नारी सशक्तिकरण आएगा, आने-पाई का हिसाबी हिस्सा लेने से ही नारी सबलता आएगी और यही सशक्तिकरण का उपाय है तो वहाँ माननीय SHOBHA GUPTA जी का एक कमेंट है "दाउदी बोहरा समुदाय में परम्परा से बेटियों को दहेज़ न दे कर सम्पत्ति में हिस्सा मिलता है" जब यह तथ्य प्रत्यक्ष है तो इस समुदाय में नारी की सबलता और शक्ति के आंकडे जुटा कर अध्ययन होना चाहिए। और वहाँ यह प्रयोग त्रृटि रहित सफल पाया जाय तो एक मात्र इस उपाय को महत्व देते हुए, बढ़-चढ कर सभी जगह अनिवार्य किया जाना चाहिए।

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    1. दो मित्र बात कर रहे थे पहले ने दुसरे से कहा, कल अमेरिका में बम विस्फोट हुआ है तो दूसरा बोला यार तुम्हारी बम की बात से भाभीजी याद आ गयी बताओ उनकी तबियत कैसी है।

      जब नोटों की बात होगी तो सुज्ञ जी, संपत्ति की बात बीच में आना स्वाभाविक ही है।

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    2. आदरणीय सुज्ञ जी
      आपने मेरी टिप्पणी का अर्थ कुछ और लगा लिया. मैं तो बस ये कहना चाहती थी कि बोहरा समुदाय की परम्परा को अन्य समुदाय भी अपना सकते है.

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    4. शोभा जी, मैं आपकी बात का समर्थन ही करता हूँ, तथ्य अनुकरणीय ही है. लेकिन केवल इसी में समाधान देखने वालों को परिणाम और प्रभावों पर संशोधन चिंतन करने में आखिर हर्ज ही क्या है?
      सकारात्मक परिणाम आते है तब तो सशक्तिकरण के लिए इधर उधर अनावश्यक श्रम करने से भी बच सकेंगे. यही अभिप्रायः था. विश्लेषण मात्र का.

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    5. सुज्ञ जी,यदि हिस्सा मिलेगा तो नुकसान की बजाए फायदा ही होगा इसमें परीक्षण की क्या जरूरत ?पर कुछ बातें सोचने की है।आजकल ज्यादायतर दंपत्ति के एक बेटा या एक बेटी ही होते हैं।हम दो भाई हैं बहन हैं नहीं तो शादी के बाद हम दोनों की पत्नियों के मायके से हिस्सा मिलेगा वो आएगा ही ?और हमें देना कुछ है ही नहीं(हालाँकि इस मामले में इच्छा पत्नी की ही सर्वोपरि होगी)मैंने अदा जी के ब्लॉग पर ये ही कहा कि कोई कुछ सोचता नहीं जैसा पहले से चलता आ रहा है वही लोग करते रहते हैं।अब ये भी कहीं सुनने को मिला कि जहाँ दो तीन या ज्यादा बेटियाँ और एक बेटा है बेटों को बहुत कम हिस्सा मिलेगा इसलिए उन्हें जोर आता है लेकिन सच यह है कि ऐसे मामलों में बेटियाँ कुछ माँग नहीं करेंगी क्योंकि यहाँ या तो संपत्ति नाममात्र की होती है या होती ही नहीं और पिता इतना कर्ज छोड जाते हैं कि बेटा जीवन भर ब्याज ही चुकाता रहता है।पर जहाँ बेटियों को फायदा लगे पहल उन्हें ही करनी होगी।धीरे धीरे ये समाज में सामान्य हो जाएगा।पिता यदि संपत्ति बेटो के नाम करे तो बेटी कुछ नही कर सकती।पिता वसीयत किए बिना मरे तो दावा कर सकती है।भाइयों को उनका हक उन्हें देना चाहिए।

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    6. राजन जी, मैं नुक्सान का कह ही नहीं रहा, निश्चित फायदा होगा। लेकिन जब इस उपाय को नारी सशक्तिकरण के सटीक और अन्तिम उपाय की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है ऐसे में उपाय का सशक्त होना आवश्यक है तब परीक्षण नहीं,किन्तु तथ्यों का विश्लेषण कर उपयोगी व निर्णायक तो साबित किया ही जा सकता है।

      बचत, नि्वेश सम्पत्ति आखिर होते किसलिए है। यह इसलिए है कि सम्भावित असम्भावित बडे खर्चों से निपटा जा सके। सब कुछ ठिक ठाक होने की दशा में पिता बेटी को उसके हिस्से के अनुपात से ही देने का प्रयास करता है। परम्परा अनुसार तो पिता के कर्तव्य पूर्ण करने के बाद भी भाई द्वारा सहयोग का प्रवाह जारी रहता है जब जब जरूरत पडती है और परिस्थिति रहती है उस दशा में। लेकिन पिता की सम्पत्ति में इस कानूनी अधिकार के मांग पर फुलफील हो जाने के बाद आगे के कर्तव्य सहज ही सम्पन्न मान लिए जाते है और रिश्तों की उष्मा भी ठडी पड जाती है। खैर यह तो सम्भावनाएं मात्र है।

      असल में स्त्री की आर्थिक सम्पन्नता मात्र इसलिए आवश्यक है कि जरूरत पडने पर उसे किसी के भी आगे हाथ न फैलाना पडे और अपने जीवन आवश्यकताओं पर खर्च अपने निर्णयों से कर सके। लेकिन जो जो स्त्रीधन (दहेज उपहार) आदि के साथ होता है, पति उस पर अपना अधिकार जमा सकता है तो इस सम्पत्ति के साथ भी यही सब होने की सम्भावनाएं तो रहती ही है। उससे धन बरगला कर भी प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए सशक्तिकरण धन में नहीं, स्त्री के स्वयं के मनोबल में छिपा हुआ है।

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    7. राजन जी,मैंने अदा जी के ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया देखी थी, मै आपके निष्कर्षों से सहमत हूँ। मैं वहां टिप्पणी इसलिए नहीं कर रहा कि मेरा दृष्टिकोण सर्वथा भिन्न है। एक तरह से विरोधार्थ में ही। मैं बार बार विरोध करके उन्हें आहत नहीं करना चाहता।

      यह चर्चा करने का दूसरा कारण जरा हल्का फुलका है… :)

      मैं बिन्दास पुरूष पक्ष का संरक्षण कर सकता हूँ क्योंकि ऐसी चर्चाओं में हमारे विचारों की ऐसी तैसी करने वाली तेज तर्रार रचना जी वोटींग माहोल में पंगा लेना नहीं चाहेगी। :))) (रचना जी, परिहास है।)

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    8. मैं इस मामले में सुज्ञ जी से पूरी तरह से सहमत हूँ। अदा जी की पोस्ट पर अपनी प्रथम प्रतिक्रिया व्यक्त करने तक मुझे बहुत देर हो चुकी थी वर्ना मैं तो अपना पक्ष वहीँ रख आता। मेरा अपना अनुभव ये है की शादी शुदा लड़की से ज्यादा उसके ससुराल पक्ष के लोग उसके पिता की संपत्ति में लालच रखते हैं। ससुराल पक्ष के लिए ये एक प्रकार से एक्सटेंडेड दहेज़ ही है। जब तक आप स्त्री को मानसिक व आर्थिक रूप से सशक्त नहीं बनाओगे ये धन का लेन देन चाहे वो दहेज़ रूप में हो या पिता की संपत्ति में हिस्से के रूप में उसके काम नहीं आयेगा। दिल्ली में मेरे ख्याल से कुल एक तिहाई कारपोरशन के सीटें महिलाओं के लिए अरक्षित हैं पर असल में सत्ता उनके पति चला रहे हैं। ऐसे ही आप जयादा दहेज़ दो या पिता की पूरी संपत्ति ही लड़की के नाम कर दो उनका कुछ भला नहीं होना। अपने सुना ही होगा पुट सपूत तो क्या धन संचय पूत कपूत तो क्या धन संचय। इसी तरह मैं कहूँगा स्त्री मन से सबल तो का सहारा और दुर्बल तो का सहारा।

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  21. आइये बकवास जारी रखें-दरअसल मैंने अपना उदाहरण (पत्नी का संपत्ति में हिस्सा) इसीलिए दिया था कि मेरे मन में यह बात पहले कभी आई ही नहीं अभी आई जब इस पर बात चली।यानी इसके साथ और कई बातें जुड़ी हुई हैं।मामला इतना सीधा नहीं है जितना समझा जा रहा है।परन्तु मैं आप दोनों से भी सहमत नहीं हूँ क्योंकि यदि हम ये सोचने लगे कि बेटी के ससुराल वाले कैसे होंगे तब तो बेटी को पढाना लिखाना यहाँ तक कि उसका विवाह करना भी लोग बंद कर देंगे।आखिर एक नालायक बेटे को भी उसका हिस्सा मिलता ही है।पर ये सच है कि इस संबंध में सोचते हुए ये बात स्वमेव दिमाग में आ ही जाती है।कोई बीच का रास्ता निकल आए तो बेहतर होगा वर्ना तो जैसे जैसे समाज बदल रहा है सब इसके चलन के हिसाब से बदलता ही रहेगा।माफी चाहता हूँ 'प्रत्युत्तर' विकल्प का प्रयोग नहीं कर पा रहा हूँ इसलिए नीचे टिप्पणी प्रकाशित कर रहा हूँ।

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  22. राजन जी,

    सम्पत्ति के दुरपयोग की बात उस तर्क से आई है कहा गया है कि दहेज तो पति या ससुराल के कब्जे में चला जाता है इसलिए सम्पत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए……

    फिर भी धन सम्पति और शिक्षा में बहुत अन्तर है। बात सबल बनने की चल रही है इसलिए सम्बंध बिगड़ने की दशा में महिला से धन सम्पत्ति छीन कर उसे निराधार किया जा सकता है किन्तु शिक्षा छीनी नहीं जा सकती। अधिक से अधिक वह साथ रहे तब तक उसकी आय छीनी जा सकती है किन्तु शिक्षा के कारण महिला स्वतंत्र अपनी आय उपार्जित कर सक्षम बन सकती है।

    अभिप्राय यह भी नहीं है कि प्रत्येक ससुराल ऐसा ही करता है और निराधार ही छोड देता है जिसके भय से विवाह ही न किया जाय। बात सशक्तिकरण की है तो उसके हाथ में साधन भी ऐसे होने चाहिए जो वास्तव में सशक्त भी हो और किसी भी दशा में सबल रखने का माद्दा रखते हों।

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  23. बहुत अच्छे जनाब.... कईयों के मन की बात कह गए आप....

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