मंगलवार, 15 मार्च 2011

ईश्वर को तो इन्सान बना दिया पर खुद इन्सान नहीं बन पाए.

मुझे नहीं मालूम की मैं सच्चे अर्थों में आस्तिक हूँ या फिर नास्तिक क्योंकि मैं ईश्वर में तो पुर्णतः विश्वास रखता हूँ पर उसके व्यक्तिगत अस्तित्व  में बिलकुल भी विश्वास  नहीं रखता. "व्यक्तिगत अस्तित्व" शायद सही शब्द न हो इसलिए  मैं स्पष्ट कर दूँ की व्यक्तिगत अस्तित्व से मेरा तात्पर्य है एक आदमी जैसा अस्तित्व जहाँ की वो दूर बैठा है और हमें देख रहा है या हमारी बात सुन रहा है और कभी हमारी प्रार्थना या पुकार पर कोई कार्यवाही करेगा. ईश्वर कोई आदमी नहीं की वो पहले तो यह निर्धारित करेगा की क्या सही है क्या गलत है  और फिर सही को पुरष्कृत और गलत को दण्डित करेगा.

ईश्वर एक व्यवस्था है जिसे हमने एक इंसानी अस्तित्व प्रदान कर दिया है. किसी ने उसे अल्लाह बनाया किसी ने भगवान, किसी ने वाहे गुरु और किसी ने ईसामसीह. अल्लाह  सिर्फ कुरान पढने वाले को मुक्ति देगा और सिर्फ मुस्लमान की ही सहायता करेगा एसा नहीं है.

ईश्वर के व्यक्तिगत अस्तिस्त्व में विश्वास रखने वाले धार्मिक विद्वानों कभी तो अपने मन में इंसानियत को जगह दो.

ईश्वर को तो इन्सान बना दिया पर खुद इन्सान नहीं बन पाए.

किसी की तकलीफ में उसे सांत्वना देने और उससे सहानभूति जताने की बजाये आप लोग उसका मजाक उड़ा रहे हो और अपन उल्लू सीधा करने की कोशिश कर रहे हो. 

थू  है तुम लोगों पर.  



मेरे मन में ये विचार इस दुनिया के सबसे बड़े और सच्चे मुस्लमान श्रीमान सलीम खान की उस टिपण्णी को पढ़ कर आये हैं जिसमे उन्होंने कहा की जापान इस्लाम को प्रतिबंधित करने वाला पहला देश है और जो उन्होंने एक सच्चे सेकुलर कांग्रेसी  श्रीमान समीर लाल  जी की एक पोस्ट पर व्यक्त किये हैं. अभी सिर्फ इतना ही बाकि शाम को ...........

शनिवार, 12 मार्च 2011

मांसाहार या शाकाहार.

मैं कुमाउनी ब्रह्मण हूँ. हम लोगों में मांसाहार एक सामान्य सी बात  है अतः मैं बचपन से मांस, मछली इत्यादि का सेवन करतारहा हूँ. मैदानी इलाकों में एक ब्राह्मण द्वारा मांस भक्षण सर्वथा वर्जित  है   इसलिए मेरा ऐसे मैदानी  मित्रों से सामना होता रहा  जो  ब्राह्मण होने के बावजूद मांसाहार करने की मेरी
आदत को लेकर मेरा  मजाक  उड़ाते  या मुझे हेय दृष्टि से देखते.  शाकाहार को प्राकृतिक और मांसाहार को अप्राकृतिक ठहराया जाता. बताया जाता की मांसाहार करने से व्यक्ति में क्रूरता की भावना का विकास होता है. मांसाहारी लोग गुस्सैल होते हैं और आपराधिक प्रवृति के हो जाते हैं. अपने मित्रों के इस व्यवहार के पीछे मुझे शाकाहार को सही नहीं बल्कि श्रेष्ट सिद्ध करना और  मांसाहारियों को नीचा दिखने का प्रयास ज्यादा महसूस होता था.


कोई हमारी आस्था, परंपरा रीती-रिवाज और विश्वास  के विरुद्ध कुछ कहे तो हम स्वाभाविक रूप से तर्क या कुतर्क करके उसका विरोध  करते हैं  अब चाहे हम गलत हो या सही. शायद  ऐसा ही कुछ मेरे साथ होता था. जब मेरे कुछ शाकाहारी मित्र अपने शाकाहारी होने  की बात  को  बड़े  गर्व    के साथ बताते और मांसाहार को अवगुण घोषित करते तो मेरी  तार्किक  बुद्धि  हमेशा उन तर्कों की  तलाश में  रहती जिनसे  मैं मांसाहार को उन लोगों के समक्ष सही ठहरा सकूँ.

मुझे शुरू से लगता था की मानव सर्व भक्षी हैं यानि की वो शाकाहार और मांसाहार दोनों ही तरह के भोजन कर सकता है. मानव के जबड़े में केनाइन दांत के होने से मुझे लगता था की कहीं न कहीं मानव में मांसाहार की क्षमता है  और चिम्पंजियों के द्वारा छोटे बंदरों को मार कर खाना भी इसी बात का साबुत देता था. अपनी दिल्ली में मैंने खुद  रीसस बंदरों को कोए के खोंसले से अंडे चुराकर खाते देखा है. हालाँकि नेट पर  दूसरी जगहों के भी ऐसे सबूत मौजूद  हैं. कभी पढ़ा था की मानव की छोटी आंत की  लम्बाई न तो मांसाहारियों जैसी कम होती हैं और न ही शाकाहारियों की तरह बहुत ज्यादा.

इन सब बातों से मुझे अपने मांसाहार को सही ठहराने का हौसला  मिलता रहा. इसके साथ ही अपने पारिवारिक  और सामाजिक अनुभवों से मैंने पाया  की जो लोग शुद्ध शाकाहारी थे वो ज्यादा गुस्सैल  थे और उनकी अपेक्षा मांसाहार करने वाले ज्यादा शांत और मनमौजी थे.

मेरे पिता सारी उम्र सप्ताहांत मीट या मछली खाते रहे और मेरी माताजी पुर्णतः शुद्ध शाकाहारी महिला थी पर मैंने कभी अपने पिता को किसी पर नाराज होते नहीं देखा जबकि मेरी माताजी को बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता था. मैंने बहुत से शुद्ध शाकाहारी परिवारों को अपने पारिवारिक झगड़े सडकों पर मारपीट के साथ सुलझाते देखा. मेरे बहुत से जैनी भाई अपनी दुकानों में और अपने घरों में नौकरों के साथ अमानवीय क्रूर व्यवहार करते दिखे. प्याज और लहुसन से मुक्त शाकाहार मेरे वणिक वर्ग के  भाइयों को भ्रष्टाचार से मुक्त न कर पाया. ऐसे में मैं अपने सप्ताहांत मांसाहार के साथ सुखी था.

पर फिर आया अपने ब्लॉग जगत में एक  शाकाहारी तूफान जिसकी शुरुवात मेरे मित्र अमित ने अपनी एक पोस्ट से की और  जिसको वत्स जी, सुज्ञ जी, अनुराग शर्माजी, प्रतुलजी और गौरव  अग्रवाल जी  जैसे आदरणीय ब्लोग्गेर्स के विचारों का सहारा  मिला. यहाँ पर मैं मित्र गौरव अग्रवाल जी  की  एक  विचारणीय पोस्ट का  उल्लेख करना चाहूँगा जिसने मुझे इस विषय पर पुनः  विचार करने को बाध्य किया.

गौरव की पोस्ट में शाकाहार के समर्थन में कुछ लेखों के लिंक थे. इनके आलावा भी मैंने नेट खंगाला और पाया की मानव तकनीकी रूप से शाकाहारी प्राणियों की श्रेणी में आता है. पर मेरे मन के कुछ प्रश्नों का उत्तर मुझे नेट पर नहीं मिल पाया.

मुझे ये समझ नहीं आ रहा था की यदि मानव विशुद्ध रूप से शाकाहारी है तो फिर किसी किसी मानव के  मन में मांसभक्षण की इच्छा क्यों उत्पन्न होती है? बहुत से लोग बिना किसी प्रेरणा के मांस खाना पसंद करते हैं और बहुत से लोग तमाम प्रयासों के बाद भी मांस की और देखते तक पसंद नहीं करते. ऐसा क्यों?  यह बात मुझे समझ नहीं आ रही थी की क्यों प्राकृतिक रूप से पुर्णतः शाकाहारी बन्दर क्यों कभी कभार मांसाहार करने को उद्यत होते हैं?

मुझे लगता है की बन्दर  मांसाहार अपनी किसी विशेष शारीरिक  आवश्यकता जैसे प्रोटीन इत्यादि  की पूर्ति के लिए करते हैं  क्योंकि वो किसी दुसरे प्राकृतिक तरीके से अपनी इस जरुरत को पूरा नहीं कर पाते और ये कभी कभार होने वाली घटना ही होती है ना की नित्य  प्रति की  आदत.  ठीक इसी प्रकार कुछ शुद्ध मांसाहारी भी कभी कभार  घास  खाते  हैं .  मैंने बिल्ली और कुत्ते को घास खाते देखा है. 

 मानव जब तक जंगलों में स्वतः  उत्पन्न होने वाले  फल फुल खाकर ही  अपना पेट भरता था  तब शायद वो भी कभी कभार मांसाहार कर प्रोटीन या शायद ऐसी ही किसी और  जरुरत की पूर्ति  करता हो पर जबसे  उसे खेती करने का तरीका समझ आया और वो अपनी जरुरत के हिसाब से अन्न उपजाने लगा तो उसे मांसाहार करने की जरुरत नहीं रही.  लेकिन फिर भी आज तक कुछ लोग  "बेसिक इंस्टिंक्ट"  का अनुसरण  करते हुए  मांसाहार की  और  आकर्षित होते हैं. 

इस विषय में ब्लॉग मित्रों, नेट और दुसरे स्रोतों से प्राप्त ज्ञान और खुद के चिंतन मनन के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ की मानव की शारीरिक संरचना तो शाकाहार के लिए ही बनी है पर  प्रकृति ने उसकी कुछ विशेष जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे कभी कभार मांसाहार करने की छुट प्रदान की है. मांसाहार मानव के लिए नित्य प्रति की जरुरत बिलकुल भी नहीं और आज जब मानव खेती कर अपनी आवश्यकता के अनुसार हर प्रकार का अन्न उगा सकता है तो उसे कभी कभार भी मांस खाने की आवश्यकता बिलकुल नहीं है.   

मैं कभी मांसाहार का समर्थन किया करता था पर अब मेरी सोच में परिवर्तन आया है. मांसाहार एक प्रकार की आहार वैश्यावृति है जो मानव समाज में अति प्राचीन काल से व्याप्त है. एक विशेष  नजरिये   से  इसे  सही ठहराया जा सकता है और बहुत सी जगहों पर इसे सामाजिक स्वीकृति भी प्राप्त है पर इसके प्रचार प्रसार के लिए इसका समर्थन करना किसी भी नजरिये से ठीक नहीं.

मेरी सोच में जो बदलाव आया है उसके लिए मैं  श्रीमान गौरव  अग्रवाल   जी को मुख्यरूप से दोषी मनाता हूँ जिनकी सार्थक  ब्लॉग्गिंग ने मुझे इस विषय में गहराई से सोचने पर मजबूर किया  और  उनके इस कृत्या में   सुज्ञ जी, प्रतुल जी, अनुराग शर्मा जी, और प्यारे अमित भाई  भी सह अभियुक्त हैं. लोगों में शाकाहार के प्रति जागरूकता जगाने के इनके अभियान का मैं भी एक शिकार हूँ और पिछले तीन चार माह से अपने इलाके के सबसे बड़े मांस विक्रेता नज़ीर फूड्स की दुकान पर नहीं गया हूँ.  हो सकता है की कभी जीभ के लालच वश या किसी और कारण से मैं मांसाहार करूँ पर मैं अब जीवन में कभी भी मांसाहार का  समर्थन नहीं कर पाउँगा.  

अंत में मैं शाकाहार के प्रति लोगों में जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे सभी भाइयों से यह प्रार्थना करूँगा की वो मांसाहारियों को एक अपराधी की दृष्टि से ना देखें. अपने सभी प्रयास ये ध्यान में रख कर करें की मांसाहार कभी प्राकर्तिक रूप से मानव की बेशक मामूली ही सही पर जरुरत जरुर रही है.

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

वाद विवाद और अतिवाद

मैंने छटी से लेकर दसवीं कक्षा तक ही सामाजिक ज्ञान विषय का अध्ययन किया और मैं हमेशा इस विषय में कम अंक ही प्राप्त करता रहा  क्योंकि हमारे इस विषय के अध्यापक हमारे उत्तर को पढ़कर नहीं बल्कि गिट से नापकर हमें अंक दिया करते थे.  जिस बच्चे का उत्तर जितना लम्बा होता था उसको उतने ज्यादा नंबर मिला करते थे अतः हमारी कक्षा के समझदार बच्चे अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए सामाजिक ज्ञान की परीक्षा में अपने घर का इतिहास और भूगोल लिख आया  करते थे.

शायद नवीं या दसवीं कक्षा में हमें समाजवाद और पूंजीवाद के विषय में पढाया गया. किसी भी प्रकार के वाद से ये मेरा पहला परिचय था. धीरे धीरे जब समझ विकसित हुयी तो पता चला की इस दुनिया में तमाम तरह के वाद बिखरे पड़े हैं.

भौतिकवाद, आध्यात्मवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, राष्ट्रवाद, अलगाववाद, प्रयोगवाद, शुद्धतावाद, नारीवाद, परिवारवाद, और भी ना जाने कितने ही वाद और वादी हैं हमारी इस दुनिया में. जब मेरी समझ थोड़ी और विकसित हुयी तो मुझे लगा की दुनिया के सारे झगड़ों की जड़ ये तरह तरह के वाद ही हैं.  ये वाद ही विवाद कराते हैं.

कैसे?  क्यों?

मुझे लगता है की जब कोई वादी अतिवादी हो जाता है तो वो विवादों को जन्म देता है.

अब देखिये एक समाजवादी इस संसार से पूंजीवाद का खात्मा  चाहता है तो राष्ट्रवादी अलगावादियों का.  भौतिकतावादी  संसारिकता में उलझे  हैं तो अध्यात्मवादी इस दुनिया  को त्यागे खड़े  हैं. मानवतावादी  राष्ट्रवादियों को पसंद नहीं करते और प्रयोगवादी  शुद्धतावादियों  के खिलाफ रहते हैं.  कहीं माओवादी कमाओवादियों  को मार रहे हैं और  कहीं नारीवादी परम्परावादियों के खिलाफ झंडा  लिए खड़े हैं.

अरे क्या कहीं कोई ऐसा निर्विवाद्वाद है जिसका किसी से कोई झगड़ा न हो?

आप जिससे भी पूछोगे तो वो अपनी विचारधारा को सर्वोत्तम बताएगा. वो कहेगा की हमारी बात  ही अंतिम सत्य हैं, २४ केरेट का एकदम खरा सोना है और  बाकि सब पीतल है. अब इन्हें  कौन  समझाए   कि २४ केरेट का खरा सोना बैंक के लोकरों में बंद  रखने  के लिए होता हैं. आम उपयोग के लिए तो हमें उसमे कुछ मिलावट करनी ही पड़ती  है.

समाजवाद में थोड़ी सी पूंजीवाद की मिलावट करिए तो वो रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीज बन जायेगा. माओवादियों के हाथो से हथियार लेकर गाँधीवादी लाठी थमा दी जाय तो शायद वो कानून की हद में रहकर भी दबे कुचले पीड़ितों को न्याय दिलवा पाएंगे.  इस दुनिया के ईश्वरवादी आस्तिकों को ये समझना होगा की वास्तव में ईश्वर कौन है और कहाँ है और इसी तरह ईश्वर का अस्तित्व न स्वीकारने  वाले  नास्तिकों को मानव मन की कमजोरियों को समझ उसके सहारे को छीनने का प्रयास छोड़ना होगा.  

हाँ एक बात और  प्रयोगवादी यदि "कांटा लगा" को  नए रूप में प्रस्तुत करेगा तो  ठीक पर ऐसा ही प्रयोग "कहीं दीप जले कहीं दिल" पर करेगा तो वो किसी को  हज़म नहीं होगा.

तो आईये हम सभी वादों से उत्पन्न विवादों का अंत करें.


 मेरी इस पोस्ट की प्रेरणा वो नहीं जो आप समझ रहे होंगे.

अपनी बात को समझाने के लिए एक शेर अर्ज है ..... ........ ........ .. (लो जी  पट्ठा शेरो शायरी पर उतर आया)

मुझे तो प्रेरित किया अपनों ने गैरों में कहाँ दम था,
यारो  पोस्ट लिखने को  ये वाद- विवाद  क्या कम था.




सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

एक स्पष्टीकरण.

मित्रों नमस्कार,



हिंदी ब्लॉग्गिंग की एक क्रन्तिकारी ब्लॉगर दिव्या जी ने अपनी एक पोस्ट महिला स्वाभिमान पर मेरी एक टिपण्णी के उत्तर में मेरे ऊपर एक नन्हा सा मगर चुभता हुआ आरोप जड़ दिया जो कुछ इस प्रकार है.

@- विचार शून्य -

आपने सही कहा , लेख बिना पढ़े भी टिप्पणियाँ की जा सकती हैं। लेकिन ताड़ने वाले भी क़यामत की नज़र रखते हैं । उनको मालूम होता है , किसने पढ़ा और किसने मात्र खानापूर्ति की है । उस व्यक्ति की वैसी ही image भी बनती है मेरे दिमाग में। व्यक्ति के शब्द उसकी पहचान होते हैं । जैसे लेखक की पहचान उसके लेख हैं , वैसे ही टिप्पणीकार की पहचान उसकी टिप्पणियां हैं।

आपके द्वारा करी गयी टिपण्णी से मुझे ये तुरंत समझ आ गया की आपने महीनों बाद कोई नई पोस्ट लगाई है , इसीलिए लिए आज आप मेरी पोस्ट पर नज़र आये हैं। आपको लेख से कोई सरोकार नहीं है ।

ब्लॉगजगत में ज्यादातर लोग उसी दिन निकलते हैं टिपण्णी करने के सफ़र पर जिस दिन वो अपने ब्लॉग पर नयी पोस्ट लगाते । क्यूंकि उन्हें सबकी टिपण्णी चाहिए होती है । ऐसे ही लोग बिना पढ़े टिपण्णी करते हैं।

बहुत कम ब्लोगर हैं जो सीरियस ब्लोगिंग करते हैं , और विरले ही हैं जो सीरियस टिपण्णी करते हैं।

और मैं सीरियस लोगों कों बेहद पसंद करती हूँ।

आभार ।

दिव्या जी, टिपण्णी में कही गयी मेरी बात से तो सहमत है पर जाने क्यों उन्होंने मुझे ऐसा आइना दिखाया जिस में मुझे अपनी तस्वीर नज़र नहीं आयी. ये बात मुझे अच्छी नहीं लगी.

इसके बाद न जाने किस डर से इस लोह महिला ने मेरे उत्तर को अपनी पोस्ट पर भी प्रकाशित नहीं किया. मजबूरन मुझे ये बात अपने ब्लॉग पर विस्तार से लिखनी पड़ रही है ताकि इस आरोप पर मेरे मौन को कोई मेरी स्वीकृति न मान ले.

वैसे भी ब्लॉग पर लिखना तो फ्री फंड का है. बन्दे के पास वक्त होना चाहिए घर बैठे कितनी भी क्रांतियाँ की जा सकती हैं. कोई ये थोड़े ही है की ब्लॉग लिखने के बाद तहरीर स्क्वायर पर सर कटाने जाना है.

हाँ तो सबसे पहले तो मैं दिव्या जी को बता दूँ की टिप्पणिया प्राप्त करने के मामले में घटिया लेखक होते हुए भी मैं आपही की तरह बहुत भाग्यशाली रहा हूँ. इस प्रसाद को प्राप्त करने के लिए मुझे कभी भी किसी को कोई मेल नहीं भेजनी पड़ी है और ना ही इसके लिए न ही मुझे नए ब्लोग्गेर्स को प्रोत्साहित करने की कसरत करनी पड़ी. अपनी ब्लॉग्गिंग के पिछले एक वर्ष के दौरान मैंने कभी भी किसी भी ब्लॉग पर इस आशा के साथ कोई टिपण्णी नहीं दी की बदले में मुझे भी किसी से टिपण्णी की भीख मिलेगी. मेरा इस प्रकार की नेटवर्किंग में कभी विश्वास ही नहीं रहा.यदि मुझे भी टिप्पणियों की इसी ही चाह होती तो मैं भी नए नए ब्लोग्स पर जाकर टिप्पणियां चेप रहा होता. मैंने तो गौरव अग्रवाल जैसे प्रतिभा संपन्न ब्लॉगर को अपने ब्लॉग पर टिपण्णी करने से हतोत्साहित ही किया था.

नए उदित हो रहे ब्लॉगर किसी टिपण्णी का प्रतिउत्तर पहले से ही व्यस्त पुराने स्थापित ब्लॉगर की अपेक्षा ज्यादा जल्दी देते हैं.(ये अपने ब्लॉग पर टिप्पणियों की संख्या बढाने के लिए श्रम कर रहे ब्लॉगर के लिए सुनेहरा सिद्धांत है. पालन करें और टिप्पणियों में इजाफा करें. )

सच कहूँ तो मैं quality में विश्वास रखता हूँ quantity में नहीं. मुझे खुद से कहीं जयादा बेहतर ब्लोग्गेर्स की एक भी टिपण्णी प्रसाद स्वरुप मिल जाती है तो मैं तृप्त हो जाता हूँ.

(दिव्या जी से मेरा संवाद यही ख़त्म अगर आप अपनी पोस्ट पर मेरा उत्तर प्रकाशित कर देतीं तो मुझे इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती )

अब मैं मुझ पर स्नेह वर्षा करने वाले सभी मित्रों के समक्ष विनम्र निवेदन करना चाहता हूँ की किसी भी पोस्ट पर मैं तभी अपनी बात रखता हूँ जब मुझे एसा करना आवश्यक लगता है अन्यथा मैं शांति से पोस्ट पढ़ कर लौट आता हूँ और जहा भी, जब भी मुझे लगा की अपनी बात रखनी चाहिए वहां मैंने पूरी ईमानदारी के साथ अपनी सहमती या सहमति व्यक्त की है.

अतः लोह महिला दिव्या जी की तरह ही यदि आप लोगों के मन के किसी कौने में ये विचार दुबका पड़ा हो की भइय्या विचार शून्य ने हमारे ब्लॉग पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी है अब उसके ब्लॉग पर भी जाकर हाजिरी बजानी पड़ेगी तो आप अपने मन से ऐसे विचार निकाल कर किसी दुसरे के ब्लॉग पर पेस्ट कर दें मुझे कोई दुःख नहीं होगा.

मैं अपनी ख़ुशी के लिए टिप्पणिया करता हूँ. आप अपनी ख़ुशी के लिए टिप्पणियां करें.

(ये पोस्ट मात्र सूचनार्थ है अतः इस बार टिप्पणियों की कोई आवश्यकता नहीं.)










बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

और वो कुत्ता मुझे सीरियस कर गया......

नमस्कार जी,

ब्लॉगजगत के सभी सदस्यों को ईद-ए-मिलाद कि शुभकामनाएं. बहुत दिनों बाद पोस्ट प्रकाशित कर रहा हूँ. पिछली पोस्ट थी कि मैं गंभीर ब्लोगिंग नहीं करूँगा पर कुछ बातें ऐसी हुई कि ब्लॉग्गिंग ही बंद हो गयी. वो हुआ कुछ ऐसा कि गत वर्ष २३ दिसंबर की शाम जब मैं ऑफिस से वापस घर लौट रहा था तो रास्ते में पास से गुजार रहे एक पगले से कुत्ते ने अचानक ही मेरे टखने पर अपने दांत गढ़ा दिए. मैंने झटक कर पैर छुड़ाने की काफी कोशिश की पर सफल नहीं हो पाया तो मैंने हाथों से ही उसके मुह को खोल अपने पांव को छुड़ाया  पर तब मेरा बांया हाथ ही उसके भरे-पूरे मुंह में फंस गया. भैय्या किसी तरह से मैंने अपने आप को बचाया.


इस कार्यक्रम में मेरे हाथ और पैर बुरी तरह से जख्मी हो गए. कुत्ते के दांत हाथ के अंगूठे में और पैर के टखने पर ठीक नस के ऊपर ही लगे थे अतः दोनों जगहों से रक्त का प्रवाह कुछ इस तरह का था कि मुझे डर लगा कहीं मेरी टंकी वक्त से पहले खाली ना हो जाए. मैं तुरंत हॉस्पिटल दौड़ा (भई रिक्शे कि सहायता से..). अस्पताल में डाक्टर साहब ने समझाया कि हालात सीरियस है. एक टीका यहीं लगेगा और दुसरे टीके के लिए जो कि घाव में ही लगेगा बड़े हॉस्पिटल जाना होगा. अब हालात सीरियस थे तो वहां भी गए. जो जो किया जा सकता था वो सब किया और घर वापस आ गए.


घर आकार जब वक्त मिला तो सारे घटनाक्रम पर विचार किया कि आखिर ऐसा क्यों हुआ. कहीं उस पगले कुकुर ने मेरी पिछली पोस्ट तो नहीं पढ़ ली थी जिसमे मैंने लिखा था कि मैं सीरियस ब्लॉग्गिंग नहीं करूँगा. उसने मेरा लेख पढ़ कर सोचा होगा कि साले कि हालत ही सीरियस कर दो तब जो कुछ भी करेगा सीरियस ही होगा और मुझे इस तरह से घायल किया कि मेरे घाव तो भर गए पर उनमे दर्द अभी भी होता है.


बहुत सी साहित्यिक रचनाओं में अनेक बार पढ़ा था कि शरीर के जख्म तो भर गए पर मन के घाव अभी भी दुखते हैं. इस साहित्यिक बात को मैंने अब प्रत्यक्ष में अनुभव किया है जब डौगी भाई के दिए जख्म तो भर गए हैं पर उनका दर्द रह-रह कर अभी भी परेशान करता है.


चलिए हो सकता है कि अब आपको मेरे लेखों में कुछ दुःख और दर्द भी दिखलाई पड़े तो फ़ौरन समझ लीजियेगा कि अगले को कुत्ते ने काटा है तभी इसकी लेखनी में इतना दर्द समां गया है. जो भी हो अब नियमित रूप से आपके साथ अपना दर्द बाटता  रहूँगा. ( बस मन में ये डर भी है कि लोग ये ना सोचें कि हमें कोई कुत्ते ने थोड़े ही काटा है जो इसका ब्लॉग पढ़ें. वैसे कुत्ता काटे तो लोगों कि सहानभूति बटोरना मुश्किल होता है. अपना दर्द बताने पर लोग कहते हैं कि आपको कुत्ते ने अब काटा है पर आपकी हरकतें तो पहले से ही वैसी रही हैं. )

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

मैं कभी सीरियस ब्लॉग्गिंग नहीं करूँगा.

वर्ष २०१० अपने अंत के निकट है. लोग पीछे मुड़ कर देख रहे हैं  की वर्षभर क्या क्या किया. क्या खोया क्या पाया. मैंने भी ब्लोग्गिं इस वर्ष के शुरू में ही शुरू की थी तो मैं भी पीछे मुड़ कर देख सकता हूँ  और खोज सकता हूँ की मैंने ब्लॉग्गिंग में क्या पाया (मेरे लिए यहाँ  खोने को तो कुछ था ही नहीं).

मेरी ब्लोग्गिं करने की पृष्ठ भूमि सन २००९ में दिल्ली सरकार ने खुद ही बना दी  थी. पिछले वर्ष दिसम्बर माह में मुझे सरकार की तरफ से हमारे छटवें वेतन आयोग का बकाया पैसा मिल गया था . उसी माह  मैं दिल्ली सरकार की  सेक्शन ऑफिसर समकक्ष परीक्षा में भी  मैं सफल हो गया था. तो जनाब मेरे जैसा व्यक्ति जिसकी जेब में थोडा पैसा हो, बहुत सा वक्त हो और प्रतुल जैसा बाल सखा हो तो वो ब्लोग्गिं शुरू कर देता है.

जी हाँ ब्लोग्गिं नाम की  चिड़िया से मुझे प्रतुल जी ने परिचित कराया.  उन्होंने ही मेरा ब्लॉग बनाया और विचार शून्य का तगमा लगा कर चल दिए. शुरू में मुझे ब्लॉग्गिंग के विषय में कुछ भी पता नहीं था. जो पहला ब्लॉग मैंने अनुसरित किया वो था  AshokWorld. मैंने इस ब्लॉग को  कभी भी नहीं पढ़ा और इस पर कोई कमेन्ट नहीं लिख पाया क्योंकि ये  ब्लॉग जाने किस  दक्षिण भारतीय भाषा में लिखा जाता है. मुझे आज भी अपनी उस गधागिरी  पर हँसी  आती है पर मेरी ये आदत अभी तक बरक़रार  है. मेरे द्वारा अनुसरित अधिकांश ब्लॉग या ब्लॉगर जिनके लेखों पर मैं अक्सर टिप्पणियां कर बैठता हूँ "A" से शुरू होकर "S" तक ही फैले हैं.

Amit Sharma,  Sanjay Aneja, Satish Pancham.
Anshumala, Shaifali Pandey, Swapn Manjusha Ada.
Anurag Sharma, Salil- Chaitanya, Satish Saxena.

जब प्रतुल जी के कहे अनुसार ब्लॉग्गिंग शुरू की तो पता नहीं था की ये एक गंभीर कार्य है. मुझे तो ब्लॉग्गिंग ने अपने बीते हुए दिनों की याद दिला दी थी. मेरे बाल्यकाल के अंतिम दिनों में और युवावस्था के शुरुवात में मैं अपने यार दोस्तों के साथ लगभग रोज ही रात्रि भोजन के उपरांत खड़ी-बैठकों में भाग लिया करता था. खड़ी इसलिए  क्योंकि बैठने को तो मिलता ही नहीं था बस खड़े खड़े ही बातें होती थी. हम लोग  हर विषय पर बात करते  थे चाहे वो इरान इराक युद्ध हो या कालोनी के शर्मा जी और वर्मा जी की लड़ाई ,गावस्कर, कपिल और श्रीकांत का खेल हो या अपना अंडा-फट्टी टूर्नामेंट , राजीव गाँधी की राजनीती हो या महोल्ला सुधार समिति के झगड़े, सलमान खान और संगीता बिजलानी की लव लाइफ हो या कालोनी के पप्पू और डोली का रोमांस , सब पर विस्तार से चर्चा होती, बहस होती, तू तू मैं मैं और कभी हाथापाई तक भी बात पहुच जाती थी और ये मामला तब तक चलता जब तक कालोनी का कोई बुड्ढा हमें डाट कर भगा नहीं देता था.   हमारी ये महफ़िल अक्सर कालोनी के चौक पर होती पर कभी कभी कुछ ऐसे चुनिन्दा घरों के आगे भी अपनी महफ़िल सजाते थे जिनमे हमारी उम्र की सुन्दर कन्यायें निवास करती थी. ऐसी बैठकों में बहस या टीका टिप्पणी कुछ ज्यादा ही उत्साह से होती थी और ये टिप्पणिया उन लड़कियों के धीरे धीरे विकसित होते........बुद्धि चातुर्य पर भी होती थी. 

हमारी ये गतिविधियाँ तब तक चलती रहीं जब तक हम लोगों के पास रात्रि भोजन के उपरांत करने के लिए कुछ ज्यादा मजेदार काम नहीं था और जब वो मिला तो हम लोग उस में रम गए. अब सब लोग विवाहित हैं, बाल बच्चेदार  हैं.  घर आते हैं फिर कहाँ निकलना होता है.  

इस तरह जब प्रतुल की कृपा से जब मेरा परिचय ब्लॉग्गिंग से हुआ तो मुझे लगा की पुराने दिन लौट आए हैं. रात्रि भोजन उपरांत नेट पर जाओ. लोगों के विचार पढों. उन पर त्वरित  टिप्पणी दो, थोड़ी बहस करो, किसी से चुहल करो और थोडा मनोरंजन कर फिर चल दो   रात्रि विश्राम हेतु.  सच में मेरे लिए तो ब्लॉग्गिंग यही है. मुझे तो तब डर लगता है जब कहा जाता है  की लोग सीरियसली  ब्लॉग्गिंग नहीं करते. ब्लॉग्गिंग में गंभीर लोग होने चाहिए. अरे ऐसा होगा तो मेरे जैसे लोग कहाँ जायेंगे  जो यहाँ सिर्फ मनोरंजन के लिए  ही हैं. अरे भई आप लोग  हर चीज को इतना गंभीरता से क्यों लेते हैं?  वैसे कुछ लोगों को हर चीज में गंभीरता ढूंढने की आदत होती है.  भई सीरियसली हँसों..... अरे जनाब आप सीरियसली फ्लर्ट करो .......आप सीरियसली मजाक किया करो और जब वास्तव में कोई गंभीर कार्य करने की बारी आती है  तो ये लोग कहीं किसी कौने में जा छिपते हैं.

दोस्तों मेरे लिए तो ब्लॉग्गिंग मनोरंजनार्थ ही है और हमेशा ही रहेगी.  मैं कभी सीरियस ब्लॉग्गिंग नहीं करूँगा.







गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

कपोत पलटदास ब्लॉग अवतारी




एक रहन कपोत पलटदास ब्लॉग अवतारी
करके आंख बंद मन मा जाने का बिचारी


तबही आई वहां एक नार शायद वो कुंवारी

देख कपोत भये चकित मति गयी उनकी मारी

 संवारना उसका देख कर सोच उनकी भयी बिकारी

लगे सोचने होगा ये......


और होगा वो........


पर........ फुर्र हो गयी वो नारी




और रह गए पलट दास ब्रह्मचारी के ब्रह्मचारी.
 





इति.