रविवार, 15 मई 2011

Toilet musings.

मेरे एक अफसर हैं जिनकी जैविक घडी शायद सामान्य समय से लगभग ४-५ घंटे देरी से चलती है अतः जो कार्य उन्हें सुबह ६-७ बजे घर पर ही निबटा देना चाहिए उसे वो अक्सर ११-१२ बजे ऑफिस में निबटा रहे होते हैं. सुबह ऑफिस पहुचने के उपरांत मैं जब पहली बार मूत्र विसर्जन हेतु जाता हूँ जो उनके मलालय ( नहीं समझे ... अरे यार मूत्रालय का बड़ा भाई) में मिलने  की संभावना का प्रतिशत बहुत उच्च कोटि का  होता है (मुझे कहीं से आवाज आ रही है ..... बेटा माँतृ भाषा को तो बक्श दे.. पर ये आवाज कुछ साफ़ नहीं है इसलिए जारी रहता हूँ...)

अपने अफसर को मैं मौखिक हजारी यहीं दे देता हूँ जिसे वो बेहिचक स्वीकार भी कर लेते हैं..लेकिन सिर्फ अंग्रेजी में.  शुरू में मैं उन्हें राम राम जी कहता था तो वो नाराज हो जाते थे इस लिए अब गुड मोर्निंग सर से ही काम चलाता हूँ.


मेरे ऑफिस में भारतीय तरीके की लेट्रिन नहीं बल्कि विशुद्ध अग्रेजी तरीके की लेट्रिन बनी हुई हैं जिनमे कुर्सी की तरह बैठा जाता है.  मुझे लगता है की मेरे ऑफिस की वो लेट्रिन सीट जहा मेरे भरी भरकम अफसर विराजते हैं अब तक तो उनकी तशरीफ़  के आकार को प्राप्त हो चुकी होगी. भगवान न करे अगर उस टोइलेट में कोई अपराध हो गया तो पुलिस वाले मेरे ऑफिसर को पकड़ लेंगे क्योंकि उनके  पिछवाड़े  के निशान वहां आसानी से मिल जायेंगे.

वैसे क्या आपने  कभी विचार किया है की जैसे बड़े बड़े महापुरुष  अपने कदमों के निशान छोड़ जाते हैं वैसे ही वो अपने  पिछवाड़े के निशान क्यों नहीं छोड़ जाते. मैंने बहुत से तीर्थों में महापुरुषों के चरण चिन्ह देखे हैं. जब चरणों के निशान इतनी आसानी से मिल जाते हैं तो उनके पिछवाड़े के निशान तो और भी आसानी से मिल जाने चाहिए. वो क्यों नहीं मिलते ? जरा सोचो अगर मिलते तो गाइड हमें बताता "फलां महापुरुष ने इस जगह पर बैठ कर वर्षों कठोर तपस्या की थी और इस वजह से यहाँ पर उनके नितम्ब चिन्ह बन गए. इन्हें शीश नवाइए" और लोग बाग़ श्रद्धावश  उन चिन्हों पर अक्षत रोली चढ़ा रहे होते और धुप बत्ती की जा रही होती. 

ओहो मैं थोडा भटक गया..  ऑफिस के अंग्रेजी टोइलेट पर वापस आता हूँ.... हाँ तो मैं कह रहा था की मेरे ऑफिस में यूरोपियन मूल  के मल-पात्र लगे हुए हैं. इन्हें देख कर मुझे बड़ा अजीब सा महसूस होता है. जब हम लोग एक दुसरे का तौलिया तक इस्तेमाल नहीं करते तो उस मल पात्र को सार्वजनिक रूप से कैसे बाट लेते हैं जो हमारे सबसे गुप्त अंग को अंग लगता है. कई बार लोग  इन पात्रों का इस्तेमाल मूत्र त्याग के लिए भी कर लेते  है. अगर कोई कोई मल या मुत्रत्यागी अच्छा निशानेबाज  न हुआ और अपना सर्वस्व वहां पर  बिखेर जाय जहाँ पर व्यक्ति बैठता है तो सोचिये बाद में बैठने वाले की तो हो गयी  न ऐसी की तैसी.  इसलिए साहब  मुझे तो जब भी इन अंग्रेजी मल पत्रों का इस्तेमाल करने की मज़बूरी होती है तो मैं अपना देशी तरीका ही अपनाता हूँ.

मल त्याग का सर्वाधिक सुरक्षित तरीका.



वैसे सुबह के  वक्त मूत्रालय में भी शो हाउस फुल चल रहा होता है क्योंकि सुबह की घर की चाय अब तक त्याग दिए जाने की अवस्था को प्राप्त हो चुकी होती है इसलिए मेरे बहुत से सहकर्मी टोइलेट में नेफ्थालिन की बाल्स के साथ मूत्र पोलो खेलते हुए मिल जाते हैं.बचपन में भी हम लोग खुले में पेशाब करते हुए एक जगह पर खड़े होकर गोल गोल घुमने लगते थे. इससे हमारे चारों तरफ  एक घेरा बन जाता था. हम बच्चे लोग अक्सर ये शर्त लगते थे की किसका घेरा पूरा गोल और सबसे बड़ा बनेगा. ... उफ़ वो भी क्या दिन थे. ये ऐसे खेल हैं जो सिर्फ पुरुष ही खेल सकते हैं.(....अफ़सोस.... यहाँ पर कट्टर नारीवादी समानता के अधिकार की मांग नहीं कर पाएंगे ). हम भारतीय लोग तो यहाँ भी पिछड़े हुए जीव हैं . देखिये अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में कितनी प्रगति कर ली है की मूत्र- पात्र में स्कोर बोर्ड भी लगा दिया हैं.





गूगल पर इन तस्वीरों को खोजते वक्त मुझे अजब गजब तरीकों के मूत्रालय डिजाइनों के दर्शन हुए. इन अंग्रेजों की रचनात्मकता का भी कोई जवाब नहीं. ये लोग जीवन के हर पक्ष को रंगीन बना देते हैं. जरा मुलाहिजा फरमाएं .


एकांत से भयभीत रहने वालों के लिए.

कलात्मक अभिरुचि रखने वालों  के लिए 1

कलात्मक अभिरुचि रखने वालों  के लिए 2

for the mama's boys

जगह की बचत

सब कुछ नाप तोल कर करने वालों के लिए

उत्तर या उत्तर पूर्व  दिशा के लिए वास्तु अनुकूलित  मूत्र पात्र  

शोले के बिना हाथ वाले ठाकुर के लिए रामू काका द्वारा  विशेष रूप से निर्मित मूत्रालय.

एक अनबुझी प्यास


पोस्ट कुछ ज्यादा लम्बी हो गयी. सब कुछ सहेजते सहेजते बहुत वक्त लग गया है इसलिए मैं तो चला... वहीँ जहाँ मेरे जैसे त्यागी महापुरुष सुबह श्याम नियमित रूप से जाते हैं. 


शनिवार, 14 मई 2011

why should boys have all the fun ?


मेरी बिटिया तीन वर्ष की है और पुत्र उससे लगभग छह वर्ष बड़ा. जब भी बेटा अपने मित्रों के साथ खेलने जाता है तो बेटी अपने खेल खिलोने और सहेलियों को छोड़ उसके साथ हो लेती है. बड़ा भाई अपने दोस्तों के साथ कोई भी खेल खेले छोटी बहिन उसमे भागीदारी करना चाहती है जिससे बड़े भाई को बहुत खीज होती है.

जितना सहज छोटी बहना का अपने बड़े भाई के साथ खेलने की जिद करना है उतना ही सहज बड़े भाई का छोटी बहना की उपस्थिति से खेल में पड़ने वाले व्यवधान पर खीजना भी है अतः मुझे दोनों के बीच में आना पड़ता है. बड़े बच्चों के भागा-दौड़ी वाले खेलों के बीच पुत्री की सुरक्षा की चिंता रहती है इसलिए मैं अक्सर उसे वापस घर ले अत हूँ जिसका मेरी नन्ही बिटिया प्रचंड विरोध करती है.

मुझे लगता है की अगर मेरी बिटिया में जरा भी समझ विकसित हुई होती और उसे पता होता की वो एक लड़की है और उसका भाई एक लड़का तो निश्चय ही उसने मेरे ऊपर नारी विरोधी होने का आरोप जड़ देना था और मुझ से पूछना था की पापा why should boys have all the fun.......

जरा याद करें प्रियंका चोपड़ा का वो विज्ञापन जिसमें वो स्कूटी चलती मासूम शरारतें करते हुए सभी युवा लड़कियों को ये मंत्र दे जाती हैं की केवल लड़के ही मजे क्यों करें......

मैंने महसूस किया है की आज की युवा लड़कियों ने प्रियंका चोपड़ा के इस मंत्र को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ग्रहण किया है. बहुत बार मैंने युवतियों को ये कहते हुए सुना है की अगर लडके ये काम कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं. हमें भी आजादी चाहिए, बराबरी चाहिए या लड़कियाँ लड़कों से कम नहीं हैं . इस तरह के तर्क मुझे कभी भी हज़म नहीं होते.

समाज के पढ़े लिखे वर्ग में बहुतायत से मिलाने वाले नारीवादियों के विचारों को पढ़ने और सुनाने के बाद मुझे लगता है की स्त्री के सम्बन्ध में आजादी,मुक्ति, समानता, बराबरी जैसे शब्दों को गलत अर्थों में समझा जा रहा है.

शौचालय का प्रयोग न करके सड़क के किनारे मूत्र विसर्जन कर रहे एक आदमी से जब पूछा गया की वो ऐसा क्यों कर रहा है तो उसका जवाब था की देश आजाद है अब हम जो चाहे, जहाँ चाहे कर सकते हैं. आजादी का कुछ ऐसा ही अर्थ ये नारीवादी लगते दीखते हैं. हमें विवाह के बंधन से मुक्त कर लिव इन रिलेशन की आजादी दो. शरीर पर कम से कम वस्त्र धारण करने की आजादी दो. पार्कों में खुल कर प्रेम करने की आजादी दो. बहुत से परुष मित्र बनाने की आजादी दो. एक बार एक महिला को आपत्ति थी की लोगों ने उनके द्वारा किसी उम्रदार पुरुष को गले लगाने की बात को याद रखा. तब मुझे लगा था की उन्हें भी इस बात की आजादी चाहिए थी की वो जब चाहें किसी को भी गले लगा लें.

स्त्री पुरुष के बीच जब भी समानता की बात होती है तो कहा जाता है की आज की आधुनिक नारी पुरुषों का हर क्षेत्र में मुकाबला कर रही है. वो पुरुषों की तरह छोटे बाल कटा पेंट शर्ट पहन रही है. वो बच्चे घर में छोड़ काम पर जा रही है. वो रेल चला रही है, वो हवाई जहाज उड़ा रही है, वो ट्रक चला रही है इत्यादि इत्यादि. मुझे समझ नहीं आता ये कैसी बराबरी है. कभी ऐसा न हो की बराबरी की इस होड़ में कोई दिन ऐसा भी आए जब कोई महिला सार्वजनिक रूप से ये कहे की आज से उसने दाढ़ी बनाना शुरू कर इस क्षेत्र में भी पुरुषों का एकाधिकार ख़त्म कर दिया है.


जाने क्यों मुझे नारी स्वतंत्रता और समानता की हर बात में नारीवादियों की सोच micro से हटकर macro की तरफ झुकती नज़र आती है.


जब से मैं एक बिटिया का पिता बना हूँ तो मैं बहुत गहराई से इस विषय में विचार करता रहता हूँ की एक एक लडके और लड़की में किन किन बातों की समानता होनी चाहिए और दोनों को कितनी स्वतंत्रता दी जानी चाहिए. मेरा ये मानना है की जो स्वतंत्रता एक लडके को दी जा सकती है ठीक उसी स्तर की स्वतंत्रता और समानता एक बेटी को नहीं दी जा सकती. उदहारण के लिए मैं दिल्ली की सडकों पर रात में अपने बेटे को तो अकेले भेजने की इजाजत दे सकता हूँ पर अपनी बेटी को कभी भी अकेले नहीं जाने देना चाहूँगा. मैं सेना की लड़ाकू टुकड़ी में तैनाती के लिए अपने बेटे को तो भेज सकता हूँ पर अपनी बेटी या देश की किसी भी बेटी को नहीं भेजना चाहूँगा.

इस विषय पर कितना विचार करू और कहाँ तक करूँ समझ ही नहीं आता अतः लगता है की यहाँ मुझे भी दीपक चोपड़ा के सात अध्यात्मिक नियमों में से एक अनिर्णय की स्थिति में रहने के नियम का पालन करना पड़ेगा. चलो इस विषय को यूँ ही छोड़ देते हैं. जो होगा जब होगा देखा जायेगा

शुक्रवार, 13 मई 2011

मुझे माफ़ करें मैंने कोशिश तो बहुत की पर चुप रह न पाया.

जब से खुशदीप सहगल जी कि देश कि बेटियों को सेल्यूट करती पोस्ट और उसमे दिए लिंक के जरिये असीमा भट्ट जी के पिता कि स्थिति जानी हैं तब से मेरा अव्यवहारिक मन अभी तक शांत नहीं हुआ है. इस पोस्ट में मुझे जो बात सबसे ज्यादा अखरी है वो है सुरेश भट्ट साहब का अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वृद्ध अनाथालय में गुमनामी की  जिंदगी गुजारना. मन में बार बार ये ख्याल आता रहा कि इस दुनिया में ऐसे क्या  कारण हो सकते हैं   जिनके तहत एक व्यक्ति अपने जीवन के संध्याकाळ कि उस बेला में जब वो शारीरिक रूप से अक्षम हो चुका हो  और जिस वक्त उसे परिवार और संतान के सहारे कि सख्त जरुरत  हो , उनके प्यार, सेवा और  संरक्षण से वंचित हो  कहीं दूर अपनी जिंदगी गुजरता  है. माता पिता तो हमेशा ही विकट से विकट परिस्थिति में भी अपनी संतान को अपने साथ बनाये रखने का यत्न करते हैं पर ऐसी क्या परिस्थितियाँ भी हो सकती हैं जिनमे वक्त आने पर वही संतान उसके साथ नहीं होती . इस प्रश्न का उत्तर जानने कि इच्छा ने मुझे परेशान कर रखा है.

मैं यहाँ के सभी सुसंस्कृत, संभ्रांत और उच्च शिक्षित लोगों कि मानसिकता को भी अभी तक समझ नहीं पाया हूँ. किसी सड़क पर कोई व्यक्ति मरणासन्न अवस्था में घायल पड़ा है, व्यक्ति का साथी घायल करने वाले को कोस रहा है और आते जाते लोग या तो कोसने वाले कि भाषा कि मार्मिकता पर मुग्ध  हैं या फिर घायल व्यक्ति कि दुर्दशा पर ओह उफ्फ करते हुए जय हिंद बोल  जाते है. क्या हमारी सामाजिकता हमसे सिर्फ इतने कि ही चाह रखती है. अगर हम ज्यादा कुछ नहीं भी कर सकते तो इतना तो कर ही सकते है कि घायल के साथी से कहें कि बच्चे दुनिया को कोसना छोड़ और इस घायल व्यक्ति कि सुध ले, कुछ इसका भला होगा कुछ तेरा हो जायेगा. पर जाने क्यों हम लोग चुप रह जाते हैं. डाक्टर अमर कुमार जैसे स्पष्ट वक्ता भी ऐसी जगहों पर अपनी स्पष्टवादिता को भूल कर जबान से लड़खड़ाते  दिखाई पड़ते हैं. मैंने डाक्टर अमर कुमार जी का ही नाम लिया है क्योंकि जाने क्यों मुझे लगा की उन्होंने अपनी टिपण्णी के पर क़तर दिए, पर मुझे उन सभी लोगों से शिकायत है जिन्होंने इन पोस्टों पर अपने विचार रखे हैं पर सुरेश जी के वृद्ध आश्रम में रहने की वजहों को जानना जरुरी नहीं समझा. क्या हम लोग भी धीरे धीरे उन विकसित पश्चिमी देशों के समकक्ष होते जा रहे है जहाँ बूढ़े लोगों का अंतिम आश्रय परिवार से दूर वृद्ध अनाथालय ही होता है .
यद्यपि  मेरा ये मानना है कि हमें किसी की  निजी जिंदगी में नहीं झांकना  चाहिए पर जब कोई इन्सान खुद ही अपने दुःख और तकलीफों को किसी सार्वजनिक मंच से सबके सामने बयान करता है तो मैं समझता हूँ कि ये हम सभी लोगों का कर्तव्य है कि हम   उसे उसके दुःख और तकलीफ का मूल कारण क्या है ये समझाएं. ये हमारा सामाजिक कर्तव्य है.
अंत में मैं तो एक बार फिर यही कहूँगा कि जिस तरह माता पिता अपनी संतान के पालन पोषण के लिए बड़ी से बड़ी क़ुरबानी या दुनिया का बड़े से बड़ा खतरा उठाने से भी नहीं चूकते व हर हाल में ये कोशिश करते हैं कि उनकी संतान खुद उनके संरक्षण में पाले बढे ठीक उसी तरह संतान का भी ये कर्तव्य बनता है कि वो अंत समय में अपने माता पिता को, जब उन्हें अपने बच्चों के शारीरिक और मानसिक सहारे कि सबसे ज्यादा जरुरत होती है, दूसरों के सहारे ना छोड़ें और अगर छोड़ ही रहे हैं तो कम से कम सारी दुनिया को उसके कर्तव्यों कि याद ना दिलाएं.
मुझे माफ़ करें मैंने  कोशिश तो बहुत की पर अपनी बात कहे बिना रह ना  पाया. अब किसी को कहीं भी मेरी बात का बुरा लगे तो मुझे जरुर बताएं. मैं भविष्य में अपनी गंवई मानसिकता को भूल  खुद को सुधारने की भरपूर कोशिश करूँगा.

मंगलवार, 10 मई 2011

क्या साहित्यकार कागज पर अभिनय करते हैं.

एक अभिनेता विभिन्न लोगों की नक़ल उतरने में माहिर होता है. सबसे पहले वो लोगों के भावों को भली भातीं पढ़ता है  फिर  उनकी हु- बहु नक़ल उतर देता है. जिस चरित्र की वो नक़ल उतर रहा होता है जरुरी नहीं की वो चारित्रिक गुण अभिनेता के व्यक्तित्व में भी समाये हों. मानो की एक अभिनेता किसी साहसी व्यक्ति का अभिनय कर रहा है. अगर वो अच्छा अभिनेता है तो उसके प्रदर्शन को देख कर आपको लगेगा की वो एक साहसी व्यक्ति है चाहे अपने निजी जीवन में वो कितना ही डरपोक क्यों न हो. इसी तरह से यदि कोई माहिर अभिनेता एक ईमानदार व्यक्ति का किरदार निभा रहा है तो आम व्यक्ति को लगेगा की वो सच में एक ईमानदार व्यक्ति है जबकि हो सकता है की वास्तविक जीवन में इस अभिनेता का ईमानदारी से दूर दूर का वास्ता न हो.

मैं जब भी किसी साहित्यकार के लेख पढता हूँ तो यही सोचता हूँ की ये व्यक्ति भी कागज के मंच पर शब्दों के मुखोटे  की सहायता से किसी एक विशेष चरित्र को जी  रहा है. कभी किसी लेख में  साहित्यकार एक ईमानदार व्यक्ति होता है, कहीं माता का भक्त, कहीं मानवता का पुजारी, कहीं धर्मं का रक्षक और कहीं एक बहुत बड़ा देशभक्त. साहित्यकार के भी बहुत से रूप होते हैं. जो कागजी अभिनेता जितनी  बारीकी से अपने किरदार के गुण दोषों को कागज के मंच पर जीवित कर देता  है  वो उतना ही बड़ा साहित्यकार कहलाता है.

एक साहित्यकार कागज पर जो कुछ लिख रहा है जरुरी नहीं की वो अपने वास्तविक जीवन में भी उन गुणों को अपनाता है . वो अपने हर लेख, हर कविता और हर  कहानी  के साथ एक नया किरदार निभा रहा होता है.

इस ब्लॉग जगत में भी ढेरों साहित्यकार भरे पड़े हैं जो बड़ी सजगता से अपनी एक विशेष छवि रचते रहते हैं.

इन सभी साहित्यकारों को मेरा प्रणाम.


शुक्रवार, 6 मई 2011

स्त्री पुरुष मैत्री - वास्तविकता या छलावा.

मैंने बहुत बार लोगों को कहते सुना है " हम लोग तो सिर्फ सच्चे मित्र हैं और हमारे बीच में मित्रता के अलावा कोई दूसरा रिश्ता नहीं है."

मैंने इस तरह की बात लड़कियों  के मुख से भी सुनी  है और लड़कों के मुख से भी सुनी है और ऐसी   बातें सुनकर हमेशा मेरा विश्वास मजबूत हो जाता है की जरुर इन लोगों की काली  दाल हंडिया  पे चढ़ी हुई है.

जाने क्यों मुझे विश्वास नहीं होता की एक स्त्री और पुरुष के मध्य शुद्ध रूप से सिर्फ मित्रता का रिश्ता कायम रह सकता है. अगर एक स्त्री व पुरुष के मध्य मित्रता होती भी है तो वो स्वतंत्र मित्रता नहीं हो सकती. उसे तरह तरह के सामाजिक प्रतिबंधों को मानना ही होगा और अगर आप समलिंगी मित्रों के सामान ही विपरीत लिंग के मित्रों से स्वतंत्र मैत्रिक सम्बन्ध  रखते हैं तो मेरा मानना है की १०० में से ९८ मामलों में यह मित्रता निश्चय  ही शारीरिक संबंधों में परिवर्तित  हो जाएगी.   स्त्रियों के विषय में तो मैं कुछ नहीं कह सकता पर मैंने देखा है की स्त्रियों से मित्रता करते वक्त अधिकांश पुरुषों के मन में यही भाव होता है की कभी तो मौका मिलेगा.

मैं अपनी बात को थोडा विस्तर से समझाने के लिए आपको कल्पना लोक में लिए चलता हूँ.

कल्पना कीजिये की एक जॉन  अब्राहिम टाइप स्वस्थ पुरुष और प्रियंका चोपड़ा जैसी स्त्री के मध्य मित्रता वाला भाव है. एक गर्मियों की शाम  वे दोनों घूमने के लिए नेहरू पार्क जाते हैं. लड़का लो जींस और शोर्ट शर्ट में है और लड़की ने देसी गर्ल वाली साड़ी पहनी है. दोनों विशुद्ध मित्र भाव से पार्क में विचरण करते हैं. दोनों में बहुत सी बातें होती हैं फिर अचानक कहीं से काले काले मेघा उमड़ आते हैं. लोगों को गरमी से राहत मिलती हैं. शाम खुशनुमा हो जाती है. दोनों मित्र उस बारिश में भीगते हैं की अचानक लड़की का पांव फिसलता है और उसके पैर में चोट आ जाती है. भइय्या ऐसी मुसीबत  में तो मित्र ही काम आते हैं अतः पुरुष मित्र अपनी महिला मित्र को सहारा देकर उठता है. पुरुष अपनी मित्र का एक हाथ अपने कंधे पर रखता है और दुसरे हाथ से उसकी कमर को सहारा देता है. दिल्ली के तिपहिया चालक इस बार भी धोखा देते हैं तो बड़ी मुश्किलात का सामना कर पुरुष स्त्री को अपने घर ले आता है जो की महिला के घर से ज्यादा नजदीक है .  घर पर आकार दोनों कपडे बदलते हैं. बारिश से पुरुष को थोडा सर्दी जुखाम हो गया है तो वो दो पैग ब्रांडी के लगा लेता है. पुरुष के घर में एक ही पलंग है अतः दोनों मित्र साथ साथ सो जाते हैं. 

अब कल्पना लोग से बाहर आकर जरा  विचार कीजिये की ऐसी स्थिति में क्या एक पुरुष व स्त्री की मित्रता कायम रह पायेगी परन्तु यदि दोनों मित्र सामान लिंग के होते तो इनकी मित्रता इन सभी परिस्थितियों से गुजर कर भी कायम रहती.
 ये तो एक उदहारण मात्र है. ऐसी अनेक स्थितिया गिनवाई जा सकती हैं जो यह दर्शाती हैं की एक स्त्री व पुरुष अपनी मित्रता को निर्बाध रूप से लम्बे समय तक कायम नहीं रख सकते और अगर कहीं किसी ने रखी भी है तो उन्होंने अपनी मित्रता  पर ऐसे अनेकानेक प्रतिबन्ध  लगाये होंगे जो उस सम्बन्ध को सच्ची दोस्ती के रूप से बहुत दूर कर एक समान्य सामाजिक सम्बन्ध में तब्दील कर देते होंगे.    


मेरी समझ तो यही कहती है  की स्त्री पुरुष नैसर्गिक मित्र नहीं होते. ये मित्र भाव रख सकते हैं परन्तु इसके लिए इन्हें  किसी न किसी रिश्ते का सहारा जरुर ढूँढना  पड़ता है.


इस पोस्ट पर मिली प्रतिक्रियाओं के बाद मुझे लगा की पहले कही अपनी बात को और ज्यादा स्पष्ट करने की आवश्यकता है. इस विषय पर कुछ कहने से पहले  मुझे मित्रता क्या है इस पर  भी कुछ  न कुछ  अवश्य  कहना चाहिए था  अतः अब कुछ पंक्तियाँ और जोड़ रहा हूँ और आशा करता हूँ की इनसे मेरे विचार और स्पष्ट होंगे .


मेरा मूल विचार यही था की विपरीत लिंगी लोग अपने सेम सेक्स के मित्रों सी निर्बाध मित्रता नहीं कर सकते और इसे सामान लिंगी मित्रता के समकक्ष नहीं रखा जा सकता. इस विचार को स्पष्ट करने के लिए बहुत कुछ तैय्यारी के साथ अपनी बात कही जानी चाहिए थी ताकि लोग इसे स्त्री पुरुष के बीच के सामान्य सामाजिक संबंधों से जोड़ कर ना देखें परन्तु मैं ऐसा कर न पाया .


ऑफिस में या समाज के अन्य क्षेत्रों में हम बहुत से स्त्री पुरुषों से मिलते हैं और व्यावसायिक या सामाजिक सम्बन्ध रखते हैं परन्तु मित्र का दर्जा हर किसी को नहीं देते. मित्रता का सम्बन्ध सामान्य संबंधों से हटकर होता है. अपने मित्र के साथ हम अपनी जिंदगी का हर अनुभव बाटते हैं.दो मित्रों के बीच एक विशवास का संबध होता है, एक निर्बाध सहजता और स्वतंत्रता होती है जो दैहिक प्रतिबंधों की मोहताज नहीं होती. दो दोस्तों के बीच मानसिक निकटता ही नहीं बल्कि शारीरिक निकटता भी होती है. शारीरिक निकटता से मेरा मतलब शारीरिक सम्बन्ध नहीं बल्कि मैं कहूँगा की सेक्स लेस शारीरिक निकटता जो की स्त्री पुरुष की दोस्ती में कभी भी नहीं हो सकती. बस इसी वजह से मैंने कहा था की स्त्री पुरुष नैसर्गिक मित्र नहीं होते. अब कहीं कोई स्त्री पुरुष अपने शरीरों को भूल कर अपनी मित्रता को कायम रख पाते हैं तो उनको मेरा दंडवत प्रणाम.











रविवार, 1 मई 2011

सीधी बात नो बकवास.


कल से मैंने अपने ब्लॉग पर लोगों की आवाजाही जानने के लिए feed jit की मुफ्त  सेवा ली है. जब से इस सुविधा को  अपने ब्लॉग पर लगाया है तब से मैं लगातार देख रहा हूँ की आने वाले अधिकांश लोगों का ध्यान मेरी दो पुरानी पोस्टों पर ही है. एक है " साईं बाबा के चमत्कार " और दूसरी है " कुछ अश्लील (नॉन वेज  ) चुटकले".  

अपने ब्लॉग पर आने वाले लोगों की रूचि को देख कर मुझे लग रहा है की यहाँ की दुनिया मोटे तौर पर दो समूहों में विभाजित है. एक समूह अध्यात्म में रूचि रखने वाले लोगों का है और दूसरा  अश्लीलता या सेक्स में रूचि रखता है.  (इन समूहों से छिटके हुए लोग या तो ब्लोग्गेर्स हैं या फिर शायद खुद को ठीक से पहचान नहीं पाए हैं) .


मोटे तौर पर देखा जाय तो अध्यात्मिक व्यक्ति  इस दुनिया की उत्पत्ति कहाँ से हुई या कैसे हुई इस बात में रूचि रखता है और सेक्स पर ध्यान केन्द्रित करने वाला उसकी खुद की उत्पत्ति कहाँ से हुई या कैसे  हुई इस बात में रूचि रखता हैं. कहीं न कहीं दोनों का ध्यान  उस  पैदा  करने वाले  पर ही है.


मुझे बेहद दुख है की मैं दोनों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता हूँ. जो लोग साई के चमत्कारों की तलाश में हैं उन्हें मेरी सोच  पर  हँसी   आती होगी और ऐसा ही हाल मेरे ब्लॉग पर अश्लीलता तलाशने   वालों   का भी होता होगा.


मैं तहे दिल से इन लोगों से क्षमा प्रार्थना करता  हूँ और प्रण लेता हूँ की अपनी आने वाली किसी भी पोस्ट का शीर्षक कभी भी बरगलाने  वाला  नहीं रखूँगा. अब से हमेशा "सीधी बात नो बकवास".

वो पगली नहीं है !


वैसे तो मैं आस पास के लोगों की घरेलु बातों पर ज्यादा मगज़मारी  नहीं करता  पर इस खबर पर से मेरा ध्यान हट न सका. मेरी पत्नी को पड़ोस के बब्बल  की  मम्मी जी ने बताया  की हमारे  दुसरे पडोसी चेला राम की बीबी पगली होने का सिर्फ  ढोंग करती है पर  असल में वो पागल नहीं है

"अच्छा !  उन्हें कैसे पता चला की वो पागल नहीं है."


"अरे वो बब्बल की मम्मी से कह रही थी की अगर उसकी एक बिटिया और हो जाये तो उसका परिवार भी पूरा हो जायेगा. एक बेटा और एक बेटी.  देखो उसको इतनी अक्ल  है. पागल होने का तो वो सिर्फ ढोंग ही करती है."


मेरी नज़रों के सामने चेला राम की इस दूसरी पत्नी का पूरा इतिहास घूम गया.
पहले पति द्वारा त्याग दी गयी क्योंकि वो पगली थी.
विधवा माँ और भाइयों ने ६२ वर्ष के नाती पोतों वाले बूढ़े से ब्याह दिया क्यूंकि वो पगली थी.
सौतेली बेटे बेटियों ने हमेशा नौकरानी समझ कर व्यवहार किया क्योंकि वो  पगली थी
सौतेली पुत्रवधू ने इसकी नसबंदी करवाने की  पूरी कोशिश की के कहीं इसके कोई बच्चा न हो जाये और ये चुपचाप सहती रही क्योंकि ये पगली थी.


अब आज अचानक बब्बल की मम्मी कहती हैं की वो पगली नहीं बहुत सायानी है.


मुझे लोगों का ऐसा व्यवहार कतई  समझ नहीं आता. किसी भी आदमी के वर्तमान के एक छोटे से कार्य से उसके पुरे व्यक्तित्व का निर्धारण कर देते हैं. उसका पूरा इतिहास जानते बुझाते  हुए भी नकार देते हैं.  कोई साला सारी जिंदगी अपनी मुर्खता और पागलपन को व्यक्त करता रहा और अचानक गलती से ही एक सही काम क्या कर दिया पिछला सब ख़त्म.

क्या है यार ये सब........