बाबा रामदेव जी का अनिश्चित कालीन आमरण अनशन शुरू होने में सिर्फ एक दिन बाकि रह गया है. चार जून से बाबाजी अपने करोड़ों भक्तों के साथ आमरण अनशन शुरू करेंगे ताकि उनकी तीन प्रमुख निम्न मांगें मान ली जाएँ.
बाबाजी की राष्ट्रहित में तीन माँगे
- लगभग चार सौ लाख करोड़ रुपये का काला धन जो की राष्ट्रीय संपत्ति है यह देश को मिलना चाहिए ।
- सक्षम लोकपाल का कठोर कानून बनाकर भ्रष्टाचार पर पूर्ण अंकुश लगाना ।
- स्वतंत्र भारत में चल रहा विदेशी तंत्र (ब्रिटिश रूल ) खत्म होना चाहिए जिससे कि सबको आर्थिक व सामाजिक न्याय मिले ।
बाबाजी की मांगों को लेकर मेरे मन में संशय है की क्या बाबाजी के आमरण अनशन के टूटने से पहले उपरोक्त मागों में से कोई भी एक पूरी की जा सकती है?
ऐसा होना मुझे तो बिलकुल भी संभव नहीं दीखता. सरकार अगर अपने तमाम संसाधनों का उपयोग कर ले तो भी इन मांगों का पूरा होना संभव नहीं तो क्या स्वामीजी व्यर्थ में अपनी और अपने समर्थकों की जान जोखिम में डाल रहे हैं और अगर स्वामीजी को सिर्फ सरकार के आश्वासन से ही संतुष्ट होना है तो वो आश्वासन तो प्रधानमंत्री जी की तरफ से एक हफ्ता पहले ही मिल चूका है तो फिर अनशन पर बैठने की जिद क्यों?
सरकार स्वामी जी के समक्ष हाथ जोड़े खड़ी है की प्रभु आप जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा तो स्वामीजी आगे बढ़कर सरकार का मार्गदर्शन क्यों नहीं करते? काहे को दो चार रोज के लिए भूखे रहकर खुद की उस शक्ति को जोकि देश की सरकार को सही राह दिखने में खर्च की जानी चाहिए थी राम लीला मैदान में जाया कर रहे हैं? ये कैसी कलजुगी लीला है मेरे राम ?
क्या आमरण अनशन जोकि निश्चित रूप से लक्षित मांगों के पूरा होने से पहले ही ख़त्म हो जाना है, भ्रष्टाचार उन्मूलन से ज्यादा महत्वपूर्ण है?
कुछ बातें और भी ....
अपनी टिप्पणी में राहुल सिंह जी ने कहा.....
पर मुझे लगता है की कल्पनाओं और विचारों का तो स्वागत किया जा सकता है पर प्रयास तो सही दिशा में ही होने चाहिए. उदहारण के लिए एक उत्तम विचार/कल्पना है...
कौन कहता है की आसमां में छेद नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो.....
अब जरा सोचें की आपका पडोसी इस विचार को सही साबित करने के लिए प्रयास शुरू कर दे तो क्या होगा.
स्वामी जी का विचार तो उत्तम परन्तु प्रयास भी कुछ ऐसा ही निर्थक है.
@ संजय जी उस ईश्वर या प्रकृति ने भेड़ें बनाई हैं तो उसी ने भेडिये भी बनाये हैं पर भेड़ की खाल में छिपे भेडिये नहीं बनाये. मैं भेडियों तो सहन कर लेता हूँ (प्रकृति की देन हैं)पर भेड़ की खाल में छिपे भेडियों को नहीं.
@ आशीष श्रीवास्तव जी आपने मेरे विचारों को मजबूत सहारा प्रदान किया है. आपका बेहद धन्यवाद.
@ अली सर, धन्यवाद, गलती में सुधार कर दिया है.
@ संजय जी एवं आशीष जी आप दोनों ने मेरी बात को विस्तार दिया, इसके लिए आपका शुक्रिया.
@ दीपक जी, रामदेव जी के प्रति आपका झुकाव बनता है क्योंकि वो भी बाबा और आप भी बाबा :))
इसके साथ ही सभी को धन्यवाद और आभार.
@ दीपक जी, रामदेव जी के प्रति आपका झुकाव बनता है क्योंकि वो भी बाबा और आप भी बाबा :))
इसके साथ ही सभी को धन्यवाद और आभार.




