धर्म मेरा प्रिय विषय है क्योंकि अभी तक मैं यह नहीं जान पाया हूँ की वास्तव में मेरा सच्चा धर्म क्या है? यह चर्चा तो बाद में भी कर लूँगा , अभी तो माया मुझे मोह रही है । मेरा ध्यान भटका रही है अतः धर्म को त्याग कर माया पर विचार करना जरुरी है।
पिताजी कहते थे की बेटा माया के चक्कर में मत फसना, माया महा ठगिनी। उनकी बातें हर आधुनिक बेटे की तरह यंत्रवत सुनता था कभी गहन विचार नहीं किया।
माया है क्या? किस चिड़िया का नाम है माया ? जब छोटा था तो सुनता था की ये धन, संपत्ति, पैसा, पद ,अहंकार, क्रोध, लोभ और ऐसी ही चीजों को माया कहते हैं। मैंने तो तभी से माया की एक मूरत मन में बना ली थी।
आज भी मेरे लिए माया का मतलब हरे हरे नोट हैं। नोट चाहे एक रुपये का हो या हजार रूपये का उसका अर्थ सामान है। तो माया का मतलब ..... हरे हरे नोट ! नोट चाहे गड्डी में हों या हार में ।
माया मेरे लिए वे देवी हैं जिनके दोनों तरफ दो हाथी सूंड में कलश उठाये खड़े रहते।
माया वो देवी हैं जिनके स्वामी स्वर्ग में रहने वाले एक देव हैं जिनका नाम "क" शब्द से शुरू होता है। कुछ याद आया.............. अरे ........ अरे भाई माया के स्वामी कुबेर।
माया एक जगह नहीं टिकती। माया आज आपके हाथ है कल राह में साईकिल पर जाने वाले के साथ हो सकती है परसों कमल पर विराजमान भी दिख सकती हैं। और कभी कभी सभी को हाथ मलने पर मजबूर भी कर सकती है। इतिहास उठा कर देखें ऐसा ही हुआ है।
माया समाज के वर्षों से सताए हुए दबे कुचले पिछड़े व्यक्ति को सत्ता के रंगीन स्वप्न दिखा सकती है। और साथ में यह सिखा सकती है की जिसने तुम्हे काटा उसे तुम काट खाओ। कभी मानसिक स्तर पर ऊँचे न उठो।
यही तो माया है। माया से मुक्त होने का प्रयास करो प्रजा जनों।
और अंत में ... माया हमें क्या सीख देती है?
माया हमें समझती है की हम अपनी सभी शक्तियों का प्रयोग सही ढंग से करे, सोच समझ कर करें , माया के फेर में न पड़े वर्ना हमारा, देश का, और सब का बेडा गर्क होने में देर नहीं लगेगी.
रविवार, 21 मार्च 2010
शुक्रवार, 19 मार्च 2010
साईं बाबा का चमत्कार - मेरे जीवन की सत्य घटना.
मैं चमत्कार वगैरा में विश्वास नहीं रखता और धार्मिक होते हुए भी मंदिरों के ज्यादा चक्कर नहीं काटता । मेरे बड़े भाई साहब मेरे बिलकुल विपरीत हैं। उनकी साईं बाबा में बेहद श्रद्धा है। वे अक्सर शिरडी आते जाते रहते हैं। कई बार उन्होंने मुझे शिरडी चलने के लिए कहा पर मैं किसी न किसी वजह से उनके साथ नहीं जा पाया।
यह बात सन २००८ की सर्दियों की है। भाई साहब दतात्रेय जयंती के अवसर पर शिरडी जा रहे थे। उन्होंने मुझे इस विषय में बताया । उन्हीं दिनों शिरडी में बाबा के किसी भक्त ने बाबा के लिए सोने का सिंहासन बनवाया था और वहां की दीवारों पर भी सोने के पत्र लगवाये थे। यह करोडो रुपयों का दान था। मैं इस बात से बड़ा प्रभावित था अतः मन में एक सोच आयी की चलो बाबा के पुण्य दर्शनों तो होंगे ही और जीवन में पहली बार एक साथ इतना सोना भी देख लेंगे, तो मैं भी शिरडी जाने के लिए तैयार हो ही गया।
मेरे बड़े भाई इस बात से बहुत खुश हुए। रास्ते भर वे मुझे साईं बाबा के चमत्कारों के विषय में बताते रहे। उन्होंने कहा की बाबा के आशीर्वाद से मेरे जीवन में भी कोई न कोई परिवर्तन अवश्य आयेगा। मैं भी मन ही मन बाबा से अपने जीवन में कोई एसा चमत्कार करने की प्रार्थना करने लगा की बस जीवन सफल हो जाये।
शिरडी पहुच कर हमने होटल में एक कमरा किराये पर लिया , अपना सामान रखा और जल्दी से नहा कर बाबा के दर्शन करने निकल पड़े। दतात्रेय जयंती की वजह से मंदिर में गर्दी बहुत थी। ( वहां की लोकल भाषा में भीड़ को गर्दी बोलते हैं) बाबा के दर्शनों के लिए लम्बी लाइन लगी थी। करीब तीन चार घंटों में हमारा नम्बर आया। मन की सारी इच्छाए मैंने बाबा के सामने रख दीं। मैंने बाबा से कहा बाबा कोई चमत्कार कर दो। बस कुछ ऐसा कर दो की लगे की मैं भी कोई बड़ा आदमी हूँ।
दर्शन के पश्चात् जब हम मंदिर से बाहर आये तो मेरे बड़े भाई को तो बड़ी तेज भूख लग रही थी और जैसा की मैं पहले बता ही चूका हूँ की मेरा स्वाभाव मेरे बड़े भाई के बिलकुल विपरीत है, तो स्वाभाव वश मुझे भी जोर की ही लगी थी। चूँकि भाई साहब बार बार शिरडी आते जाते रहते हैं अतः उन्हें मालूम था की पास में ही सड़क पार एक सुलभ शौचालय है। वे मुझे वहां ले गए । जैसा की आमतोर पर सार्वजनिक शौचालयों में होता है यहाँ भी दरवाजों पर कुण्डी नहीं थी पर मैं इसकी परवाह न करके अपने कार्य में लग गया । अपना पेट हलका करके जब मैंने शौचालय का नल खोला तो वहां पानी की एक बूंद भी नहीं थी। मैं बड़ा परेशान हो गया । मैंने दरवाजे से बाहर झाँका तो सामने एक छोटा लड़का था मैंने उससे पानी लाने की प्रार्थना की तो उसने बताया की उस समय वहां पानी कहीं नहीं मिलता । यह बात सुनकर तो मुझे पसीना ही आ गया। इस अवस्था में तो मैं बाहर भी नहीं आ सकता था। मैंने वहां करीब एक घंटे इंतजार किया तब मेरे बड़े भाई मुझे तलाशते हुए आये । पानी की व्यवस्था वो भी नहीं कर पाए। फिर अंत में वो बिजलरी की दो बोतलें खरीद कर लाये और मैं अपनी सामान्य अवस्था में आ पाया ।
यह मेरे जीवन की एक बहुत बड़ी घटना थी। जिस बिजलरी के पानी को एक आम आदमी पीने के लिए नहीं खरीद पता है उससे मैंने क्या धोया । एक मिनट में बाबा ने मेरे जीवन में कितना बड़ा परिवर्तन ला दिया । मुझे लगा की ये भी बाबा के अनेकों चमत्कारों में से एक है अतः आपसे मैंने अपने जीवन का यह अनुभव शेयर किया है। आशा है आप मेरी भावनाओ को समझेंगे और इस चमत्कार की कथा बाबा के अन्य करोडपति भक्तों तक पहुचाएंगे।
यह बात सन २००८ की सर्दियों की है। भाई साहब दतात्रेय जयंती के अवसर पर शिरडी जा रहे थे। उन्होंने मुझे इस विषय में बताया । उन्हीं दिनों शिरडी में बाबा के किसी भक्त ने बाबा के लिए सोने का सिंहासन बनवाया था और वहां की दीवारों पर भी सोने के पत्र लगवाये थे। यह करोडो रुपयों का दान था। मैं इस बात से बड़ा प्रभावित था अतः मन में एक सोच आयी की चलो बाबा के पुण्य दर्शनों तो होंगे ही और जीवन में पहली बार एक साथ इतना सोना भी देख लेंगे, तो मैं भी शिरडी जाने के लिए तैयार हो ही गया।
मेरे बड़े भाई इस बात से बहुत खुश हुए। रास्ते भर वे मुझे साईं बाबा के चमत्कारों के विषय में बताते रहे। उन्होंने कहा की बाबा के आशीर्वाद से मेरे जीवन में भी कोई न कोई परिवर्तन अवश्य आयेगा। मैं भी मन ही मन बाबा से अपने जीवन में कोई एसा चमत्कार करने की प्रार्थना करने लगा की बस जीवन सफल हो जाये।
शिरडी पहुच कर हमने होटल में एक कमरा किराये पर लिया , अपना सामान रखा और जल्दी से नहा कर बाबा के दर्शन करने निकल पड़े। दतात्रेय जयंती की वजह से मंदिर में गर्दी बहुत थी। ( वहां की लोकल भाषा में भीड़ को गर्दी बोलते हैं) बाबा के दर्शनों के लिए लम्बी लाइन लगी थी। करीब तीन चार घंटों में हमारा नम्बर आया। मन की सारी इच्छाए मैंने बाबा के सामने रख दीं। मैंने बाबा से कहा बाबा कोई चमत्कार कर दो। बस कुछ ऐसा कर दो की लगे की मैं भी कोई बड़ा आदमी हूँ।
दर्शन के पश्चात् जब हम मंदिर से बाहर आये तो मेरे बड़े भाई को तो बड़ी तेज भूख लग रही थी और जैसा की मैं पहले बता ही चूका हूँ की मेरा स्वाभाव मेरे बड़े भाई के बिलकुल विपरीत है, तो स्वाभाव वश मुझे भी जोर की ही लगी थी। चूँकि भाई साहब बार बार शिरडी आते जाते रहते हैं अतः उन्हें मालूम था की पास में ही सड़क पार एक सुलभ शौचालय है। वे मुझे वहां ले गए । जैसा की आमतोर पर सार्वजनिक शौचालयों में होता है यहाँ भी दरवाजों पर कुण्डी नहीं थी पर मैं इसकी परवाह न करके अपने कार्य में लग गया । अपना पेट हलका करके जब मैंने शौचालय का नल खोला तो वहां पानी की एक बूंद भी नहीं थी। मैं बड़ा परेशान हो गया । मैंने दरवाजे से बाहर झाँका तो सामने एक छोटा लड़का था मैंने उससे पानी लाने की प्रार्थना की तो उसने बताया की उस समय वहां पानी कहीं नहीं मिलता । यह बात सुनकर तो मुझे पसीना ही आ गया। इस अवस्था में तो मैं बाहर भी नहीं आ सकता था। मैंने वहां करीब एक घंटे इंतजार किया तब मेरे बड़े भाई मुझे तलाशते हुए आये । पानी की व्यवस्था वो भी नहीं कर पाए। फिर अंत में वो बिजलरी की दो बोतलें खरीद कर लाये और मैं अपनी सामान्य अवस्था में आ पाया ।
यह मेरे जीवन की एक बहुत बड़ी घटना थी। जिस बिजलरी के पानी को एक आम आदमी पीने के लिए नहीं खरीद पता है उससे मैंने क्या धोया । एक मिनट में बाबा ने मेरे जीवन में कितना बड़ा परिवर्तन ला दिया । मुझे लगा की ये भी बाबा के अनेकों चमत्कारों में से एक है अतः आपसे मैंने अपने जीवन का यह अनुभव शेयर किया है। आशा है आप मेरी भावनाओ को समझेंगे और इस चमत्कार की कथा बाबा के अन्य करोडपति भक्तों तक पहुचाएंगे।
विचारों के दस्त.
क्या बात है जनाब कई दिनों से दिखाई नहीं पड़े। कहाँ रहते हो? बड़े सुस्त नज़र आ रहे हो।
नहीं कोई बड़ी बात नहीं ..... बस पिछले कुछ दिनों से थोडा दिमाग ख़राब चल रहा है। विचारों के दस्त लगें है।
हैं ?????? विचारों के दस्त ! ये कोन सी नईबीमारी है दोस्त , आजतक नहीं सुनी ?
है , एक बीमारी ये भी है... जो लोग हर समय अनाप-सनाप सोचते रहते हैं...... दिमाग को आराम ही नहीं देते उनको कभी कभी ऐसी बीमारी भी हो जाती है।
अच्छा इसके लक्षण क्या है?
लक्षण क्या बताऊँ ? .... अपने कोई घटना देखि या सुनी तो आपकी खोपड़ी में गुढ़ गुढ़ सी होने लगेगी। दिमाग ऐठने लगेगा और विचार रोके नहीं रुकेंगे, बस सर पकड़ो और भागो टेबल की तरफ और लगा दो अपने विचारों का ढेर।
च च च ....... यह बीमारी लगी कैसे तुम्हें?
क्या बताऊँ यार .... कुछ कच्चे पक्के ब्लॉग देखे तब से ही दिमाग ख़राब हुआ है और बस.......... पता नहीं कब के जमे हुए बासी विचार निकले जा रहे हैं, एक के बाद एक ...... धडा धड....... कुछ तो बाहर ही फैल जाते , जगह पर ही नहीं होते। ये मेरे दोस्त का लगाया हुआ रोग है। पहले सिर्फ एक बार जाता था डायरी लिखने अब तो बार बार जाना पड़ रहा है।
इसकी कोई दवा दारू है के नहीं?
दवा का पता नहीं पर लगता है की दारू ही इस रोग से पीछा छुड़ाएगी। रात को पियो, कम्बल ओढ कर सो जाओ । सुबह दिमाग में हेंग ओवर का दर्द होगा विचारों का नहीं। बस यही रास्ता दीखता है।
हा भैया इलाज तो जल्दी करो तुम्हारे छोटे छोटे बच्चे हैं उनका ख्याल कौन रखेगा अगर तुम ऐसे ही टेबल पर बैठे रहे तो ....
हाँ कुछ तो करूँगा ही!
अच्छा भाई राम राम।
राम राम भाई राम राम।
बुधवार, 17 मार्च 2010
वेस्पा, एक्टिवा और हमारे धर्म.
मैं पिछले १५ वर्षों से वेस्पा स्कूटर चला रहा हूँ। आखें बंद करके चला सकता हूँ। कभी चलाया तो नहीं पर ऐसा विश्वास है। अभी कुछ दिनों पहले होंडा का एक्टिवा स्कूटर चलाने का मौका मिला। मैंने पहले कभी इस तरह का स्कूटर नहीं चलाया था। मेरे लिए ये एकदम नया अनुभव रहा। शुरू में तो बड़ा अजीब सा लगा। कई गियर नहीं, पैरों पर ब्रेक नहीं, किक मारने की जरुरत नहीं। स्कूटर पर बैठो , बटन दबाओ, रेस दो और आपका स्कूटर चल दिया। कितना आराम , कितनी सुविधा।
वेस्पा में क्या होता था? सबसे पहले किक मारो। किक भी ढंग से मारो, वर्ना बैक किक लगी तो लंगड़े हो जाओगे। न्यूटल पर स्टार्ट करके पहले गियर में स्पीड शुन्य से पंद्रह की फिर दुसरे गियर में स्पीड पंद्रह से तीस और फिर तीसरे चौथे गियर जाकर फुल स्पीड। और इसके बाद रफ़्तार कम करनी हो तो फिर से वही कसरत। वैसे इतने वर्षो एक गियर से दुसरे गियर बदलते हुए आदत हो गयी थी और पता नहीं चलता था की कब हमारा शारीर थक कर चूर हो गया। अब इस नयी तकनीक ने तो सब कितना आसान कर दिया है। गियर मुक्त स्कूटर हमें भी थकानसे मुक्त कर देता है।
देखो इन्सान अपने शरीर को आराम देने के लिए, सुख पहुचने के लिए, कितना कुछ करता रहता है। नयी तकनीक लाता है की चीजे आसान हो जाएँ, मुश्किलें मिटें। पर यह सब कुछ शरीर के लिए आत्मा के लिए कुछ भी नहीं। आत्मा को सुख पहुचने के लिए हमने ये जो धर्म बनाये है ( मेरा मत है की धर्मो को इन्सान ने अपनी सुविधा के लिए ही गढ़ा है , इन्हें भगवान ने नहीं बनाया) वो इतने जटिल हैं की बेचारी आत्मा थक जाती है और उसे पता ही नहीं चलता की वो सपनों की दुनिया में क्यों जाना चाहती है।
आत्मा को परमात्मा से मिलाने के लिए ये जो धर्म रूपी स्कूटर हैं ये सभी बहुत पुराने मॉडल के हो चुके हैं। इस स्कूटर के कई ब्रांड है... वैदिक , इस्लामिक , यहूदी, ... अरे बहुत है, पर हैं सभी पुराने मॉडल के। और जो नए ब्रांड बाज़ार में आये हैं उनके इंजन तो पुराने ही है। सबसे पहले तो स्कूटर स्टार्ट करना ही मुश्किल होता है . धर्म अपनाने के लिए कहीं जनेऊ के वक्त कान छिद्वाये जाते हैं, कही खतना करवाया जाता है, कहीं कुछ और। अगर आप जनेऊ नहीं पहनेगे तो आप हिन्दू नहीं। धागे का एक टुकड़ा ही धर्म है और उसी धागे से बने कपडे पहनने वाले का कोई धर्म नहीं। अगर जनेऊ प्रतीकात्मक है तो ऐसे प्रतीकों को अपनाओ जिनका हमें ज्ञान हो और एहसास हो की ये किस लिए है वर्ना इनका कोई उपयोग नहीं। मुस्लमान भाई मुझे माफ़ करें इस्लाम में भी एसा ही है। खतना क्यों जरुरी है ? क्या सिर्फ खाल के एक टुकडे पर ही हमारा धर्म टिका है। अगर ये सिर्फ साफ सफाई के लिए है तो नाख़ून कटवा के काम नहीं चलेगा क्या ?
देखा इन पुराने मॉडल के स्कूटरों को भी स्टार्ट करना मुश्किल है । एक और समानता है। अगर आपकी किक ठीक ढंग से नहीं लगी तो लंगड़े हो जाओगे मतलब धार्मिक कर्मकांडो को सही ढंग से नहीं करोगे तो आपकी गत नहीं। मन्त्रों का सही उच्चारण करो वर्ना फायदे की जगह नुकसान हो जायेगा। बेचारे हकले और तोतले लोग तो हिन्दू धर्म में मुक्ति पा ही नहीं सकते। नमाज तो उत्तर की ओर मुह करके पढो वर्ना अल्लाह मियां सुन नहीं पाएंगे कोई और ही सुन लेगा। ( अल्लाह जी मुझे माफ़ करें मैं आपसे बड़ा डरता हूँ। कोई गलती हो तो पड़ोस वाले विष्णु जी का बच्चा समझ कर माफ़ कर देना बाकि हिन्दू देवी देवताओं से मैं नहीं डरता वो तो अपने ही है।)
चलिए अपने स्कूटर स्टार्ट कर लिया पर फिर आपको बार बार गियर बदलने पड़ेंगे। कभी व्रत लो कभी रोजा रखो। कभी गंगा जी में डूबकी लगाओ कभी मक्का मदीना जाओ, सिर्फ घर पर रहने से धर्म नहीं निभेगा। कठिन मन्त्रों का जाप करो , संध्या पूजा करो, तप करो व्रत करो , अष्टांग योग नियमों का पालन करो, ये करो, वो मत करो, बस इसी तरह से गियर बदलते रहो मंजिल पर पहुच जाओगे।
मंजिल पर पहुचो न पहुचो पर थक जरुर जाओगे इस बात की गारंटी है।
अच्छा कुछ नए धर्म भी आये जिनमे ये कहा गया की ये आसान है, इनमे ज्यादा कर्म कांड नहीं हैं पर कालांतर में उनका हश्र भी कुछ अच्छा नहीं हुआ । मानव स्वभाव को तो देखो जिन धर्मों को सरलता की नीव पर खड़ा किया गया, उनमे भी लोगों ने पुराने कर्म कंडों की ईटों से नए कमरे बनवा लिए ताकि पुराने घर का सा अहसास बना रहे। वैदिक धर्म को अपनाने वाले संतानी भाइयों ने अपने कर्म कांड वैदिक धर्म में भी जोड़ लिए।
अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे की सभी धर्म शुरू तो होते हैं छोटे छोटे सरल सिद्धांतों से पर धीरे धीरे जटिल होते चले जाते हैं। एसा क्यों होता है ? शरीर के लिए तो मुश्किलों को हम आसान बनाते है पर आत्मा के लिए सरल से सरल सूत्र को भी घुमा फिर कर इतना जटिल कर देते हैं की बेचारी आत्मा मुक्त होने की जगह और ही इन बन्धनों में जकड़ी जाती है।
क्या कोई धर्म एसा नहीं हो सकता जिसमें नियम कानून , तंत्र मन्त्र, पूजा पाठ आदि चीजो से आजादी हो और जीवन का सफ़र आनंद के साथ कटे।
वेस्पा में क्या होता था? सबसे पहले किक मारो। किक भी ढंग से मारो, वर्ना बैक किक लगी तो लंगड़े हो जाओगे। न्यूटल पर स्टार्ट करके पहले गियर में स्पीड शुन्य से पंद्रह की फिर दुसरे गियर में स्पीड पंद्रह से तीस और फिर तीसरे चौथे गियर जाकर फुल स्पीड। और इसके बाद रफ़्तार कम करनी हो तो फिर से वही कसरत। वैसे इतने वर्षो एक गियर से दुसरे गियर बदलते हुए आदत हो गयी थी और पता नहीं चलता था की कब हमारा शारीर थक कर चूर हो गया। अब इस नयी तकनीक ने तो सब कितना आसान कर दिया है। गियर मुक्त स्कूटर हमें भी थकानसे मुक्त कर देता है।
देखो इन्सान अपने शरीर को आराम देने के लिए, सुख पहुचने के लिए, कितना कुछ करता रहता है। नयी तकनीक लाता है की चीजे आसान हो जाएँ, मुश्किलें मिटें। पर यह सब कुछ शरीर के लिए आत्मा के लिए कुछ भी नहीं। आत्मा को सुख पहुचने के लिए हमने ये जो धर्म बनाये है ( मेरा मत है की धर्मो को इन्सान ने अपनी सुविधा के लिए ही गढ़ा है , इन्हें भगवान ने नहीं बनाया) वो इतने जटिल हैं की बेचारी आत्मा थक जाती है और उसे पता ही नहीं चलता की वो सपनों की दुनिया में क्यों जाना चाहती है।
आत्मा को परमात्मा से मिलाने के लिए ये जो धर्म रूपी स्कूटर हैं ये सभी बहुत पुराने मॉडल के हो चुके हैं। इस स्कूटर के कई ब्रांड है... वैदिक , इस्लामिक , यहूदी, ... अरे बहुत है, पर हैं सभी पुराने मॉडल के। और जो नए ब्रांड बाज़ार में आये हैं उनके इंजन तो पुराने ही है। सबसे पहले तो स्कूटर स्टार्ट करना ही मुश्किल होता है . धर्म अपनाने के लिए कहीं जनेऊ के वक्त कान छिद्वाये जाते हैं, कही खतना करवाया जाता है, कहीं कुछ और। अगर आप जनेऊ नहीं पहनेगे तो आप हिन्दू नहीं। धागे का एक टुकड़ा ही धर्म है और उसी धागे से बने कपडे पहनने वाले का कोई धर्म नहीं। अगर जनेऊ प्रतीकात्मक है तो ऐसे प्रतीकों को अपनाओ जिनका हमें ज्ञान हो और एहसास हो की ये किस लिए है वर्ना इनका कोई उपयोग नहीं। मुस्लमान भाई मुझे माफ़ करें इस्लाम में भी एसा ही है। खतना क्यों जरुरी है ? क्या सिर्फ खाल के एक टुकडे पर ही हमारा धर्म टिका है। अगर ये सिर्फ साफ सफाई के लिए है तो नाख़ून कटवा के काम नहीं चलेगा क्या ?
देखा इन पुराने मॉडल के स्कूटरों को भी स्टार्ट करना मुश्किल है । एक और समानता है। अगर आपकी किक ठीक ढंग से नहीं लगी तो लंगड़े हो जाओगे मतलब धार्मिक कर्मकांडो को सही ढंग से नहीं करोगे तो आपकी गत नहीं। मन्त्रों का सही उच्चारण करो वर्ना फायदे की जगह नुकसान हो जायेगा। बेचारे हकले और तोतले लोग तो हिन्दू धर्म में मुक्ति पा ही नहीं सकते। नमाज तो उत्तर की ओर मुह करके पढो वर्ना अल्लाह मियां सुन नहीं पाएंगे कोई और ही सुन लेगा। ( अल्लाह जी मुझे माफ़ करें मैं आपसे बड़ा डरता हूँ। कोई गलती हो तो पड़ोस वाले विष्णु जी का बच्चा समझ कर माफ़ कर देना बाकि हिन्दू देवी देवताओं से मैं नहीं डरता वो तो अपने ही है।)
चलिए अपने स्कूटर स्टार्ट कर लिया पर फिर आपको बार बार गियर बदलने पड़ेंगे। कभी व्रत लो कभी रोजा रखो। कभी गंगा जी में डूबकी लगाओ कभी मक्का मदीना जाओ, सिर्फ घर पर रहने से धर्म नहीं निभेगा। कठिन मन्त्रों का जाप करो , संध्या पूजा करो, तप करो व्रत करो , अष्टांग योग नियमों का पालन करो, ये करो, वो मत करो, बस इसी तरह से गियर बदलते रहो मंजिल पर पहुच जाओगे।
मंजिल पर पहुचो न पहुचो पर थक जरुर जाओगे इस बात की गारंटी है।
अच्छा कुछ नए धर्म भी आये जिनमे ये कहा गया की ये आसान है, इनमे ज्यादा कर्म कांड नहीं हैं पर कालांतर में उनका हश्र भी कुछ अच्छा नहीं हुआ । मानव स्वभाव को तो देखो जिन धर्मों को सरलता की नीव पर खड़ा किया गया, उनमे भी लोगों ने पुराने कर्म कंडों की ईटों से नए कमरे बनवा लिए ताकि पुराने घर का सा अहसास बना रहे। वैदिक धर्म को अपनाने वाले संतानी भाइयों ने अपने कर्म कांड वैदिक धर्म में भी जोड़ लिए।
अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे की सभी धर्म शुरू तो होते हैं छोटे छोटे सरल सिद्धांतों से पर धीरे धीरे जटिल होते चले जाते हैं। एसा क्यों होता है ? शरीर के लिए तो मुश्किलों को हम आसान बनाते है पर आत्मा के लिए सरल से सरल सूत्र को भी घुमा फिर कर इतना जटिल कर देते हैं की बेचारी आत्मा मुक्त होने की जगह और ही इन बन्धनों में जकड़ी जाती है।
क्या कोई धर्म एसा नहीं हो सकता जिसमें नियम कानून , तंत्र मन्त्र, पूजा पाठ आदि चीजो से आजादी हो और जीवन का सफ़र आनंद के साथ कटे।
मंगलवार, 16 मार्च 2010
अथ आधुनिक देवी सूक्तं.
या देवी भारत वर्षं जनसँख्या रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ १ ॥
या देवी मनमोहन सिंह हृदये मैडम रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ २ ॥
या देवी मायावती हृदये हस्ती रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ ३ ॥
या देवी मुलायम हृदये माया रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ ४॥
या देवी ममता हृदये बंग रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ ६ ॥
या देवी अमर सिंह हृदये अमिताभ रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ ७ ॥
या देवी लालू हृदये रेल रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ ८ ॥
या देवी शाहरुख़ हृदये खान रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ ९ ॥
या देवी मम हृदये हास्य रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ १० ॥
दस और बस ॥
ॐ चण्डिके नमः ।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ १ ॥
या देवी मनमोहन सिंह हृदये मैडम रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ २ ॥
या देवी मायावती हृदये हस्ती रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ ३ ॥
या देवी मुलायम हृदये माया रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ ४॥
या देवी ममता हृदये बंग रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ ६ ॥
या देवी अमर सिंह हृदये अमिताभ रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ ७ ॥
या देवी लालू हृदये रेल रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ ८ ॥
या देवी शाहरुख़ हृदये खान रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ ९ ॥
या देवी मम हृदये हास्य रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ॥ १० ॥
दस और बस ॥
ॐ चण्डिके नमः ।
सोमवार, 15 मार्च 2010
वेद कुरआन ब्लॉग के आदरणीय जमाल साहब को मेरा सन्देश.
महोदय ,
आपके कई लेख पड़े। आप प्रयास कर रहे हैं हिन्दू धर्म में विद्यमान बुराइयों को सामने लाने का।
बहुत बढ़िया, बहुत अच्छा व नेक कार्य है।
गन्दगी जहाँ भी हो हटानी ही चाहिए। मेरे हिसाब से पढ़े लिखे होने का यही मतलब है। और आप तो ज्यादा पढ़े लिखे है। मैं तो सिर्फ हाई स्कूल पास हूँ और आपके समक्ष अपने को तुच्छ मानता हूँ। पर मैंने जब पहली बार आपका लेख पढ़ा तो इतना ही समझ पाया की आप नहा धोकर इस धर्म (वैदिक/सनातन ) के पीछे पड़े हैं।
जितनी भी मेरी समझ है, उससे लगा की आपकी भावनाए दयानंद जी के लेखो को पढ़कर भड़की हैं। उन्होंने इस्लामिक धर्म की गलत बातों को अपनी पुस्तक में उजागर किया । जहाँ तक मुझे लगा आपकी यही पीड़ा है। ठीक है हम जिस धर्म का अनुसरण करते हैं उसकी कोई बुराई करे तो जाहिर है किसी भी पढ़े लिखे व्यक्ति को पीड़ा होगी ही।
इस पीड़ा को दूर करने के दो तरीके हैं। पहला तरीका जिसे आमतौर पर सभी साधारण मानसिकता वाले जन अपनाते है, यह है की अगर आपको दर्द हुआ है या किसी ने कोई चोट मारी है तो आप हाथ में लठ्ठ ले और बाज़ार में जाकर धुमाने लगें और इसका ख्याल बिलकुल भी ना करें की किसको चोट लग रही है। आपका लठ्ठा चाहे जिस को लगे , उसने आपका भला किया हो या बुरा, वह चाहे तटस्थ हो या नहीं, आपको इससे क्या लेना आपको तो अपने मन की भडास निकालनी है। हाँ आप इस तरह से किसी अनजान को आप अपना दर्द ट्रांसफर कर देंगे और शायद तभी आपके मन की पीड़ा भी कम होगी। गर्दन के बदले गर्दन, हाथ के बदले हाथ, और अपमान के बदले अपमान। बिलकुल अरब देशो के कानून की तरह से। यह पाशविक तरीका है। जानवर ही इस तरीके को अपनाते हैं । सड़क के बीचों बीच बैठी गाय को हटायें वो तो वो गौ माता भी, अपनी जानवरों वाली प्रवृति का पालन करते हुए, आपको सींग मारकर घायल कर सकती है।।
दूसरा तरीका है तर्क का। आप अपनी बात को तार्किक रूप से साबित करें । आपकी बात में दम होगा तो बेशक अभी नहीं बाद में ही सही सामने वाला आपका समर्थन करेगा ही। अब भला अपना नुकसान कौन चाहता है। आपकी बात अगर किसी को फायदा देती है तो वह इसका पालन अवश्य करेगा चाहे छुप कर करे। ठीक है न।
पर आपका मकसद नेक होना चाहिए । अगर आपका मकसद इतना सा है की मुझे तो सामने वाले के मुह पर कीचड़ सिर्फ इसलिए मलना है क्योकि उसने मेरे मुह पर गुलाल लगाया था तो फिर आप अपनी बात को तर्क के बजाये लठ्ठ से मनवाने का विकल्प चुनेगे।
देखिये दयानंद जी ने जो भी बातें इस्लाम के विरुद्ध लिखी वो अगर सत्य नहीं थी तो उनका विरोध न करें क्योकि झूट तो झूट ही होता है। वह अपनी मौत खुद ही मर जायेगा । अपने अपने किसी लेख में अल्लोहोप्निषद का उल्लेख किया है जो की इस्लाम का समर्थन करता है और जिसको वैदिक ग्रन्थ कह कर प्रचारित किया गया।। बहुत समय हो गया है इसकी रचना हुए क्या हिन्दू धर्म पर इसका कुछ असर हुआ । जो गलत है , झूट है उसका पालन कोई नहीं करता।
आप अपने धर्म को हमसे बेहतर तरीके से जानते हैं । किसी के झूट से आपका धर्मं ख़त्म नहीं होने वाला बल्कि आपके धर्मावलम्बी ज्यादा शक्ति से अपने धर्म से जुड़ जायेंगे जैसे की आपके लेखों को पढ़कर मेरा अपने धर्म पर ज्यादा विश्वास बढ़ा है। मैंने सही और गलत का दुबारा से अवलोकन किया है।
मैंने आपकी बातों को ध्यान से पढ़ा और पाया की आपका उद्देश्य केवल विरोध करना है इसलिए आप केवल उन बातों को सामने ला रहे हैं जो गलत है। भाई सौ प्रतिशत कोई सही नहीं होता । कुछ न कुछ गलतियाँ तो सभी में होती ही हैं। देखना यह चाहिए की औसत क्या है । फिर मानवीय व्यव्हार से सम्बंधित किसी भी विज्ञानं में आप दो और दो चार वाला गणितीय सूत्र नहीं अपना सकते । जो कल गलत था आज सही है और जो आज सही है हो सकता है कल गलत हो। हमारी धार्मिक मान्यताओं में भी यही बात समझनी चाहिए । हो सकता है की वैदिक धर्म की कुछ पुरानी मान्यताएं आज के सन्दर्भ में आपको विचित्र लगें । हमें भी लगाती हैं इसलिए ही तो वे आज प्रचलन में नहीं हैं। आप हमारे धर्मं की कुछ पुरानी मान्यताओं का मजाक उड़ाने की जगह वर्तमान की बात करें । और देखे की आज हमारे धर्म में क्या गलत है। उसका विरोध करें । उसे उजागर करने का प्रयास करें । अपने धर्म के लिए भी यही रवैया रखें। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखे की कुछ सामाजिक समस्ये होती हैं और उनका धर्म से कुछ लेना देना नहीं होता है। एक जगह आपने लिखा है की हिन्दू धर्म में दहेज़ के लिए औरतों को जलाया जाता हैं। यह एक सामाजिक समस्या है । इसका किसी धर्म से कुछ लेना देना नहीं है। मेरे कुछ मुस्लिम दोस्तों की शादियों में मेने देखा है दहेज़ लिया व दिया जाता है। यह कुरीति हमारे भारतीय समाज में व्याप्त है और कोई अंग्रेज भी अगर यंहा रहेगा तो वो भी दहेज़ लेना शुरू कर देगा। संतान की चाह में वीर्य बैंक में जाने वाली बात का भी धर्म से कुछ लेना देना नहीं है। यह सिर्फ आपके मन की खीज है।
मुझे लगता तो नहीं की मैं आपको कोई राय देने के लायक हूँ पर ध्रष्टता करने का मन कर रहा है। मैंने आपके लेखों में एक अजीब सा बिखराव देखा है । आप एक बात पर नहीं टिकते , भटकते रहते हैं । इसके साथ ही आपके लेख हमेशा किसी न किसी की कही हुई बात का उत्तर होते हैं । कोई कुछ कहता है आप उस बात का अपने ब्लॉग में उत्तर देते हैं। दुसरे ने क्या कहा था पता ही नहीं चलता । देखिये मेरे हिसाब से आप सच्चे दिल से हिन्दू धर्म की बुराई करना ही चाहते हैं तो फिर इस धर्म का एक वो विचार या मान्यता जो आपको गलत लगाती है लें और अपनी राय /विचार उस पर लिखे । दूसरा क्या कहता है इस का उत्तर अपने ब्लॉग पर न देकर उसके ब्लॉग पर ही दे। इससे मेरे जैसे कम बुध्धि के लोगों को आपकी बात समझने में आसानी होगी।
अंत में एक और बात कहना चाहता हूँ। दयानंद जी ने खुले रूप में हिन्दू धर्म में प्रचलित गलत मान्यताओं का पहले विरोध किया फिर उन्होंने इस्लाम की बात की। यह दिखता है की उनका उद्देश्य मात्र बुराई को दूर करना था न की किसी का मजाक उड़ना। अगर निंदा करना ही उनका उद्देश्य होता तो वे सिर्फ इस्लाम पर ही लिखते। आप भी एसा करने का प्रयास करे। आखें खोल कर अपने धर्म की बुराइयों को देखें और उनका विरोध करें। अगर पहले से ही कर रहे हैं तो ज्यादा मुखरित हों । खुल कर बोलें। मुझे एसा नहीं दिखाई पड़ा। मुझे लगा की आप अपनी बुराइयों को भूल कर दुसरे की कमियों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
आप बड़े अच्छे हैं । सभी जगह अपनी अच्छाई फैलाएं। कोशिश करें की जिस तरह से खनिक सेकड़ो टन मिट्ठी हटाकर एक ग्राम सोने का एक टुकड़ा पाकर खुश होता और हटाई गयी मिटटी को भूल जाता है उसी तरह की मानसिकता रख कर आप भी हिन्दू धर्म की लाख बुराइयों में से (जो सिर्फ आपको दिखती है, हमें नहीं) एक अच्छाई खोजे और उसे अपने जीवन में अपनाये। मैं भी अपने जीवन में यही करने का प्रयास करता रहता हूँ।
आपके कई लेख पड़े। आप प्रयास कर रहे हैं हिन्दू धर्म में विद्यमान बुराइयों को सामने लाने का।
बहुत बढ़िया, बहुत अच्छा व नेक कार्य है।
गन्दगी जहाँ भी हो हटानी ही चाहिए। मेरे हिसाब से पढ़े लिखे होने का यही मतलब है। और आप तो ज्यादा पढ़े लिखे है। मैं तो सिर्फ हाई स्कूल पास हूँ और आपके समक्ष अपने को तुच्छ मानता हूँ। पर मैंने जब पहली बार आपका लेख पढ़ा तो इतना ही समझ पाया की आप नहा धोकर इस धर्म (वैदिक/सनातन ) के पीछे पड़े हैं।
जितनी भी मेरी समझ है, उससे लगा की आपकी भावनाए दयानंद जी के लेखो को पढ़कर भड़की हैं। उन्होंने इस्लामिक धर्म की गलत बातों को अपनी पुस्तक में उजागर किया । जहाँ तक मुझे लगा आपकी यही पीड़ा है। ठीक है हम जिस धर्म का अनुसरण करते हैं उसकी कोई बुराई करे तो जाहिर है किसी भी पढ़े लिखे व्यक्ति को पीड़ा होगी ही।
इस पीड़ा को दूर करने के दो तरीके हैं। पहला तरीका जिसे आमतौर पर सभी साधारण मानसिकता वाले जन अपनाते है, यह है की अगर आपको दर्द हुआ है या किसी ने कोई चोट मारी है तो आप हाथ में लठ्ठ ले और बाज़ार में जाकर धुमाने लगें और इसका ख्याल बिलकुल भी ना करें की किसको चोट लग रही है। आपका लठ्ठा चाहे जिस को लगे , उसने आपका भला किया हो या बुरा, वह चाहे तटस्थ हो या नहीं, आपको इससे क्या लेना आपको तो अपने मन की भडास निकालनी है। हाँ आप इस तरह से किसी अनजान को आप अपना दर्द ट्रांसफर कर देंगे और शायद तभी आपके मन की पीड़ा भी कम होगी। गर्दन के बदले गर्दन, हाथ के बदले हाथ, और अपमान के बदले अपमान। बिलकुल अरब देशो के कानून की तरह से। यह पाशविक तरीका है। जानवर ही इस तरीके को अपनाते हैं । सड़क के बीचों बीच बैठी गाय को हटायें वो तो वो गौ माता भी, अपनी जानवरों वाली प्रवृति का पालन करते हुए, आपको सींग मारकर घायल कर सकती है।।
दूसरा तरीका है तर्क का। आप अपनी बात को तार्किक रूप से साबित करें । आपकी बात में दम होगा तो बेशक अभी नहीं बाद में ही सही सामने वाला आपका समर्थन करेगा ही। अब भला अपना नुकसान कौन चाहता है। आपकी बात अगर किसी को फायदा देती है तो वह इसका पालन अवश्य करेगा चाहे छुप कर करे। ठीक है न।
पर आपका मकसद नेक होना चाहिए । अगर आपका मकसद इतना सा है की मुझे तो सामने वाले के मुह पर कीचड़ सिर्फ इसलिए मलना है क्योकि उसने मेरे मुह पर गुलाल लगाया था तो फिर आप अपनी बात को तर्क के बजाये लठ्ठ से मनवाने का विकल्प चुनेगे।
देखिये दयानंद जी ने जो भी बातें इस्लाम के विरुद्ध लिखी वो अगर सत्य नहीं थी तो उनका विरोध न करें क्योकि झूट तो झूट ही होता है। वह अपनी मौत खुद ही मर जायेगा । अपने अपने किसी लेख में अल्लोहोप्निषद का उल्लेख किया है जो की इस्लाम का समर्थन करता है और जिसको वैदिक ग्रन्थ कह कर प्रचारित किया गया।। बहुत समय हो गया है इसकी रचना हुए क्या हिन्दू धर्म पर इसका कुछ असर हुआ । जो गलत है , झूट है उसका पालन कोई नहीं करता।
आप अपने धर्म को हमसे बेहतर तरीके से जानते हैं । किसी के झूट से आपका धर्मं ख़त्म नहीं होने वाला बल्कि आपके धर्मावलम्बी ज्यादा शक्ति से अपने धर्म से जुड़ जायेंगे जैसे की आपके लेखों को पढ़कर मेरा अपने धर्म पर ज्यादा विश्वास बढ़ा है। मैंने सही और गलत का दुबारा से अवलोकन किया है।
मैंने आपकी बातों को ध्यान से पढ़ा और पाया की आपका उद्देश्य केवल विरोध करना है इसलिए आप केवल उन बातों को सामने ला रहे हैं जो गलत है। भाई सौ प्रतिशत कोई सही नहीं होता । कुछ न कुछ गलतियाँ तो सभी में होती ही हैं। देखना यह चाहिए की औसत क्या है । फिर मानवीय व्यव्हार से सम्बंधित किसी भी विज्ञानं में आप दो और दो चार वाला गणितीय सूत्र नहीं अपना सकते । जो कल गलत था आज सही है और जो आज सही है हो सकता है कल गलत हो। हमारी धार्मिक मान्यताओं में भी यही बात समझनी चाहिए । हो सकता है की वैदिक धर्म की कुछ पुरानी मान्यताएं आज के सन्दर्भ में आपको विचित्र लगें । हमें भी लगाती हैं इसलिए ही तो वे आज प्रचलन में नहीं हैं। आप हमारे धर्मं की कुछ पुरानी मान्यताओं का मजाक उड़ाने की जगह वर्तमान की बात करें । और देखे की आज हमारे धर्म में क्या गलत है। उसका विरोध करें । उसे उजागर करने का प्रयास करें । अपने धर्म के लिए भी यही रवैया रखें। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखे की कुछ सामाजिक समस्ये होती हैं और उनका धर्म से कुछ लेना देना नहीं होता है। एक जगह आपने लिखा है की हिन्दू धर्म में दहेज़ के लिए औरतों को जलाया जाता हैं। यह एक सामाजिक समस्या है । इसका किसी धर्म से कुछ लेना देना नहीं है। मेरे कुछ मुस्लिम दोस्तों की शादियों में मेने देखा है दहेज़ लिया व दिया जाता है। यह कुरीति हमारे भारतीय समाज में व्याप्त है और कोई अंग्रेज भी अगर यंहा रहेगा तो वो भी दहेज़ लेना शुरू कर देगा। संतान की चाह में वीर्य बैंक में जाने वाली बात का भी धर्म से कुछ लेना देना नहीं है। यह सिर्फ आपके मन की खीज है।
मुझे लगता तो नहीं की मैं आपको कोई राय देने के लायक हूँ पर ध्रष्टता करने का मन कर रहा है। मैंने आपके लेखों में एक अजीब सा बिखराव देखा है । आप एक बात पर नहीं टिकते , भटकते रहते हैं । इसके साथ ही आपके लेख हमेशा किसी न किसी की कही हुई बात का उत्तर होते हैं । कोई कुछ कहता है आप उस बात का अपने ब्लॉग में उत्तर देते हैं। दुसरे ने क्या कहा था पता ही नहीं चलता । देखिये मेरे हिसाब से आप सच्चे दिल से हिन्दू धर्म की बुराई करना ही चाहते हैं तो फिर इस धर्म का एक वो विचार या मान्यता जो आपको गलत लगाती है लें और अपनी राय /विचार उस पर लिखे । दूसरा क्या कहता है इस का उत्तर अपने ब्लॉग पर न देकर उसके ब्लॉग पर ही दे। इससे मेरे जैसे कम बुध्धि के लोगों को आपकी बात समझने में आसानी होगी।
अंत में एक और बात कहना चाहता हूँ। दयानंद जी ने खुले रूप में हिन्दू धर्म में प्रचलित गलत मान्यताओं का पहले विरोध किया फिर उन्होंने इस्लाम की बात की। यह दिखता है की उनका उद्देश्य मात्र बुराई को दूर करना था न की किसी का मजाक उड़ना। अगर निंदा करना ही उनका उद्देश्य होता तो वे सिर्फ इस्लाम पर ही लिखते। आप भी एसा करने का प्रयास करे। आखें खोल कर अपने धर्म की बुराइयों को देखें और उनका विरोध करें। अगर पहले से ही कर रहे हैं तो ज्यादा मुखरित हों । खुल कर बोलें। मुझे एसा नहीं दिखाई पड़ा। मुझे लगा की आप अपनी बुराइयों को भूल कर दुसरे की कमियों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
आप बड़े अच्छे हैं । सभी जगह अपनी अच्छाई फैलाएं। कोशिश करें की जिस तरह से खनिक सेकड़ो टन मिट्ठी हटाकर एक ग्राम सोने का एक टुकड़ा पाकर खुश होता और हटाई गयी मिटटी को भूल जाता है उसी तरह की मानसिकता रख कर आप भी हिन्दू धर्म की लाख बुराइयों में से (जो सिर्फ आपको दिखती है, हमें नहीं) एक अच्छाई खोजे और उसे अपने जीवन में अपनाये। मैं भी अपने जीवन में यही करने का प्रयास करता रहता हूँ।
रविवार, 14 मार्च 2010
टी -२० का चमत्कार.
क्रिकेट के नए अवतार टी-२० का सबसे बड़ा चमत्कार यह है की इसमे हम विश्व में इस युग के बेहतरीन और अलग अलग देशों के नए व पुराने खिलाडियों को एक साथ खेलते हुए देख सकते हैं। मैं इसे एक दुर्लभ सौभाग्य मानता हूँ जो हमसे पहली पीढ़ी को नहीं प्राप्त हुआ। जब मुरलीधरन हमारे धोनी के साथ मिलकर अपने ही देश के जयसूर्या को आउट करने की रणनीति बनाते हैं या आस्ट्रेलिया के गिलक्रिस्ट को आउट करने की लिए शेन वार्न अपनी प्रसिद्ध फिरकी का जल बुनते हैं तो मुझे एक अजीब सा आनंद मिलाता है। लगता हैं की बेशक कुछ समय के लिए ही सही देशों की सीमाएं मिट गयी हैं। जो पहले एक दुसरे के विरुद्ध होते थे अब साथ साथ हैं। बड़ा अच्छा लगता है।
इस सब से मेरे दिल को बड़ी तसल्ली मिलाती है की जो पैसा भाई से भाई को अलग कर देता है और परिवारों में फूट डाल देता है वही पैसा कभी कभी देशों की दूरियों को ख़त्म कर विरोधियों को मिला भी देता है। बड़ी अजब माया है लक्ष्मी देवी की।
चलो जो भी हो इस नयी सोच के लिए ललित मोदी जी धन्यवाद के पात्र हैं।
इस सब से मेरे दिल को बड़ी तसल्ली मिलाती है की जो पैसा भाई से भाई को अलग कर देता है और परिवारों में फूट डाल देता है वही पैसा कभी कभी देशों की दूरियों को ख़त्म कर विरोधियों को मिला भी देता है। बड़ी अजब माया है लक्ष्मी देवी की।
चलो जो भी हो इस नयी सोच के लिए ललित मोदी जी धन्यवाद के पात्र हैं।
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