उससे मेरी मुलाकात पल्स पोलिओ अभियान के दौरान हुई थी। वो एक नर्स थी और मैं एक क्लर्क । हम दोनों एक ही टीम में थे। हमारा सेंटर एक पोश कालोनी में था जहाँ बच्चों की भीड़ ना के बराबर थी। वैसे तो हमारी टीम में एक डाक्टर और एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी थे पर वे लोग दवा पिलाने की जिम्मेदारी हमारे कन्धों पर डाल कर अपनी दूसरी जिम्मेदारियों को निभाने चले गए थे। हमारे पास करने को ज्यादा कुछ नहीं था इसलिए हमने समय बिताने के लिए सबसे आसान काम करना शुरू किया । आसान काम यानि इधर उधर की बातें।
वो GTB Hospital में नियुक्त थी जहाँ पर मैं भी प्रशासन विभाग में कार्यरत था। जब मुझे यह बात पता चली तो मैं थोडा सहज होगया। अब बातचीत में मेरी भी रूचि बढ़ गयी। वो एक साधारण सी केरल के ईसाई परिवार की लड़की थी। गहरा रंग, ऊँचा कद , घुंघराले बाल सारे लक्षण एकदम ठेठ दक्षिण भारतीय। यहाँ वो दूसरी केरलाई लड़कियों की तरह अपने परिवार से दूर नर्स होस्टल में रहती थी।
उसके व्यक्तित्व में सब कुछ साधारण था पर मैंने उसमे दो विशेष बातें देखीं। पहली चीज थीं उसकी आखें । उन आँखों में आत्मविश्वाश की एक अनोखी चमक थी। इस चमक से पवित्रता झलकती थी, कोई चंचलता या गरूर नहीं झलकता था।
दूसरी बात जो मैंने उसमे दूसरी लड़कियों से अलग पाई वो थी की जब भी मैं उससे कोई बात कहता तो वो पुरे मनोयोग से मेरी बात सुनती थी और जब मैं अपनी बात ख़त्म कर लेता था तब अपनी आँखों में वही पवित्रता भरी चमक लिए मेरी हर बात का जबाब देती थी । उसका हर जवाब मुझे निरुत्तर कर देता था।
हमने सारे दिन भर अलग अलग विषयों पर बात की और मैने पाया की हर विषय पर उसकी पकड़ मुझसे बेहतर थी। वो विषयों को बहुत गहरे से समझ लेती थी। मैं उस से बहुत प्रभावित हुआ।
इसके बाद हम अक्सर मिलाने लगे। वो जब भी किसी कार्य के लिए प्रसाशनिक ब्लाक में आती थी तो मुझ से अवश्य मिलती थी। जल्दी ही उसका मुझसे मिलना मेरे सहकर्मियों के लिए चर्चा का विषय बन गया। उसके जाने के बाद मेरे दोस्त मुझे खूब खीचते थे। वे मजाक में हमेशा मुझसे पूछते की उसके साथ मेरा क्या रिश्ता है ? मैंने इस बात पर विचार किया । अपने दिल में झाँका और पता लगाने का प्रयास किया की वो मुझे कैसी लगाती है और उस के साथ क्या रिश्ता रखु जो की समाज में मान्य हो। उसके प्रति मेरे मन में बहिन वाले भाव नहीं थे और ना ही मैं उसे प्रेमिका के रूप में देखता था। अब उसके साथ क्या रिश्ता रखा जाय मुझे समझ नहीं आया। मैंने निर्णय लिया की अब मैं इस मिलाने जुलने के क्रम को ही ख़त्म कर दूंगा ताकि बेवजह की बदनामी से तो बचा जाय।
इसके बाद जब हम मिले तो मैंने उसके सामने अपने मन की बात रखी। उसने मेरी बात हमेश की तरह से बड़े ध्यान से सुनी । उसने मुझ से पूछा की क्या हम लोग सिर्फ दोस्ती का रिश्ता नहीं रख सकते। मैं इस बात के विरोध में था और वो इस विचार के पक्ष में थी। हमरी बहस हुई और वो जीत गयी। मुझे उसका साथ अच्छा लगता था अतः मैं भी उसके साथ दोस्ती का रिश्ता रखने को आसानी से तैयार हो गया। मेरे मन में एक भावना यह भी थी की वो एक ईसाई परिवार की लड़की है जहा इस तरह के संबंधों को आधुनिकता के नजरिये से देखा जाता है अतः हमारी दोस्ती कायम रह सकती है।
इसके बाद मैंने कभी अपने दोस्तों की बातों की परवाह नहीं की। वो जब भी पूछते की हमारा रिश्ता क्या है तो मैं उन्हें बताता की हम दोनों अच्छे मित्र हैं बस और कुछ नहीं। मेरी इस बात का वो लोग खूब मजाक उड़ाते और कहते की इस तरह की मित्रता तो उन्होंने भी कई बार निबाही है , ऐसी दोस्ती का मजा ही कुछ और होता है। मैं उनकी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देता था।
उन्ही दिनों मेरे पिताजी को दिल का दौरा पड़ा। उन्हें मेरे अस्पताल में ही CCU वार्ड में भर्ती करवाया गया जहाँ पर मेरी वो मित्र नियुक्त थी। उसने इस दोरान मेरी बहुत सहायता की । वो अपनी ड्यूटी के बाद भी मेरे साथ रहती। उसके साथ रहने से मुझे कहीं भी कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। इस अनुभव के बाद तो मैं उसे अपना सच्चा मित्र मानने लगा।
हमारी मित्रता यों ही करीब एक डेढ़ साल निर्विघ्न चलती रही फिर एक दिन उसने मुझे बताया की उसके माता पिता ने उसके लिए एक लड़का पसंद किया है। लड़का दिल्ली में ही एक दावा की कंपनी में MR था। उसने मुझे लडके का फोटो दिखाया और मेरी राय जाननी चाही। मैं चूँकि ज्योतिष में भी रूचि रखता था अतः मैने उनके sun signs मिलाये। उनके जन्मांक मिलाये। मुझे सब कुछ अच्छा लगा और मैंने अपनी सहमती व्यक्त कर दी। कुछ दिनों बाद वो केरल गयी और वहां उसकी सगाई हो गयी। केरल से वापस आने के बाद जब हम मिले तो मैंने उसके मंगेतर से मिलाने की इच्छा जाहिर की । वो मेरी बात टाल गयी। शुरू में मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा पर जब मेरे बार बार कहने पर भी उसने हमें नहीं मिलवाया तो मैंने उससे इसका कारण पूछा। उसने जो कारण बताया वह अगर किसी और लड़की के मुख से सुना होता तो मुझे अजीब नहीं लगता पर अपनी इस समझदार दोस्त से सुनकर मुझे स्त्री चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम वाला श्लोक याद आ गया।
मेरी मित्र ने मुझसे कहा की हम अपनी मित्रता को आगे कायम नहीं रख सकते क्योंकि उसकी शादी होने वाली है और वो शादी के बाद अपना सहारा समय अपने पति को देना चाहती है और वो ये भी नहीं चाहती की उसके होने वाले पति के मन में हमारी मित्रता को लेकर कहीं कोई शक रहे।
प्रश्न तो मेरे मन में उस वक्त भी बहुत सारे उठे जो आज भी कायम है पर मैंने दुबारा भी अपनी हार स्वीकारना ही ठीक समझा और उससे अपनी मित्रता को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया। हम दुबारा कभी नहीं मिले और ना ही मैं अब कभी उससे मिलना चाहूँगा ।
अब आप पूछेंगे की मुझे ये सब बातें आज क्यों याद आई ?
असल में कल सुबह मेरी अपने बच्चों (भतीजा और भतीजी) से बहस हो गयी थी । मुद्दा था एक लडके और लड़की की दोस्ती का। मैं इस बात के विरोध में था और वो इस बात के पक्ष में थे।
मेरा मानना है की एक लड़का और एक लड़की (आप स्त्री व पुरुष भी कह सकते हैं )आपस में सिर्फ मित्र नहीं हो सकते। मेरी समझ से सच्चे मित्रों का जुडाव बहुत गहरा होता है और हर स्तरपर होता है जो की एक स्त्री और एक पुरुष के बीच संभव नहीं है। अतः स्त्री व पुरुष जब एक दुसरे को सिर्फ मित्र मानते हैं तो वो मित्रता छिछली होती है और ज्यादा समय तक टिक नहीं सकती।
अपनी इस बहस में कल भी , मैं फिर से हार गया और दकियानूसी , घटिया, बाबा आदमके ज़माने का , पुराने फेशन का , आदि अनेक विश्लेषणों से अलंकृत होकर (ये सारे विश्लेषण अंग्रेजी जबान में दिए गए थे इसलिए मैं शांत रहा वर्ना फसाद हो जाता) इस नसीहत के साथ भगा दिया गया की जाओ ब्लॉग्गिंग करो।
तो मित्रो मैं आ गया आप लोगों की शरण में । अब यहाँ पर अपने पुराने, दकियानूसी विचारों को लिख दिया है। मन शांत हो गया है अब जाकर दूसरा काम करूँगा।
धन्यवाद और सुप्रभात।
रविवार, 11 अप्रैल 2010
शनिवार, 10 अप्रैल 2010
रिश्तों की जटिलता.
सुबह अपनी जींस की पैंट धो रहा था, साथ में मेरी प्यारी सफ़ेद शर्ट भी रखी थी। किस्मत ख़राब थी की जींस का कच्चा रंग शर्ट पर चढ़ गया। सोचा यह रंग जब जींस पर नहीं टिका तो शर्ट पर क्या टिकेगा, दो बार साबुन घिसुंगा उतर जाएगा। पर मैं गलत था। साबुन घिस घिस कर हर गया पर मेरी उजली शर्ट फिर से सफ़ेद नहीं हुई। मन मन बड़ा उदास हुआ अरे। कैसा घटिया रंग है जहा इसे स्थायी रूप से रहना चाहिए था वंहा रहा नहीं और जहाँ दाग समझा जा रहा है वहां से हटता ही नहीं।
इससे मुझे मेरे मित्र की समस्या का स्मरण हो आया। वो अपने बड़े भाई के साथ रहते थे। कुछ समय बाद दोनों के बीच मतभेद हुए और दोनों अलग हो गए। यंहा तक ठीक था। बहुत कॉमन बात है। पर इसके बाद बड़े भाई ने कुछ ऐसे लोगों के साथ अपने सम्बन्ध विकसित करने शुरू किये जो पहेले से उनके परिवार के साथ शत्रुता व इर्ष्या की भावना रखते थे। अपने बड़े भाई को बहुत मेहनत तथा लगन से अपने विरोधियों के साथ एक होने का प्रयास करते देख मेरा मित्र उदास होकर मुझसे पूछता था की अगर मेरे भाई ने थोड़ी सी मेहनत हमारे संबंधो को ठीक करने में की होती तो शायद हम साथ साथ होते पर वो तो उन लोगों के साथ मिलाने का प्रयास कर रहा है जहा वो हमेसा एक अजनबी तथा बाहरी व्यक्ति ही बना रहेगा चाहे जितना प्रयास कर ले। जिस परिश्रम का उपयोग अपने सहोदर भाई के साथ रिश्तों को सुधरने के लिए किया जाना चाहिए था वो इसे उन लोगों के साथ व्यर्थ कर रहा है जो हमेशा से उसके साथ शत्रुता व इर्ष्या का भाव रखते आये हैं। अब भला ये कहाँ की समझदारी है की अपने सगे भाई से तो रूठ जाएँ और गैरों की कृपा प्राप्त करेने के लिए अपना तन मन धन न्योछावर कर दें। गैरों की भावनाओं का ख्याल रखे और अपनो को नीचा दिखाए।
यह मानसिकता सभी की है या सिर्फ कुछ ही लोग इसका शिकार हैं।
मुझे तो लगता है यह सर्वभोमिक सत्य है तभी तो वो कच्चा रंग पैंट छोड़कर शर्ट के साथ हो लिया फिर चाहे उसे वहां एक अवांछनीय दाग ही क्यों न समझा जा रहा हो। काश उसे समझ होती की उसे अपनी जगह पर ही बने रहना चाहिए। दूसरों का साथ अपनो से बेहतर नहीं होता । अतः उसे कायम रखने का भरसक प्रयास करते रहो.
इससे मुझे मेरे मित्र की समस्या का स्मरण हो आया। वो अपने बड़े भाई के साथ रहते थे। कुछ समय बाद दोनों के बीच मतभेद हुए और दोनों अलग हो गए। यंहा तक ठीक था। बहुत कॉमन बात है। पर इसके बाद बड़े भाई ने कुछ ऐसे लोगों के साथ अपने सम्बन्ध विकसित करने शुरू किये जो पहेले से उनके परिवार के साथ शत्रुता व इर्ष्या की भावना रखते थे। अपने बड़े भाई को बहुत मेहनत तथा लगन से अपने विरोधियों के साथ एक होने का प्रयास करते देख मेरा मित्र उदास होकर मुझसे पूछता था की अगर मेरे भाई ने थोड़ी सी मेहनत हमारे संबंधो को ठीक करने में की होती तो शायद हम साथ साथ होते पर वो तो उन लोगों के साथ मिलाने का प्रयास कर रहा है जहा वो हमेसा एक अजनबी तथा बाहरी व्यक्ति ही बना रहेगा चाहे जितना प्रयास कर ले। जिस परिश्रम का उपयोग अपने सहोदर भाई के साथ रिश्तों को सुधरने के लिए किया जाना चाहिए था वो इसे उन लोगों के साथ व्यर्थ कर रहा है जो हमेशा से उसके साथ शत्रुता व इर्ष्या का भाव रखते आये हैं। अब भला ये कहाँ की समझदारी है की अपने सगे भाई से तो रूठ जाएँ और गैरों की कृपा प्राप्त करेने के लिए अपना तन मन धन न्योछावर कर दें। गैरों की भावनाओं का ख्याल रखे और अपनो को नीचा दिखाए।
यह मानसिकता सभी की है या सिर्फ कुछ ही लोग इसका शिकार हैं।
मुझे तो लगता है यह सर्वभोमिक सत्य है तभी तो वो कच्चा रंग पैंट छोड़कर शर्ट के साथ हो लिया फिर चाहे उसे वहां एक अवांछनीय दाग ही क्यों न समझा जा रहा हो। काश उसे समझ होती की उसे अपनी जगह पर ही बने रहना चाहिए। दूसरों का साथ अपनो से बेहतर नहीं होता । अतः उसे कायम रखने का भरसक प्रयास करते रहो.
रविवार, 4 अप्रैल 2010
मेरा धर्म , उसका धर्म, हम सबका धर्म!
आज जिस चीज को हम लोग धर्म कहते हैं और उस पर लड़ने मरने को तैयार हो जाते हैं वह चीज वास्तव में है क्या? जब भी कोई झगडा किसी भी धार्मिक रीती रिवाज को लेकर होता है तो अपनी अल्प बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए मैं भी विचार करता हूँ की आखिर इस झगड़े का कोई ओचित्य है भी की नहीं।
सभी धर्मों के लोग कहते हैं की उनका धर्म सीधे ईश्वर ने बनाया है। मुझे एसा बिलकुल भी नहीं लगता की ईश्वर ने विभिन्न धर्मों की रचना की है।
ईश्वर कोई भी ऐसी चीज नहीं बना सकते जिस से लोगों में आपस में कोई झगडा हो। आप अपने इर्द गिर्द की किसी भी वस्तु को देखें। जिस किसी भी चीज को उस परम पिता परमेश्वर ने बनाया है वह क्या बिना वजह किसी का नुकसान करती है? नहीं ! बिलकुल नहीं ! ईश्वर की बनाई एक भी ऐसी चीज नहीं है जिससे किसी को कोई नुकसान होता हो।
क्या ऐसा हो सकता है की इन धर्मों को खुद ईश्वर ने बनाया है। मैं सोचता हूँ की ऐसा नहीं है। आप अपना निर्णय खुद लें। मैं अपनी बात को आगे बढाता हूँ।
तो ये आज जो हम तेरा धर्म मेरा धर्म का राग आलापते रहते हैं वो आखिर हैं क्या?
वर्तमान समय में हम जिसे धर्म कहते है वो असल में जीवन को सही रूप में किस तरह से जिया जाये इसके लिए अलग अलग जगहों पर, अलग अलग समयों पर, अलग अलग व्यक्तियों द्वारा दिए गए दिशा निर्देश मात्र हैं। इन निर्देशों को सैकड़ो हजारों साल पहले दिया गया था। और वर्तमान समय में इनकी उपयोगिता बेहद कम हो गयी है.
जैसे की वेदों को ही लें । इनकी रचना हजारों साल पहले हुयी थी। इनमे उल्लेखित अनेक बातों का आज के आधुनिक जीवन में कोई भी स्थान नहीं है। लेकिन आज भी हम उन बातों कर अनुसरण करते हैं।
असल में धर्मं में दो बातें निहित हैं। एक है हमारा मानसिक आचरण और दूसरा है शारीरिक आचरण । मानसिक आचरण से मेरा अर्थ उन बातों से है जिनका ध्यान हमें प्राणी मात्र के साथ व्यव्हार करते वक्त रखना चाहिए। शारीरिक आचरण से मेरा अर्थ उस विशेष आचरण से है जो हम किसी विशेष भोगोलिक परिस्थिति में अनुकूलित होने के लिए करते है।
हमारा व्यव्हार सभी जीवों के साथ कैसा होना चाहिए इस विषय पर सभी धर्म एक सी ही बात कहते हैं। जहाँ तक सामाजिक आचरण की बात है सभी धर्म भिन्न मत रखते हैं क्योंकि इन धर्मों का विकास अलग अलग जगहों के लिए हुआ है। एक उदहारण देता हूँ । हिन्दू लोग धोती पहनते हैं और प्रायः अपना बदन खुला रखते है वहीँ मुस्लिम और ईसाई लोग अपने धार्मिक अनुष्ठानों में एक बड़ा सा लबादा पहने रहते है। इसके पीछे उन जगहों की परिस्थितिया है जहाँ इन धर्मों का विकास हुआ। अब अगर एक हिन्दू किसी यूरोपीय देश में भरी सर्दी में नंगे बदन कोई पूजा पाठ करेगा तो उसका क्या हाल होगा।
मैं सोचता हूँ की हमें सभी धर्मों को उसी तरह से अपडेट करते रहना चाहिए जैसे की हमारे कम्प्यूटर के anti virus programmes अपडेट होते रहते है। और जब इनको अपडेट नहीं किया जाता तो ये बेकार हो जाते हैं। वर्तमान में सभी धर्मों की यही दुविधा है की इन्हें अपडेट नहीं किया गया है।
मेरा यह मानना है की हम धर्म को दो भागों में स्पष्ट रूप से विभाजित करें। एक हो आध्यात्मिक धर्म और दूसरा हो सामाजिक धर्म। अध्यातिमिक धर्म अलग अलग लोगों का अलग अलग हो जाये पर सामाजिक धर्म सभी का एक सा हो।
अध्यात्मिक उत्थान के लिए आप चाहे तो हिन्दू धर्म अपनाये, आप चाहें तो इस्लाम अपनाएं या फिर ईसाई धर्म का अनुसरण करें पर सामाजिक धर्म के लिए देश के संविधान का पालन करना सभी का कर्तव्य होना चाहिए। और जहाँ भी अध्यात्मिक धर्म सामाजिक धर्म का विरोध करे वहां पर सामाजिक धर्म को ही महत्व दिया जाना चाहिए।
ये विचार बहुत दिनों से दिमाग में थे आज इन्हे बहार निकल पाया हूँ। अब शायद नींद अच्छी आयेगी।
शुभ रात्रि।
सभी धर्मों के लोग कहते हैं की उनका धर्म सीधे ईश्वर ने बनाया है। मुझे एसा बिलकुल भी नहीं लगता की ईश्वर ने विभिन्न धर्मों की रचना की है।
ईश्वर कोई भी ऐसी चीज नहीं बना सकते जिस से लोगों में आपस में कोई झगडा हो। आप अपने इर्द गिर्द की किसी भी वस्तु को देखें। जिस किसी भी चीज को उस परम पिता परमेश्वर ने बनाया है वह क्या बिना वजह किसी का नुकसान करती है? नहीं ! बिलकुल नहीं ! ईश्वर की बनाई एक भी ऐसी चीज नहीं है जिससे किसी को कोई नुकसान होता हो।
क्या ऐसा हो सकता है की इन धर्मों को खुद ईश्वर ने बनाया है। मैं सोचता हूँ की ऐसा नहीं है। आप अपना निर्णय खुद लें। मैं अपनी बात को आगे बढाता हूँ।
तो ये आज जो हम तेरा धर्म मेरा धर्म का राग आलापते रहते हैं वो आखिर हैं क्या?
वर्तमान समय में हम जिसे धर्म कहते है वो असल में जीवन को सही रूप में किस तरह से जिया जाये इसके लिए अलग अलग जगहों पर, अलग अलग समयों पर, अलग अलग व्यक्तियों द्वारा दिए गए दिशा निर्देश मात्र हैं। इन निर्देशों को सैकड़ो हजारों साल पहले दिया गया था। और वर्तमान समय में इनकी उपयोगिता बेहद कम हो गयी है.
जैसे की वेदों को ही लें । इनकी रचना हजारों साल पहले हुयी थी। इनमे उल्लेखित अनेक बातों का आज के आधुनिक जीवन में कोई भी स्थान नहीं है। लेकिन आज भी हम उन बातों कर अनुसरण करते हैं।
असल में धर्मं में दो बातें निहित हैं। एक है हमारा मानसिक आचरण और दूसरा है शारीरिक आचरण । मानसिक आचरण से मेरा अर्थ उन बातों से है जिनका ध्यान हमें प्राणी मात्र के साथ व्यव्हार करते वक्त रखना चाहिए। शारीरिक आचरण से मेरा अर्थ उस विशेष आचरण से है जो हम किसी विशेष भोगोलिक परिस्थिति में अनुकूलित होने के लिए करते है।
हमारा व्यव्हार सभी जीवों के साथ कैसा होना चाहिए इस विषय पर सभी धर्म एक सी ही बात कहते हैं। जहाँ तक सामाजिक आचरण की बात है सभी धर्म भिन्न मत रखते हैं क्योंकि इन धर्मों का विकास अलग अलग जगहों के लिए हुआ है। एक उदहारण देता हूँ । हिन्दू लोग धोती पहनते हैं और प्रायः अपना बदन खुला रखते है वहीँ मुस्लिम और ईसाई लोग अपने धार्मिक अनुष्ठानों में एक बड़ा सा लबादा पहने रहते है। इसके पीछे उन जगहों की परिस्थितिया है जहाँ इन धर्मों का विकास हुआ। अब अगर एक हिन्दू किसी यूरोपीय देश में भरी सर्दी में नंगे बदन कोई पूजा पाठ करेगा तो उसका क्या हाल होगा।
मैं सोचता हूँ की हमें सभी धर्मों को उसी तरह से अपडेट करते रहना चाहिए जैसे की हमारे कम्प्यूटर के anti virus programmes अपडेट होते रहते है। और जब इनको अपडेट नहीं किया जाता तो ये बेकार हो जाते हैं। वर्तमान में सभी धर्मों की यही दुविधा है की इन्हें अपडेट नहीं किया गया है।
मेरा यह मानना है की हम धर्म को दो भागों में स्पष्ट रूप से विभाजित करें। एक हो आध्यात्मिक धर्म और दूसरा हो सामाजिक धर्म। अध्यातिमिक धर्म अलग अलग लोगों का अलग अलग हो जाये पर सामाजिक धर्म सभी का एक सा हो।
अध्यात्मिक उत्थान के लिए आप चाहे तो हिन्दू धर्म अपनाये, आप चाहें तो इस्लाम अपनाएं या फिर ईसाई धर्म का अनुसरण करें पर सामाजिक धर्म के लिए देश के संविधान का पालन करना सभी का कर्तव्य होना चाहिए। और जहाँ भी अध्यात्मिक धर्म सामाजिक धर्म का विरोध करे वहां पर सामाजिक धर्म को ही महत्व दिया जाना चाहिए।
ये विचार बहुत दिनों से दिमाग में थे आज इन्हे बहार निकल पाया हूँ। अब शायद नींद अच्छी आयेगी।
शुभ रात्रि।
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
एक ब्लॉगर की अभिलाषा
चाह नहीं बनूँ इस दुनिया का
हीरो और भूल खुद को इतराऊ ।
चाह नहीं खीचुं टांग किसी की
और मन ही मन मुसकाऊ।
चाह नहीं लेख उत्तेजक लिखूं
और गलियां सबकी ही खाऊ।
मझे झेल लेना ओ ब्लॉगर तुम
और गुस्से में माउस ना देना फैक
जब भी बात कहू दिल की तुमसे
तुम भेजना हरबार टिपण्णी अनेक ।
(मेरा यह अवैध निर्माण 'मो सम कौन " के संजय अनेजा जी को समर्पित है। आपकी कल की टिपण्णी पढ़ कर मैं अपने paradise में पहुच गया था और वहां से यह निकल कर लाया हूँ।)
हीरो और भूल खुद को इतराऊ ।
चाह नहीं खीचुं टांग किसी की
और मन ही मन मुसकाऊ।
चाह नहीं लेख उत्तेजक लिखूं
और गलियां सबकी ही खाऊ।
मझे झेल लेना ओ ब्लॉगर तुम
और गुस्से में माउस ना देना फैक
जब भी बात कहू दिल की तुमसे
तुम भेजना हरबार टिपण्णी अनेक ।
(मेरा यह अवैध निर्माण 'मो सम कौन " के संजय अनेजा जी को समर्पित है। आपकी कल की टिपण्णी पढ़ कर मैं अपने paradise में पहुच गया था और वहां से यह निकल कर लाया हूँ।)
शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
वैश्यावृति को भी सामाजिक व क़ानूनी मान्यता दो!
पिछले कुछ दिनों से live in relations पर बहुत बहस हो रही है। सभी लोगों के अलग अलग विचार हैं। मैंने भी इस मुद्दे का विश्लेषण किया। मुझे तो यह मुद्दा ही समझ नहीं आया।
इसकी शुरुवात तब हुई जब एक दक्षिण भारतीय अभिनेत्री ने विवाह पूर्व शारीरिक सम्बन्ध बनाने के पक्ष में अपने विचार दिए। ठीक है, मैं अपने जीवन में जिस चीज को करूँगा उसका ही तो समर्थन करूँगा। दुसरे अभिनेता तो अपने जीवन में जिस चीज का कभी उपयोग नहीं करते उसका खुले रूप में प्रचार करते हैं वो भी पैसे लेकर तब तो कोई कुछ नहीं कहता , तो जब इस अभिनेत्री ने तो मुफ्त में ही उस बात का समर्थन किया जिसे वो अपने जीवन में करती आयी होगी तो बबाल किस बात का? पर कुछ लोगों को लगा की उसकी बातों से समाज में क्रांति हो जाएगी और सारा समाज उसकी बातों का अनुसरण करने लगेगा तो पहुच गए कोर्ट की शरण में जैसे की हमारे देश के न्यायालयों में काम की कमी होगी।
हमारे माननीय न्यायाधीश महोदय ने भी जाने क्यों इस मामले में बेचारे राधा कृष्ण को ही खीच लिया। विवाह पूर्व शारीरिक सम्बन्ध या लिव इन रिलेशन के मामले से राधा कृष्ण के अध्यात्मिक प्रेम का क्या सम्बन्ध है मुझे बिलकुल समझ नहीं आया। मैं पूरी इज्जत में साथ झुक कर माननीय कोर्ट को यह सलाह देना चाहूँगा की हिन्दू देवी देवताओं पर कोई भी गलत सलत टिपण्णी करना तो आसान है, कोई भी चूं तक नहीं करेगा, पर दुसरे धर्मों के देवी देवताओं पर कभी भी ऐसी हवाई टिपण्णी करने की जुर्रत ना करें वर्ना जान पर भी बन सकती है।
लिव इन रिलेशन को समाज में क़ानूनी मान्यता देने की बात हो रही है। मुझे समझ नहीं आया की यह क़ानूनी मान्यता देने की जरुरत ही कहाँ है? मैंने तो अभी तक एक भी ऐसा मामला नहीं सुना जहाँ पुलिस ने किसी लडके या लड़की को सिर्फ इस लिए तंग किया हो की वो बिना शादी किये ही साथ साथ रह रहे है या ऐसे किसी प्रेमी जोड़े की हत्या कर दी गयी हो।
हाँ मैंने अक्सर सुना और पढ़ा है की पुलिस वैध तरीके से विवाहित जोड़े को उठा ले गयी या उनकी हत्या कर दी गयी । ऐसे मामले तो हमारे चारों तरफ बिखरे पड़े हैं। बहस ही करनी है तो उन पर करें। जो मुद्दा समाज में है ही नहीं उस पर बेवजह क्यों बहस की जा रही है?
अब सिर्फ लिव इन रिलेशन पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाय तो मैं इसके एकदम खिलाफ हूँ और अगर आप इसको सामाजिक व क़ानूनी मान्यता दे रहे हैं तो फिर वैश्यावृति को भी क़ानूनी व सामाजिक मान्यता दें।
लिव इन रिलेशनशिप क्या है? यह दो व्यक्तियों द्वारा अपनी शारीरिक काम वासना को तृप्त करने का एक शानदार व सभ्य तरीका है। मुझे तो यह वैश्यावृति का ही सभ्य रूप लगता है। सही कहा जाय तो वैश्यावृति ज्यादा बेहतर है क्योकि बिना मज़बूरी के कम ही लोग इसका सहारा लेंगे पर लिव इन रिलेशनशिप में तो दोनों में से किसी भी पक्ष की कोई मज़बूरी नहीं होती तो क्या वजह है की लोग शादी करके अपने संबंधो को सामाजिक मान्यता नहीं देना चाहते।
वजह साफ है! लिव इन रिलेशन करने वाले दोनों पक्ष मुक्त रहना चाहते है। अगर एक शरीर से जी भर जाये तो दूसरा आसानी से मिल जाय इसके लिए लिव इन रिलेशन सबसे आसान तरीका है। शादी करने के बाद तो अलग होने में अनेक झंझट है। तो बात समझ में आयी आपके। जो लिव इन रिलेशन करते हैं उनके मन में shuru से ही अलग होने की बात रहती है ।
वैशायावृति भी तो ऐसी ही है। आज आप इस कोठे पर चढ़े , अच्छा नहीं लगा तो कल किसी दुसरे कोठे का रुख करेंगे।
इस वजह से ही मैं सोचता हूँ की अगर समाज लिव इन रिलेशन को क़ानूनी व सामाजिक मान्यता देता है तो वैश्यावृति को भी ऐसी ही मान्यता दे जिसकी मांग बहुत से लोग काफी पहले से कर रहे है।
इसकी शुरुवात तब हुई जब एक दक्षिण भारतीय अभिनेत्री ने विवाह पूर्व शारीरिक सम्बन्ध बनाने के पक्ष में अपने विचार दिए। ठीक है, मैं अपने जीवन में जिस चीज को करूँगा उसका ही तो समर्थन करूँगा। दुसरे अभिनेता तो अपने जीवन में जिस चीज का कभी उपयोग नहीं करते उसका खुले रूप में प्रचार करते हैं वो भी पैसे लेकर तब तो कोई कुछ नहीं कहता , तो जब इस अभिनेत्री ने तो मुफ्त में ही उस बात का समर्थन किया जिसे वो अपने जीवन में करती आयी होगी तो बबाल किस बात का? पर कुछ लोगों को लगा की उसकी बातों से समाज में क्रांति हो जाएगी और सारा समाज उसकी बातों का अनुसरण करने लगेगा तो पहुच गए कोर्ट की शरण में जैसे की हमारे देश के न्यायालयों में काम की कमी होगी।
हमारे माननीय न्यायाधीश महोदय ने भी जाने क्यों इस मामले में बेचारे राधा कृष्ण को ही खीच लिया। विवाह पूर्व शारीरिक सम्बन्ध या लिव इन रिलेशन के मामले से राधा कृष्ण के अध्यात्मिक प्रेम का क्या सम्बन्ध है मुझे बिलकुल समझ नहीं आया। मैं पूरी इज्जत में साथ झुक कर माननीय कोर्ट को यह सलाह देना चाहूँगा की हिन्दू देवी देवताओं पर कोई भी गलत सलत टिपण्णी करना तो आसान है, कोई भी चूं तक नहीं करेगा, पर दुसरे धर्मों के देवी देवताओं पर कभी भी ऐसी हवाई टिपण्णी करने की जुर्रत ना करें वर्ना जान पर भी बन सकती है।
लिव इन रिलेशन को समाज में क़ानूनी मान्यता देने की बात हो रही है। मुझे समझ नहीं आया की यह क़ानूनी मान्यता देने की जरुरत ही कहाँ है? मैंने तो अभी तक एक भी ऐसा मामला नहीं सुना जहाँ पुलिस ने किसी लडके या लड़की को सिर्फ इस लिए तंग किया हो की वो बिना शादी किये ही साथ साथ रह रहे है या ऐसे किसी प्रेमी जोड़े की हत्या कर दी गयी हो।
हाँ मैंने अक्सर सुना और पढ़ा है की पुलिस वैध तरीके से विवाहित जोड़े को उठा ले गयी या उनकी हत्या कर दी गयी । ऐसे मामले तो हमारे चारों तरफ बिखरे पड़े हैं। बहस ही करनी है तो उन पर करें। जो मुद्दा समाज में है ही नहीं उस पर बेवजह क्यों बहस की जा रही है?
अब सिर्फ लिव इन रिलेशन पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाय तो मैं इसके एकदम खिलाफ हूँ और अगर आप इसको सामाजिक व क़ानूनी मान्यता दे रहे हैं तो फिर वैश्यावृति को भी क़ानूनी व सामाजिक मान्यता दें।
लिव इन रिलेशनशिप क्या है? यह दो व्यक्तियों द्वारा अपनी शारीरिक काम वासना को तृप्त करने का एक शानदार व सभ्य तरीका है। मुझे तो यह वैश्यावृति का ही सभ्य रूप लगता है। सही कहा जाय तो वैश्यावृति ज्यादा बेहतर है क्योकि बिना मज़बूरी के कम ही लोग इसका सहारा लेंगे पर लिव इन रिलेशनशिप में तो दोनों में से किसी भी पक्ष की कोई मज़बूरी नहीं होती तो क्या वजह है की लोग शादी करके अपने संबंधो को सामाजिक मान्यता नहीं देना चाहते।
वजह साफ है! लिव इन रिलेशन करने वाले दोनों पक्ष मुक्त रहना चाहते है। अगर एक शरीर से जी भर जाये तो दूसरा आसानी से मिल जाय इसके लिए लिव इन रिलेशन सबसे आसान तरीका है। शादी करने के बाद तो अलग होने में अनेक झंझट है। तो बात समझ में आयी आपके। जो लिव इन रिलेशन करते हैं उनके मन में shuru से ही अलग होने की बात रहती है ।
वैशायावृति भी तो ऐसी ही है। आज आप इस कोठे पर चढ़े , अच्छा नहीं लगा तो कल किसी दुसरे कोठे का रुख करेंगे।
इस वजह से ही मैं सोचता हूँ की अगर समाज लिव इन रिलेशन को क़ानूनी व सामाजिक मान्यता देता है तो वैश्यावृति को भी ऐसी ही मान्यता दे जिसकी मांग बहुत से लोग काफी पहले से कर रहे है।
बुधवार, 31 मार्च 2010
स्त्री की प्रेम अभिव्यक्ति और हमारे सामाजिक नियम.
मनीषा जी सबसे पहले मैं यह कहूँगा की आप एकदम बिंदास लिखती है अपने विचारों में कोई काट छाट नहीं करती इसलिए आपका लेखन मुझे बहुत अच्छा लगता है।
आपने अपने मन की बात कही, आपकी भावनाएं प्राय सभी भारतीय स्त्रियों की होती है जो आज के समाज में पुरुष के साथ हर field में कंधे से कन्धा मिलकर चल रही हैं।
एक मानव के रूप में हम सभी अपने प्यार की अभिव्यक्ति ठीक उसी रूप में करते है जैसे की अपने किया पर सिर्फ स्त्रियों को संदेह की नजर से देखा जाता है और उनकी छोटी से छोटी बात को भी सालों याद रखा जाता है । यह बात विचारनीय है की ऐसा क्यों होता है । आपका दर्द एकदम जायज है क्योंकि अपने सारी घटना को एक स्त्री के नजरिये से देखा। पुरुष का नजरिया क्या होता है यह मैं आपको दिखता हूँ।
जब आप उन लेखक महोदय, जो की ७० वर्ष की उम्र के थे, से मिलीं तो अपने आदर, सम्मान व प्यार से उन्हें गले लगा लिया पर इस बात की याद उन्हें अपनी वृधावस्था में भी वर्षों तक रही यह बात पुरुष की मानसिकता को दिखाती है।
एक पुरुष के लिए रिश्तों के बंधन से मुक्त नारी हमेशा भोग्या होती है। मेरी इस बात का बहुत से लोग पुरजोर विरोध कर सकते है पर मैं अपनी बात से कभी पीछे नहीं हटूंगा। कभी कभी तो रिश्तों की दिवार भी गिरा दी जाती है चाहे वो कितनी भी मजबूत क्यों ना हो।
इस वजह से ही हमारे समाज में स्त्री का किसी भी पर पुरुष के साथ शारीरिक या मानसिक जुडाव कभी भी ठीक नहीं समझा गया।
सभी स्त्रियाँ इसे खुद पर लांछन के रूप में लेती हैं। उन्हें लगता है की उनकी पवित्रता पर शक किया जा रहा है। पर सच्चाई यह है, की यह पुरुष की मानसिकता पर लांछन है। जब दो व्यक्ति व्यव्हार करते हैं तो दोनों की भावनाओं को देखा जाता है। एक तो निर्दोष भावना से व्यव्हार कर रहा है पर दुसरे के मन में खोट हो तो नुकसान किसे होगा? आपको यह बात समझनी होगी।
अपने एक पुरुष में एक पिता को देखा होगा, एक भाई को देखा होगा, एक प्रेमी को देखा होगा पर शायद एक पुरुष में सिर्फ पुरुष को कभी नहीं देखा होगा। जब एक पुरुष एक पिता, भाई , पति या प्रेमी नहीं होता है और विशुद्ध रूप में पुरुष होता है तो उसे कोई लिहाज नहीं होता , ना भावनाओं का ना उम्र का , ना समाज का, ना सामाजिक रिश्तों का । पुरुष की इस मानसिकता से वशीभूत होकर ही तो एक ८१ वर्ष का आदमी १८ साल की युवती से विवाह कर लेता है।
तो मनीषा जी आप जिन सीमाओं को दुष्ट समझकर तोड़ देना चाहती हैं और जो सीमाएं आपकी समझ से आपको कमतर इन्सान बनती है वो आपके भले के लिए ही हैं। समाज या कानून द्वारा तय सीमा के अंतर्गत किया गया व्यव्हार किसी भी इन्सान को कमतर नहीं बनता। शायद यही वो मानसिकता है जिसके तहत आज का युवा रोड पर स्पीड की सीमा को या रेड लाइट पर रुकने को एक बंधन मानता है। उसे भी समाज के बनाये नियम कानून को मानाने से अह्सासे कमतरी होता है। ( अह्सासे कमतरी की वर्तनी मुझे ठीक नहीं लग रही, पर काफी पहले यह शब्द सुना था आज चेपने का मौका मिला है )
अच्छा अब कुछ लोग यह कह सकते हैं की पश्चिम के समाज में तो ऐसा नहीं है। तो इसका जवाब मैं जब मन करेगा तो जरुर दूंगा अभी ३१ मार्च है वक्त की कमी है।
आपने अपने मन की बात कही, आपकी भावनाएं प्राय सभी भारतीय स्त्रियों की होती है जो आज के समाज में पुरुष के साथ हर field में कंधे से कन्धा मिलकर चल रही हैं।
एक मानव के रूप में हम सभी अपने प्यार की अभिव्यक्ति ठीक उसी रूप में करते है जैसे की अपने किया पर सिर्फ स्त्रियों को संदेह की नजर से देखा जाता है और उनकी छोटी से छोटी बात को भी सालों याद रखा जाता है । यह बात विचारनीय है की ऐसा क्यों होता है । आपका दर्द एकदम जायज है क्योंकि अपने सारी घटना को एक स्त्री के नजरिये से देखा। पुरुष का नजरिया क्या होता है यह मैं आपको दिखता हूँ।
जब आप उन लेखक महोदय, जो की ७० वर्ष की उम्र के थे, से मिलीं तो अपने आदर, सम्मान व प्यार से उन्हें गले लगा लिया पर इस बात की याद उन्हें अपनी वृधावस्था में भी वर्षों तक रही यह बात पुरुष की मानसिकता को दिखाती है।
एक पुरुष के लिए रिश्तों के बंधन से मुक्त नारी हमेशा भोग्या होती है। मेरी इस बात का बहुत से लोग पुरजोर विरोध कर सकते है पर मैं अपनी बात से कभी पीछे नहीं हटूंगा। कभी कभी तो रिश्तों की दिवार भी गिरा दी जाती है चाहे वो कितनी भी मजबूत क्यों ना हो।
इस वजह से ही हमारे समाज में स्त्री का किसी भी पर पुरुष के साथ शारीरिक या मानसिक जुडाव कभी भी ठीक नहीं समझा गया।
सभी स्त्रियाँ इसे खुद पर लांछन के रूप में लेती हैं। उन्हें लगता है की उनकी पवित्रता पर शक किया जा रहा है। पर सच्चाई यह है, की यह पुरुष की मानसिकता पर लांछन है। जब दो व्यक्ति व्यव्हार करते हैं तो दोनों की भावनाओं को देखा जाता है। एक तो निर्दोष भावना से व्यव्हार कर रहा है पर दुसरे के मन में खोट हो तो नुकसान किसे होगा? आपको यह बात समझनी होगी।
अपने एक पुरुष में एक पिता को देखा होगा, एक भाई को देखा होगा, एक प्रेमी को देखा होगा पर शायद एक पुरुष में सिर्फ पुरुष को कभी नहीं देखा होगा। जब एक पुरुष एक पिता, भाई , पति या प्रेमी नहीं होता है और विशुद्ध रूप में पुरुष होता है तो उसे कोई लिहाज नहीं होता , ना भावनाओं का ना उम्र का , ना समाज का, ना सामाजिक रिश्तों का । पुरुष की इस मानसिकता से वशीभूत होकर ही तो एक ८१ वर्ष का आदमी १८ साल की युवती से विवाह कर लेता है।
तो मनीषा जी आप जिन सीमाओं को दुष्ट समझकर तोड़ देना चाहती हैं और जो सीमाएं आपकी समझ से आपको कमतर इन्सान बनती है वो आपके भले के लिए ही हैं। समाज या कानून द्वारा तय सीमा के अंतर्गत किया गया व्यव्हार किसी भी इन्सान को कमतर नहीं बनता। शायद यही वो मानसिकता है जिसके तहत आज का युवा रोड पर स्पीड की सीमा को या रेड लाइट पर रुकने को एक बंधन मानता है। उसे भी समाज के बनाये नियम कानून को मानाने से अह्सासे कमतरी होता है। ( अह्सासे कमतरी की वर्तनी मुझे ठीक नहीं लग रही, पर काफी पहले यह शब्द सुना था आज चेपने का मौका मिला है )
अच्छा अब कुछ लोग यह कह सकते हैं की पश्चिम के समाज में तो ऐसा नहीं है। तो इसका जवाब मैं जब मन करेगा तो जरुर दूंगा अभी ३१ मार्च है वक्त की कमी है।
रविवार, 28 मार्च 2010
और एक सेक्युलर मुस्लमान न बन पाया ...........
गुनगुना रहे हैं मसक , जग रही है गली गली,
वाह !वाह ! कितना कर्ण पीडक गीत है। यह सुन कर थोडा मूड बना गुनगुनाने का ।
सर्वप्रथम सभी ब्लॉग लिखने और पढने वाले निठल्ले भाईयों को मेरा नमस्कार । उन भाइयों को, जिनका ध्यान शीर्षक में मुस्लमान शब्द पढ़कर इस लेख की तरफ गया है, मैं यह वैधानिक चेतावनी देना चाहता हूँ की यहाँ आपको कुछ भी भड़काऊ नहीं मिलेगा अतः यहीं से वापस लौट जाये। आगे न बढ़ें।
मैं एक मच्छर हूँ।
मैं आपके घर में ही पैदा हुआ और शायद यहीं मर जाऊंगा और आपको पता भी न चलेगा।
क्या कभी अपने एक मच्छर के विषय में सोचा है? जानते हैं एक मच्छर कितना ताकतवर होता है । नहीं पता तो नानाजी से पूछो। ताकतवर होते हुए भी वो कितनी लाचारी की जिंदगी जीता है। कितने खतरे भरे होते हैं एक मच्छर के जीवन में। जरा सोचो आपका शिकार आपके सामने गहरी नींद में है। आप उसका खून चुसना चाहते हो, वो भी ऐसे की उसको पता न चले और aapka पेट भी भर जाये। वो सोता ही रहे। कितना कठिन कार्य है। विल्कुल एक नेता की तरह से काम करना पड़ता है।
कहीं आप इसलिए तो मुझ से घृणा नहीं करते की मैं खून चूसता हूँ? खून चुसना तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। पर जरा अपने भीतर तो झाकों । आपमे से बहुत से ऐसे हैं जिनके पास पेट भरने के लिए दुसरे रास्ते हैं या फिर जिनके पेट पहले से ही भरे पड़े हैं पर फिर भी वो दूसरों का खून चूसते हैं। घृणा करनी ही है तो उनसे करो।
हमारी कौम पर बहुत अत्याचार हुए हैं। आप लोगों ने हमें मिटने के लिए हर संभव उपाय किये हैं पर हमारा जीवट तो देखो हम अभी भी जिन्दा हैं और हमेशा रहेंगे।
कौम पर अत्याचार से मुझे धर्म की याद आ गयी। जब मैं पैदा हुआ तो मुझे नहीं पता था की खून चूसने के अलावा मेरा दूसरा धर्म क्या है? आपको पता है ही की जब हमें अपने धर्म का ज्ञान नहीं होता तो हम सेकुलर कहलाते हैं। वैसे हमारे सेकुलर कहलाने के और भी दुसरे कारण हैं।
मेरे पिता की रगों में एक मुस्लिम का खून था । मेरी माता की रगों में एक इसाई का खून और मेरी रगों में एक हिन्दू का खून बह रहा है। हम मच्छरों में यह संभव है। इसलिए भय्या हुए न हम सेक्युलर। एक दम सो फीसदी सेक्युलर।
इस देश के सभी तथाकथित सेक्युलर मेरे जैसे ही हैं।
ऐसा नहीं है की हम हमेशा ही सेक्युलर बने रहते हैं । कभी कभी हमारे भीतर भी धार्मिक भावनाए उमड़ पड़ती हैं। हम भी राजनैतिक इच्छाएं रखते हैं।
जब बजरंग दल का गठन हुआ तो मेरी रगों के बह रहा हिन्दू रक्त उबल खाने लगा। मुझे लगा की अब मुझे भी इस देश में पूजा जायेगा । मेरे भी मंदिर बनेगें।
मेरे भीतर का मच्छर बहुत खुश हुआ। मैने निर्णय लिया की मैं खुद को हिन्दू घोषित कर दूंगा।
मैं ख़ुशी ख़ुशी कटियार जी के पास गया और उन्हें कहा की वे मेरा चित्र अपनी ध्वजा पर लगायें और मेरा logo इस्तेमाल करें । विनय जी ने मेरी विनती पर कोई ध्यान नहीं दिया और मुझे भगा दिया।
आप ही बताएं क्या मेरा आग्रह वाजिब नहीं था? बजरंग बलि ने एक मच्छर का रूप धरकर ही तो लंका का भ्रमण किया था। तो क्या मैं बजरंग दल वालों के लिए पूजनीय नहीं हुआ? उन्होंने मेरी भावनाओ को ठेस क्यों पहुचाई?
आहत भावना से मैंने निर्णय लिया की अब मैं सेक्युलर से मुस्लमान बन जाऊंगा। सब कुछ तय हो गया। सारी तैयारी पूरी हो गयी थी पर एक technical problem हो गयी जिसकी वजह से मैं इस्लाम न अपना पाया।
कोई मेरा खतना करने को तैयार ही नहीं हुआ। और मैं सेक्युलर का सेक्युलर रह गया।
वाह !वाह ! कितना कर्ण पीडक गीत है। यह सुन कर थोडा मूड बना गुनगुनाने का ।
सर्वप्रथम सभी ब्लॉग लिखने और पढने वाले निठल्ले भाईयों को मेरा नमस्कार । उन भाइयों को, जिनका ध्यान शीर्षक में मुस्लमान शब्द पढ़कर इस लेख की तरफ गया है, मैं यह वैधानिक चेतावनी देना चाहता हूँ की यहाँ आपको कुछ भी भड़काऊ नहीं मिलेगा अतः यहीं से वापस लौट जाये। आगे न बढ़ें।
मैं एक मच्छर हूँ।
मैं आपके घर में ही पैदा हुआ और शायद यहीं मर जाऊंगा और आपको पता भी न चलेगा।
क्या कभी अपने एक मच्छर के विषय में सोचा है? जानते हैं एक मच्छर कितना ताकतवर होता है । नहीं पता तो नानाजी से पूछो। ताकतवर होते हुए भी वो कितनी लाचारी की जिंदगी जीता है। कितने खतरे भरे होते हैं एक मच्छर के जीवन में। जरा सोचो आपका शिकार आपके सामने गहरी नींद में है। आप उसका खून चुसना चाहते हो, वो भी ऐसे की उसको पता न चले और aapka पेट भी भर जाये। वो सोता ही रहे। कितना कठिन कार्य है। विल्कुल एक नेता की तरह से काम करना पड़ता है।
कहीं आप इसलिए तो मुझ से घृणा नहीं करते की मैं खून चूसता हूँ? खून चुसना तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। पर जरा अपने भीतर तो झाकों । आपमे से बहुत से ऐसे हैं जिनके पास पेट भरने के लिए दुसरे रास्ते हैं या फिर जिनके पेट पहले से ही भरे पड़े हैं पर फिर भी वो दूसरों का खून चूसते हैं। घृणा करनी ही है तो उनसे करो।
हमारी कौम पर बहुत अत्याचार हुए हैं। आप लोगों ने हमें मिटने के लिए हर संभव उपाय किये हैं पर हमारा जीवट तो देखो हम अभी भी जिन्दा हैं और हमेशा रहेंगे।
कौम पर अत्याचार से मुझे धर्म की याद आ गयी। जब मैं पैदा हुआ तो मुझे नहीं पता था की खून चूसने के अलावा मेरा दूसरा धर्म क्या है? आपको पता है ही की जब हमें अपने धर्म का ज्ञान नहीं होता तो हम सेकुलर कहलाते हैं। वैसे हमारे सेकुलर कहलाने के और भी दुसरे कारण हैं।
मेरे पिता की रगों में एक मुस्लिम का खून था । मेरी माता की रगों में एक इसाई का खून और मेरी रगों में एक हिन्दू का खून बह रहा है। हम मच्छरों में यह संभव है। इसलिए भय्या हुए न हम सेक्युलर। एक दम सो फीसदी सेक्युलर।
इस देश के सभी तथाकथित सेक्युलर मेरे जैसे ही हैं।
ऐसा नहीं है की हम हमेशा ही सेक्युलर बने रहते हैं । कभी कभी हमारे भीतर भी धार्मिक भावनाए उमड़ पड़ती हैं। हम भी राजनैतिक इच्छाएं रखते हैं।
जब बजरंग दल का गठन हुआ तो मेरी रगों के बह रहा हिन्दू रक्त उबल खाने लगा। मुझे लगा की अब मुझे भी इस देश में पूजा जायेगा । मेरे भी मंदिर बनेगें।
मेरे भीतर का मच्छर बहुत खुश हुआ। मैने निर्णय लिया की मैं खुद को हिन्दू घोषित कर दूंगा।
मैं ख़ुशी ख़ुशी कटियार जी के पास गया और उन्हें कहा की वे मेरा चित्र अपनी ध्वजा पर लगायें और मेरा logo इस्तेमाल करें । विनय जी ने मेरी विनती पर कोई ध्यान नहीं दिया और मुझे भगा दिया।
आप ही बताएं क्या मेरा आग्रह वाजिब नहीं था? बजरंग बलि ने एक मच्छर का रूप धरकर ही तो लंका का भ्रमण किया था। तो क्या मैं बजरंग दल वालों के लिए पूजनीय नहीं हुआ? उन्होंने मेरी भावनाओ को ठेस क्यों पहुचाई?
आहत भावना से मैंने निर्णय लिया की अब मैं सेक्युलर से मुस्लमान बन जाऊंगा। सब कुछ तय हो गया। सारी तैयारी पूरी हो गयी थी पर एक technical problem हो गयी जिसकी वजह से मैं इस्लाम न अपना पाया।
कोई मेरा खतना करने को तैयार ही नहीं हुआ। और मैं सेक्युलर का सेक्युलर रह गया।
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