गुरुवार, 2 जून 2011

काश बाबाजी देश को सुपर पावर बनवाने के लिए सत्याग्रह करते.

बाबा रामदेव जी का अनिश्चित कालीन आमरण अनशन शुरू होने में सिर्फ एक दिन बाकि रह गया है. चार जून से बाबाजी अपने करोड़ों भक्तों के साथ आमरण अनशन शुरू करेंगे ताकि उनकी तीन प्रमुख निम्न मांगें मान ली जाएँ.

बाबाजी की राष्ट्रहित में तीन माँगे
  • लगभग चार सौ लाख करोड़ रुपये का काला धन जो की राष्ट्रीय संपत्ति है यह देश को मिलना चाहिए ।
  • सक्षम लोकपाल का कठोर कानून बनाकर भ्रष्टाचार पर पूर्ण अंकुश लगाना ।
  • स्वतंत्र भारत में चल रहा विदेशी तंत्र (ब्रिटिश रूल ) खत्म होना चाहिए जिससे कि सबको आर्थिक व सामाजिक न्याय मिले ।  
(बाबाजी के भक्तों के अनुसार तो बहुत सारे मुद्दे है  पर भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की वेबसाईट इन्हीं तीन प्रमुख मांगों की बात करती है. )


बाबाजी की  मांगों को लेकर मेरे मन में संशय है की क्या बाबाजी के आमरण अनशन के टूटने से पहले उपरोक्त मागों में से कोई भी एक पूरी की जा सकती है?

ऐसा होना मुझे तो बिलकुल भी संभव नहीं दीखता. सरकार अगर अपने  तमाम संसाधनों का उपयोग कर ले तो भी इन मांगों का पूरा होना  संभव नहीं तो क्या स्वामीजी व्यर्थ में अपनी और अपने समर्थकों की  जान जोखिम में डाल रहे हैं और अगर स्वामीजी को सिर्फ सरकार के आश्वासन से ही संतुष्ट होना है तो वो आश्वासन  तो प्रधानमंत्री जी की तरफ से एक हफ्ता पहले ही मिल चूका है तो फिर अनशन पर बैठने की जिद क्यों?

सरकार स्वामी जी के समक्ष हाथ जोड़े खड़ी है की प्रभु आप जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा तो स्वामीजी आगे बढ़कर सरकार का मार्गदर्शन क्यों नहीं करते? काहे को दो चार रोज के लिए भूखे रहकर खुद की उस शक्ति को जोकि देश की सरकार को सही राह दिखने में खर्च की जानी चाहिए थी राम लीला मैदान में जाया कर रहे हैं? ये कैसी कलजुगी लीला है मेरे राम ?

क्या आमरण अनशन जोकि निश्चित रूप से लक्षित मांगों के पूरा होने से पहले ही ख़त्म हो जाना है, भ्रष्टाचार उन्मूलन से ज्यादा महत्वपूर्ण है? 


कुछ बातें और भी ....

अपनी टिप्पणी में राहुल सिंह जी ने कहा.....

आदर्श या बेहतर स्थितियां के लिए कल्‍पना हो, विचार या प्रयास, स्‍वागतेय होना चाहिए.
पर मुझे लगता है की कल्पनाओं और विचारों का तो स्वागत किया जा सकता है पर प्रयास तो सही दिशा में ही होने चाहिए. उदहारण के लिए एक उत्तम विचार/कल्पना  है...

कौन कहता है की आसमां  में छेद नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो.....

अब जरा सोचें की आपका पडोसी इस विचार को सही साबित करने के लिए  प्रयास शुरू कर दे तो क्या होगा.

स्वामी जी का विचार तो उत्तम परन्तु प्रयास भी कुछ ऐसा ही निर्थक है.

@ संजय जी उस ईश्वर या प्रकृति ने भेड़ें बनाई हैं तो उसी ने भेडिये भी बनाये  हैं पर भेड़ की खाल  में छिपे भेडिये नहीं बनाये. मैं  भेडियों तो सहन कर लेता हूँ (प्रकृति की देन हैं)पर भेड़ की खाल में छिपे भेडियों को नहीं.


@ आशीष श्रीवास्तव जी आपने मेरे विचारों को मजबूत सहारा प्रदान किया है. आपका बेहद धन्यवाद.

@ अली सर, धन्यवाद, गलती में सुधार  कर दिया है.

@ संजय जी एवं आशीष जी आप दोनों ने मेरी बात को विस्तार दिया, इसके लिए आपका शुक्रिया.   

@ दीपक जी, रामदेव जी के प्रति आपका झुकाव बनता  है क्योंकि  वो भी बाबा और आप भी बाबा  :))

इसके साथ ही सभी को धन्यवाद और आभार.

बुधवार, 1 जून 2011

अरे बाबा तन्ने बेरा ना के भ्रष्टाचार का साप समाज को भी सर से निगले है.

इस बाबा का मन भाई ठीक ना है. ना जी कतई ना .

इस बाबा  के मन में राजनैतिक चोर है ... हाँ भाई   बिलकुल हाँ.

आज तक तो ये बाबा बोले था की समाज को भ्रष्टाचार का नाग डस रहा  हैं. इब इस ललिता पवार के छोटे भाई ने ये ना बेरा है के डसने के बाद सापं अपने शिकार को खावे कित से हैं.

हैं जी... ना इब आप  ही बताओ. जब भ्रष्टाचार के नाग ने डस ही लिया तो इब वो खायेगा तो ऊपर से ही ना..
तो ऊपर वालों पर ही तो नज़र रखनी चाहिए.  

ये कुछ बातें हैं जो मैंने बाबा रामदेव जी के लिए उन्हीं की खड़ी हरियाणवी  भाषा में कहीं हैं. मैं इससे ज्यादा इस प्रकार की भाषा में बात नहीं कर सकता इस लिए अपनी औकात पर आता हूँ.

मेरे मन में बाबा रामदेव की राजनैतिक आकाँक्षाओं कहीं थोडा सा संदेह था जो अब निसंदेह में बदल गया है. बाबा रामदेव अगर मन से सच्चे होते तो शायद वो कहते की सांच को आंच नहीं और सर्वोच्च पद पर स्थापित लोगों के ऊपर सबसे ज्यादा नज़र रखने की बात करते. पर ऐसा उन्होंने किया नहीं. शायद कहीं ना कहीं उनके मन में ये विशवास हैं की आने वाले समय में वो इस देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं इस लिए प्रधानमंत्री और दुसरे उच्च पदों पर आसीन लोगों को लोकपाल बिल से उन्होंने अलग रखने की बात की है.

ये मेरा अपना अनुभव है की भ्रष्टाचार की शुरुवात उच्च पदों से ही होती है. अगर राजा भ्रष्ट होगा (जो की वो था ही) तो निश्चित है की उसके राज्य की प्रजा भ्रष्टाचारी होगी ही क्योंकि हम हमेशा अपने से ऊपर वाले की नक़ल करते हैं. अगर हमारे देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन लोग खुद ही अपने को लोकपाल के समक्ष निगरानी के लिए प्रस्तुत कर दें तो इस बात का समाज के सभी वर्गों में ये सन्देश जायेगा की इस देश में वी आई पी कोई नहीं. कानून सबके लिए बराबर है.

हमारे देश में  सभी लोग वी आई पी स्टेटस के लिए मरे जाते हैं क्योंकि एक  वी आई पी सामान्य नियम कानूनों के  परे होता है, उनसे ऊपर होता है. उच्च पदों पर आसीन लोगों को लोकपाल बिल में वी आई पी स्टेटस देने का मतलब है आम आदमी को ये सन्देश देना की ये लोग चाहे जो कुछ कर ले इनका कुछ नहीं होगा.

मैं माननीय अन्ना हजारे के इस प्रस्ताव का घोर समर्थन करता हूँ की देश को चलाने वाले सभी लोगों की सारी गतिविधियाँ (उनके हगने और मूतने को छोड़कर) हमेशा आम जनता की कड़ी निगरानी में रहनी चाहिए. क्योंकि अगर इन लोगों को भ्रष्ट कार्य करने का मौका नहीं मिलेगा तो ये लोग  अपने से नीचे के लोगों में भी भ्रष्टाचार को सहन नहीं करेंगे.

रविवार, 29 मई 2011

निहारना या घूरना.


कल शाम अपनी बिटिया के साथ सब्जी मंडी में एक दुकान पर प्याज छाट रहा था की देखा मेरी बिटिया सब्जी वाले को घूरे जा रही है. सब्जी वाला खरबूजा खाने में मगन था. मेरी बिटिया सब्जी वाले के एकदम बगल में ही खड़ी थी और निसंकोच उसे एकटक घूरे जा रही थी. पता नहीं उसका मन इस चीज के लिए ललचा रहा था या फिर वो सब्जी वाले के खरबूजा खाने के स्टाइल पर आश्चर्य चकित थी. प्याज लेने के बाद मैं बिटिया को लेकर पास में ही खरबूजे बेच रहे दुकानदार के पास गया और बिटिया को खरबूजे दिखाए तो उसने खरबूजों में जरा भी रूचि नहीं ली बाकि उसे लाल तरबूज ज्यादा पसंद आए. मैंने थोडा हिचकते हुए (क्योंकि आजकल जब  तरबूजों की चीनी  कम होती है तो  कृत्रिम उपाय अपना कर उसे बढ़ा दिया जाता है )  एक छोटा लाल चीनी तरबूजा लिया  और घर के लिए वापस लौट आया.

घर लौटते हुए मेरा मन हमारे घूरने की आदत पर ही अटका रहा. मुझे लगता है की कहीं न कहीं घूरने की आदत मानव स्वाभाव का ही एक हिस्सा है जो बाल्यकाल से ही हमारे साथ होता है. जैसे जैसे हम सामाजिक तौर तरीके सीखते जाते हैं या दुसरे शब्दों में कहूँ की हम सभ्य होते जाते हैं तो  हम अपनी इस आदत पर लगाम कसते जाते हैं.  

घूरना  का  एक भाई  भी है जिसे हम कहते हैं निहारना. घूरने और निहारने में क्या अंतर है? इन दोनों में वही अन्तर है जो राम लखन फिल्म के राम और लखन में था.  किसी को घूरना  एक सभ्य समाज में एक बुरी बात समझा जाता है पर आप किसी को भी प्यार से निहार सकते हैं. स्त्रियाँ निहारे जाने को तो पसंद करती हैं पर घूरे जाने को बिलकुल भी पसंद नहीं करती. मेरे एक मित्र निर्दोष भाव से सुन्दर स्त्रियों को निहारना पसंद करते हैं. मैंने उन्हें बताया की आप अपने घर की स्त्रियों को निहार सकते हैं पर परायी नारी  को देखेंगे तो इसे  बुरा समझा जायेगा. इस पर उन्होंने जो सफाई दी वो मुझे बहुत पसंद आयी . उन्होंने कहा की उनके निहारने या घूरने की आदत पर उनका कोई बस नहीं है. सारा कसूर निगाहों का है जो सीधी सपाट और समतल जगहों पर से तो फिसल जाती है पर वक्रता और गोलाई लिए हुए हर चीज पर टिकी रहती है.

उसकी बनियान मेरी बनियान से सफ़ेद कैसे.


हम भी क़यामत पर नज़र रखते हैं.

लगभग हर पुरुष सुन्दर स्त्री को निहारना पसंद करता है पर ये उसकी बदकिस्मती है की उसका किसी सुन्दर स्त्री को प्रशंसा की निगाह  से निहारना घूरने में परिवर्तित हो जाता है और उस बेचारे को सभ्य समाज के सामने थोड़ी शमिंदगी उठानी पड़ती है. मैं जब भी किसी सार्वजनिक स्थल पर होता हूँ  तो  मेरा समय आसानी से ये देखने में बीत जाता है की कौन आदमी किस को घूर  या निहार रहा है.  ये बहुत मजेदार खेल है. मुझे सबसे ज्यादा तब मजा आता है जब किसी सुन्दर स्त्री को कोई दूसरी स्त्री निहार रही होती है और वो खुद इस बात से बेखबर होती है की कोई और (मेरे जैसा) उसे भी बड़ी तन्मयता से निहारे जा  रहा है.

घूरने और घूरे जाने का ये चक्र बड़ा मजेदार होता है. मैंने कहीं पढ़ा था की स्त्रियाँ बनाव श्रृंगार करती ही निहारे जाने के लिए हैं. अगर आपके बनाव श्रृंगार को देखने वाला कोई न हो तो उसका फायदा ही क्या परन्तु किसी अजनबी द्वारा  घूरा जाने उन्हें पसंद ही नहीं होता. पर यार अगर आप कहीं मीठा रखो और ये सोचो की सिर्फ आपकी पालतू मधुमक्खियाँ ही आयेंगी तो ये आपकी गलती है. हमेशा ये धयान रखो की मीठे पर मधुमक्खियाँ आयें या न आयें गन्दगी पर मंडराने वाली मक्खियाँ जरुर आयेंगी अतः उनसे बचने का कोई न कोई बंदोबस्त हमेशा ही करके चलो.
हमें किसी को घूरने से मिलता क्या है? मैं जब भी खुद को ऐसी स्थितियों में रंगें हाथो पकड़ लेता हूँ तो हमेशा अपनी गिरेहबान में झांक  के  यही सवाल पूछता हूँ की बेटे तुझे मिला क्या.  किसी को चोरी छिपे कनखियों से निहारना  या घुरना मालूम नहीं जाने कौन सा गूंगे का गुड है जो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. हम बरबस ही इस और खिचे जाते है.

चलो जो भी हो उन सभी लोगों को मेरा प्रणाम जो बेफिक्र हो दूसरों को घूरते हैं और साथ ही साथ एक छोटा सा सन्देश की  

" देखि जां पर छेड़ी ना ".


 इस भाव को अंग्रेज कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं.

गुरुवार, 26 मई 2011

क्या डॉक्टर साहिबा बेईमान हैं.

कुछ पाच छः दिनों पहले हमने ध्यान दिया की शाम को दोस्तों के साथ खेल कर लौटने पर बेटे की आँखों का सफ़ेद हिस्सा  लाल हो जा हो जाता है. मैंने  बालक को अपने जान पहचान के चिकित्सक डाक्टर जोशी को दिखाया जिनकी हमारी मंडावली में बहुत अच्छी प्रक्टिस चल रही है. डाक्टर साहब ने एक आई ड्रॉप लिख दी और बताया  की आँखों ये लाली गरमी और धुल धक्कड़ में खेलने के कारण हो रही  है, जल्दी आराम आ जायेगा, चिंतित न हों. दो तीन दिन आंख में दावा डालने के पश्चात् आंख की लाली चली गयी पर कल  शाम को जब  बिटुवा खेल कर वापस आए तो उनकी आँखों के लाल डोरे फिर नज़र आ रहे थे. मन में थोड़ी शंका सी हुई तो निश्चय किया की इस बार किसी नेत्र विशेषज्ञ को ही दिखाया जाय.

मुझे अपने  घर के आस पास प्राइवेट प्रक्टिस कर रहा कोई भी नेत्र विशेषज्ञ अभी तक दिखाई नहीं दिया  है. सरकारी अस्पताल में मेरा जानें का मन नहीं करता क्योंकि वहां जाने के बाद, तमाम जानपहचान के बावजूद,  मेरा सारा दिन ख़राब हो जाता है.   इसलिए मैं अपने बेटे को मेरे घर के पास के एक तारावती चेरिटेबल मेडिकल सेंटर में ले गया. मैंने बच्चे का  ओ पी डी कार्ड बनवाया जिसमे सिर्फ दस रुपये लगे. मुझे बड़ी ख़ुशी हुई की मात्र दस रुपये में एक नेत्र विशेषज्ञ की सेवाएं मिल जाएँगी. मन ही मन मैं तारावती चरितेबल ट्रस्ट वालों को धन्यवाद करने लगा. यहाँ पर डाक्टर अर्चना परवानी नेत्र विशेषज्ञ के रूप में कार्य करती हैं. उनकी सहायक ने कुछ दो तीन मिनट बाद ही बच्चे का नाम पुकारा तो मैं बड़ी ख़ुशी से बच्चे को अन्दर ले गया. यहाँ मुझे पहला झटका लगा जब डाक्टर साहिबा की एक सहायिका ने बच्चे की नेत्र ज्योति की जाँच के लिए बच्चे से चार्ट पढवाना शुरू कर दिया. मैंने उन्हें बताया की बच्चे की नेत्र ज्योति ठीक है बस इसकी आंख में लाली है जिसकी जाँच के लिए मैं बच्चे को लाया हूँ. मेरी इस हिमाकत पर उन्होंने मुझे मुह पर उंगली रख कर चुप रहने का इशारा किया और कार्ड पर बच्चे का विजन सिक्स बाय सिक्स  लिख कर मुझसे काउंटर पर पचास रुपये जमा करवाने के लिए कहा. बताया गया की आंख की जाँच होगी.  

हमेशा की तरह से मुझे पहली बार में ही बात कुछ समझ में नहीं आई. दुबारा पूछने पर पता चला की ये पैसे आंख की पुतली की जाँच के लिए जमा करवाने हैं. आंख में  दवाई डाली जाएगी उसके बाद आंख की पुतली की जाँच होंगी. पूरी प्रक्रिया में डेढ़ दो घंटे लगेंगे.  मेरे साथ आए सभी दुसरे मरीजों को भी यही सारी बात दोहराई गयी और पैसे जमा करवाने के लिए कहा गया. अब चूँकि मैं अपनी नौकरी के शुरुवाती दौर में जी टी बी हॉस्पिटल में कार्य कर चूका हूँ और पचासों मरीजों को नेत्र विभाग में दिखाया है अतः मुझे मालूम था की आंख की हर छोटी मोटी तकलीफ के लिए  dilation  करवाने को नहीं कहा जाता. मैंने जब डाक्टर साहिबा से बात करनी चाही तो  मुझे जवाब मिला की हमारे चेरिटेबल ट्रस्ट का यही तरीका है आप अपना मरीज दिखाना चाहते हो तो जैसा कहा जा रहा है वैसा करो वर्ना मरीज को कहीं और ले जाओ.

लो जी गयी  भैस फिर से पानी में. थोड़ी देर पहले मैं जिन तारावती ट्रस्ट वालों को मन ही मन धन्यवाद दे रहा था अब उनकी असलियत जान के दुखी हो रहा था.ये लोग गरीब आदमी की जेब में चोरी छुपे डाका डाल रहे हैं. एक धर्मार्थ संस्था लोगों को ठग रही है. चेरिटेबल ट्रस्ट के नाम पर तारावती संस्था वाले सरकर  से जाने क्या क्या छुट लेते होंगे पर असलियत में आम लोगों को दूसरों की तरह ही चोरी छिपे लुट रहे हैं. घर आकर सबसे पहले मैंने डाक्टर साहिबा के खिलाफ एक शिकायती पत्र दिल्ली  मेडिकल कौंसिल को भेजा. अब सोचता हूँ की कल एक पत्र तारावती चेरिटेबल ट्रस्ट वालों को भी लिख ही दूँ. हो सकता है की डाक्टर साहिबा अपने कर्म को आसानी से सही साबित कर दें पर अगर  मेरी इस लेटर बाज़ी से इन  बेईमान लुटेरों के दिल में खोफ का एक अंश भी पैदा हो पाया तो मैं समझूंगा मेरा प्रयास सफल रहा.

सोमवार, 23 मई 2011

ये स्त्रियों का कौन सा गुण है?

दो सच्ची घटनाएँ बयान कर रहा हूँ जिनके विषय में मेरे पास प्रथम पुरुष जानकारी (फर्स्ट हैण्ड इन्फोर्मशन)  उपलब्ध है. मेरी पूरी कोशिश है की कम से कम शब्दों में अपनी बात कही जाए  ताकि आपका कीमती वक्त बर्बाद न हो. कृपया ध्यान से पढ़ें और बताएं की ये स्त्रियों का कौन सा गुण है.

पहली घटना.

मेरी पहली पोस्टिंग के वक्त मेरी  जानपहचान  एक बहुत ही सुन्दर और सुशील  नर्स से हुई जो अपने कार्य  के प्रति पूरी तरह से समर्पित थीं(अपने कार्य  के प्रति समर्पण सरकारी कर्मचारियों का एक दुर्लभ गुण है)  .  इन्होने एक निखट्टू  से प्रेम विवाह किया था. पति निखट्टू होने के साथ साथ पियक्कड़ भी  था.  धीरे धीरे  उनके प्रेम और विवाह के सारे घटनाक्रम की जानकारी मुझे उन्हीं के मुख से प्राप्त हुई. उन्हें अपने इस प्रेमी से पहली नज़र में प्यार नहीं हुआ था बल्कि शुरू में तो वो आवारा लड़का उन्हें बिलकुल भी पसंद नहीं था और उन्होंने अपने भाइयों से उसकी एक दो बार जबर्दस्त पिटाई भी करवाई पर फिर आहिस्ता अहिस्ता  उस निखट्टू के प्रेम का रंग उन  पर चढ़ ही गया और अंततः इन नर्स महोदया ने अपने परिवार के जबरदस्त विरोध के बावजूद अपने इसी प्रेमी के साथ, जिसकी कभी शुरुवात में इन्होने पिटाई  करवाई थी, विवाह कर घर बसा लिया और अब दो बच्चों के साथ उसका लालन पालन कर रही थी .

दूसरी घटना.

मेरे बचपन के एक सखा हैं जो  अपने माता पिता की ग्यारह  जीवित संतानों  में से सबसे आखिरी पायदान पर हैं. इनके दसवें पायदान वाले भाई साहब ने अपनी मुफ्तखोरी की आदत  की वजह से अपनी माता के नाम का २२५ गज का प्लाट जिसका बाजार मूल्य उस वक्त करीब २५ लाख रुपये  था सिर्फ दस या पंद्रह हज़ार रुपयों में हमारी कालोनी के ही एक नामी  गिरामी गुंडे के पास, जिसका काम ही लोगों की प्रोपर्टी हड़पना था,  गिरवी रखवा दिया. कोई बात नहीं घर के सदस्यों  ने अपने भाई के इस अपराध को क्षमा कर दिया. बड़ी जद्दोजहद के बात मेरे मित्र ने अपने लिए एक ५० गज के प्लाट का जुगाड़  किया और उसमे मकान बनवाया. मित्र के वही बड़े भाई जिनकी कृपा से वो लोग सड़क पर ही आ गए थे उनके साथ बने रहे हालाँकि  उनके रवैये में जरा भी गंभीरता नहीं आई. मेरे मित्र की शादी कर दी गयी और उनके उस बड़े भाई का विवाह नहीं हो पाया क्योंकि वो  मुफ्तखोरी और मटरगस्ती  अपनी आदत को छोड़ नहीं पाए  थे. खैर मेरे मित्र ने विवाह के बाद भी अपने बड़े भाई को अपने घर अपने साथ ही रखा और अपनी पत्नी से बड़े भाई को वही सम्मान दिलवाया जो एक जेठ को मिलना चाहिए . माता जी भी अपने सभी ज्यादा संपन्न और स्थापित पुत्रों को छोड़ अपने सबसे छोटे बेटे के पास ही रही. कहते हैं की माता को अपना सबसे छोटा पुत्र सबसे ज्यादा  प्यारा होता है. एक दिन मुफ्तखोर जेठ ने अपनी बहु यानि मेरे मित्र की पत्नी के साथ कोई शारीरिक छेड़खानी कर दी जो मेरे मित्र को  सहन नहीं हुआ और उन्होंने  अपने बड़े भाई को घर से निकल दिया. इस घटना को लेकर मेरे मित्र की माताजी सारी बातें अच्छी तरह से जानते हुए भी अपने अंतिम वक्त तक मेरे मित्र यानि अपने सबसे छोटे पुत्र और उनकी पत्नी  से नाराज ही रहीं.  


मुझे तो लगता है की ये स्त्रियों का भावुकता  वाला गुण है.(पता नहीं गुण है या कुछ और)

आप  बताएं ये दोनों उपरोक्त घटनाएँ स्त्रियों के किस गुण की और इशारा करती दिखाई पड़ती हैं.

रविवार, 22 मई 2011

प्रेम विवाह - मेरा नजरिया.


मैं प्रेम विवाहों का घोषित  विरोधी हूँ. अपने आस पास जब भी कहीं कोई प्रेम विवाह होता है जिसमे कोई अड़चन  आ रही हो तो ऐसी जगह पर एक पत्थर मैं भी अपनी और से अड़ा  आता हूँ.

अपने  ३८ वर्षीय जीवन काल में मैंने सिर्फ एक बार प्रेम विवाह की चाह रखने वाले जोड़े का समर्थन किया है. सिख धर्म को मानाने वाले मेरे दो सहकर्मी विवाह करना  चाहते थे. . दोनों बच्चे २५ वर्ष की आयु पार कर चुके थे. सिख लड़का लड़की से ज्यादा संपन्न था. लड़की रूप सौंदर्य में लडके के सामने बिलकुल भी नहीं ठहरती थी. दोनों एक ही धर्म के अनुयायी थे. इस तरह मेरी नज़र में ये प्रेम विवाह के लिए एक आदर्श केस था.  इसके अलावा   मुझे कभी भी किसी प्रेम विवाह का समर्थन करने का मौका नहीं मिला. जितने भी मामले  मेरी नज़र में आए उन सभी में, मैं  अपनी तरफ  से एक रोड़ा अटका के ही आया.

मैं प्रेम विवाहों का उन मामलों में सख्त विरोध करता रहा हूँ जहाँ लड़की की उम्र १७-२० के आस पास की रही हो और  वो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न हो. अधिकतर प्रेम विवाहों में अड़चन प्रेमियों के अलग अलग समाजों और धर्मों से जुड़े होने के कारण होती है.  एक अलग जातीय और सामाजिक  पृष्ठभूमि में पली बढ़ी युवती अपने ससुराल वालों के रीती रिवाजों और परम्पराओं से जुड़ नहीं पाती और इस वजह से उसे अपने वैवाहिक जीवन में ज्यादा संघर्षों का सामना करना पड़ता है. मेरे परिवार की एक लड़की ने यु पी के स्थानीय ब्राह्मण  परिवार के लडके से प्रेम विवाह किया. शुरू के जाने पहचाने विरोध के बाद लडके और लड़की के माता पिता विवाह के लिए मज़बूरी में रजामंद हो गए. अब लड़की  अपने ससुराल पक्ष में प्रचलित बहु के कठिन "बहु- धर्म" निबाहते निबाहते तरह तरह के मानसिक और शारीरिक विकारों की शिकार हो चुकी है. सपष्ट है लड़की ने आवेश में आकार प्रेम विवाह तो कर लिया पर विवाह के उपरांत अपने ससुराल पक्ष की अपेक्षाकृत बड़ी हुई उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई और विवाह के १२ वर्षों के उपरांत भी अपनी ससुराल में एक अवांछनीय बाहरी सदस्य बनकर बेकार की मुसीबतों  को झेल रही है. तो वो प्रेम जिसके लिए उसने अपने माता पिता और सास ससुर  की इच्छाओं के विरुद्ध जाकर विवाह किया आज उसके जीवन में सुख नहीं बल्कि दुःख का घोल रहा  है.   

कुछ लोग ऑंखें  बंद करके प्रेमी जोड़ों को विवाह करने की आजादी देने की वकालत करते  हैं. मैं सोचता हूँ की प्रेम का क्या है प्रेम तो एक शाश्वत भावना है जो हर इन्सान के अन्दर पैदायशी होती है. हम हर उस चीज से प्रेम कर बैठते हैं जिसे अपने जीवन में एक दो बार देख लेते हैं. इन्सान का जन्म ही प्रेम करने के लिए हुआ है इसलिए  प्रेम करने की गलती को तो माफ़ किया जा सकता है  पर विवाह उन्ही जोड़ों का होना चाहिए जो इसे सही ढंग से निबाहने की काबिलियत रखते हों.

विवाह बंधन में बंधना उन प्रेमी जोड़ों के लिए ठीक है जो अपने घर परिवार और समाज से दूर रहते हैं या जिनका अपने परिवार से संपर्क थोडा बहुत ही रहता है. यहाँ पर भी लड़की का  आर्थिक रूप से आत्म निर्भर होना बहुत जरुरी  है ताकि  किन्ही परिस्थियों में यदि उनके बीच कोई दरार आती है तो कम से कम लड़की का भविष्य तो सुरक्षित रहे. शायद इसी वजह से उन प्रेम जोड़ों के मध्य का विवाह बंधन जो अपने परिवारों से दूर किसी महानगर में जीवन यापन कर रहे हैं,धीरे धीरे   समाज में मान्यता प्राप्त करता जा रहा है और मेरे जैसे प्रेम विवाह के घोर विरोधियों को भी अपनी जबान पर ताला लगाने  को मजबूर करता  है.

सामान्य परिस्थितियों में , मैं  अरेंज्ड मेरिज का समर्थक हूँ क्योंकि विवाह उपरांत जब प्रेम का भूत उतर जाता है और जमीनी सच्चाई सामने आती है तो सभी को अपने घर परिवार के लोग याद आते हैं. परम्परागत रूप से होने वाली  अरेंज्ड मेरिज में भी पति पत्नी को एक दुसरे से सामंजस्य बैठने में दिक्कते आती है पर वो परिवार और समाज के सहयोग से सुलझ जाती है परन्तु जिस सम्बन्ध के लिए परिवार और समाज ही तैयार न रहा हो उसमे आई  किसी दिक्कत को दूर करने के लिए प्रेमी जोड़े के पास कोई सहायता नहीं होती और इसलिए प्रेम विवाह आसानी से टूट जाते हैं.

विवाह तो अपने आप में ही एक सामाजिक समझोता है जिसे समाज और परिवार के सहयोग से कायम रखा जाता रहा है इसलिए अपने  प्रेम विवाह पर   परिवार और समाज की अनुमति और सहमती की मुहर जरुर लगवाएं और अपने सुखी विवाहित जीवन की संभावनाओं में बढोतरी करें .  


मंगलवार, 17 मई 2011

खुद को पहचानो.

Gabriella Pasqualotto
इन्डियन प्रीमियर लीग की प्रोत्साहन बाला बहन कुमारी गेब्रिएला को भारतीय आकाओं ने आइ पी एल के कुछ सत्यों को समाज के सामने लाने की वजह  से निष्कासित कर दिया है. जब उनके ब्लॉग में लिखी बातों का मुझे पहली बार पता चला मैंने तभी ये अनुमान लगा लिया था की इसकी भैस तो गयी पानी में. 

सत्यवादी हरीशचन्द्र  की इस धरा में सत्य उद्घाटित करने वालों के साथ क्या होता है ये किसी से छिपा नहीं हैं.उस बेचारी ने जो कुछ कहा उसमे कितना सत्य था और कितना झूट इस बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. लोगों को चिंता थी तो बस उन स्थापित लोगों के कुकर्मों पर किसी तरह से पर्दा डालने की और ये तभी हो सकता था जब की उसकी आवाज को दबा दिया जाय जो उन्होंने बखूबी कर ही दिया. इस घटना के प्रकाश में आने के तीन दिन के भीतर बहन कुमारी गेब्रिएला का  कोई नाम लेवा नहीं है. हमारे संवेदनशील, भावुक मीडिया जन आइ पी एल में मगन हैं.

मेरे लिए तो इस घटना के बहुत मायने हैं. इस घटना ने मेरे सामने एक बार फिर से ये बात साफ़ कर दी की हम  लोग इस दुनिया के सबसे सच्चे  snobs हैं. हम लोगों के लिए ईमानदारी, सत्चरित्र, सच्चाई  सब आदर्शवादी बातें हैं जो हम बस किताबों में लिखे जाने  के लिए ही करते हैं वास्तविक जीवन में अपनाने के लिए कभी नहीं. भीतर से हम लोग वही हैं जो हम हैं.

हम लोग कहते हैं की देश में भ्रष्टाचार की जड़ ये राजनेता और बड़े नौकर शाह या व्यापारी लोग है. जी नहीं .. मेरी नज़र में तो हमारे देश की सभी समस्याओं का मूल कारण हमारा यही sweep everything under the carpet वाला नजरिया है जिसमे  हम समर्थ की हर  गलत बात को सीधे सीधे नज़र अंदाज कर देते हैं और अगर कोई गेब्रिएला की तरह से कभी कहीं एक छोटा सा प्रयास करता भी है तो उसका समर्थन करते हुए कहीं न शर्मा जाते हैं, हिचक जाते हैं.

आप डुगडुगी बजाकर तमाशा करें, मसखरी करें  बहुत से लोग इक्कट्ठे हो जायेंगे पर कहीं कोई छोटी सी गंभीर बात करें जहाँ पर सत्य को स्वीकारना जरा भी मुश्किल हो तो जनाब आपको आपके साथ हमेशा खड़े रहने वाले लोग भी दूर दूर तक दिखाई नहीं देंगे.

मैं तो इस विषय पर यही विचार रखता हूँ और दूसरों के क्या है जानना चाहता हूँ. वैसे कुछ लोग इस बार भी कुछ कहते हुए हिचक या शर्मा  ही जायेंगे और सिर्फ शुभकामनायें देते हुए ही निकल लेंगे. ... क्यों जी मैं की झुट बोलियाँ ...  
.  

ये भद्र महिला हम लोगों की ही तरह एक ब्लॉगर हैं .वैसे शायद इनका ब्लॉग हटा दिया गया है पर इनके विषय में थोडा बहुत ज्ञान आप निम्न लिंक पर प्राप्त कर सकते हैं.



यहाँ पर मैं डाक्टर साहब को भी धन्यवाद दूंगा की उन्होंने इस बार फिर से मेरी इज्ज़त बचाई. अब आप मेरे लिए डाक्टर कृष्ण कुमार हैं :-))